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Sunday, January 9, 2011

महंगाई डायन का जादू टोना

भारत में विदेशी रिटेल कंपनियों का आना मना है। तीन करोड़ दुकानदारों की रोजी-रोटी का हवाला देते हुए यह कह दिया जाता है कि अपने देश में बड़े रिटेलर्स आए तो इन दुकानदारों का धंधा बंद हो जाएगा। मतलब यह कि दुकानदारों के हित को ढाल बनाकर हमें महंगाई झेलने पर मजबूर किया जा रहा है
क्या इस सिस्टम से किसी का भला हो रहा है? अगर सच में सरकार महंगाई रोकने के लिए गंभीर है तो डिस्ट्रीब्यूशन के तौर-तरीकों को बदलना होगा
आर्थिक मोच्रे पर नए साल की शुरुआत अच्छी नहीं रही है। पहले हफ्ते में ही सेंसेक्स 4 परसेंट लुढ़क गया। विदेशी निवेशक बिकवाली के मूड में हैं। विदेशी ब्रोकरेज फर्म को लग रहा है कि भारत की विकास दर में कमी हो सकती है। सब कुछ जब ठीक हो रहा था तो फिर मूड बदलने की क्या वजह है। पिछले एक महीने से यह लग रहा है कि भारत में महंगाई बेकाबू हो गई है। और महंगाई इसी तरह से बढ़ती रही तो ग्रोथ पर ब्रेक लग सकता है। और महंगाई सच में विकराल रूप लेती जा रही है। 25 दिसम्बर को खत्म हुए हफ्ते में खाने-पीने के सामान की महंगाई दर 18 परसेंट को पार कर गई। यह तो सरकारी आंकड़ा है। जमीनी हकीकत तो इससे भी भयावह है। प्याज एक ही महीने में 100 परसेंट महंगी हो गई है। लहसुन और टमाटर की कीमतों में आग लगी हुई है। अंडा, दूध, आटा, दाल, चावल, पेस्ट, साबुन, बिस्कुट-सब कुछ महंगा हो गया है। यह सब तब हो रहा है जब खाने-पीने के सामान की कीमत में कमी का अनुमान लगाया जा रहा था। इतना ही नहीं, स्टील कंपनियों ने भी साल के पहले हफ्ते में ही कीमतों में करीब 5 परसेंट की बढ़ोतरी कर दी। रियल एस्टेट की कीमत तो लगातार बढ़ ही रही है। वित्तमंत्री प्रणब मुखर्जी का कहना है कि तेजी से बढ़ती महंगाई की दो वजहें हैं। पहली बात तो यह कि सप्लाई में बाधा की वजह से दाम तेजी से बढ़ रहे हैं। दूसरी वजह यह है कि लोगों की आमदनी में हो रही बढ़ोतरी का भी कीमतों पर असर हो रहा है। वित्तमंत्री की दलील बिल्कुल सही है। लेकिन अब सवाल यह है कि इस महंगाई को काबू कैसे किया जाए? शुक्रवार को कृषि क्षेत्र का प्रतिनिधित्व करने वाला एक ग्रुप वित्तमंत्री से मिला और उस ग्रुप के कुछ प्रतिनिधियों का मानना है कि रिजर्व बैंक के ब्याज दर बढ़ाने से महंगाई को कुछ काबू में लाया जा सकता है। उनका यह कहना है कि महंगाई की वजह उत्पादन में कमी नहीं है। प्याज क अलावा किसी भी फल या सब्जी के उत्पादन में कमी नहीं हुई है। े
