Wednesday, June 1, 2011

सब्सिडी के मुद्दे पर विचार जरूरी


लगातार बढ़ती महंगाई बीते कुछ वर्षो से सरकार के लिए परेशानी का सबब बनी हुई है। खाद्य वस्तुओं की कीमतों में लगी आग से आम लोगों में बढ़ती नाराजगी के चलते सरकार इसके सियासी कुप्रभाव से आशंकित है। इस पर काबू पाने के लिए भारतीय रिजर्व बैंक द्वारा लगातार अपनी मौद्रिक नीतियों में बदलाव किए गए हैं लेकिन कतिपय घरेलू और अंतरराष्ट्रीय कारकों के चलते महंगाई पर लगाम लगाने की कवायद को नीति निर्धारकों की उम्मीदों के अनुरूप सफलता नहीं मिल रही है। महंगाई की घरेलू वजहों में उत्पादन-वितरण तंत्र में निहित खामियां, जमाखोरी और मांग-आपूर्ति में असंतुलन को गिना जा सकता है। केंद्र और प्रदेश सरकारों द्वारा जवाबदेही एक-दूसरे पर ठेलना भी इसकी प्रमुख वजह है। लेकिन इसके अंतरदेशीय कारण भी हैं। जिनमें पेट्रो पदार्थो की कीमतों में लगातार हो रही बढ़ोतरी प्रमुख है। दुनिया में आर्थिक मंदी की आशंकाओं के कम होने और इससे भी बढ़कर विश्व के प्रमुख पेट्रो उत्पादक अरब देशों में चल रही अस्थिरता के चलते तेल की कीमतें नई ऊंचाइयों की ओर अग्रसर हैं। बताने की जरूरत नहीं कि पेट्रोलियम पदार्थ आर्थिक-औद्योगिक गतिविधियों के मेरुदंड हैं और इनकी कीमतों में परिवर्तन का असर पूरी दुनिया की वित्तीय गतिविधियों पर पड़ता है। भारत भी इससे अछूता नहीं है। महंगाई के मोर्चे पर अभी हो यह रहा है कि सरकार बाकी उपायों से हालात को जितना नियंत्रित करती है, बढ़ी हुई पेट्रो कीमतें सब गुड़-गोबर कर देती हैं। गौरतलब है कि भारत में पेट्रोलियम पदार्थो के भंडार बेहद सीमित हैं। वर्तमान में हम अपनी कुल जरूरत का महज 20 फीसद तक ही घरेलू जरिए से पूरा कर पाते हैं शेष 80 फीसद हिस्सा हमें आयात करना होता है। पेट्रोलियम आयात के इस भारी-भरकम बिल से सरकार की आर्थिक सेहत लगातार बिगड़ती जा रही है। साथ ही बड़ी समस्या पेट्रोल, डीजल, एलपीजी और केरोसिन को लोगों तक रियायती दर पर उपलब्ध कराना भी है। इस क्रम में दी जाने वाली सब्सिडी सरकार के योजनाकारों को उदारीकरण की राह में बाधक दिखती है। नतीजा यह कि सरकार द्वारा आर्थिक सुधार के नाम पर पहले तो पेट्रोल की कीमतों को नियंतण्रमुक्त किया गया और अब डीजल के बाबत भी ऐसा करने पर विचार की बात हो रही है। अब तो शायद ही कोई महीना-दो महीना ऐसा गुजरता हो जब पेट्रो पदार्थो की कीमत बढ़े। पहली नजर में तो सरकार का यह तर्क ठीक समझ आता है कि सब्सिडी के बढ़ते बोझ की एक सीमा है लेकिन लोगों पर किए जा रहे इस एहसान को जताते वक्त यह तथ्य छुपा दिया जाता है कि डीजल-पेट्रोल की कीमतों में एक मोटा हिस्सा उन करों का भी है जिसे केंद्र और प्रदेश सरकारें वसूलती हैं। दरअसल, समस्या सब्सिडी देने में नहीं बल्कि उसके तौर-तरीके और पात्र-अपात्र में भेद नहीं किए जाने के चलते है। यदि कोई गरीब केरोसिन से अपनी झोपड़ी रोशन करता है, कोई किसान डीजल से खेतों की सिचाई करता है और कोई निम्न-मध्यवर्गीय व्यक्ति पेट्रोल का इस्तेमाल अपने दुपहिया वाहन को चलाने के लिए करता है तो उसे रियायती दर पर ये उत्पाद मुहैया कराना सरकार की जिम्मेदारी है और यह सब्सिडी का सही उपयोग है। लेकिन यदि केरोसिन का इस्तेमाल उद्योग चलाने और डीजल-पेट्रोल का उपभोग लाखों रुपये के लक्जरी वाहन चलाने में किया जाता है तो इन पर सब्सिडी सार्वजनिक धन की बर्बादी है। लेकिन दुर्भाग्य से अब तक ऐसी कोई पण्राली विकसित नहीं की जा सकी है जिससे इन चीजों के उपयोग और उपभोग में अंतर किया जा सके। परिणाम यह है कि मूल्य वृद्धि से जहां निम्न आय के तबके की कमर टूट रही है वहीं सब्सिडी का बड़ा लाभ ऐसे लोग उठा रहे हैं जिन्हें इसकी कोई वास्तविक जरूरत नहीं। बीते वर्षो में सरकार ने सामाजिक कल्याण की योजनाओं पर निवेश बढ़ाया है। इसे जारी रखने तथा व्यापक स्वरूप देने के लिए सरकार की आर्थिक सबलता बेहद जरूरी है। लेकिन इस प्रयास में पेट्रोलियम सब्सिडी घटाते समय तथा बढ़े व्यय का भार जनता पर डालते समय सरकार को इस भार को उठाने वाले कंधे की मजबूती पर भी विचार करना होगा। रोजमर्रा की जरूरत की चीजों की ढुलाई करने वाले वाहन और वातानुकूलित टूरिस्ट बस को एक समान सब्सिडी का लाभ मिलना बिल्कुल न्यायसंगत नहीं है। सरकार यदि चाहती है कि उसका सब्सिडी बोझ कम हो तथा इसका कुप्रभाव निम्न आय वर्ग वालों के घरेलू बजट और महंगाई पर न्यूनतम हो तो उसे उपयोग और उपभोग के अंतर को समझकर दो स्लैब बनाने होंगे। अन्यथा अंतरराष्ट्रीय घटनाक्रमों पर निर्भर पेट्रोलियम पदार्थो की कीमतें यूं ही राजकोषीय घाटे की सेहत और लोगों के घरेलू बजट को डांवाडोल करती रहेंगी।


