ब्याज दरों में एक और वृद्धि की संभावना जोर पकड़ने लगी है। महंगाई कम होने का नाम नहीं ले रही। सरकार भी लगभग यह मान चुकी है कि महंगाई के खिलाफ उसके पास ब्याज दर बढ़ाने के अलावा और कोई चारा नहीं है। सितंबर में महंगाई की दर 9.72 फीसदी रही है जो अगस्त, 2011 के मुकाबले थोड़ा बेहतर तो है लेकिन सितंबर, 2010 के मुकाबले (8.98 फीसदी) खराब है। महंगाई के आंकड़े आने के कुछ ही देर बाद रिजर्व बैंक ने साफ संकेत दे दिए कि वह फिर ब्याज दरों को बढ़ाएगा। महंगाई के ताजा आंकड़े बताते हैं कि सितंबर, 2011 में सबसे ज्यादा मैन्युफैक्चरिंग उत्पादों की कीमतों में तेजी आई है। चाहे चमड़े के उत्पाद हों या कपड़े या फिर पैकेज्ड खाद्य उत्पाद, सभी की कीमतें बढ़ी है। खाद्य उत्पादों की श्रेणी में इस महीने 0.9 फीसदी की बढ़ोतरी हुई है। खाद्य उत्पादों की थोक कीमतें पिछले एक वर्ष के भीतर 9.23 फीसदी बढ़ी हैं। जानकारों का कहना है कि मैन्युफैक्चरिंग उत्पादों की कीमतों में लगातार वृद्धि से साफ है कि ब्याज दरें बढ़ने के बावजूद औद्योगिक क्षेत्र में महंगाई पर कोई काबू नहीं पाया जा सका है। अप्रैल, 2010 के बाद से अभी तक आरबीआइ 12 बार ब्याज दरों को बढ़ा चुका है। ब्याज दरों में संभावित कमी के बारे में जब आरबीआइ के डिप्टी गर्वनर केसी चक्रबर्ती से शुक्रवार को पूछा गया तो उनका सीधा जबाव था कि जब तक महंगाई काबू में नहीं आएगी, ब्याज दरों में वृद्धि जारी रहेगी। उन्होंने कहा, ब्याज दरों की वजह से महंगाई नहीं है बल्कि महंगाई की वजह से ब्याज दरों को बढ़ाना पड़ रहा है। आरबीआइ के पास और कोई तरीका नहीं है। प्रधानमंत्री की आर्थिक सलाहकार परिषद के अध्यक्ष व पूर्व आरबीआइ गर्वनर सी. रंगराजन भी मानते हैं कि जब तक महंगाई में साफ तौर पर कमी के संकेत नहीं मिले, आरबीआइ कड़ी मौद्रिक नीति जारी रख सकता है। उन्होंने उम्मीद जताई कि अगले कुछ महीनों में महंगाई की दर मौजूदा स्तर से नीचे आएगी। हालांकि वे पिछले छह महीने से ऐसा कर रहे हैं। सरकार और आरबीआइ पिछले वर्ष की रबी की कटाई के बाद से ही यह बता रहे हैं कि महंगाई की दर अब कम होगी। जबकि हकीकत यह है कि जबरदस्त अनाज उत्पादन के बावजूद खाद्य उत्पादों की कीमतों में भी नरमी का रूख नहीं दिख रहा है। जानकारों का कहना है कि नवंबर, 2011 में वार्षिक मौद्रिक नीति की छमाही समीक्षा के दौरान आरबीआइ ब्याज दरों को और बढ़ा सकता है। आरबीआइ का यह कदम मध्यम वर्ग के साथ ही औद्योगिक क्षेत्र को भारी नुकसान पहुंचा सकता है। हाल के महीने में औद्योगिक विकास दर भी लगातार कम हुई है। इसके लिए महंगे कर्ज को एक बड़ी वजह माना जा रहा है।
Saturday, October 15, 2011
आज से रेल माल भाड़ा भी महंगा
बढ़ते खर्चो के बीच कमाई बढ़ाने की गरज से रेलवे ने माल भाड़ा छह फीसदी बढ़ा दिया है। इससे उपभोक्ताओं को इन वस्तुओं की ज्यादा कीमत चुकानी होगी। सभी तरह के माल के लिए की गई यह बढ़ोतरी शनिवार से लागू हो जाएगी और जून, 2012 तक प्रभावी रहेगी। इस संबंध में रेलवे ने एक सर्कुलर जारी किया है। सर्कुलर के मुताबिक, अधिकतर वस्तुओं के लिए व्यस्त सीजन चार्ज मौजूदा 7 से बढ़ाकर 10 फीसदी कर दिया गया है। वहीं, सभी सामानों के लिए