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Friday, August 12, 2011

Tatas and Jindals get together with Govt to bid for mines in Afghanistan


For the first time, two leading private sector groups, the Tatas and Jindals, have joined hands with state-owned undertakings to jointly bid for iron ore blocks in Afghanistan’s Hajigak mines. Tata Steel, Sajjan Jindal’s JSW and Navin Jindal’s JSPL have picked up 16 per cent stake each in the joint venture. Steel maharatna SAIL leads the pack with 18 per cent; the other two PSUs RINL and NMDC hold 17 per cent each.
The Hamid Karzai government in Afghanistan had invited expressions of interest (EoIs) for granting multiple exploration concessions for the Hajigak mines located in the mountainous Bamiyan province, 130 kms west of Kabul. SAIL has been asked by the Indian government to lead the consortium for the mines which have estimated reserves of 1.8 billion tonne.
Foreign Secretary Ranjan Mathai ascertained the progress in the bidding process today and said that the consortium put out a concerted bid. Majority of the partners are understood to be interested only in exploration. SAIL chairman C S Verma, however, told Afghan Mines Minister Wahidullah Shahrani during his New Delhi visit earlier this year that his company would be keen to set up a steel plant in Afghanistan if it provides infrastructural support and raw material sources.
The Afghan government’s bid documents require the bidders to submit a refundable bid bond for $5,00,000 (Rs 2.5 crore each). All royalties, cess and duties will be paid by the bidders. Those wishing to bid for more than one block have to submit separate bids for each block. The last date for bidding is September 3. The Karzai government would commence negotiations with bidders in October and award the contract by December.
The annual investment is estimated to be to the tune of Rs 22.5 crore and given that the contracted exploration period will be 30 years, the total estimated investment is expected to be about Rs 700 crore, besides the expenditure to be incurred in developing infrastructure and evacuation mechanisms, a government official said.
Today’s meeting chaired by Mathai deliberated on a possible mechanism to evacuate iron ore from Hajigak. The options being considered are: through Pakistan and through the Bandar Abbas Port in Iran. In any case, the consortium would have to execute infrastructure projects to build rail-road connectivity to evacuate the produce, the official said.



कर्ज की फिक्र पीछे छूटी मंदी रोकने की मुहिम हुई शुरू


, नई दिल्ली कर्ज संकट की चिंता छोड़ दुनिया भर के बैंक मंदी रोकने और ग्रोथ बचाने की जंग में कूदने वाले हैं। राह फेडरल रिजर्व ने दिखाई है। अमेरिका का यह केंद्रीय बैंक ब्याज दरों को वर्ष 2013 तक तक न्यूनतम रखेगा। इतना ही नहीं, उद्योगों व निवेशकों के लिए अपने खजाने भी खुले रखेगा। दुनिया के अन्य केंद्रीय बैंक भी ऐसा ही करेंगे। इससे ब्याज बढ़ने का दौर थमने और दरें कम होने की शुरुआत हो सकती है। मंगलवार को देर रात आए फेड रिजर्व के इस फैसले की उंगली पकड़कर बाजार बुधवार को कुछ खड़े होते दिखे। दुनिया के कई बाजारों में लड़खड़हाट के साथ कुछ सुधार हुआ। मोर्गन स्टेनली ग्लोबल इंडेक्स आधा फीसदी बढ़ा, मगर बाजारों में बहुत भरोसा नहीं था। फ्रांस की रेटिंग घटने का खतरा बुधवार को यूरोपीय बाजारों को रीढ़ कंपा गया। वहीं, धराशायी हुए एशियाई बाजार हल्की खरीद के सहारे कुछ उबरे। भारत में सेंसेक्स 273 अंक की बढ़त लेकर फिर सत्रह हजार के पार चला गया। मंगलवार को फेड रिजर्व के फैसले के बाद दो साल में सबसे अच्छा दिन दर्ज करने वाले अमेरिकी बाजार बुधवार को करीब तीन फीसदी की कमजोरी के साथ खुले। लगभग तीन दिन की अफरातफरी और अनश्चितता के बाद अब दुनिया के बैंक व राजनेता संकट से निबटने के लिए एक रणनीति के करीब पहुंचते दिख रहे हैं। कोशिश कर्ज संकट से ध्यान हटाकर मंदी रोकने की है, क्योंकि ग्रोथ सौ मर्जो की एक दवा है। फेड चेयरमैन बेन बर्नाकी ने साफ कर दिया कि अमेरिका कर्ज संकट की जगह ग्रोथ को गिरने से रोकने व बढ़ाने पर ध्यान देगा। कर्ज सस्ते रखे जाएंगे यानी बाजार में डॉलर की सप्लाई बढ़ेगी। फेड रिजर्व की बैठक में अप्रत्याशित तौर पर असहमति नजर आई। असहमत सदस्यों को महंगाई का डर सता रहा था, लेकिन कम से कम एक दिन बर्नाकी ने बाजारों को राहत जरूर दे दी। दूसरी तरफ जी-7 देशों के इशारे पर यूरोप के बैंक भी बाजार में सक्रिय हस्तक्षेप यानी बांडों की खरीद और सस्ते कर्ज की राह पकड़ने वाले हैं। संभवत: एशियाई बैंक भी यही रणनीति अपनाएंगे। बुधवार को बाजार यूरोप को लेकर ज्यादा बेचैन थे। बाजारों को लग रहा है कि ट्रिपल ए यानी सबसे ऊंची साख वाले क्लब से बाहर होने की राह पर अब फ्रांस का नंबर है। इसी वजह से यूरोप के बाजार बुरी तरह टूटे और असर मुद्रा बाजारों तक गया, जहां पहले से मार खा रहा यूरो और गिर गया। फ्रांस की रेटिंग घटना यूरोप में एक नए किस्म के राजनीतिक संकट की शुरुआत होगी। फ्रांसीसी बैंको के शेयरों पर मंदडि़यों का धावा था। इस देश के प्रमुख बैंक सोसाइटी जनरेली के शेयर में 23 साल की सबसे तेज गिरावट आई। हालांकि, मूडीज ने फ्रांस ने ट्रिपल रेटिंग जारी रखने का संकेत दिया है, लेकिन यूरोपीय बाजारों को इस पर विश्वास नहीं हुआ। ब्याज दरें कम रखने की रणनीति से शेयर बाजारों को तो राहत मिली, लेकिन मुद्रा बाजार में डॉलर को लेकर घबराहट है। अमेरिका में ब्याज दर कम होने से डॉलर की ताकत घटेगी। निर्यातकों के दबदबे वाले एशियाई बाजारों में डॉलर को लेकर आशंकाएं ज्यादा थीं।


