इस बार के बजट से देश की जनता को बहुत उम्मीदें हैं। जनता चाहती है कि सरकार कुछ ऐसे ठोस कदम उठाए जिनसे लोगों का कल्याण हो और उन पर पड़ने वाला करों का बोझ कुछ कम हो। इसलिए कि महंगाई और अन्य समस्याओं से लोगों का हाल बेहाल है। केंद्रीय वित्त मंत्री प्रणब मुखर्जी को नये वित्त वर्ष का बजट पेश करते हुए सबसे ज्यादा जिस विषय पर ध्यान देने की जरूरत है, वह है महंगाई। सरकार को नये बजट के जरिए बढ़ती महंगाई पर काबू पाने के लिए जरूरी कदम उठाने की घोषणा करनी चाहिए। आयकर की दरें निर्धारित करते समय भी वित्त मंत्री को बढ़ती महंगाई को दिमाग में रखना चाहिए। अगर सरकार महंगाई को जनता को परेशान करने वाला मुद्दा मानती है तो उसे नये बजट में सबसे पहले तो आयकर में छूट की सीमा बढ़ानी चाहिए। अभी यह आम लोगों के लिए 1.60 लाख रुपये है जबकि महिलाओं के लिए आयकर में छूट की सीमा 1.90 लाख रुपये है। पिछले साल की महंगाई को देखें तो यह साफ मालूम पड़ता है कि लोगों के खर्च काफी बढ़ गए हैं। इस दृष्टि से आयकर में छूट की सीमा बढ़ाने की जरूरत स्पष्ट तौर पर महसूस होती है। आयकर सीमा को कम से कम 40,000 रुपये से लेकर 50,000 रुपये बढ़ा देना चाहिए। इसका मतलब यह है कि आयकर में छूट की समान्य सीमा तकरीबन दो लाख रुपये से लेकर 2.10 लाख रुपये हो जाएगी और महिलाओं के लिए यह सीमा मौजूदा 1.90 लाख से बढ़कर 2.30 से 2.40 लाख तक पहुंच जाएगी। महंगाई की मार से बेहाल देश के आम नागरिकों को सरकार के इस कदम से बड़ी राहत मिलेगी। अब देखना है कि सरकार इस दिशा में क्या कदम उठाती है? आयकर के स्लैब में परिवर्तन एक साहसिक कदम होगा और बड़ा सवाल यही है कि क्या वित्त मंत्री ऐसा करने का साहस जुटा पाएंगे? सरकार देश की अर्थव्यवस्था को वाकई सही दिशा में ले जाना चाहती है तो उसे आयकर के स्तर पर ही एक बेहद जरूरी और साहसिक कदम उठाना होगा। सरकार को आयकर में ही कोई ऐसा ठोस बंदोबस्त करना चाहिए जिसके जरिए काला धन बाहर निकल सके। सरकार को ऐसे उपाय करने चाहिए जिससे काला धन बनने की संभावना ही खत्म हो जाए या कम से कम हो जाए। इसके अलावा सरकार को देश के बाहर जमा यहां के लोगों के काले धन को वापस लाने के लिए भी जरूरी बंदोबस्त करना चाहिए। इस मसले पर सरकार अब तक कोई ठोस कदम उठाती नहीं दिखी है। इसलिए बजट में ही कुछ ऐसे प्रावधान होने चाहिए जिसके जरिए विदेशों में जमा काले धन को वापस लाने की प्रक्रिया शुरू हो सके। अगर सरकार ने काले धन की समस्या पर काबू पा लिया तो यकीनन यह कहा जा सकता है कि देश की कई आर्थिक समस्याओं का समाधान खुद ब खुद हो जाएगा। जहां तक आयकर का सवाल है तो सरकार को वित्त वर्ष 2011-12 के बजट में आयकर के समग्र ढांचे में बहुत ज्यादा बदलाव नहीं करना चाहिए। इसलिए भी ऐसा नहीं करना चाहिए क्योंकि अगले साल से प्रत्यक्ष कर संहिता लागू करने की योजना सरकार ने बनाई है। इसके बावजूद अगर सरकार आयकर के वर्तमान ढांचे में बहुत ज्यादा बदलाव करती है तो इससे समस्या आसान होने के बजाए और कठिन होगी। खामख्वाह नई बहस पैदा होगी। इससे कई तरह के विवाद अनावश्यक रूप से उभरेंगे। इसके अलावा, सरकारी वेतनभोगियों के लिए एक और अहम कदम उठाना चाहिए। ये लोग इस बात से परेशान हैं कि उन्हें अब स्टैंर्डड डिडक्शन नहीं मिल रहा है। 