बधाई! हमने अपने बजट की पुरानी मुसीबतों को फिर खोज लिया है। सब्सिडी का पुराना स्यापा, सरकारी स्कीमों के असफल होने का खानदानी मर्ज, खर्च बेहाथ होने का बहुदशकीय रोना और बेकाबू घाटे का ऐतिहासिक दुष्चक्र। लगता है कि हम घूम घाम कर वहीं आ गए हैं, जहां से करीब बीस साल पहले चले थे। उदारीकरण के पूर्वज समाजवादी बजटों का दुखदायी अतीत जीवंत हो उठा है। हमें नॉस्टेल्जिक (अतीतजीवी) होकर इस पर गर्व करना चाहिए। इसके अलावा हम कर भी क्या कर सकते हैं। बजट के पास जब अच्छा राजस्व, राजनीतिक स्थिरता, आम लोगों की बचत, आर्थिक उत्पादन में निजी निवेश आदि सब कुछ था, तब हमारे रहनुमा बजट की पुरानी बीमारियों से गाफिल हो गए। इसलिए असंतुलित खर्च जस का तस रहा और जड़ों से कटी व नतीजों में फेल सरकारी स्कीमों में कोई नई सूझ नहीं आई। दरअसल, हमने तो अपनी ग्रोथ के सबसे अच्छे वर्ष बर्बाद कर दिए और बजट का ढांचा बदलने के लिए कुछ भी नया नहीं किया। हमारे बजट का सूझ-कोषीय घाटा, इसके राजकोषीय घाटे से ज्यादा बड़ा है। बजट स्कीम फैक्ट्री बजट में हमेशा से कुछ बड़े और नायाब टैंक रहे हैं। हर नई सरकार इन टैंकों पर अपने राजनीतिक पुरखों के नाम का लेबल लगा कर ताजा पानी भर देती है। यह देखने की फुर्सत किसे है कि इन टैंकों की तली नदारद है। इन टंकियों को सरकार की स्कीमें कह सकते हैं। बजट में ग्रामीण गरीबी उन्मूलन व रोजगार, खाद्य सुरक्षा, शिक्षा, स्वास्थ्य, पेयजल और ग्रामीण आवास को मिलाकर कुल पांच बड़ी टंकियों, माफ कीजिए, स्कीमों का कुनबा है। देश में जन कल्याण की हर स्कीम की तीन पीढि़यां बदल गर्इं हैं, मगर हर स्कीम असफलता व घोटाले में समाप्त हुई। गरीबी उन्मू्लन और ग्रामीण रोजगार स्कीमें तो असफल प्रयोगों का अद्भुत इतिहास बन गई हैं। सरकार ने गरीबी हटाने के लिए स्वरोजगार, वेतन सहित रोजगार और रोजगार के बदले अनाज के तीन मॉडलों को फिर-फिर आजमाया, मगर नतीजे सिफर रहे। एकीकृत ग्रामीण विकास योजना (1970) से शुरू हुआ सफर नाम बदलते हुए नेशनल रूरल इंप्लॉयमेंट प्रोग्राम, लैंडलेस इंप्लॉयमेंट गारंटी प्रोग्राम और बाद में जवाहर रोजगार योजना (1989), रोजगार आश्वासन योजना (1993), स्वर्ण जयंती ग्राम स्वरोजगार योजना (1999), जवाहर ग्राम समृद्धि योजना (1999) और संपूर्ण ग्रामीण रोजगार योजना (2001) से होता हुआ रोजगार गारंटी योजना (2006) पर आ टिका है। मगर पहले तीन वर्षो में साबित हो गया कि मनरेगा से भ्रष्टाचारियों को नया रोजगार मिल गया है और इसने ग्रामीण क्षेत्र में श्रमिकों का बाजार बिगाड़ दिया। ठीक ऐसी ही कहानियां ग्रामीण आवास, पेयजल और ग्रामीण स्वास्थ्य की हैं। लोगों को सेहत देने का मिशन घोटाला मिशन बन गया है। राशन प्रणाली अनाज व सब्सिडी की बर्बादी का ऐतिहासिक सबूत है। केंद्र सरकार