पेट्रोल की कीमतें बढ़ने वाली हैं इसका संकेतवित्तमंत्री प्रणव मुखर्जी ने पिछले दिनों ही यह कह कर दे दिया था कि लोगोंको अब कड़े फैसलों के लिए तैयार रहना चाहिए। लेकिन एक झटके में ही पेट्रोलकी कीमत दस फीसद बढ़ा दी जाएगी, इसका अंदाजा शायद किसी को नहीं रहा होगा।इस बढ़ोत्तरी के बाद पेट्रोल सत्तर रुपए लीटर की सीमा पार कर गया है औरआश्चर्य नहीं यदि यूपीए सरकार की इस दूसरी पारी के खत्म होते-होते पेट्रोलसौ रुपए की सीमारेखा छूने लगे। केंद्र सरकार को यह अंदाजा तो है कि पहले हीमहंगाई से त्रस्त लोगों के लिए यह वृद्धि कितना पीड़ादायक होगी, इसीलिएवित्तमंत्री ने पल्ला झाड़ते हुए कह दिया कि पेट्रोल की कीमत पर सरकार काकोई नियंतण्रनहीं है और यह जवाबदेही तेल कंपनियों की है जो बाजार के हालातके मद्देनजर फैसला लेती हैं। शायद यही दिखाने के लिए इस वृद्धि की घोषणा उसवक्त हुई, जब पेट्रोलियम मंत्री जयपाल रेड्डी देश के बाहर थे। लेकिन आमआदमी क्या इतना नादान है जो यह भी नहीं जानता कि सरकारी हरी झंडी के बिनातेल कंपनियां ऐसी चोट लगाने की सोच भी नहीं सकतीं! तेल कंपनियां क्या इसइंतजार में थीं कि संसद का सत्र खत्म हो और यूपीए सरकार अपनी दूसरी पारी कातीसरा साल पूरा करने का जश्न मना ले उसके बाद ही देश को यह कड़वी खुराकपिलानी है! अब एनडीए के नेतृत्व में विपक्षी पार्टियां बंद के जरिए इसबढ़ोतरी के विरोध का दिखावा कर रहीं हैं तो तृणमूल और डीएमके जैसे यूपीए केघटक दल यह शोर मचा रहे हैं कि उनसे पूछे बिना ऐसा कैसे कर दिया गया! पिछलीबार पेट्रोल के दाम बढ़ते ही बगावत पर उतर आने वाली तृणमूल सुप्रीमो ममताबनर्जी के सुर इस बार उतने कठोर नहीं दिख रहे हैं। उन्हें शायद यह अंदाज होगया हो कि समाजवादी पार्टी के सरकारी खेमे के निकट पहुंच जाने के बादसरकार पर अब उनकी पकड़ पहले वाली नहीं रह गयी है। इस बढ़ोत्तरी के लिए तेलकंपनियों के माथे भी तमाम ठीकरे नहीं फोड़े जा सकते हैं क्योंकि असल खलनायकतो लगातार बदहाल होती आर्थिक हालत में छिपा है। डॉलर के मुकाबले रुपए कीगिरावट अब चिंताजनक रूप लेने लगी है और जिस देश की जरूरत का अस्सी फीसदपेट्रोलियम आयात पर टिका हो, उसके लिए सस्ता पेट्रोल शायद सपने में भी संभवनहीं। लेकिन ‘कड़े फैसलों’ की तो यह पहली कड़ी है। अब रसोई गैस, डीजल और कैरोसिन की कीमतों पर पड़ने वाली चोट का इंतजार है। पेट्रोल केमुकाबले डीजल का इस्तेमाल काफी अधिक है और इन पर दी जाने वाली सब्सिडीहमारी तेल कंपनियों के लिए घाटे का मुख्य कारण है। लेकिन, इन पर हाथ डालनेके लिए सरकार को कलेजा और मजबूत करना पड़ेगा क्योंकि इसका असर खासतौर परग्रामीण इलाकों पर पड़ेगा। रसोई गैस की कीमत बढ़ा कर सरकार क्या गृहणियोंके कोप का सामना कर पाएगी! पेट्रोल की कीमत में ऐसी उछाल आसमान छूती महंगाईको और हवा देगी, इतना तो तय है। बाइक और कार की सवारी करने वालों को घर सेनिकलने के पहले दो बार सोचना पड़ेगा तो इनका उत्पादन करने वाले कंपनियोंके माथे पर भी शिकन पड़ना तय है। ऑटो वाले अब किराया बढ़ाए बिना मानेंगेनहीं और कहीं डीजल के दाम भी बढ़ गए तो फिर दिल थाम कर बैठने के सिवा दूसराचारा नहीं बचेगा।
