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Tuesday, August 9, 2011

मंदी की आहट


अंतरराष्ट्रीय अर्थव्यवस्था गहरे संकट में धंसती जा रही है। कर्ज संकट से निबटने में अमेरिका व यूरोप की नाकामी के चलते मंदी का खतरा गहरा गया है। अमेरिका की कमजोर आर्थिक स्थिति पर वहां के केंद्रीय बैंक फेडरल रिजर्व ने देर रात अपनी बैठक में मुहर लगा दी है। चीन व भारत की महंगाई व मांग की कमी आशंकाओं को मजबूत कर रही है। कर्ज संकट को लेकर दुनिया की सरकारें लगभग असहाय सी हैं। किसी भी स्तर पर फिलहाल कोई ठोस रणनीति नहीं उभरी है, जबकि रेटिंग एजेंसियां अंतरराष्ट्रीय बैंकों व निवेश संस्थाओं की रेटिंग घटा रही हैं। डरे हुए बाजार मंगलवार को जबर्दस्त अस्थिरता के बाद और गिरे। भारतीय समयानुसार करीब 12 बजे समाप्त फेड रिजर्व की बैठक में अगले दो साल तक ब्याज दरों को निम्नतम स्तर पर बनाए रखने का फैसला किया गया। बैठक के बाद कहा गया कि अमेरिकी अर्थव्यवस्था की विकास दर सुस्त होने और महंगाई का भी खतरा बना हुआ है। फेड रिजर्व का यह इलाज अमेरिकी बाजारों को नहीं भाया। बैठक के पहले उत्सुकतावश ऊपर खुले अमेरिकी बाजार बाद में तेज गिरावट के शिकार हो गए। एशिया के बाजारों में इस दिन भुगतान संकट की नौबत बनती नजर आ रही थी। पूरी दुनिया में निवेशकों को करीब 3,800 अरब डॉलर की चपत लगी और समूचे विश्व का संयुक्त शेयर सूचकांक (मोर्गन स्टैनले व‌र्ल्ड इंडेक्स) 1.2 फीसदी गिर कर बंद हुआ। भारत में सेंसेक्स तेज उतार-चढ़ाव के बाद 132 अंक की गिरावट के साथ बंद हुआ। हालांकि, यह शुरुआत में 450 अंक तक लुढ़का था। बाजारों की घबराहट अब मुद्रा व जिंस बाजार तक फैल गई है। सोना नई ऊंचाई के रिकॉर्ड बनाने की मुहिम पर बढ़ते हुए 25,840 रुपये प्रति दस ग्राम हो गया। डॉलर में उतार-चढ़ाव व आशंकाओं के बीच मजबूती का नया आकर्षण स्विस फ्रैंक बन गया है। स्टैंडर्ड एंड पुअर्स (एसएंडपी) द्वारा अमेरिका की रेटिंग घटाने के चार दिन बाद भी दुनिया की सरकारें इस संकट को टालने की कोई रणनीति लेकर नहीं आ पाईं। अमेरिकी शेष कृष्ठ 2 कालम 1 कर

मंदी की आहट राष्ट्रपति बराक ओबामा ने देश व दुनिया को अमेरिकी साख का भरोसा दिलाने की कोशिश की, मगर बाजारों ने उनकी एक नहीं सुनी। मंदी की वापसी दुनिया के निवेशकों की नई चिंता है। अमेरिकी अर्थव्यवस्था में गिरावट तय है, यूरोप घिसट रहा है। शीर्ष 200 अर्थशास्ति्रयों के बीच रायटर्स द्वारा कराए गए ताजा सर्वे में कहा गया है कि अमेरिका में डबल डिप मंदी के आसार हैं। यानी वर्ष 2008-09 की मंदी एक बार फिर लौट सकती है। इस बीच डराने वाली बड़ी खबर चीन से आई, जहां महंगाई पर कोई काबू नहीं हो पा रहा है। भारत व चीन में विकास दर घटने से डरे निवेशक मान रहे हैं कि यह संकट एक मंदी पर जाकर खत्म होगा। बाजारों में अब नकारात्मक घटनाओं की श्रृंखला बन रही है। एशियाई देशों की रेटिंग पर खतरे से बाजार बेदम हो गए। अमेरिका के कुछ बैंकों व वित्तीय संस्थाओं की रेटिंग एक दिन पहले ही घट गई थी। यही हश्र कुछ और बैंकों का हो सकता है। दो साल पहले प्रमुख निवेश बैंक लीमन ब्रदर्स के ढहने के बाद एशिया के बाजार जिस तरह गिरे थे, ठीक वही स्थिति मंगलवार को बनती दिखी। मंदी का डर सबसे बड़ा था। एशियाई देशों को निर्यात घटने का भय सता रहा है, जबकि विदेशी निवेशक किनारा कर रहे हैं। कोरिया का शेयर सूचकांक कोस्पी एक बार तो दस फीसदी का गोता लगा गया। बाजार को उबारने के लिए कोरिया सरकार के स्टेट फंड को बाजार में उतरना पड़ा। जापान के मुद्रा बाजार में घाटा व गिरावट रोकने के लिए नियामकों को विशेष आदेश जारी करने पड़े। यूरोपीय बाजारो में गिरावट कुछ कम भी, लेकिन घबराहट व बेचैनी बहुत ज्यादा नजर आई। लंदन के बाजार में सोना अपनी दो साल की अपनी सबसे बड़ी तीन दिनी तेजी दिखाकर 1778 डॉलर प्रति औंस पर चढ़ गया। निवेशक केवल सोने व बांड को सुरक्षित मान रहे हैं। इसलिए नई खरीद इन्हीं दोनों की तरफ मुखातिब है।