गरीबों को मिलेगा एकमुश्त अनाज


दिल्ली अनाज भंडारण की चुनौती से निपटने के लिए केंद्रीय खाद्य मंत्रालय निजी निवेश बढ़ाने के अलावा कुछ और विकल्पों पर गंभीरता से विचार कर रहा है। इन मसौदों पर राज्यों से विस्तृत सुझाव मांगे गए हैं। पहले प्रस्ताव में हर गांव में गोदाम बनाकर स्थानीय स्तर पर ही खाद्यान्न भंडारण करने का प्रावधान है। वहीं, दूसरे विकल्प में कार्डधारकों को खरीद सीजन में ही एकमुश्त अनाज देने का प्रस्ताव है। इससे अनाज के सड़ने की समस्या खत्म होने के साथ रखरखाव पर आने वाला अतिरिक्त खर्च भी बचेगा। पहले प्रस्ताव के तहत खाद्य मंत्रालय प्रत्येक गांव सभा में किसानों के बनाए लघु अनाज गोदामों को मान्यता देगा। इनमें प्रत्येक की क्षमता 10 टन तक हो सकती है। इसके लिए किसानों को गोदाम के किराए का भुगतान किया जाएगा। इससे कई तरह की बचत होगी। दूसरे प्रस्ताव में खाद्य मंत्रालय इससे भी आगे बढ़कर एक नए विकल्प पर विचार कर रहा है। इसके तहत खरीद सीजन में ही कार्डधारकों को कम से कम छह महीने के राशन का अनाज एकमुश्त उपलब्ध कराया जाएगा। इस प्रस्ताव के क्रियान्वयन में आने वाली दिक्कतों का अध्ययन किया जा रहा है। अभी देश में कुल 24 करोड़ कार्डधारक हैं, जिन्हें सालाना 4.25 करोड़ टन रियायती अनाज की आपूर्ति मासिक आधार पर की जाती है। बांटने से पहले खरीद सीजन में अनाज का भंडारण किया जाता है। अंत्योदय कार्ड धारकों को हर महीने 35 किलो और बीपीएल व अन्य को 15 से 25 किलो अनाज दिया जाता है। छह महीने में लगभग सवा दो करोड़ टन अनाज बांटना पड़ता है। इस व्यवस्था में खाद्यान्न भंडारण पर प्रति टन साढ़े चार हजार रुपये का खर्च आता है। जबकि नए विकल्प को अपनाने की दशा में अनाज के बड़े पैमाने पर भंडारण की समस्या से मुक्ति मिल जाएगी। पूर्व केंद्रीय खाद्य मंत्री शांता कुमार इस विकल्प को अपनाने की बात काफी पहले से उठा रहे हैं। उन्होंने कहा कि नई व्यवस्था से लोगों को एक साथ छह महीने का राशन मिल जाएगा, जिसे वे संभालकर रख सकते हैं। इससे सरकार को भारी बचत भी होगी। कुमार ने यह भी सुझाव दिया है कि भंडारण में होने वाली बचत से गरीबों को अनाज रखने के लिए स्टील का ड्रम वितरित किया जा सकता है। ड्रम की व्यवस्था केवल पहले साल करनी होगी.