विकास शुल्क 2 से बढ़ाकर 5 फीसदी किया गया है। इस तरह दोनों में तीन-तीन फीसदी की बढ़ोतरी से ग्राहकों पर कुल छह फीसदी का भार पड़ेगा। रेलवे का गैर-व्यस्त मौसम 1 जुलाई से 30 सितंबर तक रहता है। उद्योग जगत ने आशंका जताई है कि माल भाड़े में इस बढ़ोतरी से महंगाई और भड़केगी, जबकि रेलवे ने अपने इस कदम को उचित ठहराया है। रेल मंत्रालय के एक अधिकारी ने कहा कि तीन सालों में स्टील, ईधन और ऊर्जा के दाम कई गुना बढ़े हैं। इसकी वजह से बढ़े खर्च की भरपाई के लिए ही रेलवे ने यह कदम उठाया है। वित्तीय संकट का सामना कर रहे रेलवे ने वित्त मंत्रालय से 2,100 करोड़ रुपये का कर्ज भी मांगा है। उसके पास फिलहाल महज 75 लाख रुपये का नकद रिजर्व रह गया है।
Friday, October 14, 2011
गरीबी ही नहीं गैर-बराबरी भी है मुद्दा
योजना आयोग की शहरों में 32 और गांवों में 26 रुपये प्रतिदिन की गरीबी रेखा ने राष्ट्रीय जनमानस को झकझोर कर रख दिया है। इसके खिलाफ पूरे देश में हैरानी, गुस्से और प्रतिवाद के तीखे सुर सामने आए हैं। यह स्वाभाविक भी है। सवाल उठ रहे हैं कि क्या इतनी धनराशि में दो जून का भरपेट भोजन संभव है? खासकर हाल के वर्षो में जिस तरह से खाद्य वस्तुओं और जिंसों के अलावा बुनियादी जरूरत की सभी चीजों और सेवाओं की महंगाई आसमान छू रही है, उसके कारण आम आदमी का जीना दूभर होता जा रहा है। यही कारण है कि कई विश्लेषक इसे गरीबी नहीं, भुखमरी रेखा कह रहे हैं। इस हवाई गरीबी रेखा ने पूरे देश को इसलिए भी चौंकाया है क्योंकि गरीबी निरंतर असह्य होती जा रही है। इसकी वजह यह है कि देश के तेजी से बदलते आर्थिक-सामाजिक परिदृश्य में दिनोंदिन गरीबों का जीना मुहाल होता जा रहा है। पिछले डेढ़-दो दशकों में देश में जिस तरह से अमीरों और गरीबों के बीच खाई तेजी से बढ़ी और चौड़ी हुई है, उसके कारण गरीबी का दंश और गहरा और तीखा हुआ है। यह किसी से छुपा नहीं है कि देश में एक ओर अरबपतियों की संख्या और उनकी दौलत में लगातार बढ़ोत्तरी हो रही है, वहीं दूसरी ओर, गरीबों की हालत बद से बदतर होती जा रही है। असल में, पिछले कुछ दशकों खासकर नव उदारवादी आर्थिक सुधारों के बाद के दो दशकों में देश में जिस तरह से आर्थिक गैर-बराबरी और विषमता बढ़ी है, उसके कारण गरीबी अधिक चुभने लगी है। सत्तर और कुछ हद तक अस्सी के दशक के शुरुआती वर्षो तक देश में गरीबी और अमीरी के बीच इतना गहरा और तीखा फर्क नहीं दिखाई देता था, जितना आज दिखने लगा है। इसकी एक बड़ी वजह यह भी है कि पिछले डेढ़-दो दशकों में पारंपरिक अमीरों के अलावा नई आर्थिक नीतियों का फायदा उठाकर एक नया दौलतिया वर्ग पैदा हुआ है जिसकी अमीरी और उसके खुले प्रदर्शन ने गरीबों और निम्न मध्यम वगरे में गहरी वंचना का अहसास भर दिया है। इसमें कोई शक नहीं है कि नव उदारवादी आर्थिक नीतियों के कारण अर्थव्यवस्था की वृद्धि दर में तेजी आई है। वह दो से तीन फीसद के हिंदू वृद्धि दर के दौर से बाहर निकलकर सात से नौ फीसद रफ्तार वाले हाई-वे पर पहुंच गई है। इसके साथ देश में बड़े पैमाने पर सम्पदा और समृद्धि भी पैदा हुई है। लेकिन यह भी एक कड़वी सचाई है कि यह समृद्धि कु छ हाथों में ही सिमटकर रह गई है। इसका समान और न्यायपूर्ण