Saturday, December 1, 2012

अर्थव्यवस्था की सुस्त रफ्तार बरकरार



vर्थव्यवस्था के लिए नहीं, बल्कि सरकार के लिए भी चालू वित्त वर्ष के बाकी छह महीने काफी चुनौतीपूर्ण रहने वाले हैं। आर्थिक विकास दर के दस वर्षो के न्यूनतम स्तर पर खिसकने के खतरे को दूर करने के लिए केंद्र सरकार को और कठोर फैसले लेने पड़ सकते हैं। जानकारों की मानें तो सरकार को अगर चालू वित्त वर्ष में छह फीसद की विकास दर का लक्ष्य हासिल करना है तो पेट्रोलियम सब्सिडी घटानी होगी। साथ ही वस्तु व सेवा कर यानी जीएसटी को लागू करने पर दो टूक फैसला करना होगा और ब्याज दरों को भी घटाना होगा। सरकार के ताजा अनुमान के मुताबिक पहली छमाही में देश की विकास दर 5.4 फीसद रही है, जबकि पूरे वर्ष के लिए सरकार ने 5.7 से छह फीसद का लक्ष्य रखा है। इस हिसाब से अक्टूबर-मार्च की दूसरी छमाही में लगभग साढ़े छह फीसद की विकास दर हासिल करनी होगी। उद्योग चैंबर फिक्की के अध्यक्ष आरवी कनोरिया का कहना है कि अगर सरकार ने कठोर फैसले नहीं किए तो विकास दर छह फीसद से काफी नीचे रहेगी। यह देश के लिए दुर्भाग्यपूर्ण होगा, क्योंकि यह सीधे तौर पर देश के युवाओं के रोजगार के अवसरों को प्रभावित करेगा। केंद्र की सरकार को बगैर हिचकिचाहट के आर्थिक सुधारों का यह सिलसिला आगे भी जारी रखना चाहिए। साथ ही मैन्यूफैक्चरिंग क्षेत्र को भी पर्याप्त प्रोत्साहन देना चाहिए। अन्य उद्योग संगठन सीआइआइ के महासचिव चंद्रजीत बनर्जी का कहना है कि सरकार को पेट्रोलियम सब्सिडी में और कटौती करने के लिए कदम उठाने होंगे। साथ ही जीएसटी को हर कीमत पर अंतिम रूप देकर लागू करने की कोशिश करनी चाहिए। माना जाता है कि जीएसटी को लागू कर विकास दर में एक फीसदी की वृद्धि हो सकती है। इसके साथ ही ब्याज दरों में कटौती की मांग एक बार फिर उद्योग जगत की तरफ से उठी है। खास तौर पर मैन्यूफैक्चरिंग क्षेत्र की बेहद खस्ताहाल स्थिति को देखते हुए तमाम अर्थशास्ति्रयों और उद्योग चैंबरों ने रिजर्व बैंक से तत्काल ब्याज दरों को घटाने की गुहार लगाई है। अब इन सभी को इंतजार है कि राजनीतिक दबाव और आगामी चुनावों को देखते हुए संप्रग सरकार अर्थव्यवस्था की रफ्तार बढ़ाने वाले फैसले करने की हिम्मत दिखा पाती है या नहीं।सरकार के नीतिगत अनिर्णय, महंगे कर्ज और खराब मानसून ने अर्थव्यवस्था को मुश्किल में डाल दिया है। चालू वित्त वर्ष 2012-13 की दूसरी तिमाही में आर्थिक विकास की दर 5.3 प्रतिशत तक नीचे उतर आई है। तिमाही आधार पर यह तीन साल में सबसे कम विकास दर है। अगली छमाही में अगर हालात नहीं बदले तो अर्थव्यवस्था की सालाना विकास दर एक दशक के न्यूनतम स्तर तक जा सकती है। दूसरी तिमाही यानी जुलाई-सितंबर के आर्थिक विकास के आंकड़ों ने यह स्पष्ट कर दिया है कि अर्थव्यवस्था में सुस्ती न सिर्फ बनी हुई है, बल्कि हालात और खराब हुए हैं। चालू वित्त वर्ष की पहली तिमाही में सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) की यह वृद्धि दर 5.5 प्रतिशत रही थी। मगर खराब मानसून से बिगड़ी खेती व महंगे कर्ज से ठप कारखानों ने आर्थिक विकास की दर को और नीचे ला दिया है। बीते वित्त वर्ष की दूसरी तिमाही में विकास दर 6.7 प्रतिशत रही थी। पिछले वित्त वर्ष की चौथी तिमाही से अर्थव्यवस्था में सुस्ती का जो माहौल बना वह इस तिमाही में भी बरकरार रहा है। अर्थव्यवस्था के ताजा आंकड़ों ने सरकार के साथ साथ रिजर्व बैंक पर भी इसमें तेजी लाने संबंधी कदम उठाने का दबाव बना दिया है। रिजर्व बैंक अगले महीने 18 तारीख को अपनी मौद्रिक नीति की मध्य तिमाही समीक्षा करेगा। वैसे, वित्तीय बाजारों पर आर्थिक विकास की धीमी रफ्तार का बहुत ज्यादा असर नहीं हुआ। उम्मीद से कम रहने के बावजूद बीएसई का सेंसेक्स 169 अंक चढ़ा। दूसरी तिमाही में आर्थिक विकास की रफ्तार को धीमा करने में सबसे ज्यादा योगदान कृषि का रहा है। इस अवधि में अनियमित मानसून ने खरीफ की पैदावार को प्रभावित किया है। इसके चलते खेती की वृद्धि दर 1.2 प्रतिशत पर ही सिमट गई है। पहली तिमाही में इसकी विकास दर 2.9 प्रतिशत रही थी। इसी तरह मैन्यूफैक्चरिंग क्षेत्र की रफ्तार में भी बहुत फर्क नहीं पड़ा है। महंगे ब्याज के चलते मांग में लगातार कमी हो रही है, जिसका असर औद्योगिक उत्पादन पर पड़ रहा है। सुस्ती का अंदाजा इससे भी लगाया जा सकता है कि दूसरी तिमाही में वित्तीय सेवा क्षेत्र की रफ्तार भी बीती तिमाही के मुकाबले कम हो गई है। वित्तीय सेवा क्षेत्र की वृद्धि दर 10 प्रतिशत से ऊपर बनी हुई थी, मगर जुलाई-सितंबर की तिमाही में यह 9.4 प्रतिशत पर आ गई है।

