Saturday, June 30, 2012

रसातल में रुपया सरकार परेशान


डॉलर के मुकाबले रुपया नीचे गिरते हुए रसातल में जा पहुंचा है। भारतीय मुद्रा में तेज गिरावट ने सरकार की परेशानियां बढ़ा दी हैं। एक डॉलर की कीमत शुक्रवार को 57 रुपये के पार चली गई। यह स्तर टूटते ही केंद्र सरकार हरकत में आ गई। सरकार ने कहा है कि वह गिरते रुपये को थामने के लिए देश में डॉलर का प्रवाह बढ़ाने के उपाय करेगी। पिछले एक हफ्ते में डॉलर के मुकाबले रुपये की कीमत तीन प्रतिशत से ज्यादा गिर चुकी है। शुक्रवार को अंतरबैंक विदेशी मुद्रा बाजार में डॉलर के मुकाबले रुपये की कीमत में तेज गिरावट आई। सुबह के कारोबार में डॉलर की कीमत 56.80 रुपये पर खुली, लेकिन शुरुआती कारोबार में देखते ही देखते 57 का स्तर पार कर गई। दिन भर के कारोबार में भारतीय मुद्रा 57.37 रुपये प्रति डॉलर के रिकॉर्ड निचले स्तर तक चली गई। बाद में रुपया कुछ सुधरा। इसके बावजूद यह 85 पैसे की गिरावट के साथ 57.16 रुपये प्रति डॉलर पर बंद हुआ। यह रुपये का अब तक का सबसे निचला बंद स्तर है। डॉलर के मुकाबले रुपये में तेज गिरावट के बाद वित्त सचिव आरएस गुजराल ने कहा कि सरकार रुपये की कीमत को सहारा देने के लिए देश में विदेशी मुद्रा का प्रवाह बढ़ाने के प्रयासों में लगी है। केंद्रीय बैंक ने पिछले दिनों देश में डॉलर का प्रवाह बनाए रखने के लिए कई कदम उठाए हैं जिनमें निर्यातकों की आधी आमदनी को रुपये में तब्दील करना शामिल है। संसाधन सीमित होने की वजह से रिजर्व बैंक शुक्रवार को भी बाजार में रुपये को सहारा देने के लिए नहीं उतरा। रुपये में यह कमजोरी अंतरराष्ट्रीय बाजार में डॉलर की मजबूती से आई। अमेरिकी केंद्रीय बैंक फेडरल रिजर्व की तरफ से कोई नीतिगत समर्थन नहीं मिलने से निवेशकों का रुख इक्विटी बाजार से पलटकर डॉलर की तरफ हो गया है। उन्हें इस वक्त डॉलर में निवेश करना सबसे सुरक्षित लग रहा है। अंतरराष्ट्रीय वित्तीय बाजारों में नकारात्मक रुख से भी डॉलर में लगातार मजबूती आ रही है। इसके चलते घरेलू शेयर बाजार में भी गिरावट रही। रुपये की कीमत में कमजोरी अर्थव्यवस्था की खराब स्थिति की वजह से भी बनी हुई है। वैसे, अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में कमी ने चालू खाते के घाटे में और बढ़ोतरी पर रोक लगाई है। इसके बावजूद मुद्रा बाजार में रुपये की गिरावट थम नहीं रही है। रुपये की कीमत में कमी के चलते सस्ते कच्चे तेल का फायदा भी अर्थव्यवस्था को नहीं मिल रहा है।