Wednesday, May 25, 2011

तेल की कीमतों का अर्थशास्त्र


हाल के कुछ महीनों में तेल की कीमतों, खासकर पेट्रोल के दामों में क्रमिक रूप से बेतहाशा वृद्धि देखने को मिली है। आम जनता जहां बढ़ती महंगाई और अपनी कम होती आय व खर्चो से परेशान है वहीं सरकार सरकारी कोष पर तेल सब्सिडी का ज्यादा बोझ होने का तर्क देकर औसतन हर एक-दो महीनों में तेल के दामों में बढ़ोतरी कर देती है। कुछ दिन हंगामा मचता है, सरकार की तरफ से सफाई आती है, प्रधानमंत्री आर्थिक विकास तेज करने और महंगाई कम करने का आश्वासन देते हैं और यह सिलसिला चलता रहता है। सवाल है कि क्या वाकई में सरकार तेल सब्सिडी के बोझ से दबी हुई है और उसके पास दामों में बढ़ोतरी के अलावा और दूसरा कोई विकल्प नहीं है? इसके अलावा सवाल यह भी है कि क्या महंगाई का विकास से कोई नाता है और यदि है तो किस तरह का है। पिछले एक-दो दशकों में विकासशील देशों में तेल की खपत व मांग तेजी से बढ़ रही है। इसके उलट तेल के उत्पादन में गिरावट आई है, जिससे वैश्विक बाजार में मांग-आपूर्ति का संतुलन बिगड़ा है। इसमें ओपेक देशों की मुनाफाप्रेरित राजनीति और खींचतान की भी महत्वपूर्ण भूमिका है। इन तमाम कारणों से अंतरराष्ट्रीय और राष्ट्रीय बाजार में तेल की कीमतें भी बढ़ रही हैं। भारत अपनी कुल तेल जरूरतों का दो-तिहाई हिस्सा कच्चे तेल के रूप में आयात करता है। जाहिर है सरकार को राजस्व का एक बड़ा हिस्सा इस मद में खर्च करना पड़ता है, लेकिन यह इस समस्या का एक पहलू है, जिसकी चर्चा करके और हवाला देकर सरकार खुद के सही होने का तर्क रखती है। भारत में तेल की कीमतें अधिक होने की एक बड़ी वजह तेल पर सरकार की ओर से लगाए जाने वाले कई तरह के कर और उपकर हैं। तेल के आयात से लेकर बिक्री तक के विभिन्न स्तरों पर आम उपभोक्ताओं को सीमा शुल्क, उत्पाद शुल्क, बिक्री कर और विभिन्न राज्यों द्वारा लगाए जाने वाले करों का भुगतान करना होता है। इसके अलावा डिस्ट्रीब्यूटर से लेकर रिटेलर तक के स्तर पर लूटखसोट और मुनाफाखोरी होती है। भारत में पेट्रोल के उत्पादन पर सरकार की ओर से वसूला जाने वाला टैक्स भी दुनिया के किसी भी अन्य देश से ज्यादा है। यह भार अंतत: पेट्रोल की बढ़ती कीमत के रूप में सामने आता है, जिसका भार उपभोक्ताओं पर ही पड़ता है। इसमें एक बड़ा अंतर्विरोध यह है कि करों की उगाही से मिलने वाला पैसा यानी कर प्राप्ति का एक बड़ा हिस्सा सार्वजनिक तेल कंपनियों के घाटे को कम करने के लिए