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Thursday, February 3, 2011

ब्याज दर बढ़ाना ही विकल्प नहीं


हालांकि पिछले लगभग तीन वर्षो से महंगाई लगातार बढ़ रही है, लेकिन पिछले कुछ माह से इसमें पहले से कहीं ज्यादा तेजी आ गई है। सामान्यत: किसी भी अर्थव्यवस्था में महंगाई इसलिए होती है कि पूर्ति की अपेक्षा मांग अधिक हो जाती है। ऐसे में महंगाई को दूर करने के उपायों में पूर्ति में सुधार और मांग पर नियंत्रण एक प्रमुख तरीका होता है। उल्लेखनीय है कि ऐसी किसी स्थिति में देश में वस्तुओं और सेवाओं का उत्पादन बढ़ाकर अथवा आयात करके पूर्ति में सुधार हो सकता है। पिछला अनुभव भी यही बताता है कि औद्योगिक उत्पादन विशेष तौर पर उपभोक्ता वस्तुओं का उत्पादन काफी तेजी से बढ़ रहा है, लेकिन कृषि उत्पादन में अपेक्षित वृद्धि का अभाव देखने को मिलता है। ऐसे में कृषि पदार्थो खासकर पर खाद्य पदार्थो की कीमत में वृद्धि आम जनता को ज्यादा प्रभावित कर रही है। पिछले कुछ महीनों में प्याज और टमाटरों की कीमत में हुई ऐतिहासिक वृद्धि काफी चर्चा में रही। इस महंगाई से घबराई सरकार के पास महंगाई रोकने के कोई विशेष विकल्प नहीं हैं। ऐसे में परंपरागत रूप से मौद्रिक उपायों के माध्यम से महंगाई को रोकने का चाहे आधे मन से ही सही, एक प्रयास भारतीय रिजर्व बैंक के माध्यम से सरकार कर रही है।
नियंत्रण के उपाय
भारतीय रिजर्व बैंक ऐसे प्रयास कर रहा है ताकि देश में मुद्रा एवं साख में कमी लाई जा सके। इस तरह की नीति के माध्यम से कोशिश यही होती है देश में बढ़ रही मांग पर अंकुश लगाया जा सके। जाहिर है कि सरकार यदि इस नीति में सफल होती है तो देश में वस्तुओं और सेवाओं की मांग कम होगी और कीमत वृद्धि की दर में कमी लाई जा सकेगी। हम जानते हैं कि विश्वव्यापी मंदी के बाद भारत पर इसके असर को कम करने की कवायद में भारतीय रिजर्व बैंक ने ब्याज दरों में कटौती तो की ही साथ ही भारतीय रिजर्व बैंक के पास अनिवार्य रूप से रखी जाने वाली जमा के अनुपात सीआरआर में भी लगातार कटौती की गई थी। ऐसे में देश में साख की मात्रा बढ़ाकर येन-केन-प्रकारेण मांग में वृद्धि करने का प्रयास भी किया गया। हालांकि पूरी दुनिया के देशों में आई वैश्विक मंदी के चलते हमारे निर्यातों में कुछ कमी आई थी, लेकिन उसकी भरपूर भरपाई देश में पैदा हुई मांग ने कर दी थी। यही कारण रहा कि वैश्विक मंदी के दौर में भी भारत औसतन 7-8 प्रतिशत की आर्थिक वृद्धि दर का लक्ष्य हासिल करने में सफल रहा। परंतु आज समय बदल गया है और देश मंदी के दौर से बिल्कुल मुक्त होता हुआ दिखाई दे रहा है। उलटे अब तो मांग में वृद्धि के चलते महंगाई की चिंता अधिक सताने लगी है।

कैसे आती है के्रडिट में कमी