Saturday, June 23, 2012

रसातल में रुपया सरकार परेशान


डॉलर के मुकाबले रुपया नीचे गिरते हुए रसातल में जा पहुंचा है। भारतीय मुद्रा में तेज गिरावट ने सरकार की परेशानियां बढ़ा दी हैं। एक डॉलर की कीमत शुक्रवार को 57 रुपये के पार चली गई। यह स्तर टूटते ही केंद्र सरकार हरकत में आ गई। सरकार ने कहा है कि वह गिरते रुपये को थामने के लिए देश में डॉलर का प्रवाह बढ़ाने के उपाय करेगी। पिछले एक हफ्ते में डॉलर के मुकाबले रुपये की कीमत तीन प्रतिशत से ज्यादा गिर चुकी है। शुक्रवार को अंतरबैंक विदेशी मुद्रा बाजार में डॉलर के मुकाबले रुपये की कीमत में तेज गिरावट आई। सुबह के कारोबार में डॉलर की कीमत 56.80 रुपये पर खुली, लेकिन शुरुआती कारोबार में देखते ही देखते 57 का स्तर पार कर गई। दिन भर के कारोबार में भारतीय मुद्रा 57.37 रुपये प्रति डॉलर के रिकॉर्ड निचले स्तर तक चली गई। बाद में रुपया कुछ सुधरा। इसके बावजूद यह 85 पैसे की गिरावट के साथ 57.16 रुपये प्रति डॉलर पर बंद हुआ। यह रुपये का अब तक का सबसे निचला बंद स्तर है। डॉलर के मुकाबले रुपये में तेज गिरावट के बाद वित्त सचिव आरएस गुजराल ने कहा कि सरकार रुपये की कीमत को सहारा देने के लिए देश में विदेशी मुद्रा का प्रवाह बढ़ाने के प्रयासों में लगी है। केंद्रीय बैंक ने पिछले दिनों देश में डॉलर का प्रवाह बनाए रखने के लिए कई कदम उठाए हैं जिनमें निर्यातकों की आधी आमदनी को रुपये में तब्दील करना शामिल है। संसाधन सीमित होने की वजह से रिजर्व बैंक शुक्रवार को भी बाजार में रुपये को सहारा देने के लिए नहीं उतरा। रुपये में यह कमजोरी अंतरराष्ट्रीय बाजार में डॉलर की मजबूती से आई। अमेरिकी केंद्रीय बैंक फेडरल रिजर्व की तरफ से कोई नीतिगत समर्थन नहीं मिलने से निवेशकों का रुख इक्विटी बाजार से पलटकर डॉलर की तरफ हो गया है। उन्हें इस वक्त डॉलर में निवेश करना सबसे सुरक्षित लग रहा है। अंतरराष्ट्रीय वित्तीय बाजारों में नकारात्मक रुख से भी डॉलर में लगातार मजबूती आ रही है। इसके चलते घरेलू शेयर बाजार में भी गिरावट रही। रुपये की कीमत में कमजोरी अर्थव्यवस्था की खराब स्थिति की वजह से भी बनी हुई है। वैसे, अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में कमी ने चालू खाते के घाटे में और बढ़ोतरी पर रोक लगाई है। इसके बावजूद मुद्रा बाजार में रुपये की गिरावट थम नहीं रही है। रुपये की कीमत में कमी के चलते सस्ते कच्चे तेल का फायदा भी अर्थव्यवस्था को नहीं मिल रहा है।

Friday, June 22, 2012

कब सुनेंगे खतरे की घंटी!


जबसे अंतरराष्ट्रीय रेटिंग एजेंसी फिच ने भारत की रेटिंग स्थिर से नकारात्मक की है, तबसे पूरे देश में खलबली मच गई है। भारत की रेटिंग घटाने पर सरकार ने प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए कहा कि यह आकलन सही नहीं है। कच्चे तेल की अंतरराष्ट्रीय कीमतों में बराबर कमी आ रही है। इस साल मानसून की वर्षा भी अच्छी होने की उम्मीद है। इन कारणों से भारत में विकास दर पहले की तरह ही संतोषजनक हो जाएगी, किंतु सरकार की ये दलीलें महज आंखों में धूल झोंकने के समान हैं। असलियत यह है कि बढ़ती महंगाई और घटते उत्पादन ने देश की जनता और अर्थव्यवस्था की कमर तोड़ कर रख दी है।इस साल देश का आर्थिक विकास पिछले नौ वषरें में सबसे कम रहा है। 2011-12 की अंतिम तिमाही में विकास दर 5.3 प्रतिशत के निम्नतम स्तर पर पहुंच गई है और मुद्रास्फीति की दर जीडीपी की 5.75 प्रतिशत हो गई है। परिणामस्वरूप विदेशी निवेश तेजी से घट रहा है। विदेशी निवेशक भारत से अपनी पूंजी निकाल रहे हैं और चीन, वियतनाम तथा इंडोनेशिया जैसे देशों में लगा रहे हैं। इन देशों की अर्थव्यवस्था भारत की तुलना में अधिक मजबूत है। आश्चर्य की बात यह है कि भारतीय उद्योगपति भी देश की खस्ताहाल अर्थव्यवस्था और कमजोर राजनीतिक हालात को देखकर देश के बजाय विदेश में पूंजी निवेश करना अधिक पसंद कर रहे हैं। विश्व में तीन प्रमुख रेटिंग एजेंसियां हैं- स्टेंडर्ड एंड पुअर्स, मूडी तथा फिच। तीनों ने एक स्वर में कहा है कि भारत के आर्थिक और राजनीतिक हालात अत्यंत चिंताजनक है। यहां भ्रष्टाचार चरम पर है। अत: जो विदेशी निवेशक भारत में निवेश करना चाहते हैं वे सोच-समझकर करें। एक कहावत है कि हम स्वयं अपने गुणदोष का सही आकलन नहीं कर सकते हैं। जो बात रेटिंग एजेंसियां कह रही हैं, पिछले कुछ महीनों से वही ब्रिटेन और अमेरिका के समाचारपत्रों में छपती रही हैं। हमें सुनने में बुरा जरूर लगेगा, परंतु विदेश में आम धारणा है कि भारत में राजनीतिक नेतृत्व में इच्छाशक्ति का अभाव है। कांग्रेस पार्टी के शीर्ष नेतृत्व में खींचतान जारी है। संप्रग के सहयोगी दल आए दिन कांग्रेस के आर्थिक और राजनीतिक प्रस्तावों में टांग अड़ा देते हैं, जिस कारण सरकार निष्कि्रय होकर बैठ जाती है। कांग्रेस को डर है कि यदि सहयोगी दल अलग हो गए तो सरकार गिर जाएगी और यदि सहयोगी दलों के रवैये में परिवर्तन नहीं हुआ तो 2014 के लोकसभा चुनाव में संप्रग को गहरा धक्का लग सकता है। प्रबल संभावना है वह सत्ता में न आ सके। इसी कारण कांग्रेस के नेतृत्व वाली केंद्रीय सरकार निष्कि्रय होकर बैठ गई है। इस निष्कि्रयता का सीधा प्रभाव देश की जनता पर पड़ रहा है। औद्योगिक उत्पादन की गिरावट से समस्या और बढ़ गई है। इसका सीधा असर रोजगार पर पड़ेगा। मजदूरों की छंटनी होने लगेगी। उनकी क्रय शक्ति में कमी आएगी। यह सीधे-सीधे मंदी को निमंत्रण देना होगा। इसलिए जरूरत है कि समय रहते राजनीतिक और आर्थिक दोनों मोचरें पर चुस्ती बरती जाए। कांग्रेस का हाल में मंथन शिविर हुआ जिसमें सरकार से कहा गया कि वह देश की अर्थव्यवस्था को शीघ्रातिशीघ्र सुधारे। इसके बाद प्रधानमंत्री ने विभिन्न मंत्रालय के मंत्रियों को बुलाकर इंफ्रास्ट्रक्चर को मजबूत करने के निर्देश दिए। हम अकसर अपनी तुलना चीन से करते हैं। चीन ने अपने इंफ्रास्ट्रक्चर को बहुत ही मजबूत कर लिया है जिसके कारण यदि कभी उसकी विकास दर में थोड़ी-बहुत कमी भी आती है तो मजबूत इंफ्रास्ट्रक्चर होने के कारण वह झट से उस सुधार लेता है। भारत का यह दुर्भाग्य है कि केंद्र सरकार की बात कोई सुनता ही नहीं है। देश में सैकड़ों परियोजनाएं वषरें से अटकी पड़ी हैं और उन्हें पूरा करने में किसी की दिलचस्पी नहीं है। ऐसे में यदि नए इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट लगाए जाएं तो उनसे क्या लाभ होगा? दरअसल, उद्योगपति वहीं पूंजी निवेश करता है जहां उसे लाभ की संभावनाएं दिखाई देती हैं। देश के प्रमुख उद्योगपतियों का मानना है कि भारत की सरकार बिना पतवार वाली नाव है। अत: इसकी बातों पर भरोसा करके पूंजी निवेश कैसे किया जा सकता है? यह भी बार-बार कहा जा रहा है कि सरकार की राजनीतिक इच्छाशक्ति को लकवा मार गया है जिसके कारण विकास दर गिर रही है। अभी बहुत देर नहीं हुई है। जरूरत इस सुस्ती से बाहर निकलने की है, तभी औद्योगिक विकास का वातावरण तैयार किया जा सकता है। हमारे देश में बड़ी तेजी से बेरोजगार युवकों की संख्या बढ़ रही है। यदि अर्थव्यवस्था में इसी तरह सुस्ती रही और देश मंदी की चपेट में आ गया तो इसके भयावह परिणाम होंगे। बेरोजगार नवयुवक धीरे-धीरे नक्सलपंथियों और माओवादियों के कैंपों में जाने लगेंगे। कांग्रेस का शीर्ष नेतृत्व तो लकवाग्रस्त हो ही गया है, दूसरे सबसे बड़े राष्ट्रीय दल भाजपा की भी हालत कोई अच्छी नहीं है। भाजपा में जमकर गुटबाजी चल रही है और बड़े नेता प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से एकदूसरे की कटु आलोचना करने से झिझकते नहीं हैं। ऐसे में क्षेत्रीय पार्टियों का वर्चस्व बढ़ेगा और यदि उनका वर्चस्व बढ़ा तो राष्ट्रीय हितों को कौन देखेगा? कुल मिलाकर स्थिति अत्यंत चिंताजनक है। यदि सरकार ने राजनीतिक और आर्थिक मोचरें पर महत्वपूर्ण कदम नहीं उठाए तो देश की अर्थव्यवस्था बुरी तरह चरमरा सकती है। अभी भी समय है हम दीवार पर लिखी इबारत को पढ़ें और सरकार को बाध्य करें कि वह अपने रवैये में मूलभूत परिवर्तन करे। (लेखक पूर्व सांसद एवं पूर्व राजदूत हैं) 12श्चश्रल्ल2@Aंॠ1ंल्ल.Yश्रे