40 साल से मिल यह सुविधा पांच साल पहले यह सेवा वापस ले ली गई। इससे वेतनभोगियों में बड़ा रोष है। इनका कहना है कि बढ़ती महंगाई और दूसरे मद में बढ़ते हुए खर्च को देखते हुए उनसे इस सुविधा को वापस लिया जाना ठीक नहीं है। इसलिए इन वेतनभोगियों के लिए स्टैंर्डड डिडक्शन की सुविधा एक बार फिर से बहाल की जानी चाहिए। ऐसा करने से देश के एक बड़े वर्ग को लाभ मिलेगा और ऐसे लोगों पर महंगाई की वजह से जो बोझ बढ़ा है, उससे इन्हें थोड़ी राहत मिलेगी।
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Saturday, February 26, 2011
किसानों के लिए बने राष्ट्रीय आयोग
2003-04 के नैशनल सैंपल सव्रे संगठन के आंकड़ों के मुताबिक एक किसान परिवार की औसत मासिक आमदनी महज 2,115 रुपये हैं। इसका मतलब यह है कि तकरीबन 60 करोड़ किसान गरीबी रेखा के नीचे रह रहे हैं
पिछले कई दिनों से टेलीविजन पर ऐसे कार्यक्रमों का प्रसारण बढ़ गया है जिनमें इस बात पर र्चचा की जा रही है कि इस बजट में आम आदमी को क्या हासिल होगा? इसमें आम तौर पर मध्यमवर्गीय परिवारों की महिलाएं और कर्मचारी अपनी बात कहते हुए दिख रहे हैं। यह बेहद दुर्भाग्यपूर्ण है कि जिस आम आदमी को टीवी पर दिखाया जा रहा है, उसमें किसान और खेतों में काम करने वाले मजदूर नहीं शामिल हैं। या यों कहें कि देश की दो तिहाई आबादी को आम आदमी की श्रेणी में नहीं गिना जा रहा है। किसान और किसानी न सिर्फ मीडिया से बल्कि पूरी आर्थिक व्यवस्था से ही गायब कर दिए गए हैं। ऐसा करने पर वैसे अर्थशास्त्री खास जोर देते हैं जो जमीनी हकीकत से कटे हुए हैं। पिछले पांच साल के आर्थिक सव्रेक्षणों ने इस बात को साबित कर दिया है कि कृषि क्षेत्र भयानक संकट से गुजर रहा है। हर गुजरते साल के साथ मरने वाले किसानों की संख्या बढ़ती जा रही है। आर्थिक उत्पीड़न की वजह से पिछले 15 सालों में देश भर में तकरीबन ढाई लाख किसानों ने आत्महत्याएं की हैं। ऐसे में किसी भी वित्त मंत्री की प्राथमिकता इसे रोकने और किसानों के चेहरे पर मुस्कुराहट वापस लौटाने की होनी चाहिए।