की अपनी रिपोर्टे इन स्कीमों को असफल या आंशिक सफल बताती हैं, मगर सरकार में एक हाथ रिपोर्ट लिखता है और दूसरा हाथ क्रियान्वयन से बेफिक्र होकर स्कीमें गढ़ता रहता है। बजट की दशकों पुरानी स्कीम फैक्ट्री अब जनकल्याण की नहीं, भ्रष्टाचार की गारंटी है। जनकल्याण के कार्यक्रमों में नयापन नदारद है, बस हर बजट नई लूट का रास्ता खोल देता है। इतने दशकों के बाद भी हम भरोसे से यह नहीं कह सकते कि इन स्कीमों से गरीबी दूर करने में ठोस मदद मिली है, क्योंकि सरकार के पास कोई ईमानदार अध्ययन तक उपलब्ध नहीं है। वित्त मंत्री सब्सिडी को लेकर अगर सच में बेचैन हैं तो उन्हें इस बजट से स्कीमों के असर की पड़ताल शुरू करनी चाहिए, ताकि एक नई बहस को जमीन मिल सके। वित्त मंत्री जी हिम्मत दिखाइए, आपको करदाताओं के पैसे की सौगंध है। सब्सिडी वितरण केंद्र सब्सिडी की सफलता को किस तरह नाप सकते हैं। बस यह देखिए कि जिन क्षेत्रों को सब्सिडी दी जा रही है, वहां उत्पादन, सुविधाओं या जीवन स्तर में कितना सुधार आया है। भारत में यह सुधार जरा भी नहीं दिखता। बजट राजस्व के सबसे अच्छे पिछले आठ वर्षो में सब्सिडी का बिल 4,300 करोड़ रुपये से बढ़कर 1,60,000 करोड़ रुपये पर पहुंच गया। इसमें अधिकांश बढ़ोतरी खाद, अनाज और पेट्रो उत्पादों पर हुई। इतने खर्च से तीनों उत्पादों या सेवाओं की आपूर्ति सुधरनी चाहिए थी? मगर कृषि मंत्रालय मानता है कि खाद की किल्लत बढ़ी है। खेती के ताजा हाल से इस सब्सिडी को जायज ठहराना मुश्किल है। पेट्रो सब्सिडी की असफलता तो और बेजोड़ है। सब्सिडी जिस केरोसीन पर दी जा रही है, उसे कौन इस्तेमाल कर रहा है। सस्ता डीजल लेकर कितनी कारें दौड़ रही हैं और सस्ते गैस सिलेंडर किन होटलों और एलपीजी से चलने वाली कारों में खप रहे हैं, इन सवालों का जवाब सरकार के पास नहीं है। हमारे ही टैक्स से सब्सिडी बांट कर सरकार हमें सब्सिडीखोर होने की तोहमत से लज्जित कर रही है और दूसरी तरफ पेट्रो उत्पाद महंगे भी हो रहे हैं। खाद्य सब्सिडी का खेल तो अनोखा है। राशन प्रणाली में हर पांच साल में बदलाव के बावजूद 60 फीसदी अनाज कालाबाजारिए खाते हैं, मगर इस मरियल व लूटग्रस्त राशन प्रणाली के सर सरकार खाद्य सुरक्षा गारंटी रखने जा रही है यानी करीब 1.2 खरब रुपये की ताजा सब्सिडी का बिल तैयार है। सब्सिडी अब हमारी जरूरत नहीं, बल्कि मुसीबत बन गई है। यह एक ऐसी अपसंस्कृति तैयार कर चुकी है, जहां बांटने का श्रेय लेने को हर कोई तैयार है, मगर बर्बादी रोकने का जिम्मेदार कोई नहीं है। गरीबी कम करने या सेवाओं की आपूर्ति ठीक करने में सरकारी स्कीमों की सफलता बेहद संदिग्ध है। गरीबी आर्थिक विकास से कम हुई, उदार बाजार से शिक्षा व सेहत की सुविधाएं बढ़ी हैं और गावों के लिए रोजगार शहरों ने तैयार किए हैं। लेकिन