Monday, November 14, 2011

ईधन सब्सिडी बढ़ने से और बढ़ेगी महंगाई



प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने कहा है कि पेट्रोलियम पदाथोर्ं के दाम कम करने के लिए तेल कंपनियों को अधिक सब्सिडी देने से सरकारी बजट पर बोझ बढ़ेगा और आखिर में इससे मुद्रास्फीति की स्थिति और खराब होगी। प्रधानमंत्री ने कहा, ‘यदि कच्चे तेल के दाम बढ़ते हैं तो हमें या तो घरेलू बाजार में खुदरा कीमतें बढ़ानी होेंगी या फिर तेल कंपनियों को बढ़ी कीमतों को पेट्रोलियम क्षेत्र के दूसरे क्षेत्रों में मदद कम कर स्वयं वहन करने के लिए कहा जाएगा अथवा सरकार को बजट से तेल कंपनियों को अतिरिक्त सब्सिडी उपलब्ध करानी होगी।
मनमोहन ने दक्षेस सम्मेलन से लौटते हुए संवाददाताओं के साथ बातचीत में कहा और ज्यादा सब्सिडी देने से बजट की स्थिति और बिगड़ेगी और यदि बजट गड़बड़ाता है तो एक बार फिर से मुद्रास्फीति अपना सिर उठाने लगेगी।प्रधानमंत्री ने कहा मुद्रास्फीति जो आज हर व्यक्ति के लिए बड़ी चिंता बन चुकी है उसके पीछे की एक सबसे बड़ी वजह ईंधन उत्पादों के दाम में वृद्धि होना है। उन्होंने कहा कि देश में पेट्रोलियम उत्पादों की कुल खपत का 75 प्रतिशत हिस्सा विदेशों से आयात के जरिए पूरा होता है और अंतरराष्ट्रीय बाजार में दाम पर सरकार का कोई नियंतण्रनहीं है। उन्होंने कहा, ‘बजट से दी जाने वाली सब्सिडी राशि पहले ही 1,50,000 करोड़ रुपए तक पहुंच चुकी है और स्पष्ट तौर पर कहें तो यह स्थिति लंबे समय तक नहीं चल सकती है।
उन्होंने कहा, ‘इसलिए मैं यह कहना चाहता हूं कि सभी देशवासियों को यह मानना चाहिए कि अंतरराष्ट्रीय बाजार में दाम बढ़ने पर एक निश्चित सीमा के बाद हमारा कोई नियंतण्रनहीं रह पाता है।
उल्लेखनीय है कि तेल कंपनियों ने इस महीने की शुरुआत में ही पेट्रोल के दाम में 1.80 रुपए प्रति लीटर की वृद्धि की है। अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल के दाम बढ़ने और डालर की तुलना में रुपये के कमजोर पड़ने से दाम बढ़ाने पड़े। देश में मूल्यवृद्धि को लेकर पूछे गए सवाल पर मनमोहन ने कहा, ‘मुद्रास्फीति चिंता का विषय है मैं इसे लेकर इनकार नहीं कर रहा हूं विशेषकर खाद्य मुद्रास्फीति बड़ी चिंता है।हालांकि, उन्होंने कहा कि खाद्यान्न के मामले में स्थिति इतनी खराब नहीं है और इसके दाम करीब करीब स्थिर बने हुये हैं। लेकिन अंडा, मछली, सब्जियों तथा कुछ अन्य उत्पादों के दाम ऊंचे हैं।इनकी मांग इनके उत्पादन में वृद्धि के मुकाबले ज्यादा तेजी से बढ़ रही है। इनकी आपूर्ति में आने वाली अड़चनों को दूर करना होगा, जिसमें कुछ समय लग सकता है। प्रधानमंत्री ने भी माना कि आर्थिक वृद्धि की रफ्तार तेज होने की वजह से भी कुछ मुद्रास्फीति बढ़ी है। अर्थव्यवस्था सालाना 7.5 से 8 प्रतिशत की रफ्तार से बढ़ रही है इसकी वजह से भी मुद्रास्फीति पर कुछ असर पड़ा है। यदि अर्थव्यवस्था आठ प्रतिशत सालाना की रफ्तार से बढ़ती है तो प्रतिव्यक्ति आय में भी सालाना 6.5 प्रतिशत वृद्धि होती है।

Saturday, November 12, 2011

औद्योगिक विकास की निकली हवा


वैिक बाजार के गड़बड़ हालात तथा देश में महंगाई तथा ऊंची ब्याज दरों के बीच सितम्बर में देश की औद्योगिक उत्पादन वृद्धि दर गिर कर 1.9 फीसद रह गई। यह औद्योगिक वृद्धि का दो साल का न्यूनतम स्तर है और इससे लगता है कि आंतरिक और बाह्य कठिनाइयों के चलते उद्योग की गाड़ी नरमी के दलदल में पड़ गई है। सरकार द्वारा शुक्रवार को जारी आईआईपी के आंकड़ों के बाद देश में सख्त ब्याज दर नीति में बदलाव के स्वर मुखर होने लगे है और उम्मीद है कि भारतीय रिजर्व बैंक अगले माह अपनी मौद्रिक नीति की समीक्षा में ब्याज दरों में वृद्धि के सिलसिले पर विराम लगा सकता है। प्रधानमंत्री की आर्थिक सलाहकार परिषद के चेयरमैन सी रंगराजन ने सितम्बर में औद्योगिक उत्पादन के आंकड़ों को निराशाजनक करार दिया है, वहीं मुख्य आर्थिक सलाहकार कौशिक बसु ने कहा है कि अब समय आ गया है जब रिजर्व बैंक को अपने सख्त मौद्रिक नीति रुख पर पुनर्विचार करना चाहिए। आज जारी आंकड़ों के अनुसार औद्योगिक उत्पादन सूचकांक (आईआईपी) पर आधारित औद्योगिक उत्पादन की वृद्धि दर में लगातार तीसरे महीने गिरावट आई है और यह सितम्बर माह में 1.9 फीसद रही है। पिछले साल सितम्बर में औद्योगिक उत्पादन की वृद्धि दर 6.1 फीसद थी। चालू वित्त वर्ष में अप्रैल-सितम्बर के दौरान आईआईपी की वृद्धि दर पांच फीसद रही जो बीते वित्त वर्ष की इसी अवधि में 8.2 फीसद थी। रिजर्व बैंक के डिप्टी गवर्नर सुबीर गोकर्ण ने इसे सुस्त बताया है। औद्योगिक उत्पादन की रफ्तार घटने की मुख्य वजह खनन और विनिर्माण क्षेत्र का खराब प्रदर्शन है। औद्योगिक उत्पादन सूचकांक में इन क्षेत्रों की हिस्सेदारी तीन चौथाई से अधिक है। भारतीय उद्योग जगत ने मांग की है कि अब रिजर्व बैंक को अपने रुख को पलटना चाहिए और ब्याज दरों में कमी करनी चाहिए। हालांकि योजना आयोग के उपाध्यक्ष मोंटेक सिंह अहलूवालिया ने कहा है कि ब्याज दरों और औद्योगिक उत्पादन के बीच किसी तरह का संबंध नहीं है।
औद्योगिक उत्पादन की रफ्तार घटने का सिलसिला जुलाई से शुरू हुआ था। जुलाई में औद्योगिक उत्पादन की वृद्धि दर घटकर 3.84 फीसद पर आ गई थी जो जून माह में 9.45 फीसद पर थी। अगस्त माह में यह और घटकर 3.59 फीसद रह गई। समीक्षाधीन माह में विनिर्माण क्षेत्र की वृद्धि दर केवल 2.1 फीसद रही जो बीते साल सितम्बर में 6.9 फीसद थी। इसी तरह खनन क्षेत्र के उत्पादन में सितम्बर में 5.6 फीसद की गिरावट दर्ज की गई, जबकि बीते साल सितम्बर में इसमें 4.3 फीसद की वृद्धि दर्ज की गई थी। इसी तरह पूंजीगत सामान उत्पादन सितम्बर में 6.8 फीसद घटा, जबकि 2010 के सितम्बर में इसमें 7.2 फीसद की वृद्धि देखी गई थी। वहीं माध्यमिक वस्तुओं के उत्पादन की वृद्धि दर घटकर महज डेढ़ प्रतिशत रही जो सितम्बर, 2010 में 4.6 प्रतिशत थी। इस दौरान, गैर टिकाऊ उपभोक्ता सामान के उत्पादन में 1.3 प्रतिशत की गिरावट आई, जबकि बीते साल सितंबर में इसमें 5.8 प्रतिशत की बढ़त दर्ज की गई थी। हालांकि समीक्षाधीन माह में बिजली उत्पादन में नौ प्रतिशत का सुधार दर्ज किया गया जो सितम्बर, 2010 में महज 1.8 प्रतिशत था। रंगराजन ने कहा, ‘सितम्बर माह के आईआईपी आंकड़े खराब हैं पर मार्च से इसमें बढ़ोतरी की उम्मीद है। पहले हमने वित्त वर्ष के दौरान औद्योगिक उत्पादन की वृद्धि दर सात प्रतिशत रहने का अनुमान लगाया था। पर अब यह 6 प्रतिशत के आसपास रहेगा।