पिछले कुछ माह से भारतीय रिजर्व बैंक सख्त मुद्रा की नीति अपना रहा है। इसके लिए कई प्रकार के उपाय अपनाए जा रहे हैं ताकि देश में मुद्रा की पूर्ति और उधार को कम किया जा सके। 25 जनवरी, 2011 को भारतीय रिजर्व बैंक ने रेपो रेट और रिवर्स रेपो रेट को बढ़ाकर क्रमश: 6.5 प्रतिशत और 5.5 प्रतिशत कर दिया है। यह वर्तमान वित्तीय वर्ष में सातवीं बार की गई बढ़ोतरी है। इससे पहले रिजर्व बैंक ने बैंकों के सीआरआर में भी वृद्धि की थी। जानकारों का मानना है कि भविष्य में रिजर्व बैंक द्वारा ब्याज दरों में और भी वृद्धि की जा सकती है। महत्वपूर्ण है कि अभी तक इस वर्ष में रिजर्व बैंक ने रेपो रेट में 1.25 प्रतिशत और रिवर्स रेपो रेट में 1.75 प्रतिशत वृद्धि लागू की है और दो किश्तों में सीआरआर यानी नकद जमा अनुपात को एक प्रतिशत बढ़ाया है। इस प्रकार की नीति के माध्यम से रिजर्व बैंक एक ओर तो बैंकों द्वारा उधार लेने की क्षमता में कमी की जाती है तो दूसरी ओर उधार की लागत बढ़ाकर मांग में कमी की जाती है। ऐसा कहा जाता है कि पूर्व में सीआरआर बढ़ा कर रिजर्व बैंक ने बैंकों के पास 50 हजार करोड़ रुपये की अतिरिक्त तरलता वापस खींच ली थी। 25 जनवरी, 2011 को हुई ब्याज दरों में वृद्धि का भी भारी असर देखने को मिल रहा है। शुक्रवार 28 जनवरी 2011 तक मात्र तीन दिनों में मुंबई शेयर बाजार का संवेदी सूचकांक इसी कारण से लगभग 755 बिंदु नीचे गिर गया। इसका सीधा मतलब यह है कि भारतीय शेयर बाजार ने रिजर्व बैंक के इस कदम को आर्थिक जगत के हितों के लिए एक शुभ संकेत नहीं माना है।

विकास हो सकता है बाधित
यदि पिछले 10 वर्षो का लेखा-जोखा लिया जाए तो हम देखते हैं कि देश में आर्थिक वृद्धि की दर पहले से तेज हुई है, हालांकि इसके साथ ही साथ कृषि में विकास की दर पहले से काफी घट गई है। इसके साथ ही साथ सेवा क्षेत्र में होने वाली अभूतपूर्व आर्थिक वृद्धि ने सकल विकास दर को घटने नहीं दिया, बल्कि उसमें पहले से ज्यादा तेजी आ गई। इसका सबसे बड़ा कारण यह था कि इस दशक के पहले छह-सात वर्षो तक कीमतों में वृद्धि को काफी हद तक काबू में रखा जा सका। कीमतों में अपेक्षित नियंत्रण के चलते ब्याज दरें घटीं। हालांकि घटती ब्याज दरों ने एक ऐसे वर्ग पर जो ब्याज की आय पर आधारित था को प्रभावित किया, लेकिन घटती ब्याज दरों ने देश में घरों, कारों और अन्य उपभोक्ता वस्तुओं इत्यादि की मांग में अभूतपूर्व वृद्धि भी की। यही नहीं कम ब्याज दरों के चलते सरकार द्वारा लिए गए ऋणाों पर ब्याज की अदायगी पर भी अनुकूल असर पड़ा। देश में इंफ्रास्ट्रक्चर के विकास में भी इसकी अच्छी भूमिका रही, क्योंकि निजी कंपनियों को निवेश के लिए सस्ती दरों पर ऋण मिलना शुरूहो गया। इस प्रकार मांग में अभूतपूर्व वृद्धि तो हुई, लेकिन निवेश की दर भी पहले से कहीं अधिक बढ़ गई। इससे हाउसिंग, इंफ्रास्ट्रक्चर और अर्थव्यवस्था के अन्य क्षेत्रों में तेजी से विकास होना शुरू हुआ और हमारा देश दुनिया की सबसे तेज बढ़ने वाली अर्थव्यवस्थाओं में चीन के बाद दूसरे स्थान पर आ गया, लेकिन इसके बाद वर्ष 2008-09 में कीमतों में पुन: वृद्धि