पंजाब में कोई नया कर नहीं, खर्च घटाएगी सरकार


पंजाब में सत्तारूढ़ प्रकाश सिंह बादल सरकार ने बुधवार को विधानसभा में 2012-13 का बजट पेश किया। वित्त मंत्री परमिंदर सिंह ढींढसा ने 3123.31 करोड़ रुपये के राजस्व घाटे वाले इस बजट में कोई नया कर नहीं लगाया गया है। साथ ही सरकार ने खर्च पर अंकुश के तमाम उपाय किए हैं। ढींढसा ने आतंकी दौर में बढ़े खर्चो और आमदनी के उपाय न किए जाने को बजट घाटे की मुख्य वजह करार दिया है। इसके अलावा कर्मचारियों व पेंशनरों के महंगाई भत्ते में पहली जनवरी, 2012 से सात प्रतिशत बढ़ोतरी का ऐलान भी किया गया है। इससे 745 करोड़ रुपये की अतिरिक्त देनदारी का बोझ बढ़ेगा। खर्च पर अंकुश की दिशा में नए वाहनों की खरीद पर पाबंदी, सरकारी वर्गो के ईधन, कार्यालयों के बिजली व टेलीफोन बिल और कार्यालय खर्चो पर दस प्रतिशत की कटौती, वाहनों के रखरखाव व मरम्मत खर्च में कटौती, सरकारी दफ्तरों की मरम्मत व साजोसामान पर पूरी पाबंदी, इस साल रिटायर हो रहे सरकारी कर्मचारियों को छोड़कर बाकी कर्मचारियों की एलटीसी सुविधा पर एक साल की रोक लगाई गई है। मंत्रियों और मुख्य संसदीय सचिवों की सुविधाओं में दस प्रतिशत की कटौती की गई है। इन फैसलों से सालाना 250 करोड़ रुपये की बचत होगी। बजट में सरकार ने स्वास्थ्य सेवाओं को अपनी वरियता सूची में सबसे ऊपरी कतार में रखा हुआ है। राज्य में सभी को स्वास्थ्य सेवा सुलभ कराने के ध्येय से 1309 करोड़ रुपये का प्रावधान रखा गया है। इस राशि में 260 करोड़ रुपये प्लान के तहत व 1109 करोड़ रुपये नॉन प्लान के तहत खर्च किए जाएंगे। मुख्यमंत्री कैंसर रीलीफ फंड में योगदान के तौर पर भी 30 करोड़ रुपये की राशि प्रस्तावित की गई है। राज्य सरकार साठ करोड़ रुपये के खर्च पर सरकारी अस्पतालों में पहुंचने वाले सभी मरीजों को आवश्यक दवाएं (जेनेरिक) मुफ्त में उपलब्ध कराएगी। पहले यह सुविधा सिर्फ गरीब मरीजों को ही उपलब्ध थी। सरकार ने खाद्य पदार्थो में मिलावट और ड्रग्स के गलत इस्तेमाल को रोकने के लिए राज्य में फूड एंड ड्रग एडमिनीस्ट्रेशन गठित करने का फैसला किया है। इसके लिए बजट में पांच करोड़ का प्रावधान किया गया है। इसका काम राज्य में ड्रग एक्ट व फूड सेफटी एक्ट को प्रभावी ढंग से लागू कराना होगा, ताकि लोगों को गैर मिलावटी खाद्य पदार्थ हासिल हो सकें और लोगों द्वारा दवाओं का नशे के तौर पर हो रहा इस्तेमाल बंद हो सके। ढींढसा ने कहा कि 1987 तक पंजाब वित्तीय लाभ वाला राज्य था मगर लंबे समय तक रहे आतंकवाद के कारण यह वित्तीय घाटे वाला राज्य बन गया। उस समय राज्य की सुरक्षा पर बहुत अधिक खर्च करना पड़ा, जबकि आय बढ़ाने के कोई प्रयास नहीं हुए। केंद्र ने 1984-1994 दौरान विशेष अवधि ऋण दिया। 2002-03 में पड़ोसी राज्यों को रियायतें देने के कारण पंजाब से उद्योग वहां पलायन कर गए। वेतन, पेंशन, ब्याज अदायगी और सब्सिडी के रूप में जरूरी देनदारियां ही आमदन का करीब 90 फीसदी हैं। इस कारण राज्य को अतिरिक्त कर्ज लेने की जरूरत पड़ी। 31 मार्च तक राज्य पर कुल बकाया कर्ज 78236 करोड़ रुपये है जो जीएसडीपी का 31.51 प्रतिशत है। चालू वित्त वर्ष के अंत तक यह कर्ज 87518 करोड़ रुपये होने का अनुमान है।