फिर भी दाम बढ़ रहे हैं जो चिंता का विषय है। गौरतलब है कि 2010 में रिजर्व बैंक ने 6 बार ब्याज दरें बढ़ाई। जानकारों को आशंका है कि महंगाई को काबू करने के लिए रिजर्व बैंक ने तेजी से ब्याज दर बढ़ाए तो ग्रोथ पर सचमुच ब्रेक लग सकता है। तो क्या सचमुच कोई दूसरा रास्ता है जिससे महंगाई पर काबू किया जा सकता है? मेरे ख्याल से और भी रास्ते हैं। इसके लिए हमें खाने- पीने के सामान के डिस्ट्रीब्यूसन चेन पर नजर डालना होगा। अगर किसानों को सब्जी के एक किलो के लिए 10 रुपये मिलते हैं तो मंडी आते-आते इसकी कीमत 15 रुपये हो जाती है। मंडी में होल सेलर का कमीशन डेढ़ से दो रुपये। जब ठेले वाले से ग्राहक सब्जी खरीदता है तो वह अपना साढ़े चार से पांच रु पये कमीशन जोड़ देता है। मतलब यह कि किसान को जिस सामान के लिए 10 रुपये मिलते हैं, ग्राहक तक पहुंचते- पहुंचते उसकी कीमत कम से कम 20 रुपये तो हो ही जाती है। बिना कोई वैल्यू जोड़े लाखों लोगों की करोड़ों की कमाई। सालों से यही सिस्टम चल रहा है। जैसे ही इसे बदलने की बात होती है, चौतरफा विरोध शुरू हो जाता है। इस सिस्टम की खामियां देखिए। दुकानदार मनमाफिक मुनाफा कमा सकता है। जमाखोरी, कालाबाजारी पर कोई रोक नहीं। दुनिया में हम फलों और सब्जियों के दूसरे सबसे बड़े उत्पादक हैं, इसके बावजूद हमारे यहां फल और सब्जी लगातार महंगे होते जा रहे हैं। सिस्टम में खामियां इतनी हैं कि 35 से 40 परसेंट फल और सब्जी तो बाजार पहुंचने से पहले ही सड़ जाते हैं। देश में गिनती के ही कोल्ड स्टोरेज हैं। और जहां कोल्ड स्टोरेज हैं भी वहां उनको चलाना दुनिया के दूसरे देशों के मुकाबले 100 परसेंट महंगा है। देश में इतने खाद्य पदार्थ बर्बाद हो जाएंगे तो खाने-पीने के सामान महंगे होंगे ही। क्या इसको ठीक करके महंगाई को काबू करने के तरीकों पर विचार नहीं किया जा सकता है। डिस्ट्रीब्यूशन को दुरुस्त करने के कई रास्ते भी हैं। हमारे पड़ोसी देश चीन में जो हो रहा है उससे ही सबक लेने की जरूरत है। 2007 में दुनिया की सबसे बड़ी रिटेल कंपनी वॉलमार्ट ने चीन के कृषि और वाणिज्य मंत्रालय के साथ मिलकर डायरेक्ट फॉर्म प्रोग्राम शुरू किया। इस प्रोग्राम के तहत वॉलमार्ट किसानों से सीधे फल, सब्जी और अनाज खरीदती है और उन्हें अपने स्टोर्स में बेचती है। इसकी वजह से किसानों को अच्छी कीमत मिल रही है और कंज्यूमर को बाजार से सस्ता सामान। इसके अलावा वॉलमार्ट किसानों को खेती के आधुनिक तरीकों के बारे में ट्रेनिंग देती है। साथ ही किसानों को यह भी बताया जाता है कि वे अपने खेतों की उर्वरा लंबे समय तक कैसे बचाकर रख सकते हैं। तीन साल में करीब दो लाख किसान इस प्रोग्राम से जुड़ चुके हैं। मतलब यह कि किसान को सही कीमत, मुफ्त की ट्रेनिंग और पर्यावरण का संरक्षण बोनस में। है ना सबकी बल्ले-बल्ले। इतना ही नहीं, वॉलमार्ट चीन के करीब 100 शहरों में स्टोर चला रहा है। जिसमें करीब एक लाख लोगों को रोजगार भी मिले हैं। इसके साथ-साथ कारफूर और टेस्को जैसे दूसरे रिटेलर्स के भी स्टोर्स चल रहे हैं जिनमें हजारों लोगों को नौकरी मिली है। किसानों का फायदा तो हो रहा है, संगठित क्षेत्र में रोजगार के मौके भी बन रहे हैं। लेकिन भारत में विदेशी रिटेल कंपनियों का आना मना है। तीन करोड़ दुकानदारों की रोजी-रोटी का हवाला देते हुए यह कह दिया जाता है कि अपने देश में बड़े रिटेलर्स आए तो इन दुकानदारों का धंधा बंद हो जाएगा। मतलब यह कि दुकानदारों के हित को ढाल बनाकर हमें महंगाई झेलने पर मजबूर किया जा रहा है। क्या इस सिस्टम से किसी का भला हो रहा है? अगर सच में सरकार महंगाई रोकने के लिए गंभीर है तो डिस्ट्रीब्यूशन के तौर-तरीकों को बदलना होगा। नहीं तो कुछ लोगों को फायदा पहुंचाने के लिए कीमतें इसी तरह बढ़ती रहेंगी और हम महंगाई डायन के अत्याचार का रोना रोते रहेंगे।

थोक भाव घटने के बावजूद खुदरा कीमतें ऊपर, छापेमारी में मिला सैकड़ों क्विंटल प्याज

व्यापारियों पर आयकर विभाग के छापों के बीच महानगरों में प्याज की खुदरा कीमतें शनिवार को भी 60-65 रुपये प्रति किलो की ऊंचाई पर बनी रहीं। जबकि थोक में इसके भाव 40 रुपये किलो तक आ गए हैं। देश के अलग-अलग हिस्सों में की गई छापेमारी में सैंकड़ों क्विंटल प्याज की जमाखोरी का पता चला है। इससे घबराए कारोबारियों ने अपने गोदाम खोल दिए। उम्मीद की जा रही है आपूर्ति बढ़ने से अगले कुछ दिनों में कीमतों में नरमी आएगी। वित्त मंत्री प्रणब मुखर्जी ने भी कहा है कि प्याज की आपूर्ति बढ़ाने के सरकारी उपायों से कीमतें गिरी हैं। मैंने मुख्यमंत्रियों से अनुरोध किया है कि वे कीमतों पर अंकुश लगाने के लिएं जमाखोरों के खिलाफ कदम उठाएं। कीमतों पर केवल केंद्र सरकार ही नियंत्रण नहीं कर सकती। राज्य सरकारों को भी सार्वजनिक वितरण प्रणाली को चुस्त दुरूस्त करना होगा। इस बीच, दिल्ली एवं मुंबई में प्याज की खुदरा कीमत 60 रुपये प्रति किलो पर अपरिवर्तित है। जबकि चेन्नई के खुदरा बाजारों में यह बढ़कर 65 रुपये किलो और कोलकाता में 10 रुपये बढ़कर 60 रुपये किलो हो गया है। आजादपुर मंडी की टमाटर एवं प्याज व्यापारी एसोसिएशन के महासचिव राजेंद्र शर्मा ने कहा कि थोक कीमतों में बीते दो दिनों में नरमी के बावजूद खुदरा कारोबारी ज्यादा कीमतों पर प्याज बेच रहे हैं। दिल्ली में प्याज के थोक दाम में शनिवार को तीन रुपये की गिरावट आई और यह 40 रुपये किलो रहा। शर्मा ने कहा कि महाराष्ट्र, गुजरात, मध्य प्रदेश और राजस्थान से आवक बढ़ी है। थोक कीमतों में कमी का श्रेय व्यापारियों के खिलाफ आयकर विभाग के छापों को भी दिया जा रहा है। आयकर विभाग ने भी कहा है कि वह देश भर में प्याज व्यापारियों के खिलाफ तलाशी अभियान आने वाले दिनों में भी जारी रखेगा ताकि मुनाफावसूली और जमाखोरी को रोका जा सके। आयकर अधिकारियों ने उत्तर प्रदेश के व्यापारियों के नई दिल्ली स्थित कुछ परिसरों पर शनिवार को छापे मारे। वहीं देहरादून, आगरा और मुरादाबाद में छापे की कार्रवाई जारी रही। मुरादाबाद की मंडी में तीन आढ़तों पर मारे गए छापों में 170 क्विंटल अवैध प्याज का पता चला जिसका व्यापारियों के खातों में कोई जिक्र नहीं था। पाक को सब्जी निर्यात फिर शुरू अमृतसर के सब्जी विक्रेताओं ने पाकिस्तान को टमाटर और अन्य सब्जियों का सड़क के रास्ते निर्यात शनिवार को फिर शुरू कर दिया। मालूम हो कि शुक्रवार को पाकिस्तान द्वारा प्याज निर्यात पर पाबंदी लगाने के जवाब में अमृतसर के 40 सब्जी विक्रेताओं ने पाक को जाने वाले सब्जी से लदे 70 ट्रकों को रोक दिया था। अमृतसर एक्सपोर्ट एंड इंपोर्ट चैंबर के उपाध्यक्ष राजीव उप्पल ने कहा कि हम जैसे को तैसा वाला व्यवहार नहीं अपनाना चाहते और दोनों देशों के व्यापार में तेजी की उम्मीद रखते हैं। उन्होंने कहा कि पाकिस्तान को भी जल्द से जल्द सड़क मार्ग से भारत को निर्यात रोकने का अपना फैसला वापस लेना चाहिए। पाक के इस फैसले से हमें बहुत हैरानी हुई।

