केंद्र और राज्यों में अप्रत्यक्ष कर ढांचे को बदल देने वाला वस्तु व सेवा कर (जीएसटी) कानून संसद से पारित होता है तो देश में चार अलग-अलग तरह के जीएसटी लागू होंगे। केंद्र और राज्यों में लगने वाले जीएसटी के साथ-साथ अब राज्यों में आपूर्ति के लिए होने वाली वस्तुओं की आवाजाही भी जीएसटी के दायरे में शामिल हो जाएगी। सरकार ने 22 मार्च, 2011 को लोकसभा में जीएसटी विधेयक पेश किया था। विधयेक के मसौदे में सरकार ने पहले केदो तरह के जीएसटी के बजाय चार प्रकार के वस्तु व सेवा करों का प्रस्ताव किया है। अगर अगले साल पहली अप्रैल तक संसद और 60 प्रतिशत राज्य विधानसभाएं इस कानून को पारित कर देती हैं तो ये प्रस्ताव लागू हो जाएंगे। केंद्र और राज्यों में लागू अप्रत्यक्ष करों के इस नए ढांचे में उन उत्पादों और वस्तुओं पर केंद्रीय जीएसटी लागू होगा जिनकी वसूली केंद्रीय स्तर पर होगी। इससे प्राप्त होने वाले राजस्व का बंटवारा केंद्र और राज्यों के बीच वित्त आयोग की सिफारिशों के मुताबिक होगा। तेरहवें वित्त आयोग ने इस तरह के कर राजस्व में राज्यों की हिस्सेदारी 29 प्रतिशत तय की थी। इसके अलावा उन उत्पादों व सेवाओं पर राज्य जीएसटी लगेगा जिन पर अपने-अपने राज्यों में राज्य सरकारें टैक्स लगाती हैं। इन उत्पादों और वस्तुओं पर लगे टैक्स से मिलने वाला राजस्व भी राज्यों के हिस्से में ही जाता है। इतना ही नहीं, वस्तुओं और सेवाओं की आपूर्ति के सौदों पर केंद्रीय व राज्य जीएसटी लागू होंगे। केवल उन्हीं वस्तुओं और सेवाओं की आपूर्ति के सौदों पर यह टैक्स नहीं लगेगा जो जीएसटी के दायरे में नहीं हैं। इसके अलावा विधेयक में वस्तुओं और सेवाओं के अंतरराज्यीय सौदों पर भी एकीकृत जीएसटी लगाने का प्रावधान रखा गया है। मगर केंद्र और राज्य स्तर पर लगने वाले जीएसटी के जोड़ के बराबर टैक्स देना होगा। कानून में इस टैक्स से मिलने वाले राजस्व के राज्यों के बीच बंटवारे का तरीका भी स्पष्ट किया गया है। इसके मुताबिक जो राज्य वस्तु या सेवा का निर्यात करेगा वह एकीकृत जीएसटी के तहत किए गए भुगतान को राज्य जीएसटी के खाते से केंद्र को हस्तांतरित कर देगा। आयात करने वाला डीलर अपने राज्य में उसका क्रेडिट लेगा जिसका भुगतान केंद्रीय हिस्से से किया जाएगा। अभी तक केंद्र और राज्यों को एक दूसरे के क्षेत्राधिकार में आने वाली वस्तुओं और सेवाओं पर उत्पाद शुल्क, बिक्री कर या सेवा कर लगाने का अधिकार नहीं है। चूंकि जीएसटी कानून लागू होने के बाद केंद्रीय और स्थानीय करों को जीएसटी के दायरे में शामिल कर लिया जाएगा, लिहाजा ऐसे किसी भी आइटम पर जीएसटी लगाने के लिए संविधान में संशोधन का सहारा लेना होगा। उसके बाद ही वह बदलाव केंद्र और राज्य स्तर पर लागू हो पाएगा|
Wednesday, April 6, 2011
Tuesday, April 5, 2011
मैन्युफैक्चरिंग नीति इसी महीने!