ऐसा लगता है जैसे यूपीए सरकार पेट्रोल की कीमतों में बढ़ोत्तरी के लिएबस मौके का इंतजार कर रही थी। उसके उतावलेपन का अंदाजा इसी बात से लगायाजा सकता है कि जैसे ही संसद का बजट सत्र समाप्त हुआ, उसने सरकारी तेलकम्पनियों को कीमतें बढ़ाने का संकेत कर दिया। दूसरी ओर, सरकारी तेलकम्पनियां भी जैसे इसी मौके का इंतजार कर रही थीं। उन्हें लगा कि पेट्रोलकी कीमतों में बढ़ोत्तरी का मौका पता नहीं फिर कब मिलेगा, इसलिए एक झटकेमें कीमतों में कोई 6.50 रुपये (टैक्स सहित लगभग 7.50 रुपये) प्रति लीटर कीबढ़ोत्तरी कर दी गयी। पेट्रोल की कीमतों में यह अब तक की सबसे बड़ीबढ़ोत्तरी है। हालांकि इस बढ़ोत्तरी के लिए सरकार यह कहते हुए बहुत दिनोंसे माहौल बना रही थी कि बढ़ते आर्थिक संकट को देखते हुए कड़े फैसले करने कावक्त आ गया है, लेकिन यह बढ़ोत्तरी इतनी बे-हिसाब और अतार्किक है कि खुदसरकार के मंत्रियों और कांग्रेस के नेताओं को भी इस मामले में बचाव करनामुश्किल हो रहा है। हैरानी की बात नहीं है कि कड़े फैसले की दुहाई देनेवालेवित्तमंत्री भी यह कहकर इस फैसले से हाथ झाड़ने की कोशिश कर रहे हैं किपेट्रोल की कीमतें विनियिमत की जा चुकी हैं और उसे सरकार नहीं, बाजार औरतेल कम्पनियां तय करती हैं। तकनीकी तौर पर यह बात सही होते हुए भी सच यह हैकि तेल कम्पनियां सरकार की हरी झंडी के बिना एक कदम भी आगे नहीं बढ़तीहैं। इसका सबसे बड़ा सुबूत यह है कि तेल कम्पनियों की मांग और दबाव केबावजूद पिछले छह महीनों से उन्हें पेट्रोल की कीमतें बढ़ाने की इजाजत नहींदी गई। कारण, पहले उत्तर प्रदेश समेत पांच राज्यों में विधानसभा चुनाव थेऔर उसके तुरंत बाद संसद का बजट सत्र शुरू हो गया, जहां सरकार विपक्ष कोएकजुट और आक्रामक होने का मौका नहीं देना चाहती थी। इसीलिए संसद का बजटसत्र समाप्त होने का इंतजार किया गया। इस मायने में यह संसद के साथ धोखा हैऔर चोर दरवाजे का इस्तेमाल है। अगर सरकार को यह फैसला इतना जरूरी औरतार्किक लगता है तो उसे संसद सत्र समाप्त होने का इंतजार करने के बजाए उसेविास में लेकर यह फैसला करना चाहिए था। दूसरी महत्वपूर्ण बात यह है किपेट्रोल की कीमतों में इतनी भारी वृद्धि के फैसले का कोई आर्थिक तर्क औरऔचित्य नहीं है। खासकर एक ऐसे समय में जब महंगाई आसमान छू रही है, इस फैसलेके जरिये सरकार ने महंगाई की आग में तेल डालने का काम किया है। इस तथ्य सेसरकार भी वाकिफ है लेकिन उसने आम लोगों के हितों की कीमत पर तेलकम्पनियों, खासकर निजी तेल कम्पनियों और उनके देशीिवदेशी निवेशकों के अधिकसे अधिक मुनाफे की गारंटी को ध्यान में रखकर यह फैसला किया है। इस फैसले काएक मकसद डूबते शेयर बाजार को ऑक्सीजन देना भी है। आश्चर्य नहीं कि इसफैसले के बाद शेयर बाजार में इन तेल कम्पनियों के शेयरों की कीमतों मेंतेजी दिखाई दी है। मजे की बात यह है कि तेल कम्पनियां पेट्रोल की कीमतोंमें रिकॉर्ड वृद्धि के बावजूद घाटे का रोना रो रही हैं और पेट्रोल सहितअन्य पेट्रोलियम उत्पादों की कीमतों में और अधिक वृद्धि की दुहाई दे रहीहैं। हैरानी नहीं होगी, अगर अगले कुछ दिनों में सरकार डीजल और रसोई गैस कीकीमतों में भी वृद्धि का फैसला कर ले। बाजार का तर्क तो यही कहता है औरदेशी-विदेशी निवेशक भी यही मांग कर रहे हैं। साफ है कि सरकार कड़े फैसलेकम्पनियों, शेयर बाजार और निवेशकों को खुश करने के लिए ले रही है। यहीनहीं, सबसे महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि तेल कम्पयिों को घाटा नहीं, मुनाफा होरहा है। वर्ष 2011 में तीनों सरकारी तेल कम्पनियों को भारी मुनाफा हुआ था।इंडियन ऑयल को 7445 करोड़ रुपये, एचपीसीएल को 1539 करोड़ रुपये औरबीपीसीएल को 1547 करोड़ रुपये का मुनाफा हुआ था। तेल कम्पनियों का यह तर्कभी आधा सच है कि पेट्रोल और अन्य पेट्रोलियम उत्पादों की कीमतों में वृद्धिके अलावा कोई उपाय नहीं बचा है क्योंकि कच्चे तेल की कीमतें अंतरराष्ट्रीयबाजार में ऊंची बनी हुई हैं और हाल के महीनों में डॉलर के मुकाबले रुपयेकी कीमत में खासी गिरावट आने से आयात महंगा हुआ है। सवाल यह है कि जबअंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में नरमी आ रही है और कीमतेंगिरी हैं, तब कीमतों में वृद्धि का क्या औचित्य है? दूसरे, क्या रुपये कीकीमत में इतनी गिरावट आ गई है कि पेट्रोल की कीमतों में रिकॉर्ड तोड़बढ़ोत्तरी कर दी जाए। यही नहीं, सवाल यह भी है कि क्या कीमतों में वृद्धिके अलावा और कोई रास्ता नहीं था? यह सवाल इसलिए भी मौजूं है क्योंकि सरकारसमेत सबको पता है कि पेट्रोल की कीमतों में भारी बढ़ोत्तरी से पहले से हीबेकाबू महंगाई को काबू में करना और मुश्किल हो जाएगा। यह किसी से भी छुपानहीं है कि ऊंची मुद्रास्फीति दर का अर्थव्यवस्था पर कितना बुरा असर पड़रहा है। आखिर सरकार ने और विकल्पों पर विचार करना जरूरी क्यों नहीं समझा? यह तथ्य है कि पेट्रोल की कीमतों में लगभग आधा केन्द्र और राज्यों के टैक्सका अधिभार है। सच पूछिए तो केन्द्र और राज्य सरकारें पेट्रोल को दुधारूगाय की तरह इस्तेमाल करती हैं। सवाल है कि क्या पेट्रोल पर लगने वाले टैक्सको कम करने का विकल्प नहीं इस्तेमाल किया जा सकता था? असल में, सरकार तेलकी कीमतों में बेतहाशा बढ़ोत्तरी के इस फैसले के जरिये देशीिवदेशी बड़ीपूंजी को यह संकेत देना चाहती है और उसका विास हासिल करना चाहती है कि वहउनके हितों को आगे बढ़ाने के लिए कड़े से कड़े फैसले लेने के लिए तैयार है।यह किसी से छुपा नहीं है कि यूपीए सरकार पर बड़ी देशीिवदेशी पूंजी आरोपलगाती रही है कि वह ‘नीतिगत लकवेपन’ का शिकार हो गई है और आर्थिक सुधारोंको आगे बढ़ाने के लिए जरूरी कड़े फैसले करने से बच रही है। कहने की जरूरतनहीं है कि सरकार इस समय कॉरपोरेट और बड़ी पूंजी के जबरदस्त दबाव में है।आर्थिक सुधारों को आगे बढ़ाने के एजेंडे के तहत सभी पेट्रोलियम उत्पादों कीकीमतों को पूरी तरह विनियमित करने से लेकर सरकारी तेल कंपिनयों को निजीक्षेत्र को सौंपना शामिल है। सच यह है कि यूपीए सरकार इसी एजेंडे को आगेबढ़ा रही है। पेट्रोलियम उत्पादों की कीमतों को पूरी तरह विनियमित करने कासबसे ज्यादा फायदा देशी-विदेशी बड़ी निजी तेल कम्पनियों को होगा। वे लंबेअरसे से लेवल प्लेईग फील्ड की मांग कर रही हैं। यही नहीं, इससे सरकारी तेलकम्पनियों के निजीकरण का तर्क भी बनेगा। लेकिन सवाल यह है कि जब पूरीदुनिया खासकर अमेरिका और दूसरे विकसित देशों में आम आदमी की कीमत पर निजीतेल कम्पनियों के आसमान छूते मुनाफे को लेकर सवाल उठ रहे हैं, उस समय भारतमें तेल कम्पनियों के मुनाफे के लिए सरकार आम आदमी के हितों को दांव परलगाने से नहीं हिचक रही है। लाख टके का सवाल यह है कि यह आम आदमी की सरकारहै या तेल कंम्पनियों की सरकार?