Wednesday, June 20, 2012

मगर वित्त मंत्री ने बढ़ाई 11 हजार करोड़ की सब्सिडी


प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह जी-20 के मंच से दुनिया को बता रहे थे कि भारत सब्सिडी में कटौती का कड़ा फैसला लेकर आर्थिक स्थिति में सुधार करेगा। इसके उलट वित्त मंत्री और राष्ट्रपति पद के प्रबल दावेदार प्रणब मुखर्जी 11 हजार करोड़ से अधिक की अतिरिक्त खाद्य सब्सिडी वाले प्रस्ताव पर मुहर लगा रहे थे। यह फैसला प्रधानमंत्री के दावे के कुछ देर बाद ही खाद्य मामलों पर गठित मंत्रियों के अधिकारप्राप्त समूह की बैठक में मंगलवार को लिया गया। मुखर्जी की अध्यक्षता वाले मंत्रिसमूह की इस बैठक में खाद्य प्रबंधन के नाम पर राशन प्रणाली में 60 लाख टन अतिरिक्त अनाज वितरित करने का प्रस्ताव था। इसे मंजूर कर लिया गया। इसमें 50 लाख टन अनाज गरीबी रेखा से नीचे वाले (बीपीएल) परिवारों को और 10 लाख टन अनाज गरीबी रेखा से ऊपर वालों यानी एपीएल को दिया जाएगा। अनाज का यह आवंटन पहले से मिल रहे अनाज के अतिरिक्त होगा। सरकार के इस तोहफेसे खजाने पर कुल 9,850 करोड़ रुपये का बोझ पड़ेगा। इजीओएम ने आटा चक्की, फ्लोर मिलों और बड़े उपभोक्ता उद्योगों के लिए भी सब्सिडी देकर रियायती गेहूं बेचने का फैसला किया है। खुले बाजार बिक्री योजना (ओएमएसएस) के तहत कुल 30 लाख टन अनाज बेचा जाएगा। इसकी बिक्री के लिए 1170 रुपये प्रति क्विंटल का मूल्य तय किया गया है। यह मौजूदा न्यूनतम समर्थन मूल्य 1285 रुपये प्रति क्विंटल से भी कम है। इस मूल्य पर गेहूं सितंबर, 2012 तक उपलब्ध रहेगा। इसके बाद खरीद करने वालों को 1285 रुपये के मूल्य बेचा जाएगा। इतना ही नहीं देश के किसी भी हिस्से में गेहूं का यही मूल्य रहेगा। गेहूं की ढुलाई का खर्च सरकार सब्सिडी से चुकाएगी। इससे लगभग 1,000 करोड़ रुपये की सब्सिडी का बोझ बढे़गा। सरकार ने आम बजट में खाद्य सब्सिडी के लिए 75 हजार करोड़ रुपये का प्रावधान किया गया है। 11 हजार करोड़ रुपये की यह खाद्य सब्सिडी अतिरिक्त होगी।