सब्सिडी के तौर पर दिया जाता है। यहां खेल यह होता है कि पहले निजी कंपनियां सरकार पर दबाव बनाकर अपना मुनाफा बढ़ाने के लिए तेल के दाम बढ़वाती हैं, फिर सरकार सार्वजनिक कंपनियों को निजी कंपनियों के बराबर लाने के नाम पर उन्हें भारी सब्सिडी देती है अथवा ऑयल बांड जारी करती है। साफ है कि पेट्रोल की कीमतें इसलिए नहीं बढ़ाई जातीं, क्योंकि तेल के दाम बढ़ गए होते हैं, बल्कि यह इसलिए होता है ताकि निजी कंपनियों की कमाई का मार्जिन घटने न पाए और उनका मुनाफा दिनोंदिन बढ़ता रहे व सरकार के पास टैक्स के रूप में जनता का अधिक से अधिक पैसा आए। यदि ऐसा नहीं होता तो दुनिया के अन्य देशों में जब अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल की कीमतें गिरती हैं तो वहां पेट्रोल के दाम घटा दिए जाते हैं, लेकिन भारत में ऐसा कभी नहीं होता। सरकार बजट में हर वर्ष तेल घाटे का भारी-भरकम आंकड़ा प्रस्तुत करती है, लेकिन वह टैक्स प्रणाली के इस अंतर्विरोध को खत्म करने अथवा निजी कंपनियों को फायदा पहुंचाने की नीति पर कुछ नहीं कहती, शायद इसलिए कि इन कंपनियों से सरकार को भारी-भरकम चुनावी चंदा जो मिलता है। इस तरह सार्वजनिक व निजी कंपनियों को मुनाफा पहुंचाने व सरकार को ज्यादा टैक्स देने का बोझ आम उपभोक्ताओं को ही उठाना होता है। इसके अलावा पेट्रोल की बढ़ी हुई कीमतों की सबसे ज्यादा मार महंगाई के रूप में पड़ती है। इसका प्रभाव यह होता है कि खर्च बढ़ने से आम व्यक्ति की बचत कम होती जाती है और उसकी क्रय क्षमता कम होती है। इसका दीर्घकालिक प्रभाव समाज के एक बड़े वर्ग या कहें वंचित वर्ग की तरफ से औद्योगिक व अन्य सामानों की मांग में कमी के रूप में सामने आता है। इस तरह देश में गरीबी-अमीरी की असमानता का ग्राफ बढ़ता है और देश में विकास के अवसर महज चंद लोगों तक सिमटने से समग्र देश का संतुलित विकास प्रभावित होता है। अब डीजल, एलपीजी और केरोसिन में दी जा रही सब्सिडी को भी खत्म करने की बात की जा रही है। आखिर जब सेज के लिए 90 हजार करोड़ रुपये की सब्सिडी रिजर्व बैंक और वित्त मंत्रालय के विरोध के बावजूद दी जा सकती है तो गरीबों को सब्सिडी से मिलने वाला लाभ क्यों खत्म किया जा रहा है? यह ठीक है कि इससे कालाबाजारी खत्म होगी, लेकिन हम इतना तो कर ही सकते हैं कि यह सब करते समय अन्य तमाम पहलुओं पर भी विचार करें और अधिक व्यावहारिक व जनकल्याणकारी नीति को अपनाएं। (लेखक जेएनयू में अर्थशास्त्र के प्रोफेसर हैं)


