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Thursday, March 3, 2011

दुनिया भर में दबदबा कायम करने वाली भारतीय चिकित्सा पद्धतियों की उपेक्षा


आयुव्रेदिक, यूनानी, सिद्धा और औषधीय संस्थाओं के बजट में कटौती की सिफारिश जयपुर में संचालित राष्ट्रीय आयुव्रेद संस्थान के बजट पर भी चली कैंची
नई दिल्ली। ‘योग व आयुव्रेद’ को घर-घर पहुंचाने वाले बाबा रामदेव के कथित कालेधन पर नजर गड़ाए बैठे कांग्रेस नेता बजट में ‘योग एवं आयुव्रेद’ को धन दिला पाने में कामयाब नहीं हो पाए है। यहां तक कि मोरार जी देसाई राष्ट्रीय योग संस्थान के बजट में कटौती करने की सिफारिश की गई है। प्राचीनतम भारतीय चिकित्सा पद्धति भले ही दुनियाभर में अपना दबदबा बना रही हो मगर हमारे देश में आज भी उसे कितना महत्व दिया जा रहा है उसका अंदाजा केंद्र सरकार द्वारा पेश बजट से लगाया जा सकता है। जिसमें कई आयुव्रेदिक, यूनानी, सिद्धा और औषधीय संस्थाओं के बजट में कटौती की सिफारिश की गई है। हालाकि स्वास्थ्य मंत्रालय के बजट में 20 प्रतिशत की वृद्धि का दावा किया गया है लेकिन देशी पद्धतियों के बजट में डेढ़ फीसद से भी कम बढ़ोत्तरी की गई जिसके चलते इस क्षेत्र की तमाम परियोजनाएं और अनुसंधान फाइलों में दबे पड़े रहेंगे। बजट में उन चिकित्सा पद्धतियों को दरकिनार किया गया है जिनके पीछे लोग भाग रहे है। जब देशी पद्धतियों पर भारत से ज्यादा दुनिया के तमाम विकसित देशों के लोग यकीन करने लगे तो यहां के लोगों की मांग पर इस पद्धति को और विकसित करने की मांग की गई और आरोप लगाया गया कि सरकार अंग्रेजी पद्धति पर ही पूरा जोर देती है जबकि मांग देशी पद्धति की बढ़ रही है। कुछ ऐसे मामले भी सामने आए जिसमें कहा गया कि देशी पद्धतियों में आज भी उन रोगों का इलाज है जिनके लिए अंग्रेजी पद्धति में कोई दवा तक नहीं है। यहां तक कि देशी पद्धति का कोई अन्य नुकसान नहीं होता। इस तरह के तर्क आने के बाद केंद्र सरकार ने आयुव्रेद, योग, यूनानी, सिद्धा एवं होम्योपैथिक को मिलाकर आयूष नामक एक अलग से विभाग बना दिया और उसमें मंत्रालय ने अलग से एक स्वास्थ्य सचिव की नियुक्ती कर दी ताकि अनुसंधान और शिक्षा पर जोर देने के लिए देश भर में फैले इस क्षेत्र को समेटा जा सके। लेकिन सरकार द्वारा बनाए गए इस नए विभाग को हर बार या तो पर्याप्त बजट मिलता ही नहीं है और यदि दिया भी जाता है तो वह इतना कम होता है कि कोई भी नया काम शुरू नहीं हो पता। यही वजह है कि इस दिशा में निजी क्षेत्र के लोग यदि कोई काम कर रहे है तो काफी आगे निकल रहे है। उल्लेखनीय है कि आम जनता में इन पद्धतियों की मांग है जबकि सरकारी संस्थाओं में आर्थिक तंगी की वजह से सन्नाटा छाया हुआ है। आयूष का चालू वर्ष का बजट 888 करोड़ रुपये था जिसे 900 करोड़ करने का प्रस्ताव किया गया है। गौरतलब है कि एक तरफ पूरे देश में योग ने क्रांति मचा दी है मगर केंद्र सरकार द्वारा संचालित मोरारजी देसाई राष्ट्रीय योग संस्थान के बजट में कटौती कर दी गई है। जबकि इस संस्थान को और महत्वपूर्ण बनाने के लिए बजट को बढ़ाने की मांग हो रही थी। पेश बजट में इस संस्थान को अब पूरे साल के लिए मात्र 5.5 करोड़ रुपए देने का प्रस्ताव किया गया है। केंद्रीय आयुव्रेदिक विज्ञान एवं सिद्धा परिषद के बजट को भी बढ़ाने की सिफारिश की गई थी मगर उसमें भी कटौती कर 51 करोड़ रुपये कर दिया गया है। यह परिषद देशभर के आयुव्रेदाचायरे व साधन सिद्धकों द्वारा हो रहे कामों का संरक्षण कर उसका प्रचार प्रसार करती है। इसमें काफी काम की गुंजाइश थी मगर अब इस परिषद में जो जैसे होता आ रहा था अब वही होगा। पैसे के आभाव में कोई नया काम नहीं होगा। जयपुर में संचालित राष्ट्रीय आयुव्रेद संस्थान के बजट में भी कटौती गई है। आयुव्रेद के क्षेत्र में चल रही तमाम योजनाओं पर कटौती करते हुे इसकी धनराशि को 16.50 करोड़ में समेट दिया गया है। युनानी दवाओं पर चल रहे तमाम शोध और यहां के विशेषज्ञों के लिए काम करने वाली केंद्रीय युनानी औषधि अनुसंधान परिषद के बजट में भी 5.39 करोड़ रुपए की कटौती की गई है। पूर्वोत्तर में चलने वाले आयुष देशी औषधि संस्थान के बजट में 3 करोड़ की कटौती का प्रस्ताव किया गया है। जहां एक तरफ किसानों को प्रोत्साहित करने के लिए वेजिटेबल पाकरे के लिए उदारता बरती गई है वहीं औषधीय वनस्पती व पौधों के राष्ट्रीय मिशन की उपेक्षा की गई है। गत वर्ष इसे 7.70 करोड़ मिले थे जबकि इस बार 6 करोड़ का प्रस्ताव किया गया है।


खाद्यान्न सुरक्षा, कानून से भी दूर


लगातार ऊंची खाद्य मुद्रास्फीति की दर की पृष्ठभूमि में किसी भी सरकार से कम से कम इतनी अपेक्षा तो की ही जाती है कि वह, खाद्य सहायता में वास्तविक बढ़ोतरी करेगी। हां! अगर खाद्य सुरक्षा कानून का मकसद वास्तव में खाद्य सुरक्षा कम करना हो, तो बात दूसरी है
वित्त मंत्री प्रणब मुखर्जी ने बजट भाषण में यह एलान किया है कि उनकी सरकार खाद्य सुरक्षा कानून बनाएगी। उन्होंने इसी साल संसद में खाद्य सुरक्षा विधेयक लाने का भी भरोसा दिलाया है। वैसे इसके अर्थ को भी अनदेखा करना मुश्किल है कि खाद्य सुरक्षा कानून के वादे के साथ चुनाव में उतरे यूपीए सरकार के तीसरे बजट में भी, इसी साल में खाद्य सुरक्षा कानून बनाने का वादा ही किया जा रहा था। यानी सरकार के कार्यकाल का पूर्वार्ध तो यह कानून बनाने का मन बनाते-बनाते ही निकल गया है। बहरहाल, इस मामले में सरकार की नीयत का पता देने वाला और भी महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि 2011-12 के बजट में खाद्य सब्सिडी के लिए जो रकम रखी गयी है, पिछले वित्त वर्ष के संशोधित बजट अनुमानों के मुकाबले, कुछ न कुछ कटौती को ही दिखाती है। 2010-11 का खाद्य सब्सिडी का संशोधित बजट अनुमान, 60,599.53 करोड़ रुपये है। 2011-12 के बजट में खाद्य सब्सिडी की मद में आवंटन, इससे करीब 27 करोड़ रुपये घटाकर रखा गया है। बेशक, कटौती की रकम बहुत ज्यादा नहीं है। फिर भी कम से कम दो कारणों से इस कटौती का महत्व कहीं ज्यादा है। पहली तो यही कि जब हम लगभग लगातार दो अंकों में बनी रही खाद्य मुद्रास्फीति को हिसाब में लेते हैं, वास्तविक कटौती रुपया मूल्य में की गयी इस कटौती से बहुत ज्यादा और उल्लेखनीय होगी। दूसरे, पिछले दो वर्षो में कमोबेश लगातार ऊंची खाद्य मुद्रास्फीति की दर की पृष्ठभूमि में जब खाद्य सुरक्षा व्यवस्था की बढ़ती जरूरत सभी स्वीकार करते रहे हैं, खाद्य सुरक्षा मुहैया कराने के प्रति गंभीर किसी भी सरकार से कम से कम इतनी अपेक्षा तो की ही जाती है कि वह, खाद्य सहायता में वास्तविक बढ़ोतरी करेगी। हां! अगर खाद्य सुरक्षा कानून का मकसद वास्तव में खाद्य सुरक्षा कम करना हो, तो बात दूसरी है। बहरहाल, खाद्य सुरक्षा की मद में ताजातरीन बजट में की गयी कटौती से तो यही लगता है कि मौजूदा सरकार, खाद्य सुरक्षा कानून की आड़ में खाद्य सहायता में कमी ही करने की उम्मीद लगाए हुए है। खैर, इतना तय है कि यह किसी भूल-चूक का मामला नहीं है। श्री मुखर्जी ने ही 2010-11 के बजट में खाद्य सब्सिडी में पूरे 600 करोड़ रुपये की कटौती का प्रस्ताव किया था। याद रहे कि खाद्य सहायता में कटौती के प्रयास उस देश में किये जा रहे हैं, जो वैसे भी ग्लोबल हंगर इंडैक्स के अनुसार भुखमरी के ‘चौंकाने वाले’ स्तर पर है। और जहां दुनिया भर में सबसे बड़ी संख्या में भूख के शिकार रहते हैं। इस मामले में हमारा देश 88 विकासशील देशों की सूची में भी 66 वें स्थान पर है। यह कटौती उस देश में हो रही है जहां 46 फीसद बच्चे कुपोषण के शिकार हैं, 30 फीसद बच्चे जन्म के समय ही कम वजन के पैदा होते हैं और हर साल 15 लाख बच्चे, सीधे-सीधे कुपोषण से जुड़े कारणों से दम तोड़ देते हैं। बेशक, सरकार का इस तरह का रुख, खाद्य सब्सिडी पर खर्चा, हालात के तकाजों के उलट घटाए जाने तक ही सीमित नहीं है। एक और हरित क्रांति की बतकही के बावजूद, इसी बजट में आम तौर पर कृषि तथा खास तौर पर खाद्यान्न उत्पादन में बढ़ोतरी के पहलू से ‘भविष्यदृष्टि तथा रणनीति’ के अभाव की सचाई खुद प्रोफेसर एम एस स्वामीनाथन ने बयान की है। सरकार द्वारा गठित राष्ट्रीय कृषक आयोग के अध्यक्ष ने इसे ‘दुर्भाग्यपूर्ण’ बताया है कि एक ऐसे वर्ष में जब विश्व खाद्य संकट उभर रहा है और ऊंची खाद्य मुद्रास्फीति बराबर बनी हुई है, ‘कृषि की प्रगति तथा कृषिगत खुशहाली का अवसर गंवा दिया गया है।’
यह विडंबनापूर्ण किंतु सच है कि खाद्यान्न उत्पादन में बढ़ोतरी की कोई सुसंगत रणनीति अपनाने से वह सरकार बचती रही है, जो खाद्य मुद्रास्फीति की ऊंची दरों को, जनता की खुशहाली तथा उसके चलते उपभोग की बढ़ी हुई मांग के ही सबूत के रूप में चलाने की कोशिश कर रही है। वैसे यह पूरी की पूरी दलील ही तथ्यों से मेल नहीं खाती है। सचाई यह है कि नव्बे के दशक से शुरू हुए, नव-उदारवादी आर्थिक नीतियों के दौर में, एक ओर अगर संवृद्धि दर ऊपर चढ़ती गयी है, तो दूसरी ओर प्रति व्यक्ति खाद्यान्न उपलब्धता करीब-करीब लगातार ही, नीचे खिसकती गयी है। इस प्रक्रिया में हमारे देश में वास्तव में हरित क्रांति के पूरे दौर में खाद्यान्न उपलब्धता में हुए सुधार को पलट ही दिया गया है और देश को एक बार फिर, आजादी से ठीक पहले और ठीक बाद के दौर के स्तर पर पहुंचा दिया गया है। वास्तव में यह किस्सा सिर्फ हमारे देश का ही नहीं है। आंकड़े बताते हैं कि अस्सी के बाद से सारी दुनिया को मिलाकर खाद्यान्न उत्पादन में, कुल मात्रा के लिहाज से उल्लेखनीय गिरावट आयी है। 1980-85 की अवधि में, अनाज का औसत प्रति व्यक्ति सालाना उत्पादन 335 किलोग्राम रहा था। लेकिन, 2000-05 में यही आंकड़ा 310 किलोग्राम रह गया था। ऐसे में अगर उपभोग के घटने यानी भूख के बढ़ने के बावजूद, दुनिया 2008 के बाद एक बार फिर विश्व खाद्य कीमतों में तेजी तथा खाद्य संकट की ओर खिसक रही है तो यह हमारे जैसे देशों में आम आदमी के बदहाल होने की ही निशानी है। लेकिन, इस सचाई को स्वीकार करने का मतलब यह स्वीकार करना भी होगा कि इन हालात में खाद्य सुरक्षा मुहैया कराने के लिए सहायता का दायरा उल्लेखनीय रूप से बढ़ाए जाने की जरूरत है। इसके लिए, खाद्य सब्सिडी में भी बढ़ोतरी करने की जरूरत होगी। लेकिन, सरकार के सोच की समग्र दिशा तो खाद्य सब्सिडी में ज्यादा से ज्यादा कटौती करने की ही दिशा है। अचरज नहीं कि प्रणब मुखर्जी की सरकार खाद्य सुरक्षा कानून तो देने के लिए तैयार है, लेकिन किसी वास्तविक अर्थ में भारतीयों को खाद्य सुरक्षा मुहैया कराने के लिए तैयार नहीं है। इसीलिए, खाद्य सुरक्षा विधेयक पर यूपीए की सरकार और सोनिया गांधी के नेतृत्ववाली राष्ट्रीय सलाहकार परिषद (एनएसी) के बीच साल भर से ज्यादा से जारी रस्साकशी का, कहीं कोई अंत नजर ही नहीं आ रहा है। जहां एनएसी खाद्य सुरक्षा के प्रावधान के लिए, वर्तमान सार्वजनिक वितरण व्यवस्था का विस्तार किया जाना अपरिहार्य मानती है, वहीं यूपीए सरकार कथित गरीबी की रेखा के नीचेवालों को छोड़कर, शेष तबकों के लिए खाद्यान्न मुहैया कराने की कोई जिम्मेदारी स्वीकार ही नहीं करना चाहती है। इसका सीधे-सीधे अर्थ है, पहले से चले आ रहे प्रावधानों में भी काट-छांट। एनएसी के प्रस्तावों पर विचार करने के लिए, मनमोहन सिंह की सरकार ने रंगराजन के नेतृत्व में जो कमेटी गठित की थी, उसने सार्वजनिक वितरण पण्राली के विस्तार के सभी प्रस्तावों को हिकारत से ठुकरा दिया था। इसी पृष्ठभूमि में, एनएसी की इस बजट से ऐन पहले हुई बैठक में अपना रुख कड़ा करते हुए यह फैसला लिया गया कि सरकार की मजबूरियों की परवाह न कर, वह अपनी सिफारिशें पेश करेगी! उन्हें मंजूर करे या नामंजूर, यह सरकार की मर्जी। अगर ताजा बजट कोई संकेत है तो इसके आसार कम ही हैं कि यह टकराव, बढ़ते विश्व खाद्य संकट के दौर में भी देशवासियों को कोई वास्तविक खाद्य सुरक्षा मुहैया कराएगा। हां! देश को खाद्य सुरक्षा कानून जरूर दिला सकता है, लेकिन उसे एनएसी तक का आशीर्वाद हासिल नहीं होगा; फिर एक कारगर कानून के रूप में उसकी विश्वसनीयता कितनी होगी, इसका आसानी से अंदाज लगाया जा सकता है।