Friday, June 1, 2012

सरकारी सुस्ती ने अर्थव्यवस्था को नीचे धकेला


फैसले लेने में सरकार की सुस्ती, ऊंची ब्याज दरों और खराब वैश्विक हालात की तिकड़ी ने देश की अर्थव्यवस्था को नीचे धकेल दिया। तेज रफ्तार से दौड़ चुकी अर्थव्यवस्था अब विकास की हिंदू दर की ओर फिर लौटने लगी है। बीते वित्त वर्ष 2011-12 की चौथी तिमाही में सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) की विकास दर छह फीसदी से नीचे रही है। गत नौ साल में यह देश की सबसे कम आर्थिक विकास दर है। सरकार की नाकामी से बदहाल हुई अर्थव्यवस्था साफ संकेत दे रही है कि चालू वित्त वर्ष 2012-13 में विकास की रफ्तार और घट सकती है। सरकार के ताजा आंकड़ों के मुताबिक चौथी तिमाही (जनवरी-मार्च) में जीडीपी दर घटकर 5.3 प्रतिशत पर आ गई है जो बीते वित्त वर्ष की तीसरी तिमाही में 6.1 प्रतिशत थी। चौथी तिमाही में विकास दर चौंकाने वाली तेजी से गिरी है। निवेश व खर्च की दर में आ रही कमी का इशारा समझें तो अभी स्थितियां और खराब हो सकती हैं। सालाना आर्थिक विकास दर भी अनुमानित 6.9 के बजाय 6.5 प्रतिशत पर ही सिमट गई है। जीडीपी के आंकड़ों का असर वित्तीय बाजारों पर भी हुआ। शेयर बाजार लुढ़क गया। रुपया भी गुरुवार को जीडीपी के आंकड़े आने के बाद न्यूनतम स्तर को छू गया। कृषि, खनन और मैन्यूफैक्चरिंग क्षेत्र ने अर्थव्यवस्था का काम बिगाड़ दिया है। कृषि क्षेत्र की धीमी रफ्तार चौंकाने वाली है। सरकार की नीतिगत सुस्ती ने खनन क्षेत्र की विकास दर को बुरी तरह प्रभावित किया है। बीते वित्त वर्ष में महंगे कर्ज और वैश्विक अर्थव्यवस्था में मांग घटने से मैन्यूफैक्चरिंग क्षेत्र में उत्पादन कम होने की रफ्तार बहुत तेज रही। चौथी तिमाही में तो यह रफ्तार शून्य से 0.3 प्रतिशत नीचे चली गई। अर्थव्यवस्था में छाई सुस्ती ने उद्योगों की चिंता बढ़ा दी है। सरकार का खजाना फिलहाल सुस्ती दूर करने के लिए किसी तरह का वित्तीय पैकेज देने की स्थिति में नहीं है। निर्यात के मुकाबले आयात ज्यादा होने से चालू खाते का घाटा बढ़ रहा है। राजकोषीय घाटा भी सरकार के नियंत्रण से बाहर हो रहा है। ऐसे में रिजर्व बैंक के जरिए ब्याज दरों में राहत देने के अलावा सरकार के पास कोई फौरी उपाय नहीं बचा है। रिजर्व बैंक अगले महीने की 18 तारीख को मौद्रिक नीति की मध्यतिमाही समीक्षा करने वाला है।