Wednesday, November 9, 2011

महंगे पेट्रोल का राज


पिछले दिनों सरकार ने पेट्रोल की कीमतों में 1.80 रुपये प्रति लीटर की बढ़ोतरी की। 28 जून 2010 को पेट्रोल की कीमतों के नियंत्रणमुक्त होने के बाद यह 10वीं बढ़ोतरी है। भाजपा जहां इसे आधी रात का कत्ल बता रही है, वहीं सरकार की सहयोगी पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने समर्थन वापसी की धमकी दे डाली है। महंगे पेट्रोल के कड़वे सच का विश्लेषण किया जाए तो चौंकाने वाले नतीजे सामने आते हैं। सच्चाई यह है कि पेट्रोल की कीमतों में बढ़ोतरी का मूल कारण करों का भारी बोझ है। केंद्र सरकार कस्टम ड्यूटी के रूप में 2.5 फीसदी, एडिशनल कस्टम ड्यूटी दो रुपये प्रति लीटर, काउंटरवेलिंग ड्यूटी 6.5 रुपये प्रति लीटर, स्पेशल एडिशनल ड्यूटी 6 रुपये प्रति लीटर, सेनवेट 6.35 रुपये प्रति लीटर, एडिशनल एक्साइज ड्यूटी 2 रुपये प्रति लीटर और स्पेशल एडिशनल एक्साइज ड्यूटी के मद में 6 रुपये प्रति लीटर कर वसूलती है। राज्य सरकारें वैट के मद में कर लेती हैं। दिल्ली में पेट्रोल पर 20 फीसदी वैट है। हरियाणा में यह 20.5 फीसदी, छत्तीसगढ़ और चंडीगढ़ में 22 फीसदी, पंजाब में 27.5 फीसदी, मध्य प्रदेश में 28.75 फीसदी और राजस्थान में 28 फीसदी है। इसके अलावा राज्य सरकारें एक रुपया प्रति लीटर सेस भी लेती हैं। फिर पेट्रोल पर वसूले गए कर का एक-तिहाई राज्यों को सौंप दिया जाता है। देखा जाए तो एक साल में पेट्रोलियम उत्पादों पर टैक्स के रूप में केंद्र को 96,000 करोड़ रुपये मिलते हैं और राज्यों को 84,000 करोड़। लेकिन करों का एक-तिहाई हिस्सा राज्यों को सौंपने के बाद केंद्र के पास 64,000 करोड़ रुपये ही बचते हैं। दिल्ली की कीमतों को आधार बनाएं तो सरकारी कंपनियों को एक लीटर पेट्रोल 23 रुपये के आसपास पड़ता है। शेष 45 रुपये से ज्यादा की राशि वे जनता से कर के रूप में वसूल करती हैं। यही कारण है कि भारत में पेट्रोल पड़ोसी देशों की तुलना में इतना महंगा है। इस समय पाकिस्तान में पेट्रोल 41.81 रुपये, श्रीलंका में 50.30 रुपये और बांग्लादेश में 44.80 रुपये प्रति लीटर है। यहां तक कि भारत से पेट्रोल आयात