Dainik Jagran National Edition 1-12-2012 Page -10 अर्थव्यवस्था

Wednesday, November 21, 2012

भारत 2-3 साल में फिर पकड़ लेगा तेज रफ्तार



नई दिल्ली, प्रेट्र : भारतीय अर्थव्यवस्था फिर से कुलांचे भरती नजर आएगी। विश्व विख्यात अर्थशास्त्री जगदीश भगवती की मानें तो इसमें बहुत ज्यादा देर नहीं लगेगी। महज दो-तीन साल में यह फिर से ग्लोबल वित्तीय संकट से पूर्व वाली नौ फीसद की विकास दर हासिल कर लेगी। हां, इसके लिए जरूरी होगा कि सरकार हालिया आर्थिक सुधारों को और धार दे। भगवती अमेरिका की कोलंबिया यूनिवर्सिटी में अर्थशास्त्र के प्रोफेसर हैं। भारतीय मूल के जगदीश ने साक्षात्कार में कहा, अगर सरकार हाल में उठाए गए अपने कदमों पर डटी रही और इन्हें मजबूत करने से नहीं चूकी तो हम 2-3 वर्षो में आठ से नौ फीसद की ऊंची आर्थिक विकास दर पर वापस पहुंच सकते हैं। 2008 के वैश्विक वित्तीय संकट से पूर्व भारतीय अर्थव्यवस्था की विकास दर लगातार तीन वर्षो तक नौ फीसद के आसपास रही थी। पिछले वित्त वर्ष 2011-12 में सकल घरेलू उत्पाद यानी जीडीपी की यह वृद्धि दर गिरकर नौ साल के निचले स्तर 6.5 फीसद पर आ गई। चालू वित्त वर्ष 2012-13 में इसके और घटकर 5.5 फीसद पर आने का अनुमान है। हाल ही में केंद्र सरकार ने रिटेल व विमानन क्षेत्र के लिए अपनी प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (एफडीआइ) नीति को खासा उदार बनाया है। सिंगल ब्रांड में 100 फीसद एफडीआइ की अनुमति के बाद मल्टी ब्रांड रिटेल में भी 51 फीसद प्रत्यक्ष विदेशी निवेश को मंजूरी दी जा चुकी है। विमानन के मामले में विदेशी एविएशन कंपनियां घरेलू एयरलाइनों में 49 फीसद की हिस्सेदारी ले सकती हैं। बीमा और पेंशन कानूनों में बदलाव करते हुए इन क्षेत्रों में भी एफडीआइ की अधिकतम सीमा बढ़ा दी गई है। विकास बनाम कल्याण की बहस को लेकर भगवती ने कहा, अम‌र्त्य सेन, महबूब उल हक जैसे अर्थशास्त्री कहते रहे हैं कि आर्थिक विकास गरीबी पर असर नहीं डालता। मगर अब यह साफ हो गया है कि ऐसा नहीं है। 1991 के बाद हम कह सकते हैं कि विकास में लोगों को अधिक लाभदायक रोजगार देने की क्षमता है।

