आधुनिक अर्थतंत्र की बढ़ती जटिलता के साथ अर्थशास्त्रियों की भूमिका अधिक महत्वपूर्ण और व्यापक होती गई है। ऊंचे राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय पदों पर आसीन अर्थशास्त्री जो भी निर्णय लेते हैं उनसे करोड़ों लोगों का जीवन प्रभावित होता है। जिन राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय पदों से और संस्थानों से यह अर्थशास्त्री जुड़े होते हैं, उनका इतना दबदबा होता है कि प्राय: उनकी संस्तुतियों व सलाह को सरकारें स्वीकार कर ही लेती हैं। ऊंचे पदों पर आसीन अर्थशास्त्रियों, विशेषकर वित्तीय अर्थशास्त्रियों की शक्ति इस कारण और बढ़ जाती है क्योंकि अन्तरराष्ट्रीय स्तर पर एक ऐसी व्यवस्था बनी हुई है जिसके अन्तर्गत एक ही सोच के अर्थशास्त्रियों के विभिन्न देशों के ऊंचे पदों पर पहुंचने की संभावना बढ़ जाती है। यह सोच मुख्य रूप से निजीकरण, बाजारवाद और भूमंडलीकरण को बढ़ाने वाली सोच है। ऐसी एक ही सोच के अर्थशास्त्रियों की अंतरराष्ट्रीय पदों में अधिक उपस्थिति का एक परिणाम यह सामने आता है कि अन्तरराष्ट्रीय वित्तीय व व्यापारिक संस्थानों में पहले कार्य कर चुके अधिकारी विभिन्न देशों के शीर्ष पदों पर आसानी से पहुंच सकते हैं। चूंकि अंतरराष्ट्रीय संस्थानों में प्रतिष्ठा और वेतन-भत्ते काफी आकषर्क होते हैं, अत: विभिन्न देशों के युवा अर्थशास्त्रियों में इन पदों के प्रति होड़ उत्पन्न हो जाती है। वहां जाकर वे एक विशेष विचारधारा में बंधी विशेषज्ञता हासिल करते हैं और फिर देर- सबेर इन अंतरराष्ट्रीय संस्थानों से अपने देश लौटकर किसी ऊंचे पद को इस प्रशिक्षण के अनुसार संभालते हैं। ऐसे अनेक अर्थशास्त्री बड़े कॉरपोरेट के सलाहकार भी बनते हैं। वैसे भी बड़ी बहुराष्ट्रीय कंपनियों का अंतरराष्ट्रीय वित्तीय व व्यापार संस्थानों में काफी दखल है। अपनी इन विविध भूमिकाओं में सामंजस्य बिठाते समय यह संभावना बढ़ जाती है कि इनमें से अनेक अर्थशास्त्री आम लोगों के हितों के अनुरूप कार्य नहीं करते हैं व जनहित को उच्च प्राथमिकता नहीं देते हैं। इसकी एक अभिव्यक्ति यह है कि प्राय: शीर्ष के राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय पदों पर बैठे अर्थशास्त्रियों द्वारा सुझाई गई नीतियों की जन-संगठनों द्वारा जम कर आलोचना होती है, खुला विरोध होता है। उदाहरण के लिए अन्तरराष्ट्रीय मुद्राकोष व वि बैंक द्वारा बड़े कर्ज देते समय जो शत्रे लगाई जाती हैं, उनकी प्राय: तीखी आलोचना हुई है, इसके बावजूद इन संस्थानों में नियुक्त या यहां से विभिन्न पदों पर भेजे गए विशेषज्ञों का इतना दबदबा होता है कि विभिन्न राष्ट्रीय सरकारें अपने यहां के जनिवरोध को अनदेखा करते हुए भी उनके द्वारा सुझाई नीतियों को स्वीकार ही नहीं करती बल्कि बाकायदा उन्हें लागू भी करती हैं। वैसे तो इन विसंगतियों पर पहले भी ध्यान अकषिर्त किया गया है, पर हाल के समय में अनेक विकसित देशों में गंभीर आर्थिक संकट उत्पन्न होने पर यह मांग अधिक जोरदार ढंग से उठने लगी कि शीर्ष पदों पर बैठे अर्थशास्त्रियों की भूमिका पर खुली बहस हो तथा उनकी जबावदेही सुनिश्चित की जाए। इसके