करने वाले नेपाल में पेट्रोल 63.24 रुपये प्रति लीटर बिक रहा है। लेकिन हमारे यहां डिकंट्रोल के नाम पर कंपनियों को पेट्रोल की कीमतें बढ़ाने की खुली छूट दे दी गई है। इसीलिए वे कभी कच्चे तेल की ऊंची कीमत तो कभी रुपये में गिरावट से होने वाले नुकसान को आधार बनाकर कीमतों में बढ़ोतरी करती रहती हैं। लेकिन ये कंपनियां कभी यह नहीं बतातीं कि भारत चालू दर पर कच्चा तेल न खरीद कर पहले ही अनुबंध के जरिए कीमतें तय करके अपनी तेल आपूर्ति सुनिश्चित करता है। ऐसे में रुपये की तात्कालिक कमजोरी को कहां तक उपयुक्त ठहराया जा सकता है। भले ही तेल कंपनियां घाटे का रोना रोती हों लेकिन सच्चाई यह है कि इनकी बैलेंसशीट घाटा नहीं मुनाफा दिखा रही हैं। उदाहरण के लिए 2006-07 से 2009-10 के बीच चार वषरें की अवधि में तीन पेट्रोलियम कंपनियों (इंडियन ऑयल कॉर्पोरेशन, भारत पेट्रोलियम कॉर्पोरेशन और हिंदुस्तान पेट्रोलियम कॉर्पोरेशन) का सम्मिलित लाभ 36,653 करोड़ रुपये था। फिर सार्वजनिक क्षेत्र का उद्देश्य सामाजिक लाभ है न कि मुनाफा कमाना। सरकार का तर्क है कि देश की पेट्रोलियम पदाथरें की वार्षिक जरूरत 10.6 करोड़ टन है जिसमें घरेलू उत्पादन 3.4 करोड़ टन ही है। सरकार दूसरा तर्क देती है कि 2010-11 में कच्चे तेल की औसत कीमत 85 डॉलर प्रति बैरल रहने से जहां तेल कंपनियों को 78,190 करोड़ रुपये का नुकसान उठाना पड़ा, वहीं इस समय कच्चे तेल की औसत कीमत 110 डॉलर प्रति बैरल होने से अंडररिकवरी बढ़कर 1,32,000 करोड़ हो गई है। लेकिन यदि लागत और तेल कंपनियों के मुनाफे को शामिल करते हुए लागत जोड़ सिद्धांत को अपनाया जाए तो वर्तमान दर से काफी कम मूल्य निर्धारण संभव है। फिर भारत हर साल 3.4 करोड़ टन कच्चे तेल का उत्पादन करता है जिसकी कीमत अंतरराष्ट्रीय स्तर पर निर्धारित करना जरूरी नहीं है। साथ ही भारत बड़ी मात्रा में कच्चे तेल को परिष्कृत करके पेट्रोलियम उत्पादों का निर्यात भी करता है जो उद्योग को अच्छा-खासा मुनाफा देता है। ऐसे में लाभ को छोड़ दिया जाए तो पेट्रोल की कीमतें 20 से 26 रुपये के बीच हो सकती हैं। (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं)