राष्ट्रीय मैन्युफैक्चरिंग नीति का एलान इस महीने के अंत तक हो जाने की उम्मीद है। इस हफ्ते प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की अध्यक्षता में होने वाली बैठक में इसे अंतिम रूप दिए जाने की संभावना है। इस नीति के जरिए देश के सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) में मैन्युफैक्चरिंग क्षेत्र की हिस्सेदारी 25 प्रतिशत तक लाने का लक्ष्य रखा गया है। सूत्र बताते हैं कि पिछले हफ्ते वाणिज्य व उद्योग मंत्रालय में हुई एक उच्च स्तरीय बैठक में मैन्युफैक्चरिंग नीति का मसौदा तैयार कर लिया गया है। अब इसे प्रधानमंत्री मनमोहन के साथ इसी हफ्ते होने वाली बैठक में रखा जाएगा। इस बैठक में वाणिज्य एवं उद्योग मंत्री आनंद शर्मा प्रधानमंत्री को इस नीति का विस्तार से ब्योरा देंगे। बीते शुक्रवार को मंत्रालय में नीति का मसौदा तैयार करने वाली समिति के साथ हुई बैठक में आनंद शर्मा को इसकी जानकारी दी गई। नई नीति में सरकार ने एक राष्ट्रीय मैन्युफैक्चरिंग एवं निवेश जोन (एनएमआइजेड) बनाने का प्रस्ताव किया है। इसमें न सिर्फ उत्पादक यूनिटें होंगी, बल्कि उससे जुड़ी लॉजिस्टिक्स, प्रदूषण की रोकथाम और आवास जैसी सभी सुविधाएं भी रहेंगी। इसके अलावा इस जोन में लगने वाली यूनिटों के लिए कर्मचारियों को रखने और निकालने के नियम लचीले रहेंगे। इस क्षेत्र में स्थापित होने वाली यूनिटों को कई तरह की कर छूट का प्रस्ताव भी मसौदे का हिस्सा है। फिलहाल विशेष आर्थिक क्षेत्र (एसईजेड) में लगने वाली यूनिटों को मिल रही रियायतों को राष्ट्रीय एनएमआइजेड तक बढ़ाने का प्रस्ताव है। इसमें पांच साल तक निर्यात आय पर सौ प्रतिशत आयकर छूट के साथ बिक्री और सेवा कर पर छूट का भी प्रस्ताव नीति के मसौदे में किया गया है। इस नीति के जरिए सरकार अगले नौ साल में जीडीपी में मैन्युफैक्चरिंग क्षेत्र के योगदान को जीडीपी के एक चौथाई तक ले जाना चाहती है। सरकार की इच्छा है कि इस क्षेत्र की मौजूदा रफ्तार कम से कम दुनिया के सात बड़े औद्योगिक देशों के समूह जी 7 के बराबर पहुंच जाए। इसी के मद्देनजर नई राष्ट्रीय मैन्युफैक्चरिंग नीति तैयार की जा रही है। नीति के मसौदे में पर्यावरण की सुरक्षा का ध्यान रखते हुए ग्रीन टेक्नोलॉजी पर खासा जोर दिया गया है। अगले दो दशक में देश के औद्योगिक क्षेत्र में सरकार पर्यावरण अनुकूल तकनीकी को प्रोत्साहित करेगी|
Monday, April 4, 2011
Sunday, April 3, 2011
कारपोरेट चैरिटी
दुनिया को दान की महिमा बताने निकले अमेरिका के अग्रणी पूंजीपति वारेन बुफे और बिल गेट्स की भारत यात्रा के मौके पर उद्योगपतियों के अलग-अलग घरानों की तरफ से इस सिलसिले में किए जा रहे कदमों को बढ़-चढ़कर बताया जा रहा है और इसकी काफी प्रशंसा भी की जा रही है। इस संदर्भ में भारतीय कंपनी जीएमआर ग्रुप ने भी अपनी तरफ से 1500 करोड़ रुपये से अधिक की धनराशि दान देने की घोषणा की है। दान दिए जाने वाले इस धन के बारे में बताया गया कि ऊर्जा, इंफ्रास्ट्रक्चर, हाइवे, एयरपोर्ट आदि के निर्माण में तेजी से आगे बढ़े इस ग्रुप के संस्थापक जीएम राव ने अपने निजी आय में से इस धनराशि का प्रबंध कराया है। पिछले साल ही इस सिलसिले में विप्रो के मालिक और चेयरमैन अजीम प्रेमजी का नाम तब सुर्खियों में आया था जब उन्होंने लगभग 2 अरब डॉलर की राशि उनके ही द्वारा संचालित संस्थाओं