गरीबों की बलि लेगा मनमोहन का सपना


प्रधानमंत्री जी, यहां तक तो ठीक था कि आपके महंगाई संग विकास के फार्मूले को यह देश बीते डेढ़ साल से भुगत रहा था, लेकिन अब अपने सपने को इस पर मत लादिए। पहले ही महंगाई से टूट चुके आम-आदमी की इस बार आह भी नहीं निकल पाएगी। प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने अपने सपने का खुलासा बजट सत्र में राष्ट्रपति के अभिभाषण पर लाए गए धन्यवाद प्रस्ताव पर किया और हमेशा की तरह न विपक्ष का ध्यान गया, न मीडिया का और न ही जनता का। प्रधानमंत्री ने अपने सपने का संकेत बजट भाषण से कुछ दिन पहले टीवी संपादकों के साथ बातचीत में भी दिया था, लेकिन इसका खुलासा उन्होंने लोकसभा में ही किया। उन्होंने कहा कि वे जब भी बाहर जाते हैं तो लोग ताज्जुब करते हैं कि मंदी के इस दौर में भी वे (प्रधानमंत्री) कैसे एक अरब की आबादी को 8 फीसदी की विकास दर के साथ रख पा रहे हैं। लोग पूछते हैं कि वे कैसे इतने बड़े लोकतांत्रिक देश को कानून एवं व्यवस्था, मानवाधिकार, सर्वधर्म सम्भाव, आर्थिक और सामाजिक समानता के साथ इस ऊंची विकास दर के साथ चला रहे हैं। प्रधानमंत्री ने कहा कि पूरी दुनिया भारत की सवा अरब जनता की ओर आस और उम्मीद भरी नजरों से देखती है, क्योंकि हम आगे बढ़ेंगे तो दुनिया की 1/6 मानवीय नस्ल आगे बढ़ेगी। पूरी दुनिया में संदेश जाएगा कि एक लोकतांत्रिक देश कैसे सबको साथ लेकर आगे बढ़ सकता है। इसलिए वे यहां के आम-जन खासतौर पर मीडिया से आग्रह करते हैं कि वे देश की छवि ऐसी नहीं दिखाएं, जिससे यहां यह दिखे कि यहां चारों ओर महंगाई और भ्रष्टाचार है। प्रधानमंत्री ने जब अपने को मानवीय नस्ल का संवाहक बताया। इसका सपना देखा। तभी माथा ठनक गया कि प्रधानमंत्री अपने सपने को पूरा करने के लिए देश की एक अरब आबादी की बलि लेने पर तुल आए हैं। वे अब दुनिया में क्या साबित करना चाहते हैं कि कैसे 20 रुपये की दिहाड़ी के साथ जीवन मयस्सर करने वाली 80 फीसदी श्रमिक आबादी के साथ 8 से 10 फीसदी की विकास दर लाई जा सकती है। कैसे 50 करोड़ गरीबी रेखा से नीचे रह रहे लोगों के रहते हुए भी 8 से 10 फीसदी की विकास दर हासिल की जा सकती है। साथ ही वे यह भी बताने से नहीं चूकेंगे कि देश में गरीबी को दूर करने के लिए देश में दुनिया की सबसे बड़ी राशन वितरण प्रणाली है। दुनिया की सबसे बड़ी रोजगार गारंटी योजना है। राष्ट्रीय स्वास्थ्य बीमा योजना है। किसान क्रेडिट कार्ड योजना है। इंदिरा आवास योजना है। वृद्धावस्था