Dainik jagran National Edition 21-11-2012 vFkZO;oLFkk  ist -10

Tuesday, November 6, 2012

अर्थव्यवस्था पर आरोपों से बचने की जुगत में सरकार




ठ्ठ नितिन प्रधान, नई दिल्ली भ्रष्टाचार के आरोपों में घिरी सरकार के लिए शीतकालीन सत्र अर्थव्यवस्था की खस्ता हालत को लेकर भी परेशानी का सबब बन सकता है। रेटिंग घटने की आशंका में सरकार का पूरा अमला अर्थव्यवस्था को दुरुस्त करने की कोशिश में जुट गया है। राजकोषीय संतुलन बिठाने से लेकर खजाने में राजस्व का प्रवाह बढ़ाने तक वित्त मंत्रालय ने तमाम विकल्प आजमाने शुरू कर दिए हैं। अगले महीने अंतरराष्ट्रीय रेटिंग एजेंसी फिच को भारत पर अपनी रिपोर्ट देनी है। उस वक्त संसद का शीतकालीन सत्र भी चालू होगा। संसद का सत्र इस महीने 22 तारीख से शुरू हो रहा है। ऐसे में यदि फिच भारत की रेटिंग घटा देती है तो सरकार को संसद में विपक्ष के आरोपों का सामना करना मुश्किल हो जाएगा। इस स्थिति से बचने की कोशिश में ही सरकार ने आर्थिक मोर्चे पर सुधार की रफ्तार बढ़ाने के साथ साथ राजकोषीय संतुलन बनाने के प्रयास तेज कर दिए हैं। राजकोषीय घाटे को सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) के 5.3 प्रतिशत तक सीमित रखने की वित्त मंत्रालय की हालिया घोषणा का मकसद ही अंतरराष्ट्रीय रेटिंग एजेंसियों को संतुष्ट करना था। सूत्र बताते हैं कि अर्थव्यवस्था की मौजूदा हालत से वित्त मंत्रालय खुद बहुत अधिक संतुष्ट नहीं है। निर्यात में तेज गिरावट के बाद चालू खाते का घाटा मंत्रालय के लिए सरदर्द बना हुआ है। उस पर राजस्व संग्रह की रफ्तार भी उम्मीद के मुताबिक नहीं बढ़ रही। शेयर बाजार की स्थिति विनिवेश पर आगे नहीं बढ़ने दे रही है। अब सरकार को गैर कर संग्रह में केवल स्पेक्ट्रम की नीलामी से मिलने वाली करीब 40,000 करोड़ रुपये की राशि पर ही भरोसा है। आर्थिक विकास की दर भी सरकार की चिंता बढ़ाए हुए है। ब्याज दरों को लेकर रिजर्व बैंक और वित्त मंत्रालय के मतभेद सामने आने के बाद विकास की रफ्तार बढ़ने की उम्मीद धूमिल पड़ने लगी है। सूत्र बताते हैं कि इसके मद्देनजर सरकार अर्थव्यवस्था की चालू वित्त वर्ष की मध्यावधि समीक्षा में विकास दर के अनुमान को घटा सकती है। जीडीपी की इस वृद्धि दर को वित्त मंत्रालय घटाकर 5.7 से छह प्रतिशत तक कर सकता है। रिजर्व बैंक ने भी अपनी दूसरी तिमाही की मौद्रिक नीति समीक्षा में अर्थव्यवस्था की रफ्तार के अनुमान को घटाकर 5.8 प्रतिशत कर दिया है। अर्थव्यवस्था की तस्वीर जो भी हो, मगर सरकार रेटिंग एजेंसियों की नजर में आर्थिक सुधारों के मोर्चे पर अब कमजोर पड़ते नहीं दिखना चाहती। अंतरराष्ट्रीय एजेंसियां किसी भी देश की साख का आकलन करते वक्त अर्थव्यवस्था की मौजूदा स्थिति से ज्यादा सरकार द्वारा उठाए जा रहे कदमों और उनकी दिशा पर ज्यादा ध्यान रखती हैं। इसीलिए केंद्र की कोशिश आर्थिक सुधारों के साथ-साथ राजकोषीय संतुलन बनाने का खाका खींचने पर है।

Dainik Jagran National Edition -6-11-2012 अर्थव्यवस्था Page 10

Sunday, November 4, 2012

विकास दर में गिरावट का दौर खत्म



गुड़गांव, प्रेट्र : योजना आयोग के उपाध्यक्ष मोंटेक सिंह अहलुवालिया ने अनुमान जताया है कि आर्थिक विकास दर में गिरावट का सिलसिला अब थम चुका है। अहलूवालिया ने कहा कि चालू वित्त वर्ष की दूसरी तिमाही में अर्थव्यवस्था में सुधार के संकेत मिले हैं। सीआइआइ के इन्वेस्ट नार्थ सम्मेलन में उन्होंने कहा कि पिछले वित्त वर्ष की अंतिम तिमाही में आर्थिक विकास दर 5.3 फीसद रही थी, जो चालू वर्ष की पहली तिमाही में बढ़कर 5.5 फीसद हो गई। इसलिए यह कहा जा सकता है कि अर्थव्यवस्था में गिरावट का दौर समाप्त हो गया है। जनवरी-मार्च तिमाही में अर्थव्यवस्था की विकास दर नौ साल के निचले स्तर पर पहुंच गई थी। इसके बाद अगली तिमाही में अर्थव्यवस्था में कुछ सुधार दर्ज किया गया। सितंबर में देश के आठ प्रमुख उद्योगों की वृद्धि दर पिछले साल के मुकाबले लगभग दोगुनी होकर 5.1 फीसद पर पहुंच गई। कोयला, सीमेंट का उत्पादन और पेट्रोलियम पदार्थो की रिफाइनिंग बढ़ने से यह तेजी दर्ज की गई है। इसके अलावा औद्योगिक उत्पादन की दर में 2.7 फीसद की वृद्धि हुई है। इससे पहले दो माह तक इसमें गिरावट दर्ज की गई थी। मोंटेक ने कहा कि अर्थव्यवस्था में सुधार के लिए उठाए गए सरकार के कदमों से विश्वास बढ़ा है। इसके परिणाम जनवरी से मिलने शुरू हो जाएंगे। सरकार पर निर्णय लेने में देरी के आरोपों के संबंध में योजना आयोग के उपाध्यक्ष ने कहा कि अधिकारी निर्णय लेने में अत्यधिक सतर्कता बरत रहे हैं इससे विकास दर प्रभावित हो रही है। केंद्र सरकार निर्णय लेने में देरी के सभी कारणों को दूर करने के उपाय कर रही है। इस काम में निजी क्षेत्र को सरकार की मदद करनी चाहिए। अहलुवालिया ने कहा कि विकास प्रक्रिया में ऊर्जा क्षेत्र की अहम भूमिका होती है। सरकार को उम्मीद है कि बिजली संयंत्रों को कोल लिंकेज और ईंधन सप्लाई उपलब्ध कराने संबंधी सभी मसलों को इस साल के अंत तक हल कर लिया जाएगा। उन्होंने कहा कि रसोई गैस की कीमतों में वृद्धि का फैसला वापस लेना सुधारों की प्रक्रिया में किसी बदलाव का संकेत नहीं है।
1.       Dainik Jagran National Edition 4-11-2012 vFkZO;oLFkk)Page -11

Friday, November 2, 2012

अर्थव्यवस्था में जान फूंकने को तीन सूत्रीय फार्मूला



ठ्ठ जागरण ब्यूरो, नई दिल्ली धीमी पड़ रही अर्थव्यवस्था में जान फूंकने के लिए प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने अपनी मंत्रिपरिषद को तीन सूत्रीय नुस्खा सुझाया है। प्रधानमंत्री का मानना है कि बुनियादी ढांचे, निर्यात और राजकोषीय संतुलन पर जोर देकर अर्थव्यवस्था की रफ्तार को बढ़ाया जा सकता है। प्रधानमंत्री ने खासतौर पर इन तीनों क्षेत्रों से जुड़े अपने मंत्रियों को प्रयास तेज करने की सलाह दी। अपनी पूरी मंत्रिपरिषद के साथ बैठक में प्रधानमंत्री का पूरा जोर अर्थव्यवस्था में सुधार पर रहा। सूत्र बताते हैं कि बैठक के बाद अनौपचारिक चर्चा में भी प्रधानमंत्री ने आर्थिक विभागों से जुड़े अपने मंत्रियों को फैसलों की रफ्तार बढ़ाने की सलाह दी। उन्होंने खासतौर पर देश की ऊर्जा जरूरतों को पूरा करने के लिए बिजली की मांग और सप्लाई में अंतर को कम करने पर जोर दिया। सूत्रों ने बताया कि ऊर्जा मंत्रालय की स्वतंत्र प्रभार के तौर पर जिम्मेदारी संभालने वाले ज्योतिरादित्य सिंधिया को प्रधानमंत्री ने इसके लिए खास हिदायत दी। पीएम ने बैठक के प्रारंभ में ही बताया कि देश मुश्किल आर्थिक हालात से गुजर रहा है और इस परिदृश्य को बदलने के लिए सरकार को फोकस होकर काम करना होगा। इसके लिए उन्होंने न सिर्फ वित्त मंत्री से राजकोषीय संतुलन को बनाने और वित्तीय घाटा कम करने के उपाय करने को कहा, बल्कि इस लक्ष्य को पाने के लिए वाणिज्य, उद्योग व कपड़ा मंत्री आनंद शर्मा से निर्यात बढ़ाने के उपाय तलाशने को भी कहा। हालांकि प्रधानमंत्री का पूरा जोर बुनियादी ढांचे के विकास पर रहा और उन्होंने कहा भी कि इसके लिए सरकार ने 12वीं योजना में एक खरब डालर का निवेश जुटाने का लक्ष्य रखा है। प्रधानमंत्री ने कहा कि निर्यात लगातार गिर रहा है और राजकोषीय घाटा बढ़ता जा रहा है। चालू वित्त वर्ष में सरकार ने राजकोषीय घाटे के लिए सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) के 5.1 प्रतिशत का लक्ष्य तय किया था, लेकिन पहली छमाही खत्म होते होते यह लक्ष्य 5.3 प्रतिशत पर पहुंच गया है। प्रधानमंत्री चाहते हैं कि अब इस घाटे में और इजाफा न हो। हालांकि उन्होंने कहा कि भारत की संभावनाओं को लेकर बहुत अधिक नकारात्मक होने की आवश्यकता नहीं हैं, फिर भी हमें इन चुनौतियों से पार पाने के अपने प्रयासों की रफ्तार को दोगुना करना होगा।
  Dainik jagran National Edition -2-11-2012 अर्थव्यवस्था Page -3

Thursday, November 1, 2012

विकास दर 5.5 फीसद से घटी तो आरबीआइ उठाएगा कदम


मुंबई, प्रेट्र : विकास दर बढ़ाने को तरजीह न देने के आरोपों पर रिजर्व बैंक गवर्नर डी सुब्बाराव ने अपना रुख साफ किया है। उन्होंने कहा कि अगर अर्थव्यवस्था की रफ्तार मौजूदा साढ़े पांच फीसद से कम रहती है तो केंद्रीय बैंक इस दिशा में कदम उठाएगा। उन्होंने उम्मीद जताई की अक्टूबर-दिसंबर तिमाही में इसमें तेजी आएगी। वैसे, आरबीआइ ने चालू वित्त वर्ष के लिए 5.8 फीसद विकास दर का ताजा अनुमान लगाया है। मंगलवार को मौद्रिक समीक्षा के बाद बुधवार को अर्थशास्ति्रयों और विश्लेषकों संग बैठक में उन्होंने यह बात कही। विशेषज्ञों के सवालों का जवाब देते हुए सुब्बा ने कहा कि आरबीआइ के अनुमानों के मुताबिक अगली तिमाहियों में विकास दर में बढ़ोतरी होगी। उन्होंने कहा कि मार्च तिमाही में वृद्धि दर 5.3 फीसद रही थी जो जून तिमाही में बढ़कर 5.5 फीसद हो गई है। मौद्रिक समीक्षा के दौरान भी उन्होंने कहा था कि सरकार ने हाल में आर्थिक सुधार के जो फैसले किए हैं उससे अर्थव्यवस्था की रफ्तार बढ़ेगी।
Dainik Jagran National Edition 01-11-2012   Economics page -11


Thursday, October 18, 2012

वित्तीय घाटे का विचित्र इलाज




वित्तीय घाटे का विचित्र इलाज सार्वजनिक इकाइयों के शेयर बेचकर सरकार अपना वित्तीय घाटा पूरा करना चाहती है। सरकार की आमदनी कम हो और खर्च ज्यादा हो तो अंतर को वित्तीय घाटा कहा जाता है। वर्तमान में वित्तीय घाटा तेजी से बढ़ रहा है, क्योंकि खाद्य पदार्थो, डीजल एवं फर्टिलाइजर पर दी जा रही सब्सिडी का बोझ बढ़ रहा है। चिदंबरम की सोच है कि सरकारी कंपनियों के शेयर बेचकर इस घाटे की भरपाई कर ली जाए। पेंच है कि पूंजी प्राप्ति का उपयोग चालू खर्च के पोषण के लिए किया जाना है। पूंजी प्राप्ति में जमीन, शेयर, मकान, मशीन आदि की बिक्री आती है। जैसे प्रिंटिंग प्रेस का मालिक या पूर्व में खरीदे गए मकान को बेचे तो यह उसकी पूंजी प्राप्ति होगी, जबकि पोस्टर आदि की प्रिंटिंग से मिली रकम उसकी चालू प्राप्ति होगी। प्रिंटिंग प्रेस की वित्तीय हालत का सही आकलन पूंजी प्राप्ति से नहीं किया जा सकता है। मान लीजिए छपाई के धंधे में 50 हजार का घाटा लगा, लेकिन पैतृक जमीन को बेचकर 2 लाख रुपये मिल गए। प्रेस की वित्तीय स्थिति सुदृढ़ है, क्योंकि 150,000 की रकम बच रही है, परंतु वास्तव में प्रेस की हालत खस्ता है, क्योंकि छपाई के मूल धंधे में घाटा लग रहा है। सरकार द्वारा किए गए विनिवेश को इसी तरह से समझना चाहिए। सरकार को चालू खाते में भारी घाटा लग रहा है। टैक्स से मिल रही रकम की तुलना में रक्षा, वेतन, पेंशन और सब्सिडी पर खर्च ज्यादा है। पूर्व में सरकारी कंपनियों में किए गए निवेश को बेचकर इस घाटे की भरपाई की जा रही है। यह उसी तरह हुआ कि पिता द्वारा दी गई जमीन बेचकर घाटे में चलने वाला प्रिंटिंग प्रेस अपने को स्वस्थ बताए। फिर भी सरकारी कंपनियों के शेयर बेचना बहुत जरूरी है। सार्वजनिक इकाइयों की मूल समस्या है कि इनके अधिकारी जवाबदेह नहीं होते हैं। अधिकारियों के लिए अपने निजी स्वार्थ के लिए कंपनी को डुबाना लाभप्रद हो जाता है। नेहरू की सोच थी कि देश की अर्थव्यवस्था का मूल आधार सार्वजनिक इकाइयां होंगी, परंतु पिछले 50 वर्ष के वैश्विक अनुभव ने इस फार्मूले को अस्वीकार कर दिया है। सोवियत रूस के पतन का मुख्य कारण सार्वजनिक इकाइयों द्वारा अकुशल उत्पादन था। चीन ने सार्वजनिक इकाइयों की अकुशलता से बचने के लिए विदेशी निवेश को बड़े पैमाने पर आकर्षित किया है। उपरोक्त विवरण का आशय सार्वजनिक इकाइयों की भ‌र्त्सना करना कदापि नहीं है। नि:संदेह इनका हमारे आर्थिक विकास में महत्वपूर्ण योगदान रहा है। स्वतंत्रता के बाद दुर्गापुर एवं भिलाई में स्टील का उत्पादन शुरू हुआ, आइटीआइ ने टेलीफोन बनाए, एचएमटी ने ट्रैक्टर बनाए, भेल ने टर्बाइन बनाई इत्यादि। इन नए माल का उत्पादन करने की उस समय निजी उद्यमियों में क्षमता न थी। अब पासा पलट गया है। निजी उद्यमी पेट्रोलियम संयंत्र जैसे बड़े कारखाने लगाने में सक्षम हैं। इस बदली हुई परिस्थिति में सार्वजनिक इकाइयों की भूमिका पुनर्निर्धारित करने की जरूरत है। इस दिशा में मैसूर के दीवान विश्वेश्वरैया हमारा मार्गदर्शन करते हैं। उनका कहना था कि राज्य का काम उद्योग चलाना नहीं है, परंतु यह कार्य पूर्णतया निजी क्षेत्र पर भी नहीं छोड़ा जा सकता है। नए उद्योगों को लगाना और चलाना साहस का कार्य होता है जो अकसर निजी क्षेत्र में उपलब्ध नहीं होता है। इसलिए सरकार को नए उद्योग स्थापित करके सफलता हासिल करने के बाद निजी क्षेत्र को हस्तांतरित कर देना चाहिए। वर्तमान में कई क्षेत्र हैं जहां नई सार्वजनिक इकाइयों को स्थापित करना लाभदायक होगा। अंतरिक्ष अथवा स्पेस तकनीकों में इसरो जैसे संगठनों ने पर्याप्त क्षमता विकसित कर ली है। हम सेटेलाइट बना सकते हैं, सेटेलाइट प्रक्षेपण कर सकते हैं, परंतु व्यापार करना इसरो जैसे संगठन का स्वभाव नहीं है। अत: देश को सेटेलाइट टेक्नोलॉजी एक्सपोर्ट कॉरपोरेशन स्थापित करना चाहिए। दूसरा क्षेत्र डब्लूटीओ, संयुक्त राष्ट्र, अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष एवं विश्व बैंक जैसी संस्थाओं में लॉबी करने का है। अनेक छोटे देशों के लिए डब्लूटीओ के नियमों तथा उनके प्रभाव को समझना कठिन होता है। पश्चिमी वकील इस कार्य के लिए भारी फीस लेते हैं। हम सार्वजनिक इकाई के माध्यम से इसे सस्ते में उपलब्ध करा सकते हैं। भारत में अध्यापकों एवं डॉक्टरों की भारी संख्या है। यहां शिक्षा एवं चिकित्सा दूसरे विकासशील देशों की तुलना में अच्छी है। अफ्रीका से अनेक विद्यार्थी आ भी रहे हैं। लंदन स्कूल ऑफ इकानोमिक्स में एमए की शिक्षा की दो वर्ष की फीस लगभग 20 लाख रुपये है। उसी स्तर की शिक्षा हमारे अध्यापक संभवत: दो लाख में उपलब्ध करा सकते हैं। इस संभावना को क्रियान्वित करने के लिए सरकार को इंडियन एजूकेशन एंड हेल्थ एक्सपोर्ट कॉरपोरेशन स्थापित करना चाहिए। इस उपक्रम का कार्य होगा कि भारत में उपलब्ध शिक्षा एवं स्वास्थ्य सेवाओं की रेटिंग करें। फिर इन सुविधाओं का विदेशों में प्रसार करे। वहां से छात्रों को लाए तथा उनकी शिक्षा की व्यवस्था करे। अमेरिका में बाइपास सर्जरी कराने के स्थान पर मरीज को भारत लाकर यहां सर्जरी कराना सस्ता पड़ता है। इस तरह के तमाम क्षेत्र हैं जिनमें नए निवेश की जरूरत है। सरकार को सार्वजनिक कंपनियों का पूर्ण निजीकरण करके इनके मैनेजमेंट को निजी कंपनियों के हाथ में सौंप देना चाहिए जिससे इन कंपनियों में व्याप्त अकुशलता से देश को छुटकारा मिले। मिली रकम का उपयोग नए क्षेत्र में निवेश में करना चाहिए। चिदंबरम द्वारा लागू की जा रही पालिसी दो तरह से हानिप्रद है। एक, इसमें सरकारी कंपनियों का मैनेजमेंट सरकारी अधिकारियों के हाथ में ही रहता है। अत: इनमें व्याप्त अकुशलता एवं भ्रष्टाचार से देश को छुटकारा नहीं मिलता है। दूसरे, पूंजी प्राप्ति से मिली रकम का उपयोग चालू खर्च के लिए किया जाना है। (लेखक आर्थिक मामलों के विशेषज्ञ हैं)

1.       Dainik  Jagran National Edition 17-10-2012 vFkZO;oLFkk) pej-8