को देश में शिक्षा को बेहतर ढंग से चलाने के लिए देने की घोषणा की गई। अपनी सामाजिक जिम्मेदारी के निर्वहन के लिए इस घोषणा के समय कहा गया था कि उनके द्वारा दी गई राशि पर सालाना एक हजार करोड़ रुपये का सूद मिलेगा जिसका इस्तेमाल केवल शिक्षा के काम के लिए किया जाएगा। कारपोरेट सामाजिक जिम्मेदारी की धूम के बीच यह पूछना लाजिमी हो जाता है कि चैरिटी के लिए दिए जाने वाले इन रुपयों का क्या वाकई सही इस्तेमाल हो पाता है? दूसरे क्या इस राशि को कंपनियों द्वारा सरकार को सौंपा जाता है अथवा किसी निजी ट्रस्ट में जाता है। भारत यात्रा पर आए बिल गेट्स और उनकी पत्नी मेलिंडा ने बिल एंड मेलिंडा गेट्स फाउंडेशन का गठन किया है और चैरिटी के लिए दी जाने वाली धनराशि इसी फाउंडेशन के माध्यम से कामों में लगाते है। बिल गेट्स के साथ भारत यात्रा पर आए वारेन बुफे ने भी अपनी धनराशि या तो बुफे फाउंडेशन में लगाई है या उसका अधिकतर हिस्सा बिल एंड मेलिंडा गेट्स फाउंडेशन के लिए दिया है। अगर हम कारपोरेट सामाजिक जिम्मेदारी जैसे शब्द का यदि इतिहास देखें तो वह बहुत पुराना नहीं है। साठ के दशक के उत्तरार्द्ध और सत्तर के दशक की शुरुआत में कई सारी बहुराष्ट्रीय कंपनियां वजूद में आई तभी से यह शब्द आम इस्तेमाल में प्रचलित होना शुरु हुआ। इस विचार के हिमायती कहते हैं कि इस तरह एक दूरगामी परिप्रेक्ष्य से काम करने पर कारपोरेट अधिक मुनाफा कमाते हैं जबकि आलोचकों का मानना है कि कारपोरेट सोशल रेस्पांसिबिलिटी यानी कारपोरेट जगत की सामाजिक जिम्मदारियों का निर्वहन की भावना उद्योगों की आर्थिक भूमिका से ध्यान हटाने का काम करता है। यह भी कहा जाता है कि यह एक महज शिगूफा है या ताकतवर बहुराष्ट्रीय कंपनियों की निगरानी के लिए सरकारों की भूमिका को अप्रत्यक्ष तरीके से हथिया लेना है। यदि कंपनियों को देखें तो उन्हें इसमें कई तरह के फायदे नजर आते है। इसमें एक फायदा तो नए कर्मचारियो की भर्ती करने या उन्हें कंपनी के साथ जोड़े रखने में ही दिखता है। एक साधारण कर्मचारी के लिए वह कंपनी अधिक जुड़ने लायक लग सकती है जिसमें इस तरह की जिम्मेदारी के तहत काम हो रहा हो। एक प्रतिस्पर्धी बाजार में जहां कई प्रतिद्वंद्वी मौजूद होते हैं वहां कंपनियां अपने लिए एक अनोखी व विशिष्ट पहचान भी तलाशने की कोशिश करती हैं। कारपोरेट सामाजिक जिम्मेदारी की रणनीति लोगों में कंपनी की अलग छाप छोड़ने के लिए काफी मुफीद रहती है। इसी तरह कंपनियों द्वारा अपनाई जाने वाली यह रणनीति उनके अपारदर्शी व गलत कामों पर भी परदा डाले रखने में सहायक होती है और बुनियाद प्रश्नों से जनता का ध्यान बांटती है। यह बात ग्राहकों की मनोवृत्ति में आसानी से देखी जा सकती है। वाकिंग विद कामरेड्स शीर्षक से छपे अपने एक चर्चित लेख में अरुंधति राय ने छत्तीसगढ़ की अकूत खनिज संपदा एवं प्राकृतिक संसाधनों पर नियंत्रण के लिए बेताब बड़ी-बड़ी कंपनियों की कारपोरेट सोशल रिस्पांसिबिलिटी की नीतियों की चर्चा करते हुए बताया है कि किस तरह स्थानीय आबादी के जीवन में तबाही के नए मंजर रचने वाली कंपनियों ने वहां कुछ स्कूल खोले हैं अथवा थोड़े बहुत क्लीनिक चलाए जा रहे हैं। इसके अलावा यह भी देखने में आता है कि चैरिटी के नाम पर एकत्रित धनराशि के दम पर कारपोरेट संगठन या पूंजीपति सरकार की नीतियों को भी प्रभावित करने की कोशिश करते हैं। दुनिया