सरकार के सामाजिक कल्याण कार्यक्रमों का पहाड़ा वर्षो से नहीं बदला। एक बड़ी आबादी वाले मुल्क में हर चीज का बाजार होता है। इसलिए सयानी सरकारें बाजार को कायदे से विनियमित करती हैं, सही कीमत पर सुविधाओं व फायदों का बंटवारा तय करती हैं और लोगों की आय बढ़ाने में मदद करती हैं। सरकारों के हस्तक्षेप सिर्फ वहीं जरूरी होते हैं, जहां या तो बाजार असफल हो जाता है या फिर उसके लिए संभावनाएं नहीं होतीं। ऐसे किसी ऐतिहासिक रूप से पिछड़े बुंदेलखंड , कालाहांडी या मेवात को चमकाने के लिए सरकार को कुछ वर्ष चाहिए, कई दशक नहीं। योजना आयेाग और वित्त मंत्रालय अपने प्रागैतिहासिक फार्मूलों के मोह में फंसे हैं। एक विशाल, असंगत और बहुआयामी देश में जन कल्याण के कार्यक्रमों और सब्सिडी की पूरी सोच ही बदलने की जरूरत है, क्योंकि इतने बड़े देश को एक मनरेगा, राशन प्रणाली या स्वास्थ्य मिशन में फिट नहीं किया जा सकता। हमें गरीबी, अशिक्षा, भूख दूर करने के कार्यक्रमों का नया आविष्कार चाहिए। देश को एक नए बजट की जरूरत है। नई सूझ के बजट की! क्या वित्त मंत्री ऐसा बजट देने जा रहे हैं? उम्मीद रखने में क्या हर्ज है!! ड्डठ्ठह्यद्धह्वद्वड्डठ्ठह्लद्ब2ड्डह्मद्ब@स्त्रद्गद्य.द्भड्डद्दह्मड्डठ्ठ.ष्श्रद्व
Monday, February 27, 2012
Saturday, February 18, 2012
आंध्र के बजट में 16 फीसदी वृद्धि
आंध्र प्रदेश सरकार ने अगामी वित्त वर्ष 2012-13 के लिए 1.45 लाख करोड़ रुपये का बजट पेश किया है। बजट में 4,444 करोड़ रुपये के राजस्व आधिक्य और 20,008 करोड़ रुपये के राजकोषीय घाटे का अनुमान जताया गया है। वर्ष 2011-12 के लिए 1.28 लाख करोड़ रुपये का बजट निर्धारित किया गया था, जो संशोधित अनुमान में 1.22 लाख करोड़ रुपये का रह गया। प्रदेश के वित्त मंत्री अनाम रामनारायण रेड्डी ने बजट में सभी क्षेत्रों के लिए राशि के प्रावधान में काफी वृद्धि की है। हालांकि चालू वित्त वर्ष 2011-12 के लिए जितने भी लक्ष्य तय किए गए थे उन्हें हासिल नहीं किया जा सका। बजट में किसी नई योजना की घोषणा नहीं की गई है। हालांकि मुख्यमंत्री किरण कुमार रेड्डी द्वारा वर्ष के दौरान किसानों और महिला स्वयं सहायता समूहों के लिए शून्य ब्याज पर कर्ज और एक रुपये किलो चावल दिए जाने जैसी घोषणाओं का बजट भाषण में जिक्र किया गया। रामनारायण ने कहा कि बजट में अनुमानित कुल खर्च में 91,824 करोड़ रुपये गैर-योजना खर्च के लिए और 54,030 करोड़ रुपये योजना व्यय के तहत रखे गए हैं। राज्य सरकार ने चालू वित्त वर्ष के बजट में हालांकि 3,826 करोड़ रुपये का राजस्व अधिशेष अनुमानित किया था लेकिन संशोधित अनुमानों में यह कम होकर 780 करोड़ रुपये रह गया और राजकोषीय घाटा 17,784 करोड़ रुपये रहा। चालू वित्त वर्ष में राज्य की राजस्व वसूली के संशोधित अनुमानों में नकारात्मक रुझान देखा गया। जबकि वित्त मंत्री ने अगले वित्त वर्ष के लिए इसमें 24,000 करोड़ रुपये की वृद्धि का अनुमान लगाया है। इस बजट में वर्ष 2005 के बाद से ही बड़ी राशि हासिल कर रहे प्रदेश के सिंचाई विभाग के आवंटन में कोई वृद्धि नहीं की गई है। इस साल विभाग के लिए पिछले साल के बराबर 15,010 करोड़ रुपये की राशि आवंटित की गई।