Monday, October 24, 2011

नहीं रुकने वाली है महंगाई


अर्थशास्त्र विषय में नोबल पुरस्कार हासिल करने वाले सबसे ज्यादा विद्वान अमेरिका में ही हैं, पर वहां का हाल सबके सामने है। स्थिति संभाले नहीं संभल रही है। दरअसल, वक्त आ गया है कि भारत सरकार साफ-साफ कह दे कि महंगाई को कम करना उसके बस की बात नहीं है। इस कड़वी हकीकत को वैसे भी यह देश पिछले कई सालों से देख रहा है
अब यह गिनना भी निर्थक हो चुका है कि प्रधानमंत्री और वित्त मंत्री कितनी बार यह वादा कर चुके हैं कि महंगाई कम हो जाएगी। ताजातरीन बयान वित्त मंत्री ने दिया है, जिसके मुताबिक दिसम्बर तक महंगाई की स्थिति में फर्क आने की उम्मीद है। पर उम्मीदों से महंगाई कम होती, तो 2007 में ही कम हो जाती। तब से लगातार उम्मीदें ही व्यक्त की जाती रही हैं कि महंगाई कम होगी। रिजर्व बैंक ने एक के बाद एक लगातार ब्याज दरों में बढ़ोतरी की दवा देने की कोशिश की। इस उम्मीद में कि तमाम कजरे के ब्याज की बढ़ोतरी से उनकी मांग कम होगी, सो भाव गिरेंगे और महंगाई कम होगी। इस चक्कर में हुआ यह है कि तमाम चीजों की मांग कम हो गयी, जैसे कारों की मांग में कमी आयी, क्योंकि ब्याज दर बढ़ने से किश्तें महंगी हो गयी। कार बाजार में अब मांग लगातार कम हो रही है। पर टमाटर के भाव कम होने के नाम नहीं ले रहे हैं। जहां भाव कम होने चाहिए थे, वहां भाव कम नहीं हो रहे हैं। और इस पर दावा यह कि सरकार को चलाने वाले लोग जबरदस्त किस्म के अर्थशास्त्री हैं। अर्थशास्त्र से ही अर्थव्यवस्था चलती होती, तो अमेरिका का यह हाल नहीं होता। अर्थशास्त्र विषय में नोबल पुरस्कार हासिल करने वाले सबसे ज्यादा विद्वान अमेरिका में ही हैं, पर वहां का हाल सबके सामने है। स्थिति संभाले नहीं संभल रही है। दरअसल, वक्त आ गया है कि भारत सरकार साफ-साफ कह दे कि महंगाई को कम करना उसके बस की बात नहीं है। इस कड़वी हकीकत को वैसे भी यह देश पिछले कई सालों से देख रहा है। एक दौर में बात की जा रही थी कि 2011-12 में विकास दर नौ प्रतिशत रहेगी। फिर यह आंकड़ा आठ फीसद पर आया। अब विकास दर आठ प्रतिशत भी रहेगी या नहीं, कुछ पक्का नहीं है। पक्का यह है कि राजकोषीय घाटा जितना बताया गया था, उससे ज्यादा होगा। उम्मीद की गई थी कि राजकोषीय घाटा, सकल घरेलू उत्पाद का 4.6 प्रतिशत तक होगा। पर अब स्थिति यह है कि यह घाटा बढ़कर साढ़े पांच फीसद होने का अनुमान लगाया जा रहा है। यह इससे भी ज्यादा हो सकता है। राजकोषीय घाटा कम करने का एक रास्ता यह है कि घर की चांदी बेची जाये। घर की चांदी मतलब है घर की संपत्ति- सरकार चाहती है कि तमाम सरकारी कंपनियों के शेयर बेचे जाएं। कायदे से यह संपत्ति किसी दीर्घकालीन परियोजना में लगनी चाहिए, जिससे विकास की गति तेज होती और देश का भला होता। पर इस संपत्ति का इस्तेमाल भी घाटा कम किये जाने के लिए किया जायेगा, ऐसी संभावना या कहें कि आशंका है। सरकार का लक्ष्य था कि 2011-12 में चालीस हजार करोड़ रु पये सरकारी कंपनियों के शेयर बेचकर उगाहे जाएंगे। पर अभी तक सिर्फ 1,145 करोड़ रु पये ही इस मद से उगाहे गए हैं। शेयर बाजार का जो हाल है, उसे देखते हुए लगता नहीं है कि मार्च, 2012 तक के बचे हुए महीनों में इस लक्ष्य को पूरा कर लिया जाएगा। घाटा कम करना सरकार की चिंता जरूर होनी चाहिए, पर यह अभी सरकार की प्राथमिकता सूची में ऊपर नहीं है। कमजोर शेयर बाजार में