Monday, May 28, 2012

मुनाफाखोरी का परिणाम है महंगाई


बाजार में कोई वस्तु महंगी क्यों हो जाती है? अर्थशास्त्र का एक सामान्य सिद्धांत कहता है कि उत्पादन में कमी और मांग की अधिकता से वस्तु महंगी हो जाती है और उत्पादन की अधिकता और मांग में कमी की स्थिति में वस्तु का दाम गिर जाता है। इसका तात्कालिक उदाहरण सोने का दाम है। सहालग का मौसम रहने तक मांग की अधिकता के कारण सोना ऐतिहासिक ऊंचाई पर रहा लेकिन सहालग खत्म होते ही यह नीचे उतरना शुरू हो गया है। हालांकि दाम में इस तरह के घट-बढ़ के अंतरराष्ट्रीय कारण भी होते हैं। लेकिन बाजार अगर अर्थशास्त्र के सिद्धांत के विपरीत व्यवहार करता है तो निश्चित ही उसके पीछे कोई प्रभावकारी ताकत होती है। इसी प्रभावकारी ताकत को नियंत्रित या निष्क्रिय करने की जिम्मेदारी सरकार की होती है, जो कि आज भारत में कहीं दिख नहीं रही है। प्रधानमंत्री से लेकर वित्त मंत्री तक पिछले पांच वर्षो से प्राय: हर महीने कीमतों के घट जाने का आासन देते आ रहे हैं लेकिन महंगाई का ताप दिनों-दिन बढ़ता ही जा रहा है। आलू और चीनी का उदाहरण लें। फिलहाल खुदरा बाजार में आलू का दाम 15 रुपये प्रति किलो के आसपास है। पिछले साल इन्हीं दिनों यह पांच रुपये प्रति किलो के करीब था। आलू की इस साल बंपर पैदावार हुई है। गत वर्ष कुल 404 लाख टन आलू देश में हुआ था तो इस साल यह 10 प्रतिशत बढ़कर 437 लाख टन हुआ है। इस हिसाब से तो आलू का दाम घटे भले नहीं लेकिन स्थिर तो जरूर रहना चाहिए था, जबकि हो रहा है इसका उल्टा। गौरतलब यह भी है कि अभी 2-3 माह पूर्व जब आलू की फसल तैयार हुई थी तो इसके रेट इतने ज्यादा गिर गए थे कि बहुत से स्थानों पर किसानों ने बेचने के बजाय इसे सड़क पर फेंक देना ही ठीक समझा था और आज उसी आलू के दाम तिगुने हो गए हैं। अभी उत्तर प्रदेश की कई बड़ी मंडियों में आलू 119 प्रतिशत तक महंगा हो चुका है। इस साल आलू की फसल तैयार होने से पहले ही केंद्र सरकार ने बाजार हस्तक्षेपीय योजनायानी एमआईएसके तहत यूपी सरकार को एक लाख टन आलू न्यूनतम समर्थन मूल्य पर खरीदने की वित्तीय अनुमति दी थी लेकिन तत्कालीन सरकार ने ऐसा करने में कोई रुचि ही नहीं दिखाई। यही हाल चीनी का है। देश में चीनी की सालाना खपत 2.2 करोड़ टन है। इस वर्ष चीनी की भी बंपर पैदावार देश में हुई है- कुल 2.52 करोड़ टन। यानी हमारी सकल घरेलू जरूरत से 32 लाख टन ज्यादा। बावजूद इसके बाजार में चीनी का दाम लगातार बढ़ता ही जा रहा है। बीते अप्रैल माह के आखिरी सप्ताह में अंतरराष्ट्रीय चीनी परिषद यानी आईएससीको संबोधित करते हुए वित्त मंत्री प्रणब मुखर्जी ने देसी चीनी उद्योग से कीमतों पर अंकुश को कहा था लेकिन बाजार में चीनी के दाम बढ़ते ही जा रहे हैं। चीनी के अभूतपूर्व उत्पादन से उत्साहित सरकार ने चीनी उद्योग की मांग पर 30 लाख टन चीनी के निर्यात की भी अनुमति दे दी क्योंकि एक अरसे से चीनी उद्यमियों का कहना था कि यदि निर्यात की अनुमति मिल जाए तो वे गन्ना किसानों का बकाये पैसे