होनी शुरू हो गई और ब्याज दरें पुन: बढ़ने लगीं। वर्ष 2009 से शुरुआती वैश्विक मंदी के चलते मांग को बनाए रखने के लिए भारतीय रिजर्व बैंक ने ब्याज दरों को फिर से घटाना शुरू किया और उसका अपेक्षित असर मांग पर पड़ा और वर्ष 2009-10 में जहां वैश्विक स्तर पर जीडीपी में एक प्रतिशत गिरावट दर्ज की गई, वहीं भारत में आर्थिक वृद्धि की दर सात प्रतिशत से भी अधिक दर्ज की गई। कहा जा सकता है कि भारत की आर्थिक वृद्धि की गाथा में ब्याज दरों के घटने की एक प्रमुख भूमिका रही है। ऐसे में वर्तमान वित्तीय वर्ष में तेजी से बढ़ती महंगाई और उस पर काबू करने के लिए बढ़ाई जा रही ब्याज दरें आज चिंता का विषय कही जा सकती हैं। ऐसे में आवश्यकता इस बात की है कि महंगाई पर तुरंत प्रभावी कदम उठाते हुए नियंत्रण किया जाए और ब्याज दरों को नीचा रखते हुए देश की आर्थिक विकास की यात्रा को अनवरत जारी रखने का काम किया जाए। सरकार को यह समझना होगा कि महंगाई पर काबू पाने के लिए कृषि उत्पादों की पूर्ति बढ़ानी होगी और इसके लिए उसे अभी से कृषि की अनदेखी समाप्त करना होगा। इससे गरीबों को सस्ती दरों पर खाद्य पदार्थ तो उपलब्ध होंगे ही ब्याज दरों को नियंत्रण में रखते हुए आर्थिक वृद्धि की दर भी बढ़ेगी।


Wednesday, February 2, 2011

गांधीजी की अर्थनीति


महात्मा गांधी की अर्थव्यवस्था व अर्थशास्त्र के बारे में बहुत मौलिक सोच थी। यह सोच उस समय के प्रचलित विचारों की परवाह न कर सीधे-सीधे ऐसी नीतियों की मांग करती थी जिससे गरीबों को राहत मिले। साथ ही उन्होंने ऐसे सिद्धांत अपनाने को कहा जिनसे दुनिया में तनाव व हिंसा दूर हो तथा पर्यावरण को नुकसान न पहुंचे। गांधीजी के लिए विश्व शांति, संतोष व पर्यावरण की रक्षा सबसे महत्वपूर्ण थे। वह इसी के अनुकूल आर्थिक नीतियों की बात करते थे। उन्होंने अर्थनीति और नैतिकता में कभी भेद नहीं किया। गांधी ने स्पष्ट लिखा मुझे स्वीकार करना चाहिए कि मैं अर्थविद्या और नीतिविद्या में कोई भेद नहीं करता। जिस अर्थविद्या से व्यक्ति या राष्ट्र के नैतिक कल्याण को हानि पहुंचती हो उसे मैं अनीतिमय और पापपूर्ण कहूंगा। उदाहरण के लिए जो नीति एक देश को दूसरे देश का शोषण करने की अनुमति देती है वह अनैतिक है। जो मजदूरों को योग्य मेहनताना नहीं देते और उनके परिश्रम का शोषण करते हैं उनसे वस्तुएं खरीदना या उन वस्तुओं का उपयोग करना पाप है। उन्होंने शोषण विहीन व्यवस्था की मांग रखी ताकि सबकी बुनियादी जरूरतें पूरी हों। उन्होंने कहा कि गरीब लोगों को भी उत्पादन के साधनों पर नियंत्रण मिले ताकि उनका शोषण न हो। गांधी ने लिखा मेरी राय में न केवल भारत की, बल्कि सारी दुनिया की अर्थरचना ऐसी होनी चाहिए कि किसी को भी अन्न और वस्त्र के अभाव में तकलीफ न सहनी पड़े। दूसरे शब्दों में हर एक को इतना काम अवश्य मिल जाना चाहिए कि वह अपने खाने-पहनने की जरूरतें पूरी कर सके। यह आदर्श तभी कार्यान्वित