जबर्दस्त निर्यात ने किया सरकार को बेफिक्र

दिसंबर में 36.4 फीसदी बढ़कर 22.5 अरब डॉलर रहा, 33 महीने के उच्चतम स्तर पर पहुंचा
निर्यात के मोर्चे पर अब सरकार बेफिक्र होती जा रही है। ग्लोबल मंदी के बाद निर्यात में आई सुस्ती अब दूर होती दिखने लगी है। दिसंबर में निर्यात 22.5 अरब डॉलर पर पहुंच गया जो पिछले साल की इसी अवधि की तुलना में 36.4 प्रतिशत अधिक है। बीते 33 महीनों में यह निर्यात की सबसे तेज रफ्तार है। चालू वित्त वर्ष की तीन तिमाहियों की औसत वृद्धि दर भी अब सम्मानजनक 29.5 प्रतिशत के स्तर पर पहुंच गई है। अप्रैल से दिसंबर के नौ महीने की अवधि में देश से 164.7 अरब डॉलर का निर्यात हुआ है। विदेश व्यापार में आयात की धीमी होती रफ्तार भी सरकार को राहत दे रही है। वाणिज्य सचिव राहुल खुल्लर ने बताया कि दिसंबर में 25.1 अरब डॉलर का आयात किया गया जो पिछले साल के मुकाबले 11.1 प्रतिशत कम है। इसका असर व्यापार घाटे पर भी हुआ है जो दिसंबर 2010 में घटकर 2.6 अरब डॉलर रह गया है। पिछले तीन साल में यह न्यूनतम व्यापार घाटा है। निर्यात के मुकाबले धीमी होती आयात की रफ्तार का मतलब है कि व्यापार संतुलन को लेकर सरकार की चिंताएं कम होना। सरकार के खजाने की मौजूदा स्थिति में 120 से 125 अरब डॉलर का व्यापार संतुलन आदर्श स्थिति है। इससे अधिक होने पर सरकार का राजकोषीय संतुलन भी बिगड़ सकता है। मगर अब सरकार के सामने यह दिक्कत नहींआएगी। विदेश व्यापार से होने वाली आय और विदेश में किए जाने वाले भुगतान के अंतर को व्यापार संतुलन कहा जाता है। वाणिज्य सचिव ने बताया कि दिसंबर में निर्यात के मामले में जिन क्षेत्रों ने बेहतर प्रदर्शन किया उनमें इंजीनियरिंग, रत्‍‌न व आभूषण, पेट्रोलियम उत्पाद, लेदर व इसके उत्पाद, कालीन और कॉटन आदि हैं। इस महीने इंजीनियरिंग उत्पादों के निर्यात में 112 प्रतिशत की वृद्धि हुई है। यह वृद्धि कोलंबिया जैसे लैटिन अमेरिकी देशों से मिले ऑर्डर की वजह से हुई है। हालांकि खुल्लर ने कहा कि अब अमेरिकी और यूरोपीय यूनियन से मिलने वाले ऑर्डर की संख्या भी बढ़ने लगी है। खुल्लर ने कहा कि निर्यात की मौजूदा रफ्तार से सरकार को भरोसा है कि चालू वित्त वर्ष में निर्यात का 200 अरब डॉलर का लक्ष्य न केवल प्राप्त हो जाएगा बल्कि इससे ऊपर निकलकर सरकार 215 से 225 अरब डॉलर का निर्यात करने में सफल होगी। आमतौर पर वित्त वर्ष की आखिरी तिमाही में निर्यात की रफ्तार सबसे अधिक रहती है। इसलिए बाकी के तीन महीने में भी सरकार को निर्यात के मोर्चे पर वृद्धि दर की यही रफ्तार बने रहने की उम्मीद है।