इस साल देश का विदेशी व्यापार पांच सौ अरब डॉलर का आंकड़ा पार करने की संभावना है। विश्व व्यापार में इस वर्ष 13.5 फीसदी की वृद्धि का अनुमान है। वैश्विक मंदी से उबरते हुए विश्व बाजार में सुधार के सहारे भारत से वस्तुओं के आयात-निर्यात में अच्छी तेजी दर्ज की गई। इस दौरान आयात का आंकड़ा 350 अरब डॉलर तक पहुंचने की संभावना है। पिछले साल कुल 288 अरब डॉलर का आयात हुआ था। चालू वित्त वर्ष में भारत से वस्तुओं का निर्यात 200 अरब डॉलर के पार जा सकता है। विश्व व्यापार संगठन (डब्ल्यूटीओ) की एक रिपोर्ट के मुताबिक अर्थशास्ति्रयों ने वर्ष 2010 में विश्व व्यापार की वृद्धि के अपने अनुमान को बढ़ाकर 13.5 फीसदी कर दिया है। भारतीय अर्थव्यवस्था अपनी खुली व्यापार नीतियों के चलते वैश्विक स्पर्धा में तेजी से आगे बढ़ रही है। इसका अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि चालू वित्त वर्ष में भारत का व्यापार घाटा 120-130 अरब डॉलर के दायरे में रहने का अनुमान है। वर्ष 2010 के दौरान अंतरराष्ट्रीय व्यापार जगत में कई विवाद भी दिखे। अमेरिका और चीन के बीच विनियम दर नीति को लेकर वाद-विवाद हुआ। अमेरिका चाहता है कि चीन अपनी मुद्रा युआन की दर को बाजार पर छोड़े। उसकी राय में चीन अपना निर्यात बढ़ाने के लिए युआन को कृत्रिम तौर से सस्ता रखे हुए है। इससे अमेरिकी कंपनियों का कारोबार प्रभावित होता है। अमेरिका पर भी ऐसे ही चालें चलने का आरोप लगा है। अमेरिका के केंद्रीय बैंक फेडरल रिजर्व ने नवंबर में घोषणा की कि वह मंदी से जूझती अपनी अर्थव्यवस्था में नकदी बढ़ाने के लिए 600 अरब डॉलर की सरकारी प्रतिभूतियों की खरीदारी करेगा। ऐसी नीति का सीधा असर डॉलर की विनिमय दर पर पड़ सकता है और डॉलर सस्ता हो सकता है। अमेरिका ने अपनी कंपनियों पर आउटसोर्सिग के बजाय देश में ही नौकरी देने पर बल दिया। भारत जैसे देशों ने उसकी इस नीति को विरोध किया है। अमेरिका के ओहियो राज्य ने विदेश से सरकारी कामकाज कराने पर रोक लगा दी। अमेरिकी प्रशासन ने मैक्सिको से लगी अपनी सीमा पर सुरक्षा व्यवस्था बढ़ाने संबंधी एक नए कानून के तहत भारत जैसे देशों के आइटी और अन्य पेशेवर कर्मचारियों के लिए वीजा शुल्क बढ़ा दिया गया। वर्ष 2010 के दौरान विकसित देशों के मुकाबले विकासशील देशों का व्यापार प्रदर्शन अच्छा रहने की उम्मीद जताई जा रही है। इस दौरान चीन द्वारा 36.3 फीसदी की व्यापार वृद्धि के साथ सबसे च्च्छा प्रदर्शन करने की उम्मीद है। वर्ष 2010 के पहले 11 महीनों में एशिया की सबसे तेजी से बढ़ने वाली अर्थव्यवस्था चीन का व्यापार 2,680 अरब डॉलर रहा। अमेरिका, भारत और अन्य भागीदार देशों के साथ व्यापार संतुलन चीन के पक्ष में झुका होने से अर्थशास्ति्रयों, केंद्रीय बैंकरों और नीति निर्माताओं के माथे पर चिंता की लकीरें गहराती रहीं। भारत ने अपनी व्यापार चिंताएं चीन के समक्ष उठाई और व्यापार असंतुलन दूर करने पर जोर दिया। चीन के साथ मुक्त व्यापार समझौता करने के मामले में भी भारत ने इंकार कर दिया। भारत सरकार ने वर्ष के दौरान दक्षिण कोरिया सहित दक्षिण पूर्व एशियाई देशों के संगठन आसियान के साथ मुक्त व्यापार समझौते पर कदम आगे बढ़ाया। इसके अलावा ब्रिटेन, यूरोपीय यूनियन सहित कई देशों के साथ मुक्त व्यापार समझौते पर बातचीत चल रही है। मलेशिया और जापान के साथ व्यापार समझौतों को अंतिम रूप दिया जा चुका है। वर्ष 2001 में शुरू हुई विश्व व्यापार संगठन की दोहा वार्ताओं में वर्ष के दौरान कोई खास प्रगति नहीं हुई।