औने-पौने दामों पर सरकारी कंपनियों के शेयर बेचना निहायत मूर्खतापूर्ण काम होगा, चाहे यह जितना भी जरूरी क्यों न हो। लेकिन घाटा घटाने की मजबूरी को देखते हुए सरकार यह उपाय भी आजमा सकती है। सरकार के सामने इस समय सबसे बड़ा संकट विसनीयता का है। इस सरकार की विसनीयता पर उसके सहयोगी दल ही प्रश्नचिन्ह लगा रहे हैं। सरकार में शामिल शरद पवार ने हाल में कु छ इसी किस्म का बयान दिया है। मतलब यह है कि ऐसी सूरत जब सरकार की हो, तो कोई बड़ा फैसला लेना उसके लिए संभव नहीं होता। सरकार चलाये रखने, बचाये रखने के मसले सबसे ज्यादा प्राथमिकता के हो जाते हैं। दीर्घकाल में अर्थव्यवस्था की स्थिति बेहतर करना किसी की प्राथमिकता में नहीं होता है। इसका एक परिणाम हाल में स्टेट बैंक ऑफ इंडिया झेल चुका है। स्टेट बैंक की क्रे डिट रेटिंग पहले के मुकाबले कमजोर हुई है। इसका बड़ा कारण यह है कि इस बैंक को पूंजी की जरूरत है। सरकार की तरफ से इसे पूंजी मिलनी चाहिए, या पूंजी जुटाने के वैकिल्पक स्रेतों पर विचार होना चाहिए। पर ऐसा कुछ नहीं हुआ। पूंजी की कमी से जूझ रहे सरकारी बैंकों को कब तक पूंजी मिलेगी, इस सवाल का जवाब किसी के पास नहीं है। बैंकों की क्रे डिट रेटिंग अगर कम हो जाती है, तो उनके लिए संसाधन जुटाना मुश्किल हो जाता है। जब बैंक के लिए संसाधन जुटाना मुश्किल होता है, तो उन्हे मंहगी दर से संसाधन जुटाने होते हैं। इसका असर फिर से बैंकों की स्थिति पर पड़ता है। क्रेडिट रेटिंग कम होने के बाद स्टेट बैंक के लिए पूंजी बाजार से रकम उठाना उतना आसान नहीं है, जितना पहले था। यह एक दुष्चक्र है। पर इस दुष्चक्र से निकालने के लिए आवश्यक राजनीतिक इच्छाशक्तिकहीं दिखाई नहीं पड़ती। सरकार के वित्त मंत्री प्रणब मुखर्जी वित्त मामलों के अलावा सैकड़ों दूसरे मसलों को निपटाते हुए दिखते हैं। सरकार के लगभग हर कामकाज पर उनका बयान दिखता है। पर गहन आर्थिक मसले कैसे निपटेंगे, इसके बारे में थोड़ा बहुत अंदाज तब ही हो पाता है, जब वित्त मंत्री पत्रकारों से मिलते हैं। महंगाई कम होने के आसार इसलिए नहीं हैं क्योंकि कच्चे तेल के अंतरराष्ट्रीय भावों में कमी होने के बावजूद घरेलू पेट्रोलियम उत्पादों के भाव कम होने के आसार नहीं हैं। इस आशय के संकेत पेट्रोलियम मंत्री जयपाल रेड्डी ने दिये हैं। महंगे होते पेट्रोलियम उत्पादों के बैकग्राउंड में महंगाई कम होने की उम्मीद व्यर्थ है। कु ल मिलाकर संकेत यही हैं कि दिसम्बर में सरकार की तरफ से एक बार फिर आासन आ सकता है कि अगले बजट के बाद उम्मीद है कि महंगाई कम होगी। इस तरह के आासन इतने व्यर्थ हो गए हैं कि कई टीवी चैनल और अखबार तो इन्हें महत्व तक नहीं देते। बढ़ता घाटा, बढ़ती महंगाई के सामने सरकार की गायब इच्छाशक्ति ने और समस्याएं पैदा की हैं। सहयोगी दलों की नाराजगी, हिसार उपचुनाव में हारने के बाद सरकारी मशीनरी में एक डर-सा बैठ गया है। कोई भी मंत्री ठोस कदम उठाते हुए नहीं दिख रहा है। जैसा चल रहा है, वैसा ही चलने दिया जाए, यह हालत आर्थिक मंत्रालयों की हो गई है। ऐसी सूरत में इस सरकार से कु छ विशेष की उम्मीद करना ठीक नहीं है। ठीक यही है कि महंगाई के और बढ़ने का इंतजार किया जाए और इसके बाद कुछ आासन और आ जाएं। आासन इस सरकार के पास इफरात में हैं, वे जितने चाहे लिये जा सकते हैं। अर्थशास्त्र से ही अर्थव्यवस्था चलती होती, तो अमेरिका का यह हाल नहीं होता।