साथ ही यह मांग उठी है कि सरकारी निर्णयों को प्रभावित करने वाले अर्थशास्त्रियों के यदि उससे जुड़े निजी हित या आय अर्जन के स्रेत हों तो वे उनको घोषित करें। अमेरिका में सीनेट बैंकिंग समिति व सदन की वित्तीय सेवा समिति में 96 प्रस्तुतियों के आधार पर बताया गया है कि इस तरह अपने निजी हितों के बारे में स्वयं जानकारी देने के उदाहरण बहुत कम हैं। वर्ष 2010 में चाल्र्स फगरुसन की डाक्यूमेंट्री ‘इनसाईड जॉब’ ने वित्तीय सेवा उद्योग व अर्थशास्त्रियों के संबंधों पर जनता का ध्यान आकषिर्त किया। इसी समय के आसपास जॉर्ज डीमार्टिनो की पुस्तक ‘द इकोनॉमिस्ट’स ओथ’ ने अर्थशास्त्रिायों में नैतिकता संबंधी मुद्दों की उपेक्षा की आलोचना की। अमेरिका में अर्थशास्त्रियों के प्रमुख संस्थान ‘अमेरिकन इकनॉमिक एसोसिएशन’ को इस बारे में तीखी आलोचना सहनी पड़ी है कि उसने अपने सदस्यों की नैतिकता का कोई कोड अब तक तैयार नहीं किया। तीन सौ अर्थशास्त्रियों ने इस एसोशिएसन को अर्थशास्त्रियों के लिए एक आचार संहिता बनाने के लिए समिति गठित करने का सुझाव दिया। आलोचना से प्रभावित होकर इस संस्थान ने इस मुद्दे पर एक कार्यदल का गठन किया। हैगनबार्थ और एपस्टीन के एक चर्चित अध्ययन में 19 ऊंची प्रतिष्ठा के अर्थशास्त्रियों के आकलन से पता चला है कि 2005 से 09 के दौरान उनमें से 15 के निजी वित्तीय हित पाए गए। इनमें से अनेक ने सरकारों में व अंतरराष्ट्रीय संस्थानों में उच्च पद भी प्राप्त किए। इन विभिन्न आलोचनाओं के बीच धनी देशों में यह पूछा जा रहा है कि हाल के आर्थिक संकट के लिए बड़े बहुरराष्ट्रीय बैंकों या सट्टेबाजी की प्रवृत्तियों से जुड़े अर्थशास्त्रियों की संस्तुतियां कहां तक जिम्मेदार थीं। गरीब व विकासशील देशों में भी यह सवाल पूछा जा रहा है कि इन देशों में बहुराष्ट्रीय कंपनियों के हितों, निजीकरण व बाजारवाद को बढ़ाने वाली नीतियों की संस्तुतियां जिन अर्थशास्त्रियों ने बढ़- चढ़कर कीं, उनके अन्तरराष्ट्रीय वित्तीय व व्यापार संस्थानों से क्या संबंध रहे हैं या उन अकादमिक संस्थानों से कैसे संबंध रहे हैं जहां से इन अंतरराष्ट्रीय संस्थानों में अधिकांश विशेषज्ञ जाते हैं। इस तरह की जांच पड़ताल से यह तथ्य सामने आए हैं कि ऐसे संबंध बहुत उच्च स्तर तक पहुंचते हैं व अन्तरराष्ट्रीय संस्थानों से आने वाले अधिकारी कई बार विकासशील व गरीब देशों में वित्तमंत्री के पद तक व कभी-कभी तो इसके भी ऊपर पहुंचते हैं। इस तरह अंतरराष्ट्रीय वित्त व व्यापार संस्थानों का एजेंडा गरीब व विकासशील देशों पर हावी होने का मैदान तैयार होता है। इन संस्थानों में धनी देशों की व बहुराष्ट्रीय कंपनियों की गहरी पैठ के बारे में पहले ही बहुत जानकारी उपलब है। इन परिस्थितियों में अर्थशास्त्रियों के कार्य में पारदर्शिता लाने व उनकी जवाबदेही सुनिश्चित करने की मांग को व्यापक समर्थन मिलना चाहिए। अर्थशास्त्रियों के लिए आचार संहिता तैयार करने के लिए आरंभ हुए प्रयास और तेज व व्यापक होने चाहिए। इसके साथ ही इस बारे में पुनर्विचार की जरूरत है कि अन्तरराष्ट्रीय वित्त व व्यापार संस्थानों से जुड़े रहे अर्थशास्त्रियों