बंटवारा नहीं हुआ है। नतीजा यह हुआ है कि इस दौर में जहां अमीरों और उच्च मध्यवर्ग की संपत्ति और समृद्धि में तेजी से इजाफा हुआ है, वहीं गरीबों तथा हाशिये पर पड़े लोगों की स्थिति और खराब हुई है। सच तो यह है कि पिछले एक दशक में अमीरी अश्लीलता की हद तक और गरीबी अमानवीयता की हद तक पहुंच गई है। इसे देखने के लिए दूर जाने की जरूरत नहीं है। देश के बड़े महानगरों और शहरों के शापिंग मॉल्स में चले जाइए, वहां देश-दुनिया के बड़े ब्रांडों के उपभोक्ता सामानों की मौजूदगी और उनकी चमक-दमक आंखें चौंधियाने के लिए काफी है। आज देश में दुनिया के सबसे बड़े लक्जरी ब्रांड्स और उनके उत्पाद मौजूद हैं और अच्छा कारोबार भी कर रहे हैं। उनके कारण आज लंदन-पेरिस-न्यूयार्क और दिल्ली-मुंबई-बेंगलूरू में कोई खास फर्क नहीं रह गया है। दरअसल, भारत के अमीरों तथा उच्च मध्यवर्ग के उपभोग स्तर और दुनिया के अन्य मुल्कों के अमीरों के उपभोग स्तर में खास फर्क नहीं रह गया है। आज देश में बड़े अंतरराष्ट्रीय ब्रांडों की लाखों- करोड़ों की घड़ियां, कारें, ज्वेलरी, सूट, फोन सहित भांति-भांति के इलेक्ट्रॉनिक साजो-सामान, यहां तक कि खाने-पीने की चीजें भी उपलब्ध हैं। जाहिर है कि इनके उपभोगकर्ताओं की संख्या और उनके उपभोग की भूख दोनों बढ़ी हैं। सबसे बड़ी बात कि यह सब अब दबे-छिपे नहीं बल्कि खुलकर और सबको दिखाकर हो रहा है। इस वास्तविकता के उल्लेख का अर्थ सिर्फ इतना है कि जिस देश में कोई 78 फीसद से अधिक लोग 20 रुपये प्रतिदिन से कम पर गुजर-बसर करने के लिए अभिशप्त हों, वहां अमीरी की यह तड़क-भड़क और उसका खुला प्रदर्शन सामाजिक-आर्थिक अश्लीलता नहीं तो और क्या है? देश में बढ़ती आर्थिक गैर-बराबरी और विषमता का अंदाजा इस तथ्य से लगाया जा सकता है कि सबसे अमीर दस फीसद लोग देश के कुल उपभोग व्यय का 31 फीसद गड़प कर जाते हैं। सबसे अमीर और उच्च मध्यवर्ग के 20 फीसद लोग कु ल उपभोग व्यय का 45 फीसद चट कर जाते हैं। जबकि सबसे गरीब दस फीसद लोगों के हिस्से कुल उपभोग का मात्र 3.6 फीसद हिस्सा आता है। यहां तक कि खुद प्रधानमंत्री को कुछ साल पहले उद्योगपतियों के सम्मेलन में कहना पड़ा था कि इस तरह के ‘दिखावे का उपभोग’ समाज के लिए अच्छा नहीं है और इससे बचा जाना चाहिए। यह और बात है कि सरकार की आर्थिक नीतियों के कारण ही यह सामाजिक-आर्थिक अश्लीलता सफलता का पैमाना बनती जा रही है। यही नहीं, इस दौर में आजादी के आंदोलन के दौर में बने सादगी, संतोष और मितव्ययता जैसे सामाजिक-राजनीतिक मूल्य लगातार बेमानी होते चले गए हैं। नए मूल्य यह हैं- ‘ग्रीड इज गुड’ यानी लालच अच्छी बला है, मोक्ष का रास्ता अधिकाधिक उपभोग और कर्ज लेकर घी पीएं। आश्चर्य नहीं कि पिछले डेढ़-दो दशकों में समावेशी विकास के नारों के बीच देश में गैर-बराबरी बेतहाशा बढ़ी है। तथ्य यह है कि अगर आज इस देश में नरेगा के तहत मिलनेवाली न्यूनतम मजदूरी सौ रुपये प्रतिदिन (मासिक तीन हजार रुपये) और कॉरपोरेट क्षेत्र के अधिकांश सीईओ की दस लाख से एक करोड़ रुपये मासिक की तनख्वाह को आधार मानें तो देश में आय के स्तर पर गैर-बराबरी बढ़ते-बढ़ते असह्य स्तर से भी ऊपर पहुंच गई है। भारत सरकार के सबसे आला अधिकारियों