उनकी साख डूबी और इनकी संभावनाएं


नई दिल्ली दुनिया की आर्थिक तस्वीर बिगड़ते ही रोजगारों का पूरा परिदृश्य तब्दील होने लगा है। वर्ष 2011 की शुरुआत में रोजगारों का बाजार मंदी से उबरने की उम्मीदें और सूचना तकनीक, रिटेल के अलावा इंजीनियरिंग व शोध विकास जैसे क्षेत्रों में नए अवसरों की संभावना से सराबोर था। वहीं, आज सन्नाटा और आशंका की मुश्किलें आ जमी हैं। नौकरियों के लिए मुश्किलें तितरफा हैं। घाटे से परेशान सरकारें खर्च व रोजगार के अवसर घटा रही हैं। सरकारों की यह हमलावर मुद्रा अमेरिका व यूरोप के रोजगार बाजारों में आतंक बन गई है। मंदी से डरी कंपनियों को देख एशिया व दक्षिण अमेरिका के उभरते बाजारों मे रोजगार चाहने वालों की सांसें अटकी हुई हैं। रही बची कसर लंदन में भड़की हिंसा ने पूरी कर दी है। वित्तीय संकट की हताशा प्रवासियों और मूल निवासियों के बीच तनाव की वजह बन रही है, जबकि राजनीति इसे भड़का रही है। मंदी से उबरने की कुछ ठोस उम्मीदों के मद्देनजर इस साल की शुरुआत में नौकरियों के बाजार का नजरिया बदलता दिख रहा था। सीएनबीएसी और करियर बिल्डर्स जैसे नामचीन जॉब आउटलुक सर्वेक्षण रोजगार बाजार के अच्छे दौर की तरफ इशारा कर रह थे। मगर अब रोजगारों के पारंपरिक व नए सभी क्षेत्रों पर निराशा का साया है। भर्ती मैनेजरों व निवेशकों की निगाहें गुरुवार को आने वाली अमेरिका की इनीशियल क्लेम्स रिपोर्ट पर हैं। यह अमेरिका बाजार में रोजगारों की स्थिति की बताएगी। पिछली रिपोर्ट ने कुछ उम्मीद बंधाई थी, मगर अमेरिका की रेटिंग घटने के बाद बहुत कुछ बदल गया है। रोजगारों पर सबसे बड़ा खतरा सरकारों की तरफ से आया है, जो कि रोजगारों का एकमुश्त बड़ा स्त्रोत हैं। घाटे और दमघोंटू कर्ज से घिरी सरकारें खर्च घटाने पर बाध्य हैं। ब्रिटेन के प्रधानमंत्री डेविड कैमरून के रणनीतिक सलाहकार स्टीव हिल्टन की रोजगार विरोधी सूझ ब्रिटेन में राजनीतिक विवादों की वजह बनी है। खर्च कम करने के लिए स्टीव हिल्टन ने सरकारी रोजगार घटाने और अस्थायी श्रमिकों के लिए श्रम कानून सख्त करने की राय दी है। लंदन में भड़के दंगों के पीछे इस रणनीति को लेकर उभरी आशंकाएं भी एक वजह हैं। अस्थायी नौकरियां प्रवासियों का प्रमुख आकर्षण हैं और ताजा दंगों में प्रवासियों को शामिल बताया गया है। अमेरिका में कर्ज की सीमा बढ़ाने की राजनीतिक सहमति का प्रमुख आधार