भुखमरी का संकट


2050 में नौ अरब लोगों का पेट भरने की चुनौती दुनिया के कृषि विशेषज्ञों के माथे पर बल डाल रही है। हर रोज 2,29,000 लोगों की नई फौज खाने वालों की कतार में शामिल हो रही है। इसी को देखते हुए एग्रोबिजनेस कंपनियां भुखमरी का हौवा खड़ा कर मुनाफा कमाने के अभियान में जुट गई हैं। ये कंपनियां दुनिया भर की सरकारों पर दबाव बना रही हैं कि वे कृषि क्षेत्र में सुधारों को लागू करें। यह ठीक है कि बढ़ती आबादी के अनुरूप खाद्यान्न उत्पादन न होने और सीमित क्रय क्षमता के कारण भुखमरी के शिकार लोगों की संख्या तेजी से बढ़ रही है। अंतरराष्ट्रीय खाद्य एवं कृषि संगठन (एफएओ) के मुताबिक आज दुनिया का हर छठा व्यक्ति भुखमरी की कगार पर है। लेकिन एफएओ ने हाल ही में एक चौकाने वाली रिपोर्ट भी जारी की है। इसके अनुसार विकसित व विकासशील देशों में बड़े पैमाने पर भोजन की बर्बादी जारी है। औद्योगिक देश जहां हर साल 67 करोड़ टन भोजन बर्बाद करते हैं वहीं विकासशील देश 63 करोड़ टन। सर्वाधिक बर्बादी फलों, सब्जियों और जड़ वाले आहारों की होती है। खाद्यान्न की कुल बर्बादी विश्व के कुल अनाज उत्पादन (230 करोड़ टन) का आधा होगी। अर्थात हर साल 130 करोड़ टन भोजन बर्बाद होता है। भोजन की बर्बादी औद्योगिक देशों की प्रमुख समस्या है। यूरोप व अमेरिका में प्रति व्यक्ति 95 से 115 किलो भोजन बर्बाद होता है जबकि उप सहारा अफ्रीका और एशियाई देशों में यह बर्बादी मात्र 6 से 11 किलो ही है। जहां विकसित देशों में 40 फीसदी बर्बादी भोजन की थाली में होती है, वहीं विकासशील देशों में सर्वाधिक हानि भंडारण, प्रसंस्करण स्तर पर। बर्बादी रोकने के साथ-साथ खान-पान की आदतों में बदलाव से भी करोड़ों लोगों की भूख शांत की जा सकती है। संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम द्वारा जारी पर्यावरण खाद्य संकट नामक रिपोर्ट के मुताबिक यदि पशुओं को अनाज की जगह पशु चारा खिलाया जाए तो 300 करोड़ अतिरिक्त लोगों के लिए पर्याप्त भोजन उपलब्ध हो सकेगा। एक अनुमान के अनुसार 2050 तक दुनिया की आबादी में करीब इतनी ही वृद्धि होगी। ऐतिहासिक रूप से देखें तो वर्ष 1700 से 1961 तक दुनिया की आबादी में पांच गुना बढ़ोत्तरी हुई और खाद्यान्न की बढ़ी हुई मांग को खेती का रकबा बढ़ाकर पूरा किया गया। 1961 के बाद अब तक जनसंख्या 80 फीसदी बढ़ी है, लेकिन खेती का रकबा महज आठ फीसदी ही बढ़ पाया। इस अंतर की भरपाई प्रति एकड़ पैदावार से बढ़ोत्तरी करके की गई है लेकिन अब बढ़ती आबादी के अनुपात में पैदावार में बढ़ोत्तरी नहीं हो पा रही है। ऐसे में यदि तत्काल कुछ उपाय नहीं किए गए तो खाद्य संकट और महंगाई के मोर्चे पर चुनौतियां बढ़ जाएंगी। दक्षिण अमेरिका, एशिया और अफ्रीका में करोड़ों छोटे किसान ऐसे हैं जो खाद्यान्न उत्पादक होने के बावजूद भूखे लोगों की श्रेणी में आते हैं क्योंकि उन्नत बीज, सिंचाई, मशीनरी, उर्वरक खरीदने की उनकी क्षमता नहीं है। यही वजह है कि उनकी उत्पादकता कम है और वे गरीबी के जाल में उलझे हैं। लेकिन दुनिया भर की सरकारें बड़े किसानों, खेती के औद्योगिकरण, नकदी फसल आदि को बढ़ावा देने पर तुली है जिनमें प्राकृतिक संसाधनों की बरबादी होती है। ग्लोबल वार्मिंग के कारण विश्व भर में मुख्य फसलों की पैदावार में कमी आई है। फिर उदारीकरण के दौर में कृषि क्षेत्र में होने वाला निवेश तेजी से घटा। 1970 की तुलना में कृषि उत्पादन में वैश्विक सार्वजनिक निवेश 75 फीसदी तक कम हो गया। हाल के दशकों में विकास रणनीति के केंद्र में ऊंची आर्थिक संवृद्धि दर ही रही। सरकारी स्तर पर यह मान लिया गया कि ऊंची विकास दर की रिसन से भुखमरी, कुपोषण, गरीबी का खात्मा हो जाएगा जबकि हुआ इसका ठीक उल्टा। (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं)