2जी स्पेक्ट्रम घोटाले की आंच झेल रहे केंद्रीय गृह मंत्री पी चिदंबरम ने अमीरों से ज्यादा टैक्स वसूले जाने की वकालत की है। देश के विकास के लिए ज्यादा संसाधनों की जरूरत है। इसके लिए आवश्यक है कि राजस्व में बढ़ोतरी हो। हालांकि उन्होंने माना कि अधिकांश लोग इस बात से सहमत नहीं होंगे कि धनवान लोगों पर ज्यादा टैक्स लगे। बुधवार को यहां अखिल भारतीय प्रबंधन संघ (आइमा) के सालाना समारोह को संबोधित करते हुए चिदंबरम ने कहा कि संसाधनों में कमी के रुझान को रोकने के लिए कर राजस्व बढ़ाना होगा। भले ही लोग उनकी इस बात को पसंद न करें, लेकिन इसके बावजूद वो इस तरह का वक्तव्य देने का साहस दिखा रहे हैं। हालांकि चिदंबरम ने ही मई, 2004 से नवंबर, 2008 तक वित्त मंत्री रहते हुए टैक्स की दरों में कमी की थी। इस अवधि के लिए उन्हें स्वप्निल बजट पेश करने वाले वित्त मंत्री के तौर पर भी याद किया जाता है। उन्होंने स्वीकार किया, मैं ही वह वित्त मंत्री था, जिसने टैक्स की दरों में कमी की थी। इसलिए अब आपको ऊंची दर पर टैक्स देने के लिए भी तैयार रहना चाहिए, विशेष तौर पर धनी लोगों को ज्यादा टैक्स देने के लिए तैयार रहना चाहिए। यूरोप में धनी लोग खुद ज्यादा टैक्स देने की पेशकश कर रहे हैं। चिदंबरम का यह वक्तव्य राष्ट्रपति बराक ओबामा की उस सोच से मेल खाता है, जिसमें उन्होंने अमेरिका को संकट से उबारने के लिए वहां के धनी लोगों से ज्यादा टैक्स देने की अपील की है। चिदंबरम ने कहा कि नए बजट की तैयारियां शुरू हो गई हैं। लिहाजा कौन सा टैक्स बढ़े, इस बारे में चर्चा करने का यह उचित समय नहीं है। मगर इस बात पर गंभीरता से सोचना चाहिए कि देश के कर राजस्व को किस तरह से बढ़ाया जा सकता है।
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Thursday, September 29, 2011
Saturday, June 18, 2011
Tuesday, June 14, 2011
Monday, June 13, 2011
Friday, April 8, 2011
Sunday, April 3, 2011
कारपोरेट चैरिटी
दुनिया को दान की महिमा बताने निकले अमेरिका के अग्रणी पूंजीपति वारेन बुफे और बिल गेट्स की भारत यात्रा के मौके पर उद्योगपतियों के अलग-अलग घरानों की तरफ से इस सिलसिले में किए जा रहे कदमों को बढ़-चढ़कर बताया जा रहा है और इसकी काफी प्रशंसा भी की जा रही है। इस संदर्भ में भारतीय कंपनी जीएमआर ग्रुप ने भी अपनी तरफ से 1500 करोड़ रुपये से अधिक की धनराशि दान देने की घोषणा की है। दान दिए जाने वाले इस धन के बारे में बताया गया कि ऊर्जा, इंफ्रास्ट्रक्चर, हाइवे, एयरपोर्ट आदि के निर्माण में तेजी से आगे बढ़े इस ग्रुप के संस्थापक जीएम राव ने अपने निजी आय में से इस धनराशि का प्रबंध कराया है। पिछले साल ही इस सिलसिले में विप्रो के मालिक और चेयरमैन अजीम प्रेमजी का नाम तब सुर्खियों में आया था जब उन्होंने लगभग 2 अरब डॉलर की राशि उनके ही द्वारा संचालित संस्थाओं को देश में शिक्षा को बेहतर ढंग से चलाने के लिए देने की घोषणा की गई। अपनी सामाजिक जिम्मेदारी के निर्वहन के लिए इस घोषणा के समय कहा गया था कि उनके द्वारा दी गई राशि पर सालाना एक हजार करोड़ रुपये का सूद मिलेगा जिसका इस्तेमाल केवल शिक्षा के काम के लिए किया जाएगा। कारपोरेट सामाजिक जिम्मेदारी की धूम के बीच यह पूछना लाजिमी हो जाता है कि चैरिटी के लिए दिए जाने वाले इन रुपयों का क्या वाकई सही इस्तेमाल हो पाता है? दूसरे क्या इस राशि को कंपनियों द्वारा सरकार को सौंपा जाता है अथवा किसी निजी ट्रस्ट में जाता है। भारत यात्रा पर आए बिल गेट्स और उनकी पत्नी मेलिंडा ने बिल एंड मेलिंडा गेट्स फाउंडेशन का गठन किया है और चैरिटी के लिए दी जाने वाली धनराशि इसी फाउंडेशन के माध्यम से कामों में लगाते है। बिल गेट्स के साथ भारत यात्रा पर आए वारेन बुफे ने भी अपनी धनराशि या तो बुफे फाउंडेशन में लगाई है या उसका अधिकतर हिस्सा बिल एंड मेलिंडा गेट्स फाउंडेशन के लिए दिया है। अगर हम कारपोरेट सामाजिक जिम्मेदारी जैसे शब्द का यदि इतिहास देखें तो वह बहुत पुराना नहीं है। साठ के दशक के उत्तरार्द्ध और सत्तर के दशक की शुरुआत में कई सारी बहुराष्ट्रीय कंपनियां वजूद में आई तभी से यह शब्द आम इस्तेमाल में प्रचलित होना शुरु हुआ। इस विचार के हिमायती कहते हैं कि इस तरह एक दूरगामी परिप्रेक्ष्य से काम करने पर कारपोरेट अधिक मुनाफा कमाते हैं जबकि आलोचकों का मानना है कि कारपोरेट सोशल रेस्पांसिबिलिटी यानी कारपोरेट जगत की सामाजिक जिम्मदारियों का निर्वहन की भावना उद्योगों की आर्थिक भूमिका से ध्यान हटाने का काम करता है। यह भी कहा जाता है कि यह एक महज शिगूफा है या ताकतवर बहुराष्ट्रीय कंपनियों की निगरानी के लिए सरकारों की भूमिका को अप्रत्यक्ष तरीके से हथिया लेना है। यदि कंपनियों को देखें तो उन्हें इसमें कई तरह के फायदे नजर आते है। इसमें एक फायदा तो नए कर्मचारियो की भर्ती करने या उन्हें कंपनी के साथ जोड़े रखने में ही दिखता है। एक साधारण कर्मचारी के लिए वह कंपनी अधिक जुड़ने लायक लग सकती है जिसमें इस तरह की जिम्मेदारी के तहत काम हो रहा हो। एक प्रतिस्पर्धी बाजार में जहां कई प्रतिद्वंद्वी मौजूद होते हैं वहां कंपनियां अपने लिए एक अनोखी व विशिष्ट पहचान भी तलाशने की कोशिश करती हैं। कारपोरेट सामाजिक जिम्मेदारी की रणनीति लोगों में कंपनी की अलग छाप छोड़ने के लिए काफी मुफीद रहती है। इसी तरह कंपनियों द्वारा अपनाई जाने वाली यह रणनीति उनके अपारदर्शी व गलत कामों पर भी परदा डाले रखने में सहायक होती है और बुनियाद प्रश्नों से जनता का ध्यान बांटती है। यह बात ग्राहकों की मनोवृत्ति में आसानी से देखी जा सकती है। वाकिंग विद कामरेड्स शीर्षक से छपे अपने एक चर्चित लेख में अरुंधति राय ने छत्तीसगढ़ की अकूत खनिज संपदा एवं प्राकृतिक संसाधनों पर नियंत्रण के लिए बेताब बड़ी-बड़ी कंपनियों की कारपोरेट सोशल रिस्पांसिबिलिटी की नीतियों की चर्चा करते हुए बताया है कि किस तरह स्थानीय आबादी के जीवन में तबाही के नए मंजर रचने वाली कंपनियों ने वहां कुछ स्कूल खोले हैं अथवा थोड़े बहुत क्लीनिक चलाए जा रहे हैं। इसके अलावा यह भी देखने में आता है कि चैरिटी के नाम पर एकत्रित धनराशि के दम पर कारपोरेट संगठन या पूंजीपति सरकार की नीतियों को भी प्रभावित करने की कोशिश करते हैं। दुनिया को दान की शिक्षा देने के लिए निकले वारेन बुफे खुद एक दूसरे विवाद में भी फंसे नजर आए। जानकारों के मुताबिक वर्ष 2006 से बुफे ने विवादास्पद पोस्को परियोजना में पैसे लगाए हैं। उनकी इनवेस्टमेंट फर्म बर्कशायर हाथवे, गैर कोरियाई निवेशकों में सबसे बड़ी है जिसने पोस्को में पैसा लगाया है। सभी जानते हैं कि बड़ी-बड़ी कंपनियां जीरो टैक्स कंपनियां होती हैं। टैक्स अदायगी के दायित्व से न बंधे होने के कारण काफी अधिक संपत्ति का सृजन करने में सफल होती है। अगर जीरो टैक्स देने वाली ऐसी कोई कंपनी चंद स्कूल अथवा क्लीनिक आदि किसी आदिवासी इलाकों में चला भी देती हैं तो इससे इनकी कमाई पर क्या फर्क पड़ने वाला है? प्रसिद्ध अर्थशास्त्री मिल्टन फ्रीडमैन ने भी अपने एक लेख में पूंजीपतियों की दानशीलता की सच्चाई को अनावृत किया है।
Friday, April 1, 2011
Wednesday, March 30, 2011
Wednesday, March 23, 2011
महंगाई भत्ते से महरूम लोगों का क्या होगा
आम बजट से वित्तमंत्री प्रणब मुखर्जी ने जिस तरह से सबको लुभाने की कोशिश की थी, अब उसकी पोल खुलने लगी है। एक फीसदी उत्पाद शुल्क बढ़ाए जाने से 130 चीजों के दाम बढ़ने लगे हैं। जिन 130 नए उत्पादों को एक्साइज ड्यूटी के दायरे में लाया गया है, उसमें पेंसिल से लेकर मोमबत्ती तक दैनिक खपत वाली बहुत-सी छोटी चीजें महंगी हो जाएंगी। वित्तमंत्री ने उत्पाद शुल्क की बुनियादी दर को 4 से पांच फीसदी करने की जो घोषणा की है, वह दवाओं से लेकर खाद्य उत्पादों तक ढेर सारे सामानों में महंगाई की आग लगाएगी। उत्पादक बढ़े हुए कर को तत्काल उपभोक्ताओं की जेब पर मढ़ देते हैं। इसलिए उत्पादन के बजाय आय पर कर लगाने की सलाह दी जाती है। खासतौर पर जब महंगाई खेत से निकलकर कारखानों तक पहुंच चुकी हो, तब तो यह नया कराधान जनता को और चोट पहुंचाएगा। आम जनता पर पहले से ही करों का भारी भरकम बोझ है। इस बार के बजट ने इस बोझ को और अधिक बढ़ा दिया है। बजट ने ब्रांडेड रेडीमेड गारमेंट के साथ चादरें, तौलिया, परदे, लुंगी और रुमाल भी महंगा कर दिया है। कपास और धागों की कीमतें बढ़ने से पहले ही महंगाई की मार सह रहे टेक्सटाइल उद्योग के ऊपर अब अलग-अलग स्तरों पर करों का नया और भारी बोझ आ गया है। 10 प्रतिशत के उत्पाद शुल्क से जहां रेडीमेड गारमेंट महंगे हो जाएंगे, वहीं पांच फीसदी के उत्पाद शुल्क से पॉवरलूम का कपड़ा भी अब सस्ता नहीं रह पाएगा। सीमेंट की कीमतों में बढ़ोतरी के साथ अब मकान बनाना महंगा हो गया है। उत्पाद शुल्क में हुए फेरबदल के कारण भवन निर्माण से जुड़े कच्चे माल महंगे हो रहे हैं। मकान बनाने के लिए प्रमुख कच्चे माल सीमेंट और स्टील के दामों में पिछले दो-तीन महीने से तेज बढ़ोतरी जारी है, जिसे बजट से और ताकत मिलेगी। सीमेंट के दामों में तो अप्रत्याशित तेजी आई है। संसदीय समिति ने भी माना है कि कंपनिया कार्टेल बनाकर सीमेंट के दाम बढ़ा रही हंै, पर वित्तमंत्री प्रणब मुखर्जी ने सीमेंट पर लगने वाले उत्पाद शुल्क की दरों में बदलाव कर इसके दाम और बढ़ाने का रास्ता खोल दिया है। पिछले तीन महीने में सीमेंट की एक बोरी पर 70 से 80 रुपये की बढ़ोतरी हुई है। बजट में उत्पाद शुल्क से समग्र प्रावधानों के बाद इसमें और बीस रुपये तक की बढ़ोतरी की आशंका है। प्रणब मुखर्जी के इस बजट में आम लोगों को जितनी सब्सिडी दी गई है, उसकी करीब चार गुनी रियायत देश की कंपनियां ले जाती हैं। यह रियायत सरकार के उन प्रोत्साहनों का हिस्सा है, जो कर छूट के तौर कंपनियों को दिए जाते हैं। बजट में आम लोगों को 1,53,962 करोड़ रुपये की सब्सिडी की दी गई, जबकि उद्योग जगत को कर और शुल्कों में 4,60,772 करोड़ रुपये की रियायत मिली है। अगर कच्चे तेल, खाद्य तेल व कई तरह के अनाजों और उर्वरक के आयात वगैरह पर कंपनियों को मिली 76,000 करोड़ रुपये की कर राहत को निकाल दिया जाए (जो कि आम लोगों की मदद के पैकेज का हिस्सा है) तो भी उद्योग जगत को 3,84,000 करोड़ रुपये की छूट मिली हुई है। इसके ठीक विपरीत वित्तमंत्री प्रणब मुखर्जी यह आंक रहे हैं कि नए वित्तवर्ष 2011-12 में बजट से दी जाने वाली सब्सिडी घट जाएगी। दूसरी तरफ कंपनियों को कर रियायत का आकार नए वित्तवर्ष में बढ़ जाएगा। कॉरपोरेट जगत को उत्पाद शुल्क में रियायत इसलिए दी जाती है ताकि वह उत्पादों की कीमतें संतुलित रखें। महंगाई पर काबू पाने की अपनी रणनीति के तहत सरकार ने वर्ष 2009-10 के बजट में तमाम उत्पादों को सीमा शुल्क व उत्पाद शुल्क में राहत दी थी, लेकिन उसके बाद अभी तक महंगाई की दर काबू में नहीं आई। पिछले वित्त वर्ष के दौरान भारतीय कंपनियों का संयुक्त तौर पर कर बाद मुनाफे में 2335 फीसदी की वृद्धि हुई है। उधर लघु उद्योगों को उत्पाद शुल्क के दायरे में लाने के खिलाफ कांग्रेस ने भी आवाज उठाई है। कांग्रेस के प्रवक्ता मनीष तिवारी के साथ लघु उद्योगों के प्रतिनिधियों ने उद्योगों को उत्पाद शुल्क के दायरे में लाने के प्रस्ताव को वापस लेने का आग्रह किया है। कांग्रेस प्रवक्ता मनीष तिवारी के अनुसार इन उद्योगों पर उत्पाद शुल्क को पहले की तरह ही वैकल्पिक रखा जाए। इन पर उत्पाद शुल्क अनिवार्य करने से देश भर में फैले लाखों छोटे व मझोले उद्यमियों के सामने रोजी-रोटी की समस्या खड़ी हो जाएगी। इसीलिए पावरलूम और हैंडलूम सेक्टर की चुनौतियों को देखते हुए तत्कालीन वित्तमंत्री पी चिदंबरम ने 2004 के बजट में हैंडलूम और पावरलूम सेक्टर को केंद्रीय वैट से मुक्त कर दिया था। हमारे बजट का बहुत बड़ा हिस्सा उस निकम्मी और नकारा नौकरशाही पर खर्च होता है, जो आज इस देश की जनता पर बोझ बन गई है। तमाम आर्थिक सुधारों, राजकोषीय प्रबंधन की रणनीतियों और बढ़ते कंप्यूटरीकरण के बावजूद सरकारी बाबुओं की संख्या बढ़ती जा रही है। यह संख्या साल दर साल बढ़ रही है। आर्थिक सुधार के दौर में महत्वहीन हो चुके मंत्रालय व विभाग भी नए कर्मचारियों की नियुक्ति से परहेज नहीं कर रहे। ताजा आंकड़े बताते हैं कि सिर्फ दो वर्षो में सरकारी कर्मचारियों की संख्या में लगभग साढ़े छह फीसदी की वृद्धि हुई है। वर्ष 2009-10 के अंत तक में इनकी संख्या 32,24,486 थी। यह मार्च 2012 तक बढ़कर 34,30,843 हो जाएगी। अगले वित्त वर्ष (2011-12) में विभिन्न सरकारी विभागों में 57,879 नई भर्तियां होंगी। संख्या बल बढ़ने के साथ ही सरकार पर इनके वेतन, भत्ते व अन्य व्यय भी उसी रफ्तार से बढ़ेगा। चालू वित्त वर्ष 2010-11 के दौरान सरकारी कर्मियों के वेतन, भत्ते व अन्य व्यय पर 97,566.39 करोड़ रुपये खर्च हुए। यह राशि अगले वित्त वर्ष 2011-12 के दौरान 12 फीसदी तक बढ़ जाएगी। इन कर्मियों के यात्रा भत्ते पर ही सरकार 3,295 करोड़ रुपये सालाना खर्च कर रही है। कुल मिलाकर सरकारी कर्मचारियों के वेतन, भत्ते पर एक लाख करोड़ रूपये से अधिक खर्च होता है। बजट अब देश की अर्थव्यवस्था की तस्वीर पेश नहीं करते हैं। यह राजनीतिक दलों के दांवपेच का हथियार बन गए है। जिसका इस्तेमाल राजनेता जनता को रिझाने और भरमाने के लिए करते हैं। देश की अर्थनीति को और अधिक उदार बनाना आवश्यक है। पर यह कार्य सरल नहीं है। इस बारे में पहली बात यह है कि उदारीकरण की क्रिया सिलसिलेवार होनी चाहिए, अचानक बहुत तेजी के साथ नहीं। आज भी आधुनिकीकरण या विस्तार के लिए जो आवेदन दिए जाते हैं, उनमें लालफीताशाही के कारण बहुत देर हो जाती है और कई स्तरों पर नौकरशाही की निष्ठुरता और कठोरता भी देखने को मिलती है। राजनीतिक रूप से निजीकरण भले ही संभव न हो, लेकिन निजी क्षेत्र की नई इकाइयों को उन स्थानों पर जाने और अपना काम शुरू करने के लिए प्रोत्साहित करना चाहिए, जो फिलहाल सार्वजनिक क्षेत्र में हैं। जैसे बैंक, यूटीआइ, बिजली विभाग आदि। स्वदेशी तकनीक के विकास के प्रोत्साहन के बारे में सरकारी नीतियों में सर्वोच्च वरीयता दी जानी चाहिए। यह हमारे जैसे उस देश के लिए, जिसने आत्मनिर्भरता के सिद्धांत को अपना रखा है, बड़ी गंभीर बात है। आज स्वदेशी तकनीक के विकास को वरीयता देने के बदले उसके मार्ग में सरकार रोड़े अटकाती है। पूर्णतया स्वदेशी तकनीक से निर्मित उत्पादों के निर्माण को प्रोत्साहित करने के लिए ऐसे निर्माताओं को जिन्होंने बाजार में ऐसे उत्पाद बिक्री के लिए रखे हैं और जो अपेक्षित मानदंडों की कसौटी पर खरे उतरते हैं, उन्हें प्रोत्साहित करने के लिए अनुदान, तैयार उत्पादों पर सीमा शुल्क की छूट और कच्चे मालों के आयात पर रियायत मिलनी चाहिए। (लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं)
Sunday, March 13, 2011
जापान की बर्बादी में भारत के लिए संभावनाएं
सदी के सबसे बड़े जलजले के बाद जापान फिर खड़े होने की कोशिशों में जुटा है। दुनिया की इस तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था में कंस्ट्रक्शन से संबंधित वस्तुओं की भारी मांग होने की संभावना है। इससे भारतीय कंपनियों को भी बड़े पैमाने पर ऑर्डर मिलने की उम्मीद है। जापान खाने पीने की चीजों का भी बड़े पैमाने पर आयात कर सकता है और बंपर पैदावार होने की वजह से भारत जापान को खाद्यान्न निर्यात करने की भी बेहतर स्थिति में है। जापान में निर्यात की संभावनाओं को बढ़ता देख सरकार से इस बारे में उपयुक्त कदम उठाने की भी मांग उठने लगी है। निर्यातकों के शीर्ष संगठन फियो के महासचिव ज्ञान प्रकाश उपाध्याय ने बताया कि जापान ने दूसरे विश्व युद्ध के बाद लंबे समय तक निर्माण कार्य किया था। भूकंप के बाद ऐसे ही आसार बने हैं। भारतीय कंपनियों ने स्टील और सीमेंट सहित अन्य बिल्डिंग मटीरियल उत्पादों में विश्व स्तर पर अपनी पहचान बना ली है। जापान इन सभी उत्पादों का अब आयात शुरू कर सकता है। लिहाजा सरकार को चाहिए कि वह घरेलू कंपनियों को निर्यात बढ़ाने में सहयोग करे। सबसे ज्यादा संभावना अनाज निर्यात बढ़ने की है। भारत में इस साल अनाज की पैदावार जबरदस्त होने की संभावना है। गेहूं, चीनी व चावल के बंपर उत्पादन से घरेलू बाजार में भंडारण की समस्या और गंभीर हो सकती है। वैश्विक बाजार में फिलहाल जिंसों की कीमतें भी काफी तेज हैं। सरकार को इस स्थिति को समझते हुए घरेलू जरूरतों को पूरा करने का इंतजाम करने के बाद खाद्यान्न निर्यात पर लगे प्रतिबंध को हटा लेना चाहिए। इससे जापान को भी मदद मिलेगी क्योंकि वह एक जगह से बड़ी आपूर्ति ले सकेगा। हाल ही में भारत और जापान के बीच आर्थिक साझेदारी समझौता (सीपा) हुआ है। इससे आपसी कारोबार और तेज हो सकता है। भारत पहले से ही जापान को दालों, गेहूं, अनाज, चीनी व मसालों, सब्जियों, फलों, चाय, काफी, तंबाकू जैसे खाद्य उत्पादों का निर्यात करता रहा है। जापान के बाजार में इन भारतीय उत्पादों की प्रतिष्ठा है। ऐसे में जापान की मदद करते हुए भारत अपने निर्यात को बढ़ा सकता है। वित्त वर्ष 2009-10 में भारत और जापान का द्विपक्षीय कारोबार करीब 10.3 अरब डॉलर का था। जापान को 3.63 अरब डॉलर का निर्यात किया गया था, जबकि आयात 6.73 अरब डॉलर का रहा था। फियो का कहना है कि भूकंप के बाद निर्यात मांग बढ़ने की संभावना से भारत और जापान का द्विपक्षीय कारोबार वर्ष 2012-13 तक 25 अरब डॉलर हो सकता है। वैसे दोनों देशों ने सीपा के तहत वर्ष 2014 तक इसके हासिल होने का लक्ष्य रखा है|
Saturday, March 12, 2011
स्वास्थ्य व शिक्षा को ढांचागत क्षेत्र का दर्जा
शिक्षा व स्वास्थ्य क्षेत्र को अपनी प्राथमिकता बताते हुए केंद्र सरकार ने दोनों को ढांचागत क्षेत्र का दर्जा दे दिया है। इससे इन दोनों क्षेत्रों में निवेश करने वाली कंपनियों को ज्यादा आसानी से कर्ज मिल सकेगा और इन्हें ज्यादा कर लाभ भी मिलेगा। इस घोषणा से स्वास्थ्य व शिक्षा के क्षेत्र में अब ज्यादा निजी निवेश आने की संभावना है। शुक्रवार को आम बजट 2011-12 पर जारी चर्चा पर जवाब देते हुए वित्त मंत्री प्रणब मुखर्जी ने लोकसभा में यह घोषणा की। इसके साथ ही सदन ने 2010-11 की अनुपूरक मांगों पर मंजूरी की मुहर लगा दी। स्वास्थ्य सेवाओं को कर दायरे में लाने सहित कुछ अन्य प्रस्तावों की वापसी पर वित्त मंत्री ने कुछ नहीं कहा, लेकिन संकेत दिए कि इस पर पुनर्विचार किया जा रहा है। इसका एलान बाद में होगा। माना जा रहा है कि 17 मार्च, 2011 को वित्त मंत्री कर संबंधी प्रस्तावों में बदलाव को लेकर कुछ घोषणा करेंगे। वित्त मंत्री के एलान के बाद अब शैक्षणिक संस्थानों और अस्पतालों को ढांचागत उप-क्षेत्र का दर्जा मिलेगा और इनमें होने वाले पूंजीगत निवेश को वित्त मंत्रालय के वायबिलिटी गैप फंडिंग (वीजीएफ) नीति के तहत माना जाएगा। ऐसा होने से सरकार जरूरत पड़ने पर इन परियोजनाओं को अनुदान के जरिए वित्तीय मदद उपलब्ध करा सकेगी। इससे निजी क्षेत्र को परियोजना पूरा करने के लिए आसानी से फंड मिल सकेगा। वित्त मंत्री ने मछलीपालकों को सब्सिडी पर कर्ज देने की सरकार की मौजूदा नीति आगे भी जारी रखने का एलान किया। साथ ही उन्होंने बताया कि महिला स्वयं सहायता समूहों को 500 करोड़ रुपये नाबार्ड के जरिये दिए जाएंगे। इससे ग्रामीण क्षेत्रों की महिलाओं को अपना कारोबार शुरू करने के लिए आसानी से कर्ज मुहैया हो सकेगा। वित्त मंत्री के जवाब में आम आदमी के लिए कुछ खास नहीं था। महंगाई से आम आदमी को राहत देने के लिए उन्होंने सिर्फ जुबानी जमा पूंजी खर्च की। उन्होंने कई बार यह याद दिलाया कि संप्रग के छह वर्ष के कार्यकाल में अर्थव्यवस्था का प्रदर्शन पहले के राजग सरकार से बहुत ही बेहतर रहा है। वित्त मंत्री ने भरोसा जताया कि अगले वित्त वर्ष के दौरान अर्थव्यवस्था एक बार फिर नौ फीसदी की रफ्तार हासिल कर लेगी। उन्होंने कहा कि महंगाई की ऊंची दर बिल्कुल स्वीकार नहीं है और सरकार इसे कम करने के लिए हरसंभव कोशिश कर रही है। सरकार महंगाई प्रबंधन के लिए आपूर्ति और मांग के बीच सामंजस्य बिठाने की कोशिश कर रही है|
Monday, March 7, 2011
उद्योगों पर संकट का साया
केंद्रीय बजट आने के साथ ही हंगामा शुरू हो गया। पंजाब के औद्योगिक शहर लुधियाना के कई क्षेत्रों के उद्यमियों ने हड़ताल शुरू कर दी है। होजरी, टेक्सटाइल और सिलाई मशीन तथा जालंधर के खेल उद्यमियों ने तो हड़ताल करके साफ तौर पर अपना विरोध जता दिया। साइकिल उद्यमी भी अपना विरोध जता चुके हैं। अगर सरकार ने अपने फैसले पर पुनर्विचार न किया तो आगे वे भी हड़ताल पर जा सकते हैं। यह विरोध केवल लुधियाना या पंजाब में ही हो ऐसा नहीं है। विरोध के ये सुर कर्नाटक और महाराष्ट्र के अलावा दिल्ली से भी सुनाई दे रहे हैं। यह विरोध केंद्रीय बजट के उस प्रस्ताव के विरुद्ध है जिसमें केंद्रीय उत्पाद शुल्क के दायरे में 130 नए उद्योगों को लाए जाने की बात की गई है। इसमें कोई दो राय नहीं है कि संविधान ने सरकार को अपने खर्चे पूरे करने के लिए कर और शुल्क लगाने के अधिकार दिए हैं, लेकिन सवाल यह है कि संविधान ने उन्हें यह अधिकार क्यों दिए हैं? यह बात हमें कभी नहीं भूलनी चाहिए कि किसी भी लोकतांत्रिक देश का संविधान हमेशा जनोन्मुख होता है। उसमें सरकार की हैसियत कोई राजा या तानाशाह जैसी नहीं होती है। वह कुल मिलाकर जनता की एक प्रतिनिधि भर होती है, जनता की इच्छा और सुविधानुसार देश की व्यवस्था देखने और शासन चलाने के लिए। बेहद शर्मनाक बात यह है कि जब भी देश का बजट आता है तो जिस तरह विभिन्न क्षेत्रों पर अनाप-शनाप कर और शुल्क लगाए जाते हैं, उससे यह साबित हो जाता है कि हमारे राजनेता अभी भी सामंती मानसिकता से उबरे नहीं हैं। करों के प्रावधान देखकर उन राजाओं की याद आ जाती है जो किसी भी बात के लिए जनता पर कर थोप देते थे। कहने के लिए यह बजट महंगाई से पहले से ही पीडि़त आम जनता के घावों पर मरहम रखने को ध्यान में रखकर बनाया गया है। यही वजह है कि जनता पर प्रत्यक्ष कर लगाने से सरकार बची है, लेकिन वहीं सरकार अप्रत्यक्ष रूप से कर भी थोप दिए हैं। आखिर इसका भुगतान किसे करना होगा? जाहिर है जो अप्रत्यक्ष कर उद्यमियों पर लगाए हैं, आखिरकार इनका बोझ जनता की जेब पर ही पड़ेगा। जब उद्यमियों पर कर लगाए जाएंगे तो उनके तैयार माल की लागत बढ़ जाएगी। इससे सामान की कीमत बढ़ेगी और वह बढ़ी हुई कीमत जनता से ही वसूलेंगे। उद्यमियों का कहना है कि कच्चे माल की कीमत बढ़ी होने के कारण चीजों के दाम पहले से ही बढ़े हुए हैं। ऐसी स्थिति में उनके लिए और अधिक दाम बढ़ाने की कोई गुंजाइश नहीं बची है। उनके लिए अपने सामानों के दाम बढ़ाने की गुंजाइश इसलिए भी नहीं रह गई है, क्योंकि दुनिया भर के कई दूसरे देशों के लिए भारतीय बाजार के दरवाजे सरकार पहले ही खोल चुकी है। चीन से हर तरह के सामान हमारे देश में आ रहे हैं और दाम कम होने की वजह से खूब बिक भी रहे हैं। बेहद सस्ते दाम पर आने के लिए चीनी माल दुनिया भर के उद्यमियों के लिए परेशानी का सबब बने हुए हैं। काफी हद तक वे भारतीय उद्यमियों के लिए भी परेशानी के कारण बन चुके हैं। अगर भारतीय उद्यमियों पर इसी तरह बिना सोचे-समझे कर या शुल्क लगाए जाते रहे तो आने वाले दिनों में इनके लिए अस्तित्व का संकट पैदा हो जाएगा। आखिर मामूली मुनाफे पर या घाटा बर्दाश्त करके कोई उद्योग कितने दिनों तक चल सकेगा? इससे भी महत्वपूर्ण सवाल यह है कि उद्योगों से केवल उद्यमियों का जीवन जुड़ा हुआ नहीं है। इनसे बड़ी संख्या में मजदूरों की रोजी-रोटी का सवाल भी जुड़ा है। अगर उद्योग संकट में पड़ गए तो उन तमाम मजदूरों की रोजी-रोटी का क्या होगा जो इन पर आश्रित हैं? यह प्रश्न इसलिए भी अत्यंत प्रासंगिक है, क्योंकि बेरोजगारी पहले से ही पूरे देश में एक बहुत बड़ी समस्या के रूप में मौजूद है। इस समस्या को हल करने के नाम पर नाटक चाहे जितना भी क्यों न हो रहा हो, लेकिन सच्चाई यह है कि वास्तव में किसी भी प्रयास का कोई असर दिख नहीं रहा है। अब अगर उद्योग भी संकट में फंस गए तो फिर रोजगार की स्थिति देश में क्या होगी यह आसानी से समझा जा सकता है। इस तरह अगर देखा जाए तो सरकार नए रोजगार सृजन के बजाय देश में पहले से मौजूद रोजगार को भी खत्म करने पर तुल गई सी लगती है। इसी सोच के तहत लुधियाना के मजदूर संगठन भी उद्यमियों के साथ आ गए हैं। वे इस हड़ताल को अपना पूरा समर्थन दे रहे हैं। उद्यमियों और मजदूरों की इस मुश्किल को समझा जाना चाहिए। सरकार को इसके दूरगामी परिणामों की ओर भी देखना चाहिए। यह एक स्थापित तथ्य है कि जिस किसी भी समाज में बेरोजगारी और महंगाई बढ़ी है, वहां अपराध भी बढ़े हैं। वस्तुत: अपनी आवश्यक आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए समाज के एक बड़े वर्ग की यह मजबूरी हो जाती है। चिंताजनक बात यह है कि भारत में महंगाई और बेकारी दोनों ही समस्याएं बड़ी तेजी से बढ़ती जा रही हैं। क्या सरकार आने वाली स्थितियों के लिए तैयार है? यह सही है कि सरकार के खर्चे बढे़ हैं, लेकिन क्या इन खर्चो में सभी वाजिब हैं? यह कौन नहीं जानता कि जनकल्याण पर किए जाने वाले खर्चो में से एक बहुत बड़ा हिस्सा भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ जाता है! इस पर अंकुश लगाने का इंतजाम क्यों नहीं किया जाता है? सरकार जनता को तो अपने खर्चे सीमित करने के उपदेश देती है, लेकिन उस पर वह स्वयं अमल करने की कोशिश क्यों नहीं करती? अफसरों और मंत्रियों के अनाप-शनाप खर्चो में कटौती क्यों नहीं की जाती है? पहले से ही तबाह जनता अपने खर्चे किस हद तक सीमित करेगी? जिसके लिए अपनी रोटी-दाल का इंतजाम भी मुश्किल हो वह अपने खर्चे और किस हद तक सीमित करेगा? दूसरी तरफ, लाखों करोड़ों रुपये के घपले की जो बातें सामने आ रही हैं, उनकी ईमानदारी से जांच क्यों नहीं कराई जाती है? अपने चहेते लोगों को तरह-तरह से उपकृत करने और अनुत्पादक कार्यो पर सरकार के मंत्री जो खर्चे कर रहे हैं, उन पर नियंत्रण के उपाय क्यों नहीं किए जाते हैं? सच तो यह है कि अगर केवल इतने ही उपाय ईमानदारी से कर लिए जाएं तो सरकार के खर्चे बहुत हद तक घट जाएंगे। ठीक इसी तरह विकास कार्यो में भी अगर पूरी पारदर्शिता और ईमानदारी लाई जाए तो बहुत खर्चे घट जाएंगे। कम लागत में वास्तविक और प्रभावी विकास हो सकते हैं। बार-बार कर लगाने और नए-नए शुल्क थोपने की प्रवृत्ति से सरकार को बचना चाहिए, क्योंकि इससे पहले जनता, फिर उद्यमियों और अंतत: रोजगार पर इसका बहुत बुरा असर पड़ता है। इससे एक-एक करके क्रमश: सभी तबाह होते हैं और यह किसी भी देश या समाज के लिए अच्छी स्थिति नहीं होती है। अगर ऐसे ही बिना सोचे-समझे कर लगाए जाते रहे तो वह दिन दूर नहीं जबकि उद्यमों की स्थिति भी खेती जैसी हो जाएगी। ऐसी स्थिति की कल्पना भी भयावह है। अगर सरकार वास्तव में ऐसी स्थिति से बचना चाहती है तो बेहतर होगा कि वह अभी से इसके लिए सतर्क हो जाए और कराधान की अपनी वर्तमान प्रणाली पर पुनर्विचार करे। (लेखक दैनिक जागरण हरियाणा, पंजाब व हिमाचल प्रदेश के स्थानीय संपादक हैं)
Monday, February 28, 2011
दादा ने आम आदमी को क्या दिया!