तेल कंपनियों के लिए मांगे 58,000 करोड़


अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल (क्रूड) की ऊंची कीमतों के चलते तेल कंपनियों पर बढ़ते बोझ से पेट्रोलियम मंत्रालय खासा चिंतित है। तेल कंपनियों के घाटे की भरपाई करने के लिए मंत्रालय ने वित्त मंत्रालय से 58 हजार करोड़ रुपये की राशि मांगी है। इसमें तीसरी तिमाही में कंपनियों की अंडर रिकवरी (घाटे में पेट्रो उत्पादों की बिक्री) के 15 हजार करोड़ रुपये की राशि भी शामिल है। चालू वित्त वर्ष 2011-12 की पहली तिमाही (अप्रैल से जून तक) तक तेल मार्केटिंग कंपनियों का नुकसान 43,000 करोड़ रुपये था। इसमें से वित्त मंत्रालय 14,000 करोड़ रुपये का भुगतान कंपनियों को कर चुका था। इसके अतिरिक्त 15,000 करोड़ रुपये का आश्वासन वित्त मंत्रालय से मिला था, लेकिन यह राशि कंपनियों को अब तक नहीं मिली है। इसलिए वित्त मंत्रालय पर तेल कंपनियों का पहली तिमाही का करीब 29,000 करोड़ रुपये बकाया है। दूसरी तिमाही (जुलाई- सितंबर) के लिए पेट्रोलियम मंत्रालय ने फिर से 14,000 करोड़ रुपये की मांग रखी, लेकिन वित्त मंत्रालय से अभी तक इस राशि पर भी कोई जवाब नहीं मिला है। सूत्रों के मुताबिक, पेट्रोलियम मंत्रालय ने वित्त वर्ष की दूसरी अनुदान मांगें भेजते समय तेल कंपनियों के लिए तीसरी तिमाही के 15,000 करोड़ रुपये की राशि भी जोड़ ली है। इसे मिलाकर पेट्रोलियम मंत्रालय ने अनुदान मांगों की दूसरी किस्त में तेल कंपनियों के लिए करीब 58,000 करोड़ रुपये की मांग वित्त मंत्रालय के सामने रख दी है। पेट्रोलियम मंत्रालय के अधिकारी मानते हैं कि वित्त मंत्रालय से तेल कंपनियों के लिए इतनी ज्यादा राशि मिलने की उम्मीद उन्हें भी नहीं है। अंतरराष्ट्रीय बाजार में क्रूड की कीमत अभी भी 110 डॉलर प्रति बैरल के आसपास बनी हुई है। ऊपर से डॉलर के मुकाबले रुपये की कमजोरी ने तेल मार्केटिंग कंपनियों पर बोझ बढ़ा दिया है, क्योंकि उनके लिए आयात अब महंगा हो गया है। इसकी वजह से इन तेल कंपनियों का नुकसान घरेलू बाजार की मौजूदा कीमत के मुकाबले लगातार बढ़ रहा है। पेट्रोलियम मंत्रालय चाहता है कि सरकार अगर पेट्रोल के दाम और बढ़ाने की इजाजत नहीं देती तो कम से कम तेल कंपनियों के नुकसान की भरपाई उसे करनी चाहिए।

Saturday, October 15, 2011

उड़ीसा स्टील प्लांट से हाथ खींच सकती है आर्सेलर मित्तल


फाइलों और मंजूरियों के खेल में उलझी स्टील कंपनी आर्सेलर मित्तल उड़ीसा के प्रस्तावित प्लांट से हाथ वापस खींच सकती है। लगभग 1.2 करोड़ टन स्टील उत्पादन वाले इस संयंत्र में भूमि अधिग्रहण से लेकर मंजूरियों तक को लेकर कई समस्याएं सामने आ रही हैं। कंपनी सूत्रों के मुताबिक पिछले डेढ़ साल में कंपनी को इस परियोजना में कोई प्रगति हासिल नहीं हुई है। ऐसे में कंपनी कर्नाटक और झारखंड में प्लांट लगाने पर ज्यादा गंभीर होती जा रही है। अधिग्रहण के लिए जरूरी 15 ग्रामसभाओं में से अभी तक मात्र आठ सभाएं ही आयोजित हुई हैं। यह ग्रामसभाएं 2010 के मध्य तक ही हो गई थीं। इसके बाद एक भी ग्रामसभा नहीं हुई। आर्सेलर मित्तल ने 2006 में उड़ीसा सरकार के साथ एमओयू पर हस्ताक्षर किए थे। इसके तहत क्योंझर में लगभग 10 अरब डॉलर (50 हजार करोड़ रुपये) के निवेश से 1.2 करोड़ टन स्टील उत्पादन का प्लांट लगाया जाना था। इस एमओयू की अवधि दिसंबर में खत्म हो रही है। जब इस प्रोजेक्ट के भविष्य के बारे में कंपनी प्रतिनिधि से पूछा गया तो उन्होंने कुछ भी बताने से इंकार कर दिया। इस बीच आर्थिक मंदी के चलते कंपनी ने लगभग एक अरब डॉलर की बचत करने का अभियान चला दिया है। कंपनी प्रवक्ता ने बताया कि इस अभियान से कंपनी को दूरगामी फायदे होंगे। हालांकि इसका भारत में किए जा रहे निवेश पर कोई फर्क नहीं पड़ेगा। वहीं कर्नाटक में स्थिति कहीं बेहतर है। कंपनी के प्रस्तावित 60 लाख टन उत्पादन वाले प्लांट के लिए वहां लगभग पूरी जमीन अधिग्रहित की जा चुकी है। वहीं कंपनी झारखंड में खुद ही भूमि अधिग्रहण कर रही है। कंपनी वहां करमपाड़ा में लौह अयस्क खनन परियोजना शुरू करना चाह रही है। कंपनी का अनुमान है कि इन खदानों से लगभग 20 करोड़ टन का उत्पादन किया जा सकेगा।