किया जा सकता है जब जीवन की प्राथमिक आवश्यकताओं के उत्पादन के साधन जनता के नियंत्रण में रहें। वह हर एक को बिना किसी बाधा के उसी तरह उपलब्ध होने चाहिए जिस तरह कि भगवान की दी हुई हवा और पानी हमें उपलब्ध है। किसी भी हालत में वे दूसरों के शोषण के लिए चलाए जाने वाले व्यापार का वाहन न बनें। किसी भी देश या समुदाय का उन पर एकाधिकार अन्यायपूर्ण होगा। हम आज न केवल अपने इस दुखी देश में, बल्कि दुनिया के दूसरे हिस्सों में भी जो गरीबी देखते हैं उसका कारण इस सरल सिद्धांत की उपेक्षा है। प्राय: यही माना जाता है कि निरंतर आर्थिक विकास व वृद्धि से ही दुनिया से गरीबी व अभाव दूर होगी, लेकिन महात्मा गांधी ने यह पहचान लिया था कि इस तरह के आर्थिक विकास के तहत गरीबी व विषमता बढ़ने की संभावना भी मौजूद रहती है। अत: उन्होंने आर्थिक विकास को नहीं, बल्कि गरीब आदमी की बुनियादी आवश्यकताओं को अपनी आर्थिक सोच का केंद्र बनाया। उन्होंने देश के नेताओं और नियोजकों से विशेष आग्रह किया कि जब भी तुम्हें संदेह हो या तुम्हारा अहम तुम पर हावी होने लगे तो यह कसौटी आजमाओ। जो सबसे गरीब और कमजोर आदमी तुमने देखा है, उसकी शक्ल याद करो और अपने दिल से पूछो कि जो कदम उठाने का तुम विचार कर रहे हो, वह उस आदमी के लिए कितना उपयोगी होगा। क्या उससे उसे कुछ लाभ पहुंचेगा? क्या उससे वह अपने ही जीवन और भाग्य पर कुछ काबू रख सकेगा? यानी क्या उससे उन करोड़ों लोगों को स्वराज मिल सकेगा जिनके पेट भूखे हैं और आत्मा अतृप्त? इस तरह महात्मा गांधी गरीब आदमी को आर्थिक चिंतन के केंद्र में ले आए। तेजी से होने वाला तकनीकी बदलाव और मशीनीकरण उस समय की विचारधारा पर भी छाया हुआ था, क्योंकि इसी रास्ते पर चलकर यूरोप में समृद्धि आई थी। पर महात्मा गांधी ने इस विचारधारा को भी चुनौती दी और देश के गरीब किसान, दस्तकार और मजदूर के रोजगार और आजीविका को अंधाधुंध मशीनीकरण से बचाने के लिए उन्होंने जोर दिया। यंत्रों के बारे में उन्होंने कहा कि उससे मनुष्य को सहारा मिलना चाहिए। वर्तमान यह झुकाव है कि कुछ लोगों के हाथ में खूब संपत्ति पहुंचाई जाए और जिन करोड़ों स्त्री-पुरुषों के मंुह से रोटी छीनी है उन बेचारों की जरा भी परवाह न की जाए। सच्ची योजना तो यह होगी कि भारत की संपूर्ण मानव शक्ति का अधिक से अधिक उपयोग किया जाए। मानव श्रम की परवाह न करने वाली कोई भी योजना न तो मुल्क में संतुलन कायम रख सकती है और न इनसानों को बराबरी का दर्जा दे सकती है। इसी तरह गांधीजी ने कहा मनुष्य का लक्ष्य अपने उपभोग को निरंतर बढ़ाना नहीं अपितु सादगी के जीवन में संतोष प्राप्त करना है। यदि शक्तिशाली व अमीर लोग इस भावना में जिएं तो गरीबों के लिए संसाधन बचने की संभावना कहीं अधिक होगी। उनके शब्दों में, सच्ची सभ्यता का लक्षण संग्रह बढ़ाना नहीं है, बल्कि सोच-समझकर और अपनी इच्छा से उसे कम करना है। ज्यों ज्यों हम संग्रह घटाते जाते