महंगाई से जूझ रहे लोगों को उम्मीद थी कि प्रणब मुखर्जी जब देश का 80वां बजट पेश करेंगे तो उसमें महंगाई से राहत के उपाय होंगे, लेकिन प्रणब मुखर्जी के बजट प्रस्तावों में ऐसा कुछ खास नहीं निकला, जिससे महंगाई से जूझ रही जनता राहत की उम्मीद कर सके। सरकार और कांग्रेस पार्टी इसे किसानों और आम आदमी का बजट बताते थक नहीं रही है। हालांकि कांग्रेस पार्टी को भी पता है कि यह बजट आम आदमी की उम्मीदों पर खरा नहीं उतर पाएगा। कांग्रेस प्रवक्ता मनीष तिवारी के शब्दों पर गौर फरमाएं तो यह तथ्य साफ हो जाएगा। बजट पेश होने के बाद प्रतिक्रिया देते हुए मनीष तिवारी का कहना कि वित्तमंत्री ने सस्ती लोकप्रियता हासिल करने वाला बजट पेश नहीं किया है, साफ करता है कि कांग्रेस भी मानती है कि प्रणब मुखर्जी का बजट आम लोगों की उम्मीदों पर खरा नहीं उतरा। शायद यही वजह है कि समूचा विपक्ष इस बजट को सिर्फ वायदों का पिटारा बता रहा है। यों तो वित्तमंत्री बजट को दो हिस्सों में पढ़ते हैं, लेकिन लोगों को बजट प्रावधानों से ज्यादा नजर अपनी आम जरूरत की चीजों की कीमतों पर रहती है। लोग यह भी चाहते हैं कि आयकर की छूट सीमा बढ़े। इस लिहाज से प्रणब मुखर्जी का बजट कमजोर है। लोगों को उम्मीद थी कि इस बार आयकर की छूट सीमा एक लाख साठ हजार से बढ़ाकर तीन लाख रुपये कर दी जाएगी, लेकिन यह छूट महज बीस हजार रुपये की बढ़ी। महिलाओं को पिछले कई साल से छूट देने की परंपरा ही बन गई है, लेकिन इस बार उन्हें निराशा ही हाथ लगी है। बुजुर्ग लोगों को आयकर की छूट सीमा दो लाख चालीस हजार से बढ़ाकर ढाई लाख रुपये कर दी गई। हां, अस्सी साल से ज्यादा उम्र के बुजुर्गो के लिए यह छूट सीमा पांच लाख रुपये तक कर दी गई है। अभी तक पैंसठ साल के बुजुर्गो को ही वृद्धावस्था पेंशन देने का प्रावधान था। अब यह उम्र सीमा घटाकर साठ साल कर दी गई है। फिर राशि भी दो सौ से बढ़ाकर पांच सौ रुपये कर दी गई है। महंगाई के इस दौर में जैसी गति दो सौ रुपये की थी, वैसी ही गति पांच सौ की है। ऐसे में बुजुर्गो को क्या फायदा मिलेगा। बीस हजार रुपये की आयकर छूट का साढ़े आठ फीसदी महंगाई दर के दौर में लोगों को क्या फायदा मिलेगा, इसे वित्तमंत्री ही ठीक तरीके से बता सकते हैं। लेकिन यह तय है कि आम लोगों को खास फायदा नहीं मिला है। वित्तमंत्री ने एक बोल्ड कदम जरूर उठाने का ऐलान किया है कि केरोसिन और एलपीजी के लिए अब सीधे नगद ही सब्सिडी दी जाएगी। अब तक यह सब्सिडी तेल कंपनियों को ही मिलती थी। जब किसानों को 73 हजार करोड़ रुपये की सब्सिडी दी गई थी, तब कुछ एनजीओ और राजनीतिक दलों ने मांग रखी थी कि यह सब्सिडी सीधे नगदी तौर पर किसानों को ही दी जाए तो हर किसान को साढ़े छह हजार रुपये मिलेंगे और उसका सीधा फायदा उसे मिलेगा। सरकार ने तब किसानों को ऐसा फायदा भले ही लेने नहीं दिया, लेकिन केरोसिन और एलपीजी पर नगद सब्सिडी देने का ऐलान करके एक सराहनीय कदम उठाने की कोशिश जरूर की है। लेकिन इसके लिए क्या सरकारी प्रक्रिया होगी, किन्हें यह फायदा मिलेगा, कहीं यह फायदा सिर्फ सरकार की नजर में रहे गरीब लोगों को ही मिल पाएगा..? ये कुछ सवाल हैं, जिनका जवाब सरकार को देना होगा। लेकिन यह तय है कि अगर इस सब्सिडी को लागू करने के लिए पारदर्शी और अचूक तरीका अख्तियार नहीं किया गया तो इससे सरकारी बाबुओं के मालामाल होने और भ्रष्टाचार की नई राह खुल जाएगी। सरकार के नए ऐलानों से लोहा, ब्रांडेड रेडिमेड कपड़े, ब्रांडेड सोना, विदेशी हवाई यात्रा महंगी हो जाएगी। जबकि सौर लालटेन, साबुन, मोबाइल, एलईडी टीवी, कागज, प्रिंटर, साबुन, गाडि़यों के पुर्जे, कच्चा रेशम, सिल्क, रेफ्रिजरेटर, मोबाइल, सीमेंट, स्टील का सामान, कृषि मशीनरी, बैटरी वाली कार, बच्चों के डायपर आदि सस्ते होंगे। लेकिन सरकार ने जिस तरह सर्विस टैक्स के दायरे में बड़े अस्पतालों में इलाज समेत कई सेवाओं को लागू किया है, उससे