को दान की शिक्षा देने के लिए निकले वारेन बुफे खुद एक दूसरे विवाद में भी फंसे नजर आए। जानकारों के मुताबिक वर्ष 2006 से बुफे ने विवादास्पद पोस्को परियोजना में पैसे लगाए हैं। उनकी इनवेस्टमेंट फर्म बर्कशायर हाथवे, गैर कोरियाई निवेशकों में सबसे बड़ी है जिसने पोस्को में पैसा लगाया है। सभी जानते हैं कि बड़ी-बड़ी कंपनियां जीरो टैक्स कंपनियां होती हैं। टैक्स अदायगी के दायित्व से न बंधे होने के कारण काफी अधिक संपत्ति का सृजन करने में सफल होती है। अगर जीरो टैक्स देने वाली ऐसी कोई कंपनी चंद स्कूल अथवा क्लीनिक आदि किसी आदिवासी इलाकों में चला भी देती हैं तो इससे इनकी कमाई पर क्या फर्क पड़ने वाला है? प्रसिद्ध अर्थशास्त्री मिल्टन फ्रीडमैन ने भी अपने एक लेख में पूंजीपतियों की दानशीलता की सच्चाई को अनावृत किया है।
Friday, April 1, 2011
भारत-पाक फिर शुरू करेंगे कारोबार बढ़ाने को बातचीत
भारत और पाकिस्तान के बीच विश्व कप सेमीफाइनल मैच से जो माहौल बना है, इससे दोनों देशों के बीच द्विपक्षीय कारोबारी रिश्ते पर पड़ी गर्द के भी हटने के संकेत मिल रहे हैं। मोहाली में प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह और पाकिस्तानी प्रधानमंत्री यूसुफ रजा गिलानी की मुलाकात और बातचीत के बाद दोनों देशों की तरफ से आपसी व्यापार को बढ़ाने के लिए प्रयास फिर शुरू हो सकते हैं। भारतीय उद्योगपतियों का एक दल बहुत जल्द पाकिस्तान की यात्रा पर जा सकता है। देश के बड़े उद्योग चैंबर भी अपने स्तर पर व्यापारिक दल पाकिस्तान रवाना करने की सोच रहे हैं। सूत्रों के मुताबिक अगर सब कुछ ठीक रहा तो भारत का आधिकारिक व्यापारिक दल अगले महीने अप्रैल के अंत या मई की शुरुआत में पाकिस्तान की यात्रा पर जा सकता है। दल की अगुवाई वाणिज्य सचिव राहुल खुल्लर करेंगे। उनके साथ देश के प्रमुख उद्योगपतियों का दल भी होगा। हालांकि उद्योग चैंबर सीआइआइ अपने स्तर पर भी अलग से एक व्यापारिक दल पाकिस्तान भेजने की संभावना तलाश रहा है। अगर वाणिज्य सचिव की अगुआई में यह दल पाकिस्तान जाता है तो दो वर्ष के बाद आपसी व्यापार को बढ़ाने के लिए दोनों देशों के बीच बातचीत फिर शुरू होगी। सीआइआइ के अध्यक्ष हरि भरतिया ने दैनिक जागरण को बताया कि इस मैच ने हमें आपसी विश्वास बहाली का मौका दिया है। आपसी विश्वास के बल पर ही कोई भी व्यापारिक या सांस्कृतिक रिश्ता आगे बढ़ेगा। अब हमें इस बहाली को बरकरार रखने की जरूरत है। सीआइआइ भारत व पाकिस्तान के द्विपक्षीय व्यापार को बढ़ाने की अपने स्तर पर हर मुमकिन कोशिश करेगा। चैंबर के ढांचागत मामलों की समिति के अध्यक्ष विनायक चटर्जी का कहना है, किसी भी रिश्ते के लिए आपसी विश्वास बहाली बेहद जरूरी है। इस मैच के जरिये यह काम हो गया है। अब हम अपना व्यापारिक दल वहां भेजने की सोच रहे हैं साथ ही उम्मीद है कि पाक का व्यापारिक दल भी भारत आएगा। कूटनीतिक के साथ ही भारत और पाकिस्तान के बीच व्यापारिक संबंध भी नवंबर, 2008 में मुंबई आतंकी हमले के बाद हलके पड़ गए हैं। वैसे दोनों देशों के बीच आधिकारिक कारोबार 2.5 अरब डॉलर के करीब है। गैर-आधिकारिक तौर पर यह कारोबार 10 अरब डॉलर से भी ज्यादा होने की संभावना जताई जाती है। हाल ही में दोनों देशों के बीच कृषि उत्पादों का आयात-निर्यात बढ़ा है..
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