एयर इंडिया की कर्ज पुनर्गठन योजना मंजूर
नकदी संकट से जूझ रही एयर इंडिया को कर्ज देने वाले बैंकों ने कंपनी पर बकाया 18,000 करोड़ रुपये का कर्ज पुनर्गठित करने की योजना मंजूर कर ली है। साथ ही ये बैंक एयरलाइंस को 2,200 करोड़ रुपये का नया कर्ज देने को भी तैयार हो गए हैं। सूत्रों के मुताबिक पुनर्गठन योजना के तहत एयर इंडिया इन बैंकों को 7,400 करोड़ रुपये के गैर-परिवर्तनीय डिबेंचर जारी करेगी। समय पूरा होने पर एयरलाइंस की ओर से इन डिबेंचरों का धन वापस किए जाने की जिम्मेदारी सरकार लेगी। भारतीय स्टेट बैंक (एसबीआइ) के नेतृत्व वाले 13 बैंकों के समूह ने एयर इंडिया को रोजमर्रा का काम चलाने के लिए 2,200 करोड़ रुपये का कर्ज देने पर भी सहमति जताई है। दस दिन पहले वित्त मंत्री प्रणव मुखर्जी की अध्यक्षता वाले मंत्रिसमूह ने एयर इंडिया को 7,400 करोड़ रुपये जुटाने की अनुमति दी थी। मंत्रिसमूह ने सरकारी गारंटी वाले गैर परिवर्तनीय डिबेंचर के जरिए ये रकम जुटाने की मंजूरी दी है। आधिकारिक सूत्रों के मुताबिक डिबेंचर की कूपन दर 8.5 से 9 फीसदी होगी। वित्तीय संस्थान ही ये बांड खरीद सकते हैं। एयरइंडिया पर 67,520 करोड़ रुपये का कर्ज बकाया है। जिसमें से 21,200 करोड़ रुपये का कर्ज रोजमर्रा के कामकाज के लिए लिया गया था जो अल्प और मध्यम अवधि के लिए है। जबकि 22,000 करोड़ रुपये का दीर्घकालिक कर्ज विमान खरीद सौदे के लिए लिया गया। कंपनी पर 4,600 करोड़ रुपये आपूर्तिकर्ताओं के भी बकाया हैं। कंपनी का संचई नुकसान 20,320 करोड़ रुपये का है। बैंक और वित्तीय संस्थानों ने एयर इंडिया का नेट वर्थ सुधारने के लिए कई उपाए सुझाए हैं जिन्हें मंत्रिसमूह ने स्वीकार किया है।
Wednesday, February 15, 2012
महंगाई 26 महीने के निचले स्तर पर
खाने-पीने की चीजों के थोक दाम नीचे आने से सरकार राहत में तो है, लेकिन अभी इससे संतुष्ट नहीं है। जनवरी में थोक मूल्यों पर आधारित महंगाई की दर सात प्रतिशत से भी नीचे उतर आई है। मंगलवार को जारी ताजा सरकारी आंकड़ों के मुताबिक, यह दर पिछले 26 महीने के निचले स्तर 6.55 फीसदी पर आ गई है। वित्त मंत्री प्रणब मुखर्जी ने अगले कुछ महीनों में इसके और नीचे आने की उम्मीद जताई है। जनवरी में खाद्य उत्पादों के दाम नीचे आने से महंगाई की सामान्य दर में आई इस गिरावट से माना जा रहा है कि रिजर्व बैंक ब्याज दरों में