का भुगतान शीघ्र कर देंगे। लेकिन निर्यात की अनुमति मिलने के बाद से चीनी के दाम में अप्रत्याशित उछाल आना शुरू हो गया है। यहां जिक्र सिर्फ आलू और चीनी का नहीं है बल्कि इनके बहाने बाजार और उस पर नियंत्रणकारी शक्तियों की चर्चा का है। आलू और चीनी आम आदमी के दैनिक भोजन के दो आवश्यक तत्त्व हैं। गरीब आदमी तो आलू के बगैर अपने दैनिक जीवन की भोजन संबंधी आवश्यकता पूरी ही नहीं कर सकता। अभी कुछ वर्ष पहले तक गरीब लोग चीनी के बजाय गुड़ से अपना काम चला लेते थे लेकिन गुड़ अब चीनी से भी ज्यादा महंगा हो गया है। ये कैसा खेल है? यह समझने की बात है कि देश में सिर्फ गेहूं और चावल ही दो प्रमुख खाद्यान्न हैं जिनका दाम सरकार के काबू में है क्योंकि यही दो जिंस हैं जिनका विपुल भंडार सरकार के पास है। मतलब यह कि अगर सट्टेबाज या जमाखोर इन दोनों जिंसों पर अपनी काली नजर डालना चाहें तो सरकारी भंडार उनमें सबसे बड़ी बाधा हैं। इसके उलट चीनी, उद्योगपतियों और बिचौलियों के हाथ में हैं तो आलू शीतगृहों के मोहताज हैं। देश में खासकर उत्तर प्रदेश, मध्यप्रदेश व बिहार में शीतगृहों की अत्यंत कमी है और जो हैं भी वे दलालों और कालाबाजारियों के हाथ में रहते हैं। आलू भंडारण का समय आते ही बिचौलिये व शीतगृह मालिक सांठगांठ करके फर्जी ढंग से शीतगृहों को भरा हुआ बता देते हैं। चूंकि आलू को किसान ज्यादा समय तक खुले में रख नहीं सकता, इसलिए वह उसे औने-पौने बेचने को मजबूर हो जाता है। लेकिन यही आलू जब बिचौलियों के हाथ में आ जाता है तो उसका रेट इन कालाबाजारियों का मोहताज हो जाता है। इस सारी प्रक्रिया में सरकार का कोई हस्तक्षेप किसी भी स्तर पर दिखाई ही नहीं पड़ता। सरकारी शीतगृह अगर पर्याप्त संख्या में स्थानीय स्तर पर उपलब्ध हों तो किसान अपनी उपज उसमें रखकर उचित समय आने पर बेच सकता है। सरकारी नीतियों के कारण बाजार अब सही मायने में मुक्त हो गए हैं। किसी वस्तु की उत्पादन लागत क्या आ रही है और वह बाजार में किस दर पर बेची जा रही है, इसके नियंतण्रकी कोई भी पण्राली दिखाई नहीं पड़ रही है। महंगाई के कारण उत्पादन लागत बढ़ती है, यह सही है; लेकिन किस लागत पर कितना लाभ लिया जा सकता है, क्या इसकी कोई नीति और उसका बाजार में क्रियान्वयन किसी को दिखाई पड़ रहा है? इस साल उत्तर प्रदेश के 10-12 जिलों में पाला और कोहरे के प्रकोप के कारण आलू का उत्पादन प्रभावित हुआ था लेकिन इसके उलट पश्चिमी उत्तर प्रदेश और बिहार में आलू की बंपर पैदावार हुई। फिर उसके दाम में वृद्धि क्यों हो रही है? अब यह बाजार का मिजाज होता जा  रहा है कि उपलब्धता चाहे कितनी ही क्यों न हो, किसी न किसी वस्तु का दाम अचानक आसमान छूने लगता है और सरकार आंख-कान मूंदकर बैठी रहती है। यही प्याज के सिलसिले में हुआ, अरहर की दाल के बारे में हुआ और यही अब आलू को लेकर हो रहा है। क्या यह कालाबाजारियों का षड्यंत्र नहीं लगता कि किसी न किसी वस्तु का कृत्रिम अभाव पैदा कर व उसका दाम आसमान चढ़ाकर अपनी तिजोरियॉ भर ली जाएं?