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Tuesday, August 9, 2011

..तो सस्ते होंगे पेट्रोल-डीजल


नई दिल्ली कर्ज संकट से घिरे अमेरिका की रेटिंग घटने से वैसे तो भारतीय अर्थव्यवस्था पर कई तरह के नकारात्मक असर पड़ेंगे, लेकिन कुछ अच्छे प्रभाव भी देखने को मिल सकते हैं। जानकारों का मानना है कि अमेरिका और यूरोप के ताजा हालात भारत में पेट्रोल डीजल की कीमत कम करने में मदद कर सकते हैं। साथ ही इससे खाद्य उत्पादों की महंगाई से भी राहत मिलने के आसार बन सकते हैं। ठंडा होगा कच्चा तेल जब भी अमेरिका में मांग कम होने की खबर फैलती है, सबसे पहले कच्चे तेल (क्रूड) की कीमत धाराशायी होती है। वर्ष 2008-09 में क्रूड कुछ दिनों के भीतर 145 डॉलर प्रति बैरल से गिरकर 50 डॉलर प्रति बैरल पर गया था। इस बार भी कुछ ऐसे ही आसार दिख रहे हैं। पिछले शुक्रवार को क्रूड के वायदा में 10 और हाजिर सौदे में 7 फीसदी की गिरावट देखी गई। अंतरराष्ट्रीय बाजार में क्रूड की कीमत अभी 107 डॉलर के करीब है। पिछली बार जब सरकार ने पेट्रोल, डीजल, केरोसीन और रसोई गैस को महंगा करने का फैसला किया था, तब क्रूड की आधार कीमत 95 डॉलर मानी गई थी। ऐसे में क्रूड की कीमत 95 डॉलर से कम होते ही कम से कम पेट्रोल डीजल की खुदरा कीमत में कमी आने की सूरत बनती है। काबू में आएगी महंगाई जानकारों का कहना है कि पिछले तीन वर्षो से कमोडिटी बाजार में जारी तेजी पर भी मौजूदा हालात ब्रेक लगा सकते हैं। खास तौर पर अगर चीन की अर्थव्यवस्था डगमगाती है तो इसका सीधा असर विश्व के खाद्य बाजार पर पड़ेगा। अंतरराष्ट्रीय बाजार में खाद्य तेल, चीनी, दुग्ध उत्पाद, गेहूं जैसे प्रमुख खाद्यान्नों की कीमतों में कमी सकती है। इसका असर भारतीय बाजार पर भी पड़ेगा। इससे सरकार के लिए महंगाई पर लगाम लगाने का काम आसान हो सकता है। कर्ज भी हो सकते हैं सस्ते अमेरिका और यूरोप के मौजूदा संकट की वजह से दुनिया भर में ब्याज दरों में गिरावट की संभावना जताई जा रही है। उद्योग चैंबर फिक्की की ओर से जारी सर्वेक्षण के मुताबिक, भारतीय उद्योग ग्लोबल मांग में कमी के साथ ब्याज दरों का बोझ नहीं उठा सकता। लिहाजा, रिजर्व बैंक वर्ष 2008-09 ग्लोबल मंदी की भांति ब्याज दरें घटा सकता है। इससे होम लोन अन्य बैकिंग कर्जो के सस्ता होने का रास्ता साफ होगा। सोने में होगा फायदा वित्तीय फर्म एजेंल ब्रोकिंग के कमोडिटी बाजार विशेषज्ञ नवीन माथुर का कहना है कि शेयरों में गिरावट की वजह से सोना एक बार फिर निवेशकों का पसंदीदा बन जाएगा। ऐसे में सोने की कीमत और नए रिकॉर्ड बनाए तो कोई आश्चर्य नहीं। एक अन्य जानकार का कहना है कि अगले कुछ हफ्तों बाद त्योहारी मौसम शुरू होने वाला है। इससे सोने की कीमत में और तेजी सकती है। हालांकि, चांदी में गिरावट की संभावना है और निवेशकों को इससे फिलहाल दूर ही रहने की सलाह दी गई है।

भारत को इस बार जापान-यूरोप का भी सहारा नहीं


नई दिल्ली घरेलू अर्थव्यवस्था की सुस्ती से निबटने की तैयारी में जुटे भारतीय उद्योग जगत के सिर पर अब अमेरिकी कर्ज संकट का खतरा मंडराने लगा है। इंडिया इंक का मानना है कि अगर इस संकट पर समय रहते काबू नहीं पाया गया तो यह अर्थव्यवस्था को वर्ष 2008-09 की ग्लोबल मंदी से भी ज्यादा डगमगा सकता है। ये हालात रत्न आभूषण, टेक्सटाइल, चमड़ा, आइटी जैसे क्षेत्रों से जुड़ी कंपनियों के प्रदर्शन पर काफी बुरा असर डाल सकते हैं। उद्योग चैंबर फिक्की ने मौजूदा संकट पर एक सर्वे जारी किया है। इसके मुताबिक, उद्योपतियों ने निर्यात पर सबसे ज्यादा असर पड़ने की आशंका जताई है। सर्वे से यह बात भी सामने आती है कि वर्ष 2008-09 की तरह इस बार भारतीय निर्यातक चीन और जापान के बाजार से भरपाई नहीं कर सकेंगे। वर्ष 2011 में जापान की अर्थव्यवस्था में 0.5 फीसदी की गिरावट के आसार हैं, जबकि अमेरिकी ऋण संकट से चीन की अर्थव्यवस्था की रफ्तार भी सुस्त होने की संभावना है। यूरोपीय देशों की मांग में सुधार आने के भी लक्षण नहीं हैं। ऐसे में निर्यात में हाल के महीनों में दर्ज तेजी थम सकती है। सीआइआइ के महानिदेशक चंद्रजीत बनर्जी ने दैनिक जागरण को बताया कि अमेरिका एक ऐसी अर्थव्यवस्था है, जिसमें कुछ भी होता है तो उसका असर भारत सहित तमाम विकासशील देशों पर पड़ना तय है। लेकिन यह असर किस तरह से पड़ेगा, इसका आकलन करने में समय लगेगा। मसलन, इस संकट की वजह से अगर रुपय डॉलर की तुलना में मजबूत होता है तो इसके सकारात्मक और नकारात्मक असर दोनों पड़ेंगे। इसी तरह से अगर अमेरिका अपनी मौद्रिक नीतियों में कुछ बदलाव करता है तो इसका सीधा असर भारत में होने वाले निवेश पर पड़ेगा। हो सकता है कि बहुत सारे फंड भारत की तरफ आकर्षित हो जाएं, इसका भी दूरगामी प्रभाव पड़ेगा। अमेरिकी बाजार से सीधे तौर पर जुड़ी देश की आइटी कंपनियां भी दम साधे पूरी स्थिति पर नजर रख रही हैं। आइटी उद्योग के शीर्ष संगठन नासकॉम के एक अधिकारी ने बताया, वर्ष 2008-09 की ग्लोबल मंदी के समय हमने यूरोप और जापान के बाजार ें पहुंच बढ़ाकर राहत पाने की कोशिश की थी। लेकिन इस बार तो अमेरिका से ज्यादा इन दोनों के हालात खराब हैं। यही स्थिति टेक्सटाइल निर्यातकों की हो सकती है। ताजा आंकड़ों के मुताबिक, अमेरिका भारत के कुल टेक्सटाइल निर्यात का 20 फीसदी आयात करता है। कर्ज संकट से निकलने के लिए अमेरिकी सरकार खर्चो में कटौती करने जा रही है। इससे व्यक्तिगत कॉरपोरेट खर्चो में भी कमी होने की आशंका जताई जा रही है।