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Friday, December 31, 2010
पोस्को-आर्सेलर परियोजनाओं में विलंब राष्ट्रीय नुकसान
अक्सर शांत रहने वाले इस्पात मंत्री वीरभद्र सिंह ने भी अब परियोजनाओं में देरी के लिए परोक्ष रूप से पर्यावरण मंत्री जयराम रमेश पर निशाना साधा है। बहुराष्ट्रीय इस्पात कंपनी पोस्को और आर्सेलर-मित्तल की 1.5 लाख करोड़ रुपये की परियोजनाओं में देरी पर अफसोस जताते हुए उन्होंने इसे राष्ट्रीय नुकसान बताया है। उनका मानना है कि इतनी बड़ी परियोजनाओं को तरजीह देने की बजाय इन्हें आम परियोजनाओं की तरह देखा गया। इससे पहले खनन क्षेत्र में गो व नो गो की परिभाषा व्यावहारिक नहीं होने के चलते रमेश कोयला मंत्री श्रीप्रकाश जायसवाल और योजना आयोग के उपाध्यक्ष मोंटेक सिंह आहलूवालिया के निशाने पर रहे हैं। वीरभद्र सिंह ने कहा कि मैं इसे लेकर व्यक्तिगत तौर पर दुखी हूं। मुझे लगता है कि यह राष्ट्रीय नुकसान है। उन्होंने कहा कि हमें यह सुनिश्चित करना चाहिए कि जिन प्रक्रियाओं को लागू किया जाना है, उसे तेजी से लागू किया जाए। परियोजनाओं में देरी से हमारी उत्पादन क्षमता प्रभावित हुई है और हमें 3.6 करोड़ टन का नुकसान हुआ है। पोस्को और आर्सेलर मित्तल द्वारा स्टील संयंत्र लगाए जाने का मामला पिछले पांच साल से लटका है। पोस्को की उड़ीसा परियोजना को पर्यावरण मंत्रालय की मंजूरी का इंतजार है। इसके अलावा दोनों परियोजनाओं को जमीन अधिग्रहण और विरोध संबंधी कई समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है। उन्होंने कहा कि पोस्को और आर्सेलर मित्तल ने अपनी परियोजनाओं की स्थापना को लेकर गंभीरता दिखाई है लेकिन प्रधानमंत्री कार्यालय समेतच्उच्च स्तर पर चिंता जताए जाने के बावजूद परियोजनाएं लटकी हुई हैं। हम चाहते हैं कि कानून के तहत सभी बाधाएं दूर हो। पोस्को परियोजना उड़ीसा सरकार के लिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि इसके जरिए 54,000 करोड़ रुपये का प्रत्यक्ष पूंजी निवेश आएगा। दक्षिण कोरियाई कंपनी पोस्को ने उड़ीसा सरकार के साथ 1.2 करोड़ टन सालाना क्षमता का कारखाना लगाने के लिए 2005 में समझौता किया था। कंपनी के निवेश को अबतक का सबसे बड़ा प्रत्यक्ष विदेशी निवेश माना जा रहा है। इसी तरह दुनिया की दिग्गज स्टील कंपनी आर्सेलर मित्तल ने झारखंड सरकार के साथ 2005 में समझौता किया था। इसके साल बाद कंपनी ने उड़ीसा सरकार के साथ समझौता किया। कंपनी लगभग एक लाख करोड़ रुपये के निवेश से 1.2-1.2 करोड़ टन सालाना क्षमता का कारखाना दोनों राज्यों में लगाना चाहती है। मगर उसे भी कई समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है।
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