कमी का सिलसिला शुरू कर सकता है। वित्त मंत्री ने उम्मीद जताई है कि महंगाई की दर घटते हुए मार्च की समाप्ति तक छह प्रतिशत रह जाएगी। अभी भी स्वीकार्य स्तर पर नहीं है। इससे पहले मार्च अंत तक महंगाई की दर सात प्रतिशत रहने का अनुमान लगाया गया था। थोक मूल्य सूचकांक पर आधारित महंगाई की दर दिसंबर, 2011 में 7.47 प्रतिशत पर थी। पिछले साल जनवरी के महीने में यह 9.47 प्रतिशत दर्ज की गई। महंगाई के ताजा आंकड़े नवंबर, 2009 के बाद सबसे कम हैं। जनवरी में महंगाई की दर को नीचे लाने में सब्जियों के साथ-साथ आलू और प्याज की मुख्य भूमिका रही। इस अवधि में खाद्य उत्पादों की महंगाई की दर शून्य से 0.52 प्रतिशत नीचे रही। बहरहाल, मैन्युफैक्चरिंग उत्पादों को लेकर अभी भी चिंता बनी हुई है। थोक मूल्य सूचकांक में ऐसी वस्तुओं का 65 प्रतिशत तक भारांश है। साल दर साल आधार पर मैन्युफैक्चरिंग उत्पादों की मुद्रास्फीति जनवरी में 6.49 प्रतिशत रही है, पिछले महीने यह 7.41 प्रतिशत रही थी। जनवरी में पिछले साल की इसी अवधि के मुकाबले सब्जियों की कीमतों में 43.13 प्रतिशत की गिरावट आई है। थोक में आलू 23.15 और प्याज 75.57 प्रतिशत सस्ते हुए हैं। गेहूं के दामों में भी पिछले साल के मुकाबले 3.48 प्रतिशत की कमी आई है। वैसे, खाद्य तेल और दूध के ऊंचे दामों को लेकर सरकार की चिंता अभी दूर नहीं हुई है। वित्त मंत्री ने कहा, आने वाले समय में खाद्य तेल और दूध के दामों में तेजी खाद्य महंगाई के सामने सबसे बड़ा खतरा बनी रहेगी। मीट, अंडा तथा अन्य प्रोटीन उत्पादों से भी खाद्य महंगाई की दर के समक्ष जोखिम बरकरार है।
Tuesday, February 14, 2012
कारखाने बने सुस्ती के शिकार
औद्योगिक उत्पादन की घटती रफ्तार से सरकार की परेशानी बढ़ती जा रही है। बीते साल दिसंबर में औद्योगिक उत्पादन सिर्फ 1.8 प्रतिशत की दर से ही बढ़ सका। दिसंबर, 2010 में इसकी रफ्तार 8.1 प्रतिशत थी। उत्पादन वृद्धि दर नीचे आने की मुख्य वजह खनन और पूंजीगत सामान (कैपिटल गुड्स) क्षेत्र में उत्पादन घटना रहा। इससे पहले इसी हफ्ते केंद्रीय सांख्यिकी संगठन (सीएसओ) ने अनुमान लगाया था कि देश की आर्थिक विकास दर चालू वित्त वर्ष 2011-12 में 6.9 प्रतिशत रहेगी। बीते वित्त वर्ष में यह दर 8.4 प्रतिशत थी। सरकार ने दिसंबर, 2011 के औद्योगिक उत्पादन सूचकांक (आइआइपी) के आंकड़े शुक्रवार को जारी किए। इनके मुताबिक, समीक्षाधीन माह के दौरान मैन्युफैक्चरिंग क्षेत्र के उत्पादन में भी 1.8 प्रतिशत की बढ़त हुई। इसके मुकाबले दिसंबर, 2010 में इस क्षेत्र की वृद्धि दर 8.7 प्रतिशत थी। आइआइपी में इस क्षेत्र का योगदान 75 प्रतिशत है। पिछले कुछ महीनों की तरह खनन क्षेत्र का उत्पादन दिसंबर में भी धीमा ही रहा। बीते वित्त वर्ष की समान अवधि के मुकाबले