हालांकि, मुझे नहीं लगता कि 2011 का बजट किसानों के लिए बड़ी राहत लेकर आएगा। 1991 के वित्त मंत्री मनमोहन सिंह के बाद से जितने वित्त मंत्री बने हैं और उन्होंने किसानों के साथ जो किया है, वही प्रणब मुखर्जी भी करेंगे। किसानों की अहमियत की बात करेंगे और कृषि क्षेत्र की सेहत सुधारने की जरूरत पर बल देंगे। अब तक जो र्चचाएं हुई हैं, उनसे तो यह नहीं लगता कि आर्थिक संकट से जूझ रहे किसानों को वित्त मंत्री कोई राहत देने वाले हैं। कृषि क्षेत्र की सबसे बड़ी समस्या उत्पादन में कमी नहीं बल्कि किसानों की घटती आमदनी है। किसानों के कल्याण के लिए योजना बनाने की बात चलती है तो विचारों का अकाल पड़ जाता है। न्यूनतम समर्थन मूल्य में अगर बढ़ोतरी होती है तो इसका फायदा सिर्फ 30 से 40 फीसद किसानों तक ही पहुंच पाता है क्योंकि इनके पास ही मंडी में कुछ बेचने के लिए होता है। 60 फीसद से ज्यादा किसानों का तो न्यूनतम समर्थन मूल्य से कोई लेना-देना नहीं है। ऐसे में यह बजट इस ऐतिहासिक गलती को सुधारने का अवसर वित्त मंत्री को मुहैया कराएगा। 2003-04 के नैशनल सैंपल सव्रे संगठन के आंकड़ों के मुताबिक एक किसान परिवार की औसत मासिक आमदनी महज 2,115 रुपये हैं। इसका मतलब यह है कि तकरीबन 60 करोड़ किसान गरीबी रेखा के नीचे रह रहे हैं। ऐसे में वित्त मंत्री को किसानों की आमदनी के लिए एक राष्ट्रीय आयोग के गठन का सुझाव रखना चाहिए। इस आयोग को एक निश्चित जमीन में किसानों के लिए एक निश्चित मासिक आमदनी सुनिश्चित करने की दिशा में काम करने की जिम्मेदारी देनी चाहिए। मुझे पता है कि मौजूदा आर्थिक हालत में वित्त मंत्री के पास बहुत ज्यादा वित्तीय आजादी नहीं है। पर ऐसे में उन्हें उद्योगों को दिए जा रहे राहत पैकेज को हटाकर इसे किसानों को दे देना चाहिए। किसानों को गेहूं, चावल, ज्वार, बाजरा और रागी पर बोनस देने का बंदोबस्त कर देना चाहिए। किसानों को आर्थिक मदद की जरूरत है लेकिन उद्योगों को मिल रही आर्थिक मदद को वापस लेने के लिए सियासी साहस की जरूरत है। किसान अभी ज्यादा जरूरतमंद हैं, इसलिए यह मदद उन्हें दी जानी चाहिए। इस बजट में किसानों को दिए जाने वाले कर्ज में 50,000 करोड़ रुपये की बढ़ोतरी कर इसे 4.25 लाख करोड़ रुपये किया जा सकता है। पर इस बात को भी ध्यान में रखा जाना चाहिए कि कृषि के नाम पर दिए जाने वाले कर्ज का मोटा हिस्सा उन कंपनियों को मिल जाता है जो इस क्षेत्र में काम कर रही हैं और छोटे किसानों को कर्ज नहीं मिल पाता। साफ है कि कर्ज देने से किसानों का भला
नहीं होने वाला क्योंकि पहले से ही किसान कर्ज के बोझ तले दबे हुए हैं। ऐसे में अधिक कर्ज देने का मतलब यह है कि वे कर्ज के बोझ तले और दबेंगे। जहां तक सवाल तिलहन और दालों की उपज घटने का है तो तिलहन का उत्पादन तो सरकार की नीतियों की वजह से घटा है। सरकार ने इनके आयात पर लगने वाले शुल्क को घटा दिया और इसका नतीजा यह हुआ कि घरेलू बाजार सस्ते तिलहन से पट गया। 1993-94 में भारत खाद्य तेलों के मामले में आत्मनिर्भर था लेकिन आयात शुल्क में साल-दर-साल की गई कमी का नतीजा यह हुआ कि आज भारत दुनिया भर में सबसे ज्यादा खाद्य तेल आयात करने के मामले में दूसरे स्थान पर है। ऐसे में तिलहन और दलहन का उत्पादन तब तक नहीं बढ़ेगा जब तक सरकार आयात शुल्क को पुराने स्तर पर नहीं लाती है। विश्व व्यापार संगठन के समझौते के तहत तिलहन पर भारत 300 फीसद तक आयात शुल्क लगा सकता है लेकिन इसे शून्य कर दिया गया है। दलहन के लिए भी आयात शुल्क शून्य कर दिया गया है। जब तक ये शुल्क बढ़ाए नहीं जाते, भारतीय किसान रियायत पर उपजाए जाने वाले सस्ते अनाजों का मुकाबला नहीं कर पाएंगे।
सस्ते अनाज का आयात करने का सीधा मतलब बेरोजगारी आयात करना है। हरित क्रांति को पूर्वोत्तर के राज्यों में ले जाने के लिए वित्त मंत्री ने पिछले साल 400 करोड़ रुपये दिए थे। पर यह एक भ्रम में डालने वाली रणनीति है क्योंकि हरित क्रांति की प्रौद्योगिकी ने पंजाब, हरियाणा, पश्चिमी उत्तर प्रदेश और आंध्र प्रदेश की जमीन की उत्पादकता को खत्म करने का काम किया है। हरित क्रांति की वजह से पैदा हुईं समस्याओं का ही नतीजा है कि आज किसान आत्महत्याएं करने को मजबूर हैं। ऐसे में हरित क्रांति के मॉडल को पूर्वोत्तर के राज्यों में ले जाने का सीधा अर्थ यह निकाला जाएगा कि देश ने पुरानी गलती से कोई सबक नहीं लिया है। राष्ट्रीय सलाहकार परिषद द्वारा प्रस्तावित खाद्य सुरक्षा विधेयक वित्त मंत्री का ध्यान आकृष्ट करेगा। अनाज की बढ़ती कीमतों को देखते हुए संभव है कि बीमार और भ्रष्ट सार्वजनिक वितरण पण्राली को और पैसे मुहैया कराए जाएं। इसके बजाए गांव और तालुका स्तर पर अनाज भंडार तैयार करने के लिए धन मुहैया करवाया जाना चाहिए। इसे हर राज्य में क्षेत्रीय अनाज भंडार से जोड़ा जाना चाहिए। ग्रामीण विकास मंत्रालय ने पंचायत घर स्थापित करने के लिए संसाधन मुहैया करवाए हैं। ऐसे में हर पंचायत में बीज भंडार बनाने पर जोर दिया जाना चाहिए। इससे अनाज की बर्बादी थमेगी और स्थानीय स्तर पर खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित हो सकेगा। इससे सार्वजनिक वितरण पण्राली का बोझ भी घटेगा और जिसे फिर सुधारने में भी सहूलियत होगी। मुझे यह जानकर बेहद प्रसन्नता हुई कि वित्त मंत्री ने स्वास्थ्य बीमा के तहत रोजगार गारंटी योजना के तहत साल में कम से कम 15 दिन काम करने वाले मजदूरों को भी शामिल कर लिया है। आने वाले सालों में स्वास्थ्य बीमा के दायरे को बढ़ाकर इसमें पूरे किसान समुदाय को शामिल करने की जरूरत होगी। अभी फसल को भी बीमा के दायरे में नहीं लाया गया है। कुछ राज्यों में किसानों को स्वास्थ्य बीमा दिया गया है लेकिन ज्यादातर राज्यों में ऐसा नहीं हुआ है। बजट में हुए आवंटन के साथ 2010 के आर्थिक सव्रेक्षण को पढ़ने पर इस बात का पता चलता है कि सरकार खेती पर कॉरपोरेट और निजी कारोबारी घरानों का वर्चस्व बढ़ाना चाहती है। आर्थिक सव्रेक्षण में अनाज को लेकर जिन कदमों के उल्लेख किए गए हैं, उनसे साफ है कि सरकार कृषि में औद्योगिकरण बढ़ाना चाहती है और कृषि उत्पादों को संगठित खुदरा उद्योग से जोड़ना चाहती है। इसका मतलब यह हुआ कि किसानों पर बोझ और बढ़ेगा।
कर बढ़े पर बोझ नहीं