यानी सचिवों की मासिक तनख्वाह और नरेगा की मासिक मजदूरी के बीच 500:1 का अनुपात बढ़ती आर्थिक गैर बराबरी का बड़ा उदाहरण है। देश में योजना की शुरु आत में 10:1 के आर्थिक गैर बराबरी अनुपात को कु छ हद तक बर्दाश्त लायक माना गया था, लेकिन आय और उपभोग के स्तर पर मौजूदा गैर-बराबरी को देख लगता है कि यह किसी सतयुग की बात है। गौरतलब यह भी है कि इस दौर में तेज आर्थिक विकास के बावजूद रोजगार के अवसर तो बढ़े नहीं, अलबत्ता उसकी गुणवत्ता में गिरावट ही आई है। देश में अब भी कुल श्रम शक्ति का 92 फीसद हिस्सा असंगठित क्षेत्र में काम करने के लिए बाध्य है। यही नहीं, इस दौर में सीईओ से लेकर सरकारी नौकरशाहों की तनख्वाहों में भारी इजाफा हुआ है लेकिन न्यूनतम मजदूरी गरीबी रेखा की तरह अतीत में अटकी हुई है। निजी क्षेत्र का तेजी से विस्तार हुआ है लेकिन उसमें रोजगार के संविदाकरण और अस्थाईकरण के अलावा श्रम कानूनों का उल्लंघन बढ़ा है। दूसरी ओर कृषि क्षेत्र पर आबादी के 60 प्रतिशत की निर्भरता के बावजूद कु ल जीडीपी में उसका हिस्सा मात्र 14 फीसद रह गया है। मतलब 60 फीसद आबादी को देश की कुल आय में सिर्फ 14 फीसद हिस्सा मिल रहा है। कहने की जरूरत नहीं कि इस सबके कारण गैर-बराबरी बढ़ती जा रही है और बर्दाश्त से बाहर होती जा रही है। योजना आयोग की गरीबी (गल्प) रेखा इसीलिए और बेमानी लगने लगी है।
किस महंगाई के घटने की बात कर रहे सुब्बा
एक तरफ महंगाई आम जनता को मुंह चिढ़ा रही है, तो दूसरी तरफ सरकारी अमला इसे लेकर जले पर नमक छिड़कने से बाज नहीं आ रहा। कमरतोड़ महंगाई के इस दौर में पिछले महीने ही योजना आयोग को 32 रुपये खर्च की गरीबी रेखा के मामले में खरी-खोटी सुननी पड़ी थी। अब भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआइ) के मुखिया डी सुब्बाराव ने महंगाई घटने के बारे में जो बयान दिया है, वह आग में घी डालने जैसा ही है। रिजर्व बैंक के निदेशक मंडल की जयपुर में हुई बैठक के बाद सुब्बा ने कहा है कि बढ़ती कीमतों पर कुछ हद तक अंकुश लगा है। मुद्रास्फीति को रोकने के लिए उठाए गए कदम से ही महंगाई और नहीं बढ़ी। जबकि हकीकत यह है कि सामान्य और खाद्य महंगाई अभी भी दस फीसदी के करीब बनी हुई हैं। अगस्त में मासिक महंगाई 9.78 फीसदी रही है और सितंबर के आंकड़े आने वाले हैं। इसी तरह एक अक्टूबर को समाप्त सप्ताह में खाद्य मुद्रास्फीति मामूली रूप से घटकर 9.32 फीसदी रही है। इससे पिछले सप्ताह यह 9.41 फीसदी थी। अप्रैल, 2010 से अब तक महंगाई को काबू में करने के लिए आरबीआइ 12 बार ब्याज दरों में बढ़ोतरी कर चुका है। अब केंद्रीय बैंक की 25 अक्टूबर को फिर छमाही मौद्रिक नीति समीक्षा में दरें बढ़ाने की तैयारी है। ब्याज दरें बढ़ाने की रणनीति से महंगाई की तपिश तो कम हुई नहीं, उलटे कर्ज जरूर महंगा हो गया। नतीजतन, न सिर्फ होम व ऑटो लोन लेने वाले उभोक्ताओं की जेब पर ज्यादा ईएमआइ का बोझ बढ़ा है, बल्कि लागत वृद्धि के नाम पर तमाम कंपनियों ने अपने-अपने उत्पाद महंगे कर दिए हैं। केंद्रीय बैंक के मुखिया कीमत वृद्धि पर जिस अंकुश की बात कर रहे हैं वह सिर्फ सरकारी आंकड़ों में नजर आती है। जबकि आम उपभोक्ताओं को नमक, तेल, दाल, सब्जी जैसे रोजमर्रा के सामान से लेकर कपड़े, घर और गाडि़यों तक के लिए ज्यादा जेब ढीली करनी पड़ रही है। यानी थोक मूल्य के आंकड़ों में भले ही कभी महंगाई घटे, मगर उपभोक्ताओं को इसका लाभ मिलता नजर नहीं आ रहा है। एक अक्टूबर को समाप्त सप्ताह के खाद्य महंगाई के जो सरकारी आंकड़े गुरुवार को जारी हुए हैं, उसमें भी इसकी बानगी साफ झलक रही है। खाद्य महंगाई के थोक मूल्य सूचकांक में तो मामूली कमी आई है, लेकिन सालाना आधार पर दूध 13.01 फीसदी मंहगा हुआ है। फल और सब्जियों के दाम क्रमश: 12.19 और 10.35 फीसदी बढ़े हैं। इसी तरह अंडा, मीट और मछली जैसे प्रोटीन आधारित उत्पाद भी सालाना स्तर पर 9.92 फीसदी मंहगे हुए हैं। अनाज 5.41, चावल 5.86 और दाल की कीमतों में 6.87 फीसदी की बढ़ोतरी हुई है। हालांकि, गेहूं और प्याज की कीमतों में थोड़ी गिरावट जरूर आई, लेकिन थोक मूल्य सूचकांक में यह कमी सिर्फ पिछले वर्ष के तुलनात्मक ऊंचे आधार की वजह से हुई है। पिछले साल की समान अवधि में खाद्य महंगाई 17 फीसदी से अधिक थी। प्याज सालाना आधार पर 10.15 और गेहूं 0.24 फीसदी सस्ता हुआ है। ईधन और बिजली की मुद्रास्फीति भी पेट्रोल की कीमतों में बढ़ोतरी के कारण बढ़कर 15.10 फीसदी हो गई है। प्राथमिक उत्पादों की मुद्रास्फीति दर 10.60 और गैर-खाद्य उत्पादों की 9.50 फीसदी रही है। इन आंकड़ों के बावजूद सुब्बाराव किस कीमत वृद्धि पर अंकुश लगने की बात कर रहे हैं, वही जानें। हालांकि, उन्होंने इतना जरूर कहा है कि नवंबर में आरबीआइ की निगरानी कमेटी की बैठक में मंहगाई और मंहगाई को रोकने के लिए उठाए गए कदमों के असर की समीक्षा की जाएगी।
Monday, October 10, 2011
रुपये में गिरावट से कंपनियों के नतीजों में लगेगी सेंध
: रुपये की कीमत में गिरावट, बढ़ती ब्याज दरें, ऊंची महंगाई दर और वैश्विक आर्थिक मंदी की आहट के कारण चालू वित्त वर्ष की दूसरी तिमाही में घरेलू आइटी कंपनियों को छोड़कर ज्यादातर कंपनियों के मुनाफे में सेंध लग सकती है। बुधवार को देश की दूसरी सबसे बड़ी आइटी कंपनी इंफोसिस के नतीजों से दूसरी तिमाही के वित्तीय परिणाम घोषित करने की शुरुआत होगी। जानकारों का कहना है कि केवल रुपये में आई तेज गिरावट से ही कंपनियों के मुनाफे में तीन से पांच फीसदी की कमी हो सकती है। विदेश से लिए कर्ज पर उन्हें ज्यादा ब्याज चुकाना पड़ेगा। इसके अलावा वैश्विक और घरेलू अर्थव्यवस्था की दिनों-दिन खस्ता हो रही हालत का असर भी कंपनियों के नतीजों पर पड़ सकता है। बैकिंग और इक्विटी अनुसंधान क्षेत्र की प्रमुख कंपनी सीएलएसए ने दूसरी तिमाही के नतीजों के पूर्वानुमान संबंधी अपनी रपट में कहा कि जिन कंपनियों ने विदेशी मुद्रा संबंधी देनदारियों के मामले में सुरक्षा का इंतजाम नहीं किया है, उनके मुनाफे पर रुपये की कमजोरी का असर पड़ना तय है। ब्रोकरेज कंपनी रेलिगेयर कैपिटल के मुताबिक दूसरी तिमाही के नतीजों में आर्थिक मंदी के संकेत दिखेंगे। सेंसेक्स में शामिल ब्लूचिप कंपनियों के मुनाफे में नौ फीसदी से कम वृद्धि दर्ज हो सकती है। इंफोसिस के बाद देश की दिग्गज कंपनी रिलायंस इंडस्ट्रीज 15 अक्टूबर को अपने नतीजे घोषित करेगी। इस तिमाही के नतीजे शेयर बाजार के लिए अगला संकेतक साबित होंगे। रेलिगेयर कैपिटल को दूसरी तिमाही में आइटी, बैंकिंग, एफएमसीजी, सीमेंट और फार्मा क्षेत्र के नतीजे अच्छे रहने की उम्मीद है। जबकि रियल एस्टेट, दूरसंचार, बिजली और धातु क्षेत्र के नतीजे निराशाजनक हो सकते हैं। सीएलएसए के मुताबिक बढ़ती ब्याज दर का असर लगभग सभी कंपनियों पर होगा क्योंकि इससे कंपनियों की कर्ज लागत बढ़ रही है।