इसमें 3.7 प्रतिशत की गिरावट आई। साल भर पहले इसी दौरान इस क्षेत्र में 5.9 फीसदी वृद्धि दर्ज हुई थी। दूसरी तरफ बिजली उत्पादन में 9.1 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई। इससे पिछले साल की समान अवधि में इसकी वृद्धि दर 5.9 प्रतिशत थी। मैन्युफैक्चरिंग क्षेत्र में मशीन उपकरण बनाने वाले पूंजीगत उद्योग क्षेत्र के उत्पादन में 16.5 प्रतिशत की बड़ी गिरावट दर्ज की गई। इन उत्पादों का आयात बढ़ना भी इसकी एक वजह हो सकता है। वैसे, इस अवधि में 22 प्रकार के उद्योग समूहों में से 15 में वृद्धि दर्ज हुई। चालू वित्त वर्ष 2011-12 में अप्रैल से दिसंबर की तीन तिमाहियों में औद्योगिक उत्पादन की वृद्धि दर 3.6 प्रतिशत रही। बीते वित्त वर्ष की समान अवधि में यह 8.3 प्रतिशत थी। सरकार ने नवंबर, 2011 के आइआइपी में संशोधन किया है। इससे उस महीने की औद्योगिक वृद्धि दर 5.94 प्रतिशत हो गई। प्रारंभिक आंकड़ों में इसे 5.9 प्रतिशत बताया गया था। दिसंबर, 2011 के दौरान कुल मिलाकर उपभोक्ता वस्तुओं (कंज्यूमर गुड्स) के उत्पादन में 10 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई। उपभोक्ता वस्तुओं में टिकाऊ उपभोक्ता उत्पादों (कंज्यूमर ड्यूरेबल) का उत्पादन 5.3 प्रतिशत बढ़ा। इसी तरह गैर टिकाऊ उपभोक्ता उत्पादों (एफएमसीजी) का उत्पादन 13.4 प्रतिशत की दर से बढ़ा।
सरकार पर बढ़ रहा कर्ज का बोझ
कर राजस्व की सुस्त रफ्तार के चलते खजाना भरने के उपायों में उलझी सरकार के लिए दिक्कतें कम नहीं हो रही हैं। सरकार पर कर्ज का बोझ भी बढ़ता जा रहा है। चालू वित्त वर्ष 2011-12 की तीसरी तिमाही में सरकार के कर्ज में 3.2 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई है। इस अवधि में सरकार पर करीब 34 लाख करोड़ रुपये का कर्ज हो गया है। वित्त मंत्रालय ने गुरुवार को सार्वजनिक ऋण यानी सरकार के ऊपर कर्ज के तिमाही आंकड़े जारी किए। इनके मुताबिक अक्टूबर-दिसंबर, 2011 की तिमाही में सरकार पर कर्ज 33,82,645 करोड़ रुपये रहा। यह सितंबर तिमाही के मुकाबले 3.2 प्रतिशत अधिक है। उस वक्त सरकार के ऊपर 32,76,368 करोड़ रुपये का कर्ज था। सरकार के कुल कर्ज में आंतरिक ऋण की हिस्सेदारी दिसंबर तिमाही में 89.9 प्रतिशत रही। उसके ऊपर बकाया आंतरिक कर्ज 30,41,895 करोड़ रुपये रहा। यह सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) का 33.9 प्रतिशत था। सितंबर, 2011 तिमाही में यह 32.7 प्रतिशत था। यह कर्ज वह राशि है, जो सरकार बांड, डाकघर जमाओं और बाजार के जरिए जनता से हासिल करती है। बांड के जरिए सरकार ने चालू वित्त वर्ष की दूसरी छमाही में 52,872 करोड़ रुपये अधिक जुटाए हैं। विनिवेश और अन्य गैर कर स्रोतों से राजस्व नहीं मिलने के चलते सरकार को बजट की अनुमानित बाजार उधारी