लीबिया में मारकाट, बाकी अरब जगत में अस्थिरता, कच्चे तेल के भावों को लेकर अनिश्चितता, उद्योगों में मंडराता मंदी का संकट, बढ़ती महंगाई, डूबता स्टाक बाजार, काले धन को लेकर दिखायी जा रही अतिरिक्त संवेदनशीलता, बजट के ठीक पहले इस सबसे ज्यादा चुनौतियां आम तौर पर वित्त मंत्री के सामने नहीं होतीं। वित्त मंत्रियों के लिए बजट का मतलब होता है, ऐसा हिसाब-किताब, जिसमें, आय की बढ़ोत्तरी की जुगाड़ की जाये और खचोर्ं में कमी का जुगाड़ जमाया जाये। ये दोनों काम बहुत मुश्किल हो जाते हैं। खास कर तब, जब सरकार गठबंधन की हो। यों गठबंधन की सरकार से पैदा होने वाली कमजोरी का रोना प्रधानमंत्री बाकायदा प्रेस कान्फ्रेंस करके रो चुके हैं। पर वित्त मंत्री के सामने भी वही मजबूरियां पेश हैं। रेल मंत्री ममता बनर्जी मोटे तौर पर रेलवे के किराये बढ़ाने के मूड में नहीं हैं। रेलवे को जिन संसाधनों की दरकार है, उसका भी बड़ा हिस्सा वित्त मंत्री को जुटाना होगा। यह जुटाने की आर्थिक वजह तो है ही, साथ में राजनीतिक वजह यह है कि कांग्रेस और ममता बनर्जी की पार्टी तृणमूल कांग्रेस को कुछ समय बाद पश्चिम बंगाल में साथ-साथ चुनाव लड़ना है। ऐसी सूरत में पब्लिक को परेशान करने वाली कोई घोषणा न रेल बजट में होनी चाहिए, न आम बजट में होनी चाहिए। वित्त मंत्री और रेल मंत्री दोनों की कोशिशें कुछ इस तरह की होंगी। एक महत्वपूर्ण राज्य में चुनावी माहौल में बजट के सामने चुनौतियां दोगुनी हो जाती हैं। सबसे पहली चुनौती तो बजट के सामने यह है कि कैसे ऐसा हिसाब-किताब बनाया जाये, जिससे महंगाई का बोझ जनता पर न पड़े। गौरतलब है कि एक्साइज शुल्क सरकार की कमाई का एक खास जरिया है। एक्साइज में शुल्क में किसी भी बढ़ोतरी का मतलब है कि तमाम वस्तुएं महंगी हो जायेंगी। जैसे साबुन, वाशिंग पाऊडर, कार, जीप वगैरह पर अगर एक्साइज बढ़ाया जाता है, तो इसका मतलब है कि ये सारी चीजें महंगी हो जायेंगी। आटोमोबाइल सेक्टर में तो तेजी का माहौल है, वह तो थोड़ी महंगाई झेल सकता है। पर और तमाम सेक्टर यह महंगाई नहीं झेल सकते। प्याज टमाटर की महंगाई ने पहले ही आम आदमी का बजट बिगाड़ रखा है। वह और अधिक महंगाई किसी भी स्रेत से झेलने के मूड में नहीं है। तब सवाल उठता है कि साधन जुटाये कहां से जायेंगे? कर का एक महत्वपूर्ण स्रेत है सर्विस टैक्स, जो तमाम तरह की सेवाओं पर लगता है। ड्राइक्लीनिंग से लेकर ब्यूटी पार्लर और रेस्टोरेंट से लेकर कोचिंग सेंटरों पर यह कर लगता है और तमाम सेवाओं को महंगा बनाता है। इस समय अर्थव्यवस्था यानी सकल घरेलू उत्पाद का करीब साठ प्रतिशत सेवा क्षेत्र से ही आ रहा है। इसमें कर की बढ़ोतरी का मतलब है कि तमाम सेवाओं के भाव बढ़ेंगे। इसका मतलब भी वही है- बढ़ती हुई महंगाई। अर्थात् सरकार को उन रास्तों से संसाधन जुटाने की जरूरत है, जिन रास्तों से करदाताओं के ऊपर बोझ न पड़ता हो पर ऐसे