तय है कि महंगाई और बढ़ेगी। आज के तनाव भरे दौर में जिस तरह से लोगों की जिंदगी पर खतरा बढ़ा है, उसमें बीमा पर लोगों का आसरा बढ़ा है। लेकिन बीमा पॉलिसी पर भी सेवाकर बढ़ाकर वित्तमंत्री ने एक तरह से लोगों की पॉकेट पर ही निगाह गड़ा दी है। ऐसे में महंगाई से राहत की उम्मीद कैसे की जा सकती है। आयातित कार बैटरियों और सीएनजी किट पर सीमा शुल्क घटाकर सरकार ने पर्यावरणवादी कदम उठाने की कोशिश तो की है, लेकिन सच तो यह है कि इन्हें लोकप्रिय बनाने के लिए सीमा शुल्क का आधा किया जाना ही राहत भरा बड़ा कदम नहीं हो सकता। कच्चे रेशम पर भी सीमा शुल्क घटाकर पांच प्रतिशत किया गया है, लेकिन देसी बुनकरों के लिए खास छूटों का ऐलान नहीं है। हालांकि नाबार्ड के जरिए तीन हजार करोड़ की मदद का ऐलान जरूर किया गया है। सरकार का दावा है कि इसका फायदा तीन लाख हथकरघा मजदूरों को मिलेगा। वित्तमंत्री ने किसानों को 4.75 लाख करोड़ रुपये का कर्ज देने का ऐलान किया है। इसके साथ ही वक्त पर कर्ज लौटाने पर उन्हें 3 फीसदी की छूट देने का ऐलान भी किया गया है। इसके साथ ही उन्हें 7 फीसदी ब्याज पर कर्ज देने की भी घोषणा है। इसके साथ ही कोल्ड स्टोरेज के लिए एसी पर कोई एक्साइज नहीं लगाया गया है। इसके साथ ही माइक्रोफाइनेंस क्षेत्र को मजबूती देने के लिए अलग से व्यवस्था की गई है, लेकिन इसका फायदा किसानों की बजाय छोटे उद्यमियों को आर्थिक मदद के तौर पर दिलाने का वायदा है। सच तो यह है कि इसका सबसे ज्यादा फायदा किसानों को मिलना चाहिए। उन्हें कम पूंजी के जरिये अपनी खेती को उन्नत बनाने की जरूरत हर साल पड़ती है, लेकिन सरकार ने अपनी माइक्रोफाइनेंसिंग के दायरे में किसानों पर ध्यान नहीं दिया। वित्तमंत्री ने 2000 से ज्यादा आबादी वाले गांवों में बैंक की सुविधा देने और ग्रामीण बैंकों को 500 करोड़ रुपये देने का भी ऐलान किया है। जाहिर है, गांवों तक सरकारी बैंक ही पहुंचेंगे, लेकिन गांवों में सरकारी बैंकों की जो हालत है और किसानों के साथ उनका क्या सलूक है, यह छुपा नहीं है। उनकी हालत सुधारने और किसान हितैषी बनाने के संबंध में प्रणब मुखर्जी का बजट मौन है। पिछले साल बढ़ी दालों की कीमतों और दूध के आसन्न संकट से निबटने के लिए वित्तमंत्री ने अपने बजट में प्रावधान तो किए हैं। दलहन का उत्पादन बढ़ाने के लिए उन्होंने जहां 300 करोड़ की रकम का प्रावधान किया है, वहीं इतनी ही रकम दूध का उत्पादन बढ़ाने के लिए भी देने का ऐलान है। लेकिन वित्तमंत्री यह भूल गए हैं कि इतने बड़े देश में सिर्फ 300 करोड़ की रकम से दाल और दूध का उत्पादन उस स्तर तक नहीं पहुंचाया जा सकता, जितनी कि देश को जरूरत है। भारतीय जनता पार्टी समेत विपक्षी दलों और बाबा रामदेव ने जिस तरह काले धन को देश व्यापी मुद्दा बना रखा है, उसका दबाव भी प्रणब मुखर्जी के बजट प्रस्तावों में दिखा। बजट भाषण पढ़ते हुए उन्होंने काले धन के दुष्प्रभावों को लेकर चिंता जाहिर करते हुए कहा कि सरकार इससे निपटने के लिए पांच सूत्रीय कार्ययोजना चला रही है। जिसके तहत काले धन के विरुद्ध वैश्विक संघर्ष में साथ, देना उपयुक्त कानूनी ढांचा तैयार करना, अनुचित तरीकों से कमाए गए धन से निपटने के लिए संस्थाएं स्थापित करना, क्रियान्वयन के लिए प्रणालियां विकसित करना और लोगों को कौशल का प्रशिक्षण देना शामिल किया गया है, लेकिन काले धन को लेकर सरकार के कड़े कदम क्या होंगे, उसकी कोई स्पष्ट रूपरेखा उनके बजट भाषण में नहीं दिखी। जाहिर है कि वित्तमंत्री ने सिर्फ चतुराई का ही परिचय दिया है। इससे साफ है कि वित्तमंत्री के मौजूदा बजट भाषण का जमीनी स्तर पर खास फायदा नहीं होने जा रहा। किसान पहले की तरह हलकान रहेंगे, मध्यवर्ग अपनी कमाई में गुजर-बसर करने के लिए मजबूर रहेगा। (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं)
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