खर्च में कमी है। अमेरिका में राज्यों व स्थानीय सरकारें पहले ही नौकरियां काट रही हैं। करियर बिल्डर व सीएनबीसी ने सूचना तकनीक यानी आइटी (जॉब लिस्टिंग 45 फीसदी बढ़ी) और वित्तीय सेवाओं जैसे पारंपरिक क्षेत्रों के अलावा इंजीनियरिंग, प्रशासन, हेल्थकेयर, शोध व विकास, रिटेल व एकाउंटिंग को भर्तियों का नया सरताज बताया था। मानव संसाधन मैनेजरों व भर्ती एजेंसियों के बीच हुए इन सर्वे में पाया गया कि इन्नोवेशन के कारण शोध विकास, लागत घटाने के कारण इंजीनियरिंग और प्रशासनिक पुनर्गठन के कारण प्रशासन में रोजगार बढ़ने की उम्मीद है। साथ ही नए एकाउंटिंग नियमों के कारण एकाउंटिंग और संगठित रिटेल के विस्तार के चलते रिटेल व सेल्स में रोजगार बढ़ने की उम्मीद की जा सकती है। मगर आर्थिक सुस्ती सब चौपट कर रही है। ब्रिटेन में फैक्टरी उत्पादन गिरा है। अमेरिका में मंदी के कारण आउटसोर्सिग राजनीतिक निशाने पर होगी। चीन व भारत जैसी बड़ी आर्थिक मशीनें धीमी पड़ गई है। मंदी से रोजगार घटने की चिंता सबसे ज्यादा एशिया, अफ्रीका व लैटिन अमेरिका के बाजारों में हैं, क्योंकि उत्पादन का प्रमुख स्त्रोत यही बाजार हैं।




फेमा को बदल विदेशी मुद्रा की आवाजाही आसान करो


ऐसे समय जब वैश्विक मंदी के बादल फिर से मंडरा रहे हैं और भारत सहित तमाम देशों की मुद्राओं को लेकर अनिश्चितता बनी हुई है, आरबीआइ की उच्चस्तरीय समिति ने विदेशों से पैसा लाने या ले जाने की मौजूदा नीतियों को काफी सरल बनाने का सुझाव दिया है। केजे उदेशी की अध्यक्षता वाली इस समिति की रिपोर्ट में कहा गया है कि व्यक्तिगत स्तर पर विदेशी मुद्रा के इस्तेमाल को लेकर फेमा के मौजूदा नियम काफी पुराने पड़ चुके हैं। समिति ने प्रवासी भारतीयों को भारत में निवेश करने, इलाज करने या अपने रिश्तेदारों को ज्यादा विदेशी मुद्रा भेंट स्वरूप देने का भी रास्ता खोल दिया है। उदेशी समिति ने चार महीने के भीतर ही अपनी रिपोर्ट तैयार कर बुधवार को आरबीआइ को सौंप दी। इसमें कहा गया है कि आज विदेशी कारोबार का आकार सकल घरेलू उत्पाद का 40 फीसदी है। हमें इस सच्चाई को ध्यान में रखते हुए ही विदेशी मुद्रा के आवागमन पर नियंत्रण करना चाहिए। इस संदर्भ में फेमा (विदेशी मुद्रा प्रबंधन कानून) का उल्लेख करते हुए कहा गया है कि यह मूल तौर पर पुराने फेरा (विदेशी विनियमन नियंत्रण कानून) की तरह ही काम करता है।