Tuesday, August 9, 2011

भारत को इस बार जापान-यूरोप का भी सहारा नहीं


नई दिल्ली घरेलू अर्थव्यवस्था की सुस्ती से निबटने की तैयारी में जुटे भारतीय उद्योग जगत के सिर पर अब अमेरिकी कर्ज संकट का खतरा मंडराने लगा है। इंडिया इंक का मानना है कि अगर इस संकट पर समय रहते काबू नहीं पाया गया तो यह अर्थव्यवस्था को वर्ष 2008-09 की ग्लोबल मंदी से भी ज्यादा डगमगा सकता है। ये हालात रत्न आभूषण, टेक्सटाइल, चमड़ा, आइटी जैसे क्षेत्रों से जुड़ी कंपनियों के प्रदर्शन पर काफी बुरा असर डाल सकते हैं। उद्योग चैंबर फिक्की ने मौजूदा संकट पर एक सर्वे जारी किया है। इसके मुताबिक, उद्योपतियों ने निर्यात पर सबसे ज्यादा असर पड़ने की आशंका जताई है। सर्वे से यह बात भी सामने आती है कि वर्ष 2008-09 की तरह इस बार भारतीय निर्यातक चीन और जापान के बाजार से भरपाई नहीं कर सकेंगे। वर्ष 2011 में जापान की अर्थव्यवस्था में 0.5 फीसदी की गिरावट के आसार हैं, जबकि अमेरिकी ऋण संकट से चीन की अर्थव्यवस्था की रफ्तार भी सुस्त होने की संभावना है। यूरोपीय देशों की मांग में सुधार आने के भी लक्षण नहीं हैं। ऐसे में निर्यात में हाल के महीनों में दर्ज तेजी थम सकती है। सीआइआइ के महानिदेशक चंद्रजीत बनर्जी ने दैनिक जागरण को बताया कि अमेरिका एक ऐसी अर्थव्यवस्था है, जिसमें कुछ भी होता है तो उसका असर भारत सहित तमाम विकासशील देशों पर पड़ना तय है। लेकिन यह असर किस तरह से पड़ेगा, इसका आकलन करने में समय लगेगा। मसलन, इस संकट की वजह से अगर रुपय डॉलर की तुलना में मजबूत होता है तो इसके सकारात्मक और नकारात्मक असर दोनों पड़ेंगे। इसी तरह से अगर अमेरिका अपनी मौद्रिक नीतियों में कुछ बदलाव करता है तो इसका सीधा असर भारत में होने वाले निवेश पर पड़ेगा। हो सकता है कि बहुत सारे फंड भारत की तरफ आकर्षित हो जाएं, इसका भी दूरगामी प्रभाव पड़ेगा। अमेरिकी बाजार से सीधे तौर पर जुड़ी देश की आइटी कंपनियां भी दम साधे पूरी स्थिति पर नजर रख रही हैं। आइटी उद्योग के शीर्ष संगठन नासकॉम के एक अधिकारी ने बताया, वर्ष 2008-09 की ग्लोबल मंदी के समय हमने यूरोप और जापान के बाजार ें पहुंच बढ़ाकर राहत पाने की कोशिश की थी। लेकिन इस बार तो अमेरिका से ज्यादा इन दोनों के हालात खराब हैं। यही स्थिति टेक्सटाइल निर्यातकों की हो सकती है। ताजा आंकड़ों के मुताबिक, अमेरिका भारत के कुल टेक्सटाइल निर्यात का 20 फीसदी आयात करता है। कर्ज संकट से निकलने के लिए अमेरिकी सरकार खर्चो में कटौती करने जा रही है। इससे व्यक्तिगत कॉरपोरेट खर्चो में भी कमी होने की आशंका जताई जा रही है।



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