में वृद्धि करनी पड़ी। इसके बाद भी सरकार की वित्तीय जरूरतें पूरा नहीं होने के बाद बाजार उधारी में 40,000 करोड़ रुपये की और बढ़ोतरी करनी पड़ी। इससे चालू वित्त वर्ष की बाजार उधारी में 92,872 करोड़ रुपये की वृद्धि हो चुकी है। सरकार की राजकोषीय हालत कर राजस्व में कमी के चलते भी बिगड़ी है। तीसरी तिमाही तक सरकार बजट में अनुमानित कर राजस्व का केवल 63.5 प्रतिशत तक ही जुटा पाई है। पिछले वित्त वर्ष में इसी अवधि तक सरकार बजट अनुमान का 70.7 प्रतिशत तक प्राप्त कर चुकी थी।
Tuesday, January 24, 2012
कोयले पर अटका 12वीं योजना का बिजली लक्ष्य
कोयले के उत्पादन, आपूर्ति और कीमत को लेकर अनिश्चितता से सरकार 12वीं योजना (वर्ष 2012-17) के लिए बिजली क्षमता का लक्ष्य तय नहीं कर पा रही है। सरकार ने कोयले की कीमत तय करने का नया फार्मूला लागू कर दिया है, लेकिन इससे बिजली कंपनियां परेशान हैं। कंपनियों का कहना है कि नए फार्मूले पर कोयला खरीदने से उनकी बिजली उत्पादन लागत 40 फीसदी तक बढ़ जाएगी। इसका बोझ आज नहीं तो कल आम जनता को उठाना पड़ेगा। 12वीं योजना सिर्फ दो महीने बाद 1 अप्रैल, 2012 से लागू होगी। सरकार अभी तक इसी उधेड़बुन में लगी है कि अतिरिक्त बिजली उत्पादन का लक्ष्य 90 हजार मेगावाट तय किया जाए या एक लाख मेगावाट। प्रधानमंत्री कार्यालय (पीएमओ) की इच्छा है कि यह लक्ष्य एक लाख मेगावाट हो, जबकि योजना आयोग और बिजली मंत्रालय इसे 90 हजार मेगावाट या इससे भी नीचे रखना चाहते हैं। योजना आयोग के सदस्य बीके चुतर्वेदी ने बताया कि बिजली उत्पादन के लक्ष्य के बारे में अंतिम फैसला राष्ट्रीय विकास परिषद की बैठक में होगा। देश की सबसे बड़ी बिजली उत्पादक एनटीपीसी ने साफ कर दिया कि अगर सरकार ने बिजली कंपनियों को भी नए फार्मूले से कोयले की कीमत अदा करने के लिए बाध्य किया तो बिजली उत्पादन महंगा हो जाएगा। कोयला मंत्रालय ने 1 जनवरी, 2012 से ही नए फार्मूले से कोयले की कीमत तय करने का फैसला किया है। घरेलू कोयले के साथ ही आयातित कोयले की कीमत भी लगातार बढ़ रही है। इससे देश में लग रहीं नई बिजली परियोजनाओं से पैदा होने वाली बिजली के लिए ज्यादा शुल्क वसूलना पड़ सकता है। 11वीं योजना के दौरान देश की बिजली उत्पादन क्षमता में बमुश्किल 52 हजार मेगावाट की वृद्धि होने की संभावना है। बिजली मंत्री सुशील कुमार शिंदे ने यह तो स्वीकार किया कि 11वीं योजना के दौरान तय 62 हजार मेगावाट का लक्ष्य हासिल नहीं हो सकेगा, लेकिन भरोसा जताया कि आगामी योजना के दौरान इससे ज्यादा क्षमता जोड़ी जा सकेगी। शिंदे ने बताया कि 12वीं योजना के दौरान शुरू होने वाली 80 हजार मेगावाट क्षमता की बिजली परियोजानओं पर अभी से काम चालू हो चुका है।
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