Monday, October 3, 2011
निर्यात की डगर पर बढ़ती मुश्किलें
सामयिक वैिक मंदी के बढ़ते हुए निराशाजनक दौर में यद्यपि डॉलर के मुकाबले रुपया कमजोर होने से निर्यातकों को कुछ राहत है, लेकिन उनकी दूसरी कठिनाइयां यथावत हैं। ऐसे में भारत को मंदी की चुनौतियों के बीच नए निर्यात बाजार खोजने होंगे। ब्रिक्स और आसियान देशों में निर्यात बढ़ाने के नए प्रयास करने होंगे। चीन में भी भारतीय निर्यात की नई संभावनाएं खोजनी होंगी
इस समय जैसे-जैसे पूरी दुनिया एक बार फिर से वैिक मंदी की ओर तेजी से आगे बढ़ रही है, वैसे-वैसे वैिक व्यापार कम हो रहा है और दुनिया में निर्यात संकट की स्थिति उत्पन्न हो रही है। ऐसे में भारत के निर्यात भी घटते हुए दिखाई दे रहे हैं। वस्तुत: वैिक व्यापार और निर्यात घटने के पीछे अमेरिका और यूरोपीय देशों का कर्ज संकट सबसे प्रमुख कारण है। अमेरिकी अर्थव्यवस्था में दोहरी मंदी, (डबल डिप रिसेशन) का संकट खड़ा हो गया है। नवीनतम सव्रेक्षण बता रहे हैं कि अमेरिका में लोग वर्तमान परिदृश्य से निराश और चिंतित हैं। मिशिगन विविद्यालय के उपभोक्ता मनोभाव सूचकांक की गिरावट अगस्त 2011 के अंत में 30 वर्षो के न्यूनतम स्तर पर आ गई है। यह स्तर नवम्बर 2008 की पिछली मंदी के स्तर से भी कम है। स्थिति यह है कि अमेरिका की दोहरी मंदी को दूसरे वि युद्ध के समय शुरू हुई मंदी से भी घातक माना जा रहा है। यह उल्लेखनीय है कि अमेरिका और यूरो जोन के कर्ज संकट और विकसित अर्थव्यवस्थाओं में राजकोषीय अस्थिरता से विकासशील देशों में भी पूंजी के प्रवाह और निर्यातों पर स्पष्ट असर पड़ा है। वर्ष 2008 में जहां दुनिया मंदी के संकट से निपटने के लिए बेहतर स्थिति में थी और उसने इसकी प्रतिक्रिया में कठिनाई से निपटने के लिए बेहतर तालमेल और समन्वय भी दिखाया था वहीं अब वर्ष 2011 में ऐसा होता नहीं दिख रहा है। फिलहाल अमेरिका और कई यूरोपीय देशों की सरकारें सरकारी निष्क्रियता, भारी महंगाई और राजकोषीय दबाव का सामना कर रही हैं। स्थिति यह है कि अटलांटिक पार की अर्थव्यवस्थाओं में मंदी और ऋण संकट की दोहरी चुनौती और विकसित देशों की सरकारों द्वारा कदम न उठाए जाने के चलते वैिक अर्थव्यवस्था के समक्ष विदेश व्यापार और निर्यातों में कमी का खतरा उत्पन्न हो गया है। हालांकि भारत अपनी कृषि अर्थव्यवस्था, लोगों की बचत और मजबूत बैंकिंग व्यवस्था के कारण दोहरी मंदी और निर्यात संकट से कम प्रभावित हो रहा है। लेकिन अमेरिका भारत का सबसे बड़ा उद्योग- व्यापार सहभागी है, इसलिए भारत पर कमोबेश प्रभाव होना स्वाभाविक है। देश में गहराते आर्थिक संकट के बीच गैर आईटी क्षेत्रों में नौकरियां घटी हैं। टेलीकॉम, वित्तीय सेवाओं, निर्माण और ऑटो क्षेत्र से जुड़ी कंपनियों में होने वाली भर्तियों में कमी दर्ज की गई है। गौरतलब है कि भारत के आईटी व्यापार का 60 प्रतिशत निर्यात अमेरिका से संबंधित है जबकि कुल निर्यात का लगभग 35 प्रतिशत अमेरिका और यूरोप के बाजार में पहुंचता है। मंदी के कारण इन देशों में भारतीय निर्यात के जो क्षेत्र सबसे ज्यादा प्रभावित हो रहे हैं, उनमें जेम एंड ज्वैलरी, लेदर, टेक्सटाइल, आईटी, फार्मा और कुछ अन्य सेवा क्षेत्र शामिल हैं। दरअसल, अमेरिका और यूरोप में खचरे में कटौती की जो प्रक्रिया चल रही है, उससे भारतीय निर्यातकों को मुसीबतों का सामना करना पड़ रहा है। उदाहरण के लिए अमेरिकी और यूरोपीय बाजारों में वित्तीय अस्थिरता और कच्चे माल व लागत में भारी बढ़ोतरी के कारण भारतीय चमड़ा निर्यात की वृद्धि दर कमजोर पड़ रही है। लघु और मझोले उद्योगों की बहुलता वाले चमड़ा उत्पादन क्षेत्र में लागत बढ़ने से इकाइयों का मार्जिन 50 फीसद घट गया है। ऐसे में बेहद जरूरी है कि चमड़ा निर्यात बढ़ाने के लिए तथा इससे संबंधित उत्पादों को अधिक प्रतिस्पर्धी बनाने के लिए सरकार कच्चे माल के आयात पर शुल्क और उससे जुड़े करों को घटाने, प्राकृतिक रबड़ के आयात पर शुल्क कम करने की दिशा में पहल करे। वैिक मंदी के बढ़ते हुए निराशाजनक दौर में यद्यपि डॉलर के मुकाबले रुपया कमजोर होने से निर्यातकों को कुछ राहत है, लेकिन उनकी दूसरी निर्यात कठिनाइयां यथावत हैं। ऐसे में भारत को मंदी की चुनौतियों के बीच नए निर्यात बाजार खोजने होंगे। ब्रिक्स और आसियान देशों में निर्यात बढ़ाने के नए प्रयास करने होंगे। चीन में भी भारतीय निर्यात की नई संभावनाएं खोजनी होंगी। माना जा रहा है कि भारत-आसियान मुक्त व्यापार समझौता (एफटीए) लागू होने के बाद भारतीय उद्योगों के लिए असीम अवसर पैदा हुए हैं, लेकिन आसियान देशों से होने वाले आयात पर शुल्क में कमी से भारतीय उद्योगों को कुछ नुकसान भी उठाना पड़ा है। आसियान समझौता जनवरी 2010 में लागू हुआ था। भारत- आसियान एफटीए का भारतीय उद्योगों पर प्रभाव के मामले में फिक्की द्वारा कराए गए नवीनतम अध्ययन में इस बात का खुलासा हुआ है कि भारत आसियान देशों में निर्यात और बढ़ा सकता है। इसी तरह खाड़ी देशों में चीन के साथ भारत की भी समान निर्यात संभावनाएं उभरकर सामने आ रही हैं। निश्चित रूप से वर्ष 2020 तक चीन खाड़ी देशों का सबसे बड़ा आर्थिक साझेदार होगा लेकिन इस दौरान इन देशों के साथ भारत के ऐतिहासिक और सांस्कृतिक संबंध भी सही दिशा में प्रगति करेंगे और भारत से निर्यात संभावनाएं भी बढ़ेंगी। लेकिन भारत की निर्यात वृद्धि जिन कुछ खास खतरों से जूझ रही है इन खतरों से सही तरीके से निपटा गया तो ही खाड़ी देशों के साथ व्यापार और निवेश बढ़ेंगे। हमारे लिए बुनियादी ढांचे के विकास और अनुकूल कारोबारी माहौल पर ध्यान देना जरूरी है। चूंकि हमारा विदेश व्यापार असंतुलन तेजी से बढ़ता जा रहा है, इसलिए एक ओर मंदी की चुनौतियों के बावजूद निर्यात बढ़ाने होंगे, वहीं दूसरी ओर आयात को नियंत्रित करने की रणनीति भी बनानी होगी। हमें देश के निर्यात को दूसरे देशों में दी जा रही सुविधाओं के दृष्टिगत प्रोत्साहित करना होगा। भारतीय निर्यात को वि बाजार में चीन से मिल रही निर्यात चुनौतियों का भी सामना करना है। फिलहाल जहां वि निर्यात में भारत का हिस्सा महज एक फीसद है, वहीं चीन का हिस्सा दस फीसद है। इस समय निर्यात में जबरदस्त इजाफे के बाद 1.20 लाख करोड़ डॉलर का निर्यात रिकार्ड बनाते हुए चीन जर्मनी से आगे निकलकर दुनिया का सबसे बड़ा निर्यातक बन गया है। जिन देशों के साथ भारत के एफटीए हुए है, उनमें से अधिकांश देशों के साथ चीन के भी एफटीए हैं। लिहाजा, चीन के साथ भारत की प्रतिस्पर्धा बहुत बढ़ गई है। स्थिति यह बनी है कि भारत को एफटीए वाले देशों के बाजारों में ताकतवर खिलाड़ी चीन से आमने-सामने का मुकाबला करना पड़ रहा है। ऐसे में भारतीय निर्यात को वैिक प्रतिस्पर्धा में बनाए रखने के लिए निर्यात लागत घटानी होगी। निर्यातकों को वर्तमान से दो फीसदी कम ब्याज दर पर ऋण उपलब्ध कराए जाने चाहिए। वस्तुत: हमारे देश में निर्यात ऋण पर ब्याज दर चीन सहित दुनिया के अन्य देशों की तुलना में ज्यादा है। देश के औद्योगिक क्षेत्र को सुस्ती के दौर से निकालने के लिए प्रोत्साहन देने होंगे। औद्योगिक एवं व्यापारिक ऋणों पर लगातार ब्याज दर बढ़ाए जाने संबंधी मौद्रिक कदमों को रोकना होगा। इन सबके साथ-साथ देश की नई पीढ़ी को प्रतिभा और कौशल उन्नयन से सुसज्जित करके निर्यात की डगर पर आगे बढ़ना होगा।कोल इंडिया करेगी 40,000 करोड़ निवेश
सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनी कोल इंडिया 12वीं पंचवर्षीय योजना (2012-17) में खदानों के विकास पर 40,000 करोड़ रुपये का निवेश करेगी। 12वीं योजना के दौरान कोयला उत्पादन का लक्ष्य काफी अधिक है, इसलिए ज्यादा निवेश की जरूरत है। कंपनी के चेयरमैन एनसी झा ने यह जानकारी दी। 11वीं योजना में कंपनी ने 35,000 करोड़ रुपये के निवेश का लक्ष्य रखा था। मगर बाधाओं के कारण अब तक 25,000 करोड़ रुपये से भी कम निवेश कर पाई हैं। कोल इंडिया ने वर्ष 2016-17 तक 55.6 करोड़ टन कोयला उत्पादन का लक्ष्य रखा है। 12वीं योजना के अंत तक मांग 96.5 करोड़ टन रहने का अनुमान है। जबकि निजी खदानों को मिलाकर देश में कुल कोयला उत्पादन वर्ष 2016-17 तक 70 करोड़ टन रहने का अनुमान है। शेष मांग को पूरा करने के लिए आयात बढ़ाना होगा। एनसी झा ने कहा कि विदेशों में कोयला संपत्तियों के अधिग्रहण की योजना उम्मीद के मुताबिक आगे नहीं बढ़ रही है। अगली पंचवर्षीय योजना में कंपनी का ध्यान देश के भीतर कोयला खदानों के विकास पर होगा। उन्होंने कहा कि चालू वित्त वर्ष में 45.2 करोड़ टन कोयला उत्पादन का लक्ष्य है। ज्यादा बारिश के कारण सितंबर तक कम उत्पादन के बावजूद कंपनी लक्ष्य को हासिल कर लेगी। उन्होंने कहा कि नए खान विधेयक से कंपनी के लाभ में सालाना करीब 2,000 करोड़ रुपये की कमी आएगी। इस विधेयक के तहत कोयला खनन कंपनियों को अपना 26 फीसदी लाभ परियोजना से प्रभावित लोगों में वितरित करना होगा। झा ने कहा कि अगर सरकार सार्वजनिक क्षेत्र के लाभ को बनाए रखना चाहती है तो उसे कोयले की कीमत में वृद्धि का सहारा लेना होगा। इससे पहले झा ने कहा था कि नए कानून के कारण जो अतिरिक्त बोझ पड़ेगा उसे ग्राहकों पर डाला जाएगा। घरेलू कोयले की कीमत फिलहाल 770 रुपये से 1,700 रुपये प्रति टन है।
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