रास्ते तलाशना आसान नहीं है। थ्रीजी स्पेक्ट्रम से हर साल रकम नहीं वसूली जा सकती। टू जी स्पेक्ट्रम में करीब एक लाख पिचहत्तर करोड़ रुपये का घाटा कैसे वसूला जायेगा, इस सवाल का जवाब किसी के पास नहीं। राजा और तमाम अफसरों से अगर यह रकम वसूली जा सके, तो बजट में एक योगदान उनका भी हो सकता है। काले धन को लेकर बहुत हल्ला-बावेला है। कांग्रेस और बाबा रामदेव जी में बजट से ठीक पहले इस मसले पर बहस हो रही है। रामदेव जी काले धन को सामने लाना चाहते हैं। कांग्रेस का मानना है कि सिर्फ रामदेव ही देशभक्त नहीं हैं। कांग्रेस पार्टी भी काले धन के मामले में संवेदनशील है। इस संवेदनशीलता को अगर ठोस प्रयासों में परिवर्तित किया जा सके, तो यह देश के लिए बहुत अच्छा होगा। एक अध्ययन के मुताबिक हर चौबीस घंटों में करीब 240 करोड़ रुपये गैर कानूनी तरीके से देश से बाहर जा रहे हैं। इसे रोकना आसान नहीं है। काले धन को बाहर कैसे लाया जाये, उन्हें किस तरह का प्रोत्साहन या दंड दिया जाये, यह सवाल वित्त मंत्री के लिए महत्वपूर्ण है। काला धन सिर्फ बहस का नहीं, कर्म का विषय भी है, इस किस्म का संदेश इस बजट में दिया जाना चाहिए। उधर, इनकम टैक्स देने वाले मांग रहे हैं कि करों में छूट बढ़नी चाहिए। छूट बढ़ने का मतलब है कि कर संग्रह में कमी। यह भी आसान नहीं है। वैसे अब तक का अनुभव यह रहा है कि ईमानदारी से कर देने वालों के मुकाबले काले धन वालों के लिए स्थितियां ज्यादा मुफीद रही हैं। समय-समय पर तमाम ऐसी योजनाएं आती हैं, जिनसे काले धन को बाहर निकालने की कोशिश की जाती है। यानी काले धन को बाहर निकलने के लिए तमाम रियायतों की घोषणा होती है। इस बजट में ऐसी रियायतें कैसे घोषित हों कि ईमानदार करदाता पर चोट न हो, यह चुनौती वित्त मंत्री के सामने खासी बड़ी चुनौती है। एक बहुत बड़ा मसला बजट से ऐन पहले कच्चे तेल के भावों का है। लीबिया समेत कई अरब देशों के संकट के चलते कच्चे तेल के भाव सौ डालर प्रति बैरल से ऊपर चले गये हैं। ये भाव कहां तक जायेंगे, किसी को नहीं पता। किसी को नहीं पता कि अरब जगत में अशांति और असंतोष के स्तर कहां तक जायेंगे। अगर सऊदी अरब में अशांति और असंतोष व्यापक तौर पर फैल जाते हैं, तो फिर तेल के भाव कहां जाकर रुकेंगे, कोई नहीं कह सकता। कच्चे तेल के भावों में बढ़ोत्तरी का मतलब है कि देर सबेर भारत में भी पेट्रोल औऱ डीजल के भाव बढ़ेंगे। इनके भाव बढ़ने का मतलब है कि लगभग हर वस्तु और सेवा के भाव ऊपर जायेंगे। ऐसे समय में जब कच्चे तेल के भाव आम आदमी को पहले ही डरा रहे हों, तब बजट बनाने वालों के लिए किसी और आइटम पर कर दर बढ़ाना मुश्किल हो जाता है।इसलिए आगामी बजट में वित्त मंत्री की रचनात्मकता की परीक्षा होगी। कर बढ़ जाये, पर बोझ न बढ़े, इस चुनौती का समुचित हल वित्त मंत्री को ढूंढना ही होगा।
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