पेंशन है। विधवा पेंशन है। सब्सिडी है और अब सब्सिडी के बदले नकद राशि योजना है यानी 50 करोड़ गरीब जनता को अपने कंधे पर लादकर प्रधानमंत्री वाशिंगटन में 10 फीसदी की विकास दर से दौड़ लगाने का अपना सपना पूरा कर सकेंगे। यह पूरी मानवीय नस्ल के लिए संदेश होगा, जो युगों-युगों तक याद रखा जाएगा। दरअसल, इस सपने को पूरा करने की उनकी आस नवंबर 2009 में बनी, जब अपनी अमेरिकी यात्रा के दौरान व्हाइट हाउस में भोज के दौरान राष्ट्रपति बराक ओबामा ने उनकी समझदारी और शान में कसीदे पढ़े। ओबामा ने बाद में ऐसा कई मौकों पर कहा। फिर एक पश्चिमी पत्रिका ने भी उन्हें दुनिया का सबसे समझदार और बुद्धिमान नेता का तमगा दे दिया। फिर क्या था, प्रधानमंत्री को इसे साबित करना था और दुनिया को बताना था कि मंदी में भी 6.5 फीसदी की विकास दर और बाद में 8.6 फीसदी की विकास दर कोई इत्तेफाक नहीं है। इस विकास दर को वे अगले कई वर्षो तक 9 से 10 फीसदी तक बनाए रखने का हौसला रखते हैं। मई 2009 में जब प्रधानमंत्री ने दोबारा से सत्ता संभाली थी तो उन्होंने सोचा नहीं था कि वे भारत की आम-जनता को दुनिया की मानवीय नस्ल का हिस्सा मानने लगेंगे। शुरुआत में वे कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी के एक अदद सिपाही की ही तरह थे, जो श्रीमती गांधी के गरीबोन्मुखी योजनाओं के क्रियान्वयन के लिए संकल्पबद्ध था। इसी के तहत प्रधानमंत्री ने जुलाई 2009 में पेट्रोल-डीजल के दामों में बढ़ोतरी कर संकेत दे दिए थे कि वे आम जनता खासतौर पर मध्यम वर्ग पर महंगाई को बोझ लादकर उससे मिल रहे पैसे को गरीबों के उत्थान की योजनाओं में लगाएंगे, लेकिन नवंबर 2009 के बाद प्रधानमंत्री की खुद को वैश्विक नेता के रूप में स्थापित करने की ख्वाहिश बलवती होने लगी। इसका खुलासा उन्होंने कभी किसी से नहीं किया। मन ही मन चुपचाप अपने सपने में मौजूदा महंगाई बनाम गरीबी उत्थान की योजनाओं के माध्यम से रंग भरने लगे। जब स्थितियां उनके अनुकूल चलने लगीं और लाख विरोध के बावजूद पार्टी और सोनिया गांधी उनके साथ खड़ी दिखाई दीं तो मौजूदा बजट सत्र में राष्ट्रपति अभिभाषण के धन्यवाद प्रस्ताव पर उन्होंने इसका खुलासा कर दिया, लेकिन हमेशा की तरह प्रधानमंत्री के इस सपने की ओर किसी का ध्यान नहीं गया। जब भी पत्रकारों ने उनसे मध्यावधि चुनाव या राहुल के प्रधानमंत्री बनने का सवाल पूछा तो वे बड़ी अडिगता से कहते आए कि उन्हें अभी बहुत से अधूरे काम पूरे करने है। उनका वक्तव्य साफ था, लेकिन कोई इसके पीछे उनकी मंशा को नहीं पढ़ पाया। दूसरे, हाल में जारी आर्थिक सर्वे 2011-12 की रिपोर्ट में सरकार ने साफ उल्लेखित कर दिया है कि आने वाले कई सालों यानी दशक तक महंगाई और विकास का साथ चोली-दामन की तरह रहने वाला है। यानी कि इस देश की जनता खासतौर से मध्यवर्ग को अब निम्न मध्य वर्ग और निम्न मध्य वर्ग को गरीबी रेखा से नीचे (बीपीएल) की पायदान पर खिसकने के लिए तैयार हो जाना चाहिए। रही बात गरीबी रेखा के नीचे रहने वालों की तो सरकार ने उसकी कभी परवाह नहीं की, क्योंकि एक पूरी बीपीएल नस्ल भी खत्म हो जाए तो निम्न मध्यम वर्ग की एक पूरी नस्ल उसकी जगह भरने के लिए इस देश में हमेशा तैयार रहती है। सरकार के लिए गरीब आंकड़े भर होते हैं, जिनके लिए सरकारी योजनाएं चलाई जाती हैं और अपनी पीठ थपथपाई जाती है कि इतने लोगों को गरीबी रेखा से ऊपर ले आया गया है। यह बात दूसरी है कि देश में 6.5 करोड़ परिवार (केंद्र सरकार के मुताबिक) गरीबी रेखा से नीचे हैं या 10.5 करोड़ परिवार (राज्य सरकारों के मुताबिक)। सुरेश तेंदुलकर भले ही कहें कि 27.5 करोड़ लोग (जैसा कि केंद्र सरकार कहती है) नहीं, देश में 37.6 करोड़ लोग गरीबी रेखा से नीचे हैं। या एनसी सक्सेना के मुताबिक 52 करोड़ बीपीएल लोग या अर्जुन सेन गुप्ता के मुताबिक 80 फीसदी आबादी बीपीएल में आती हो। सरकार को इन सबसे कोई फर्क नहीं पड़ता। उसे बस राष्ट्रीय सलाहकार परिषद की अध्यक्ष सोनिया गांधी को बताना है कि वह गरीबी उत्थान की योजनाओं के सफल क्रियान्वयन के साथ-साथ राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा कानून के लिए क्या कर रही है। राहुल गांधी को यह बताना है कि उसने इस बार पूर्वी उत्तर प्रदेश के बुनकरों के सिर चढ़े 3 हजार करोड़ रुपये के ऋण माफ कर दिए हैं। बीते बजट में राहुल गांधी बुंदेलखंड के लिए 1100 करोड़ और 7200 करोड़ रुपये (विशेष पैकेज) के रूप में ले गए थे। जो भी हो, सरकार खासतौर पर प्रधानमंत्री और सोनिया गांधी अपने इस महंगाई संग विकास के मॉडल से पीछे हटने वाले नहीं हैं, क्योंकि सोनिया गांधी को लगता है कि सरकारी योजनाओं में लग रही राशि (जो महंगाई से आ रही है), वोट बैंक में तब्दील हो जाएगी। यह बात दूसरी है कि यह हकीकत से कोसों दूर है। संप्रग-1 के समय सरकार ने किसानों को 70 हजार रुपये के ऋण माफ किए थे। वनाधिकार अधिनियम लागू किया था और तो और, मनरेगा था। लेकिन इसके बद भी मई 2009 के लोकसभा चुनावों में कांग्रेस को गरीब प्रदेश बिहार, उड़ीसा, झारखंड और छत्तीसगढ़ की 86 लोकसभा सीटों में से मात्र 10 सीटें मिलीं। अगर इसमें राजस्थान को छोड़कर बीमारू प्रदेश मध्य-प्रदेश और उत्तर प्रदेश को भी जोड़ लिया जाए तो यह आंकड़ा 208 में से मात्र 48 सीटों पर आकर रुकता है, लेकिन इस हकीकत को कोई मानने को तैयार नहीं है। प्रधानमंत्री तो खैर मानेंगे ही नहीं, क्योंकि इसे मान लिया तो फिर उनके सपने का क्या होगा। इसलिए आने वाले दो-चार दिनों में पेट्रोल-डीजल, दूध या दवाओं के दाम बढ़ें तो आम-आदमी चिल्लाए नहीं, क्योंकि इससे दुनिया में देश की छवि खराब होती है। उसे तो चाहिए कि वह प्रधानमंत्री के अदद सपने को पूरा करने करने के लिए चुपचाप अपनी जान दे दे। (लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं)