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Friday, August 12, 2011

सड़क परियोजनाओं में देरी से संसदीय समिति नाराज


नई दिल्ली देश के चारों महानगरों को जोड़ने वाली स्वर्णिम चतुर्भुज सड़क परियोजना के निर्माण में हो रही देरी पर संसद की प्राक्कलन समिति ने गहरी चिंता जताई है। उत्तर से लेकर दक्षिण और पूरब से लेकर पश्चिम को जोड़ने वाली महत्वपूर्ण सड़क परियोजना भी विलंब की शिकार है। यह राष्ट्रीय राजमार्ग विकास परियोजना (एनएचडीपी) के तहत संचालित है। संसद में पेश समिति की 2010-11 की रिपोर्ट में कहा गया है कि पूर्व-पश्चिम और उत्तर-दक्षिण कॉरीडोर परियोजना को 2009 में ही बन कर तैयार हो जाना था। कई बार अवधि विस्तार देने के बाद समिति को बताया गया कि दिसंबर 2010 में इसे एक बार फिर से अवधि विस्तार दिया गया। समिति ने इस बात पर चिंता जताई है कि परियोजना की 444 किलोमीटर सड़क के लिए अभी टेंडर तक नहीं दिए गए हैं। जब तक सारे टेंडर दिए नहीं जाते तब तक सड़क परिवहन मंत्रालय भी बता पाने की स्थिति में नहीं है कि यह परियोजना कब तक पूरी हो पाएगी। इस परियोजना में विलंब के संबंध में मंत्रालय के तर्को से भी समिति सहमत नहीं है। समिति ने अनुशंसा की है कि पूर्व-पश्चिम, उत्तर-दक्षिण कॉरीडोर के बचे काम के लिए बिना देरी किए टेंडर दिए जाएं और एनएचएआइ बोर्ड जैसी कोई उच्च स्तरीय कमेटी इसकी पाक्षिक निगरानी करे, ताकि निर्माण कार्यो में आगे कोई विलंब न हो। देश के चार महानगरों को जोड़ने वाली स्वर्णिम चतुर्भुज सड़क परियोजना को 2004 में पूरा होना था। समिति ने सात साल बाद भी इस परियोजना के पूरा नहीं होने पर नाराजगी जाहिर की है। मंत्रालय की इस दलील से समिति ने असहमति व्यक्त की कि इतने बड़े पैमाने की सड़क परियोजना को पूरा करने के लिए देश का निर्माण उद्योग सक्षम नहीं था। समिति ने कहा है भूतल परिवहन मंत्रालय सड़क निर्माण के काम में आने वाले भारी उपकरणों के आयात की अनुमति देने का फैसला लेने में शीघ्रता दिखाकर निर्माण में होने वाली देरी को कम कर सकता था। समिति ने अनुशंसा की है कि मंत्रालय सतत निगरानी करके जल्द से जल्द इस परियोजना को पूरा कराए।


निर्यात में तेज उछाल मगर आगे घटेगी रफ्तार


: अमेरिकी और यूरोपीय संकट के बावजूद जुलाई के निर्यात में 81.8 फीसदी की तेज बढ़त दर्ज की गई है। इंजीनियरिंग, पेट्रो-रसायन और रत्न एवं आभूषण क्षेत्र के बेहतर प्रदर्शन के चलते यह 29.3 अरब डॉलर पर पहुंच गया है। जबकि चालू वित्त वर्ष 2011-12 के पहले चार महीनों (अप्रैल-जुलाई) के दौरान निर्यात में 54 फीसदी की तेजी आई है। हालांकि सरकार ने चेताया है कि कठिन वैश्विक हालत में आगामी महीनों के दौरान यह रफ्तार शायद ही बरकरार रहे। वाणिज्य सचिव राहुल खुल्लर ने गुरुवार को निर्यात के आंकड़े जारी करते हुए कहा कि अमेरिका और यूरोपीय देशों में अनिश्चितता की वजह से निर्यात की रफ्तार को कायम रख पाना मुश्किल होगा। अगस्त-सितंबर से ही निर्यात की वृद्धि दर में कमी दिखाई देनी शुरू हो जाएगी। खुल्लर ने कहा कि ज्यादातर क्षेत्रों ने हालांकि बेहतर प्रदर्शन किया है, पर निर्यातकों को अति उत्साहित होने की जरूरत नहीं है। उन्हें संभलकर चलना चाहिए। माना जा रहा है कि अमेरिका और यूरोप में अनिश्चितता की वजह से वैश्विक मांग प्रभावित होगी। इन देशों की भारत के निर्यात में 35 फीसदी की हिस्सेदारी है। जुलाई में देश का इंजीनियरिंग निर्यात 8.7 अरब डॉलर का रहा। इसी तरह पेट्रोलियम उत्पादों का निर्यात 4.6 अरब डॉलर और रत्न एवं आभूषण निर्यात 3.5 अरब डॉलर का हुआ। इस दौरान आयात भी 51.5 फीसदी बढ़कर 40.4 अरब डॉलर पर पहुंच गया है। यानी इस महीने व्यापार घाटा बढ़कर 11.1 अरब डॉलर हो गया। चालू वित्त वर्ष के पहले चार महीनों में निर्यात 54 फीसदी उछल कर 108.3 अरब डॉलर का रहा है। इस दौरान आयात भी 40 फीसदी बढ़कर 151 अरब डॉलर पर पहुंच गया। पेट्रोलियम उत्पादों का आयात साल दर साल आधार पर 23 फीसदी बढ़कर 42 अरब डॉलर का रहा। निर्यातकों के संगठन फियो ने कहा कि निर्यात में इतनी तेजी वृद्धि हाल के समय में कभी नहीं हुई है।

केंद्र को सताने लगा औद्योगिक समूहों का डर


नई दिल्ली भूमि अधिग्रहण विधेयक के मसौदे पर आगे बढ़ रही सरकार को अभी से औद्योगिक समूहों का डर सताने लगा है। वह अपने ऊपर यह ठप्पा नहीं लगने देना चाहती कि सरकार औद्योगिकीकरण के खिलाफ है। इस मामले को देख रहे ग्रामीण विकास मंत्री जयराम रमेश सरकार के दूसरे मंत्रियों का साथ पाने के लिए खुद किसानों को लामबंद करने में जुट गए हैं। यही वजह है रमेश भूमि अधिग्रहण विधेयक तैयार कराने का श्रेय राहुल गांधी को देना भी नहीं भूले। जयराम रमेश औद्योगिक संगठनों के सरकार पर पड़ने वाले दबाव से वाकिफ हैं। भूमि अधिग्रहण के पिछले विधेयक पर पिछले सालों में काफी काम हुआ है। सरकार के पहले कार्यकाल में ही विधेयक दो बार कैबिनेट में गया। इसके पहले विधेयक कैबिनेट और मंत्रिसमूह के बीच घूमता रहा है। बमुश्किल मंजूरी मिल पाई थी, तब संसद में पेश किया जा सका था। इसीलिए उन्होंने किसानों को बताया कि यह मसौदा पहले कैबिनेट में जाएगा, इसके बाद संसद और फिर संसद की स्थायी समिति में रखा जाएगा। ग्रामीण विकास मंत्री से मिलने आज उत्तर प्रदेश के किसानों को लेकर कांग्रेस की प्रदेश अध्यक्ष रीता बहुगुणा आई थीं। रमेश ने उनके कई तीखे व असहज सवालों के जवाब में बताया कि विधेयक का संशोधित मसौदा जल्दी ही जारी किया जाएगा। शहरीकरण और औद्योगिकीकरण के बीच फर्क करने की जरूरत है। सर्वाधिक विवाद शहरीकरण के लिए ली जाने वाली जमीन को लेकर है। मसौदे के जिन प्रावधानों को बदला जा रहा है, उनमें शहरीकरण की जमीन के सामाजिक प्रभाव आकलन की सीमा को एक सौ एकड़ से घटाकर 50 एकड़ करना शामिल है। किसानों की कुछ आपत्तियों पर मंत्री निरुत्तर नजर आये। अलीगढ़ के एक किसान नेता धीरेंद्र प्रताप ने पूछ लिया कि उनकी जमीन का अधिग्रहण होने के बाद आखिर उनकी डेयरी के पशु कहां जाएंगे। मसौदे में उनके बारे में कोई प्रावधान नहीं है। उनके रहने के शेड और चारे की समस्या आएगी। भूमि हीन किसान, जो बटाई पर खेती करते हैं, उनका क्या होगा? संयुक्त परिवार प्रणाली में सारी जमीन पिता के नाम पर होती है, ऐसे में बालिग बच्चों को भी इकाई माना जाएगा? किसान को दस साल तक हर महीने 2000 रुपये को बहुत कम बताते हुए इसे बढ़ाने की मांग। दो एकड़ और 50 एकड़ वाले किसानों की पेंशन राशि में फर्क होना चाहिए। चंदौली, मथुरा, अलीगढ़, सहारनपुर, गाजियाबाद, नोएडा और बुलंदशहर के किसान नेताओं ने बैठक में हिस्सा लिया। किस्तों में कत्ल हुआ मेरा.. नई दिल्ली : भूमि अधिग्रहण के मसले पर सरकारों की कथित नाइंसाफी को आडे़ हाथों लेते हुए उत्तर प्रदेश के किसानों ने ग्रामीण विकास मंत्री जयराम रमेश से यहां तक कह डाला, किस्तों में कत्ल हुआ मेरा, कभी खंजर बदल गया, कभी कातिल बदल गए। उनके निशाने पर वे सभी राजनीतिक दल थे, जिनकी सरकारें समय-समय पर उत्तर प्रदेश में बनीं और उन्होंने भी वही किया जो आज की सरकार कर रही है। इसलिए साहब कानून बदलने की बात करिए। किसानों ने 1991 से 2011 तक भूमि अधिग्रहण की दास्तानों का तरतीबवार जिक्र किया।