ने भूमंडलीकरण, निजीकरण व बाजारवाद का जो एजेंडा दुनिया भर में लादने का प्रयास किया है, उसका औचित्य क्या है। इस बारे में तमाम साक्ष्य उपलब्ध हैं कि जो देश मौजूदा विकास की दौड़ में आगे निकले, वहां सरकार ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई पर दूसरी ओर इन तथ्यों को नजर अंदाज कर इन अर्थशास्त्रियों ने विभिन्न देशों में महत्वपूर्ण क्षेत्रों से सरकार को हटने को कहा है। इसका खास परिणाम यह हुआ कि नए क्षेत्र बड़ी व बहुराष्ट्रीय निजी कंपनियों के लिए खुले छूटते गए व इस क्षेत्र में पहले से उपलब्ध सरकारी सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनियों व उनकी परिसंपत्तियों को निजी क्षेत्र की कंपनियों ने सस्ते में हथिया लिया। यह अनुचित नीतियां व लूट इस कारण संभव हुई कि इनके लिए एक सैद्धांतिक आधार तैयार किया गया जिससे बेहद अनुचित नीतियों व निर्णयों का औचित्य सिद्ध किया जा सके। इस सैद्धांतिक आधार को तैयार करने में एक संकीर्ण सोच की विचारधारा व उससे जुड़े विशेषज्ञों की महत्वपूर्ण भूमिका थी। अत: अर्थशास्त्रियों की जवाबदेही सुनिश्चित करने के साथ अनेक देशों को आर्थिक व वित्तीय संकट की ओर ले जाने वाली नीतियों की समीक्षा भी जरूरी है। आज के दौर में दुनिया भर में क्योंकि अर्थव्यवस्था की वैकल्पिक राह खोजने की जरूरत शिद्दत से महसूस की जा रही है इसलिए अर्थशास्त्रियों की जवाबदेही सुनिश्चित करना भी बहुत जरूरी हो गया है। जिन देशों को पूंजीवाद का गढ़ माना जाता रहा है, वहां आर्थिक संकट तेज होने के बाद विकल्प खोजने की यह बेचैनी देखी जा सकती है। शायद यही कारण है कि अमेरिका जैसे देश में भी अर्थशास्त्रियों की जवाबदेही की मांग उठने लगी है। यह एक अनुकूल समय है कि इस मांग को पूरी जिम्मेदारी और गंभीरता से आगे ले जाया जाए। साथ ही इस प्रक्रिया को विकल्पों की तलाश से जोड़ा जाए।
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Monday, February 27, 2012
Friday, February 11, 2011
आम जनता को कैसे मिले राहत
पिछले लगभग एक वर्ष के दौरान भारतीय जन-जीवन को प्रतिकूल प्रभावित करने वाले किसी एक मुद्दे को चुनना हो तो वह निश्चय ही महंगाई है। देश के महानगरों से लेकर ग्रामीण क्षेत्रों के अधिसंख्य लोग कमरतोड़ महंगाई से त्रस्त हैं। मौजूदा सरकार के बारे में कहा जाता रहा है कि इसमें विद्वान अर्थशास्त्रियों की मौजूदगी के कारण इसका आर्थिक नीति पक्ष बहुत मजबूत है। पर हकीकत में महंगाई संबंधी आश्वासन बार-बार झूठे सिद्ध हुए हैं और सरकार की विश्वसनीयता संकट में पड़ती रही है। वर्ष 2009 तक तो उतार-चढ़ाव देखे गए पर वर्ष 2010 के आंरभ से अब तक महंगाई की निरंतरता बनी हुई है और लोगों को कोई राहत नहीं मिल रही है। महंगाई में सबसे अधिक उछाल जरूरी खाद्य उत्पादों का रहा है जो बड़ी चिंता है। मुख्य अनाज, दलहनति लहन, सब्जी-फल और दूध के बढ़ते दामों ने आम लोगों की थाली व जेब दोनों हल्की कर दी हैं। जहां सब्जी, फल, दाल व दूध के बढ़ते दामों से निम्न मध्यवर्ग में कुपोषण की समस्या और विकट हो रही है, वहीं सबसे गरीब तबके में भुखमरी की समस्या बढ़ रही है। भारतीय भोजन का जरूरी हिस्सा रहे लहसुन, प्याज आम आदमी की पहुंच से बाहर होते जा रहे हैं। समझ नहीं आ रहा है कि परिवार की बुनियादी जरूरतें पूरी हों तो कैसे? हालांकि सरकारी आंकड़े भी महंगाई की बिगड़ती स्थिति कबूल रहे हैं पर आकलन संबंधी जटिलताओं के कारण महंगाई की पूरी सच्चाई आंकड़ों में प्रकट नहीं होती है। उदाहरण के लिए औद्योगिक व कृषि मजदूरों के लिए जो उपभोक्ता मूल्य सूचकांक तैयार किए जाते हैं उनमें आवास शामिल किए जाने के कारण महंगाई की जितनी मार मजदूर झेलते हैं वह इस सरकारी आंकड़े में दर्ज नहीं हो पाती है। हाल में शिक्षा और स्वास्थ्य क्षेत्रों का निजीकरण जिस तेजी से बढ़ा है, उस कारण आम लोगों के लिए आर्थिक बोझ व तनाव पहले ही बढ़ गए। उस पर पेट भरने की सबसे बुनियादी जरूरत पूरी न होने से असंतोष फैलना स्वाभाविक है। यह संभावना अमीर-गरीब के बीच बढ़ते अंतर के दौर में और बढ़ जाती है। देश का एक तबका रेहड़ी-पटरी पर प्याज खरीदने के लिए तरस रहा हो और दूसरा आलीशान मॉल्स में महंगी उपभोक्ता वस्तुओं की खरीद में लगा हो तो असंतोष बढ़ेगा ही बढ़ेगा। आज सरकारी नीतियां आम लोगों के सरोकारों से दूर चंद निहित स्वार्थो की गिरफ्त में नजर आ रही है। महंगाई से जूझते एक ईमानदार सरकारी कर्मचारी का कहना था कि वह खाद्य पदार्थो की महंगाई सहने को तैयार हैं बशत्रे बढ़ती खाद्य कीमतों का लाभ गरीब किसानों को मिले। पर त्रासदी यह है कि बढ़ती खाद्य कीमतों से जहां उपभोक्ता पिस रहा है वहीं किसान भी गंभीर संकट में फंसता जा रहा है। सवाल है कि जब आम उपभोक्ता व किसान दोनों त्रस्त हैं तो फिर मलाई किसे मिल रही है? जब विश्व व्यापार संगठन के समझौतों के दबाव तले कृषि बाजार खोला गया तो तरह-तरह के सस्ते आयात के कारण किसान संकटग्रस्त होने लगे। किसानों के संकट का विरोध करने जन-शक्ति खड़ी हुई तो कहा गया कि सस्ती खाद्य उपलब्धि भी जरूरी है। पर बाद में किसानों की बदहाली के साथ कीमतें भी बढ़ीं। इतना ही नहीं सरकार ने बहुराष्ट्रीय कंपनियों सहित विभिन्न बड़ी कंपनियों को अनाज के व्यापार में बड़ी भूमिका दी जिससे खाद्य सुरक्षा मजबूत करने की क्षमता पर प्रतिकूल असर पड़ा व जमाखोरी व मुनाफाखोरी बढ़ी। महंगाई की आड़ में अब बहुराष्ट्रीय कंपनी को खुदरा क्षेत्र में आगे बढ़ाने और छूट देने के बहाने खोजे जा रहे हैं। कुतर्क है कि अपनी मार्केटिंग कुशलता के आधार पर यह कंपनियां महंगाई कम करने में सहायक होंगी जबकि इनमें से अनेक के दुनिया भर के कारोबार का अनुभव है कि इनसे किसान व उपभोक्ता, दोनों को गंभीर शिकायतें रही हैं। हाल के वर्षो में तरह-तरह की आकर्षक शब्दावली का भ्रमजाल पैदा कर नव-साम्राज्यवादी तत्वों ने सरकारी नीतियों को गिरफ्त में लिया है जिससे समस्या का सही विश्लेषण कर उचित निष्कर्ष पाने की सरकार की क्षमता कुप्रभावित हुई है। यही कारण है कि खाद्य उत्पादों की महंगाई के समाधान के लिए ऐसे समाधान सुझाए जा रहे हैं जिनसे समस्या और बढ़ेगी। जैसे खुदरा क्षेत्र में बहुराष्ट्रीय कंपनी का बढ़ता प्रवेश या मौजूदा मंडी व्यवस्था को निजीकरण से जुड़े बदलावों की ओर ले जाने की पहल। जलवायु बदलाव के इस दौर में प्रतिकूल मौसम तो चलता ही रहेगा। सवाल है कि जलवायु बदलाव के इस दौर का सामना करने की सरकार की तैयारी कितनी है। इस दौर में सरकार को छोटे किसानों के हाथ मजबूत करने के लिए व्यापक कदम उठाने होंगे। छोटे किसानों, मजदूरों, दस्तकारों के लिए सरकारी बजट बढ़ाना होगा। भूमिहीन खेतिहरों को भी किसान बनाने के लिए भूमि-सुधार तेज करने होंगे। छोटे किसानों को लघु सिंचाई व सस्ती तकनीक उपलब्ध होनी चाहिए जिससे खेती का खर्च न्यूनतम हो सके। न्यूनतम लागत की व पर्यावरण की रक्षा के अनुकूल खेती का व्यापक प्रसार होना चाहिए। पिछड़े क्षेत्र के किसानों की सर्वाधिक सहायता करनी चाहिए। मुनाफाखोरी पर रोक लगाने के खास प्रबंध होने चाहिए। गुणवत्तापरक स्वास्थ्य व शिक्षा सेवाओं की जिम्मेदारी सरकार को स्वयं संभालनी चाहिए। इससे निजी क्षेत्र के स्कूल व अस्पताल भी नियंतण्रमें रहेंगे। सरकार सब नागरिकों की बुनियादी जरूरतों को पूरा करने की जिम्मेदारी स्वीकार करे व इसके लिए अनुकूल नीतियां अपनाए।
Wednesday, February 2, 2011
गांधीजी की अर्थनीति
महात्मा गांधी की अर्थव्यवस्था व अर्थशास्त्र के बारे में बहुत मौलिक सोच थी। यह सोच उस समय के प्रचलित विचारों की परवाह न कर सीधे-सीधे ऐसी नीतियों की मांग करती थी जिससे गरीबों को राहत मिले। साथ ही उन्होंने ऐसे सिद्धांत अपनाने को कहा जिनसे दुनिया में तनाव व हिंसा दूर हो तथा पर्यावरण को नुकसान न पहुंचे। गांधीजी के लिए विश्व शांति, संतोष व पर्यावरण की रक्षा सबसे महत्वपूर्ण थे। वह इसी के अनुकूल आर्थिक नीतियों की बात करते थे। उन्होंने अर्थनीति और नैतिकता में कभी भेद नहीं किया। गांधी ने स्पष्ट लिखा मुझे स्वीकार करना चाहिए कि मैं अर्थविद्या और नीतिविद्या में कोई भेद नहीं करता। जिस अर्थविद्या से व्यक्ति या राष्ट्र के नैतिक कल्याण को हानि पहुंचती हो उसे मैं अनीतिमय और पापपूर्ण कहूंगा। उदाहरण के लिए जो नीति एक देश को दूसरे देश का शोषण करने की अनुमति देती है वह अनैतिक है। जो मजदूरों को योग्य मेहनताना नहीं देते और उनके परिश्रम का शोषण करते हैं उनसे वस्तुएं खरीदना या उन वस्तुओं का उपयोग करना पाप है। उन्होंने शोषण विहीन व्यवस्था की मांग रखी ताकि सबकी बुनियादी जरूरतें पूरी हों। उन्होंने कहा कि गरीब लोगों को भी उत्पादन के साधनों पर नियंत्रण मिले ताकि उनका शोषण न हो। गांधी ने लिखा मेरी राय में न केवल भारत की, बल्कि सारी दुनिया की अर्थरचना ऐसी होनी चाहिए कि किसी को भी अन्न और वस्त्र के अभाव में तकलीफ न सहनी पड़े। दूसरे शब्दों में हर एक को इतना काम अवश्य मिल जाना चाहिए कि वह अपने खाने-पहनने की जरूरतें पूरी कर सके। यह आदर्श तभी कार्यान्वित किया जा सकता है जब जीवन की प्राथमिक आवश्यकताओं के उत्पादन के साधन जनता के नियंत्रण में रहें। वह हर एक को बिना किसी बाधा के उसी तरह उपलब्ध होने चाहिए जिस तरह कि भगवान की दी हुई हवा और पानी हमें उपलब्ध है। किसी भी हालत में वे दूसरों के शोषण के लिए चलाए जाने वाले व्यापार का वाहन न बनें। किसी भी देश या समुदाय का उन पर एकाधिकार अन्यायपूर्ण होगा। हम आज न केवल अपने इस दुखी देश में, बल्कि दुनिया के दूसरे हिस्सों में भी जो गरीबी देखते हैं उसका कारण इस सरल सिद्धांत की उपेक्षा है। प्राय: यही माना जाता है कि निरंतर आर्थिक विकास व वृद्धि से ही दुनिया से गरीबी व अभाव दूर होगी, लेकिन महात्मा गांधी ने यह पहचान लिया था कि इस तरह के आर्थिक विकास के तहत गरीबी व विषमता बढ़ने की संभावना भी मौजूद रहती है। अत: उन्होंने आर्थिक विकास को नहीं, बल्कि गरीब आदमी की बुनियादी आवश्यकताओं को अपनी आर्थिक सोच का केंद्र बनाया। उन्होंने देश के नेताओं और नियोजकों से विशेष आग्रह किया कि जब भी तुम्हें संदेह हो या तुम्हारा अहम तुम पर हावी होने लगे तो यह कसौटी आजमाओ। जो सबसे गरीब और कमजोर आदमी तुमने देखा है, उसकी शक्ल याद करो और अपने दिल से पूछो कि जो कदम उठाने का तुम विचार कर रहे हो, वह उस आदमी के लिए कितना उपयोगी होगा। क्या उससे उसे कुछ लाभ पहुंचेगा? क्या उससे वह अपने ही जीवन और भाग्य पर कुछ काबू रख सकेगा? यानी क्या उससे उन करोड़ों लोगों को स्वराज मिल सकेगा जिनके पेट भूखे हैं और आत्मा अतृप्त? इस तरह महात्मा गांधी गरीब आदमी को आर्थिक चिंतन के केंद्र में ले आए। तेजी से होने वाला तकनीकी बदलाव और मशीनीकरण उस समय की विचारधारा पर भी छाया हुआ था, क्योंकि इसी रास्ते पर चलकर यूरोप में समृद्धि आई थी। पर महात्मा गांधी ने इस विचारधारा को भी चुनौती दी और देश के गरीब किसान, दस्तकार और मजदूर के रोजगार और आजीविका को अंधाधुंध मशीनीकरण से बचाने के लिए उन्होंने जोर दिया। यंत्रों के बारे में उन्होंने कहा कि उससे मनुष्य को सहारा मिलना चाहिए। वर्तमान यह झुकाव है कि कुछ लोगों के हाथ में खूब संपत्ति पहुंचाई जाए और जिन करोड़ों स्त्री-पुरुषों के मंुह से रोटी छीनी है उन बेचारों की जरा भी परवाह न की जाए। सच्ची योजना तो यह होगी कि भारत की संपूर्ण मानव शक्ति का अधिक से अधिक उपयोग किया जाए। मानव श्रम की परवाह न करने वाली कोई भी योजना न तो मुल्क में संतुलन कायम रख सकती है और न इनसानों को बराबरी का दर्जा दे सकती है। इसी तरह गांधीजी ने कहा मनुष्य का लक्ष्य अपने उपभोग को निरंतर बढ़ाना नहीं अपितु सादगी के जीवन में संतोष प्राप्त करना है। यदि शक्तिशाली व अमीर लोग इस भावना में जिएं तो गरीबों के लिए संसाधन बचने की संभावना कहीं अधिक होगी। उनके शब्दों में, सच्ची सभ्यता का लक्षण संग्रह बढ़ाना नहीं है, बल्कि सोच-समझकर और अपनी इच्छा से उसे कम करना है। ज्यों ज्यों हम संग्रह घटाते जाते हैं त्यों-त्यों सच्चा सुख और संतोष बढ़ता जाता है, सेवा की शक्ति बढ़ती जाती है। त्याग की यह शक्ति हममें अचानक नहीं आएगी। पहले हमें ऐसी मनोवृत्ति पैदा करनी होगी कि हमें उन सुख-सुविधाओं का उपयोग नही करना है, जिनसे लाखों लोग वंचित हैं। समता और सादगी को एक महत्वपूर्ण उद्देश्य के रूप में प्रतिष्ठित कर पर्यावरण का नाम लिए बिना ही महात्मा गांधी हमें पर्यावरण संरक्षण के मूल से परिचित करा गए। उन्होंने कहा भी कि प्रकृति सब मनुष्यों की जरूरतें तो पूरी कर सकती है, लेकिन लालच नहीं।
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