हैं त्यों-त्यों सच्चा सुख और संतोष बढ़ता जाता है, सेवा की शक्ति बढ़ती जाती है। त्याग की यह शक्ति हममें अचानक नहीं आएगी। पहले हमें ऐसी मनोवृत्ति पैदा करनी होगी कि हमें उन सुख-सुविधाओं का उपयोग नही करना है, जिनसे लाखों लोग वंचित हैं। समता और सादगी को एक महत्वपूर्ण उद्देश्य के रूप में प्रतिष्ठित कर पर्यावरण का नाम लिए बिना ही महात्मा गांधी हमें पर्यावरण संरक्षण के मूल से परिचित करा गए। उन्होंने कहा भी कि प्रकृति सब मनुष्यों की जरूरतें तो पूरी कर सकती है, लेकिन लालच नहीं।


Wednesday, January 26, 2011

महंगाई के स्थायी समाधान की सोचें


पिछले तीन वर्षो से महंगाई लगातार बढ़ती ही जा रही है। दिसंबर 2010 में महंगाई की दर 8.43 प्रतिशत दर्ज की गई। यदि पिछले तीन वर्षो का लेखा-जोखा देखा जाए तो महंगाई की दर औसतन 7-8 प्रतिशत तक वार्षिक रही, लेकिन सरकार द्वारा बताई गई मुद्रास्फीति की बढ़ती दर की तुलना में आम आदमी कहीं ज्यादा महंगाई का सामना करना पड़ रहा है। इसका कारण यह है कि अभी तक महंगाई की दर को मापने के लिए थोक मूल्य सूचकांक का ही सहारा लिया जाता है। वर्ष 2004-05 से लेकर 2009-10 के बीच पांच वर्षो के आंकड़ों को देखने से पता चलता है कि थोक कीमतों पर महंगाई की दर और उपभोक्ता कीमतों पर महंगाई की दर में खासा बड़ा अंतर है। हालांकि सरकार द्वारा पिछले पांच वर्षो में औसतन 5.4 प्रतिशत की दर से मुद्रास्फीति दिखाई गई जबकि औद्योगिक श्रमिकों के लिए बनाए गए उपभोक्ता सूचकांक के आधार पर यह मुद्रास्फीति 7.8 प्रतिशत की रही है। यह भी देखा गया है कि उपभोक्ता कीमत सूचकांक से भी खाद्य पदार्थो में महंगाई अधिक होती है। दिसंबर 2010 में जहां महंगाई की दर 8.43 आंकी गई वहीं खाद्य पदार्थो में यह 17 प्रतिशत दर्ज की गई जो सामान्य मुद्रास्फीति से दोगुनी अधिक है। हाल ही में कई बार खाद्य पदार्थो की मुद्रास्फीति 30 प्रतिशत तक जा पहुंची। वास्तव में 80 प्रतिशत देश के बहुत गरीब लोग जो 20 रुपये प्रतिदिन से भी कम पर गुजर-बसर करते हैं, उन्हें न तो थोक कीमतों द्वारा मापी गई मुद्रास्फीति और न ही उपभोक्ता कीमतों द्वारा मापी गई मुद्रास्फीति प्रभावित करती है। उन्हें तो खाद्य पदार्थो जैसे- आटा, दाल, चावल, खाद्य तेल और चीनी इत्यादि की कीमतों में होने वाली वृद्धि ही ज्यादा प्रभावित करती है। यही कारण है कि गरीबों की थाली पर महंगाई का असर ज्यादा होता है और उनका भोजन पहले से कम हो जाता है। यहां हमें मुद्रास्फीति के कारणों को भी समझना होगा। दरअसल खाद्य पदार्थो में होने वाली मुद्रास्फीति का मुख्य कारण देश में कृषि उत्पादन का लगातार घटते जाना है। पिछले 10 वर्षो में हमारी जनसंख्या लगभग 20 प्रतिशत बढ़ गई है, जबकि इन 10 वर्षो में खाद्य पदार्थो का उत्पादन जैसे-अनाज, खाद्य तेल, गन्ना, दालों आदि का उत्पादन या तो लगभग स्थिर रहा है अथवा अत्यंत धीमी गति से बढ़ा है। ऐसे में एक तरफ जहां सिकुड़ते उत्पादन की समस्या है, लगातार बढ़ रही जनसंख्या का मामला है जिससे कृषि पदार्थो की मांग बढ़ी है और लोग गैर-कृषि क्षेत्रों में अधिक रुचि ले रहे हैं। नतीजन पिछले 5 वर्षो में थोक कीमतों के आधार पर भी खाद्य पदार्थो में मुद्रास्फीति औसतन 8.2 प्रतिशत के आसपास रही। इसी कालखंड में गैर-पेट्रोलियम औद्योगिक उत्पादों की मुद्रास्फीति मात्र 4 प्रतिशत रही। यह साफ है कि गरीब के लिए आटा, दाल, चावल, तेल, चीनी और सब्जियों के भाव तो आसमान छू रहें हैं, लेकिन कारों, एलसीडी टेलीविजन, एयरकंडिशनरों और अन्य विलासितापूर्ण उपभोग की चीजों के भाव या तो घट रहें हैं या बहुत कम बढ़े हैं। हालांकि पिछले कुछ सप्ताह से प्याज के एकदम बढ़े भावों से सरकार थोड़ी बहुत चिंतित दिखाई देती है, लेकिन अत्यंत दकियानूसी उपाय जैसे-व्यापारियों के ठिकानों पर छापे मारना आदि अपनाए जा रहे हैं। ऐसा लगता है कि पहले से ही महंगाई से त्रस्त जनता का मन बहलाने के लिए सरकार दिखावटी प्रयासों का नाटक और रिहर्सल कर रही हो। अर्थशास्त्र का एक बहुत पुराना और सटीक सिद्धांत है, जिसके अनुसार मुद्रा की पूर्ति बढ़ने से भी महंगाई बढ़ती है। जब वस्तुओं का उत्पादन न बढ़े या कम बढ़े और मुद्रा की आपूर्ति बाजार में लगातार बढ़ती चली जाए तो महंगाई आना एक स्वाभाविक घटना है, क्योंकि जब थोड़ी वस्तुओं का पीछा ज्यादा मुद्रा करती है तो उन वस्तुओं की कीमतें बढ़ जाती हैं। पिछले लगभग 3 वर्षो से सरकार ने अपने ही पूर्व के संकल्पों की धज्जियां उड़ाते हुए अपना राजकोषीय घाटा बहुत अधिक बढ़ा लिया है। सरकार ने एफआरबीएम एक्ट के तहत यह संकल्प लिया था कि वह अपने घाटे को 2.5 प्रतिशत तक सीमित रखेगी, लेकिन पिछले वित्तीय वर्ष में यह घाटा 7 प्रतिशत तक पहुंच गया। बढ़े राजकोषीय घाटे को येन-केन-प्रकारेण पूरा करने के लिए सरकार के निर्देश पर भारतीय रिजर्व बैंक ने भारी मात्रा में मुद्रा छापी। अतिरिक्त मुद्रा छपने के फलस्वरूप देश में मुद्रा की पूर्ति पिछले पांच वर्षो में औसतन 17.1 प्रतिशत की दर से प्रति वर्ष बढ़ी। स्वाभाविक है बढ़ी मुद्रा की उपलब्धता ने मुद्रास्फीति की स्थिति को और भयावह बना दिया। चूंकि औद्योगिक वस्तुओं का उत्पादन पिछले 5 वर्षो में औसतन 8.3 प्रतिशत प्रति वर्ष बढ़ा है इस कारण औद्योगिक वस्तुओं में मुद्रास्फीति की दर कम रही है, लेकिन कृषि उत्पाद और विशेष तौर पर खाद्य पदार्थो में देश इतना भाग्यशाली नहीं रहा और इसका खामियाजा ऊंची खाद्य वस्तुओं की कीमतों के रूप में गरीब आदमी को भुगतना पड़ा। भारतीय रिजर्व बैंक द्वारा मुद्रास्फीति को रोकने के लिए जो प्रयास होते हैं वे अनुपयुक्त भी हैं और अपर्याप्त भी। ऐसा इसलिए है कि भारतीय रिजर्व बैंक मुद्रा की पूर्ति को कम करने के लिए प्रयास करता है ताकि चिंता का कारण बन रही बढ़ती महंगाई पर लगाम कसी जा सके। आवश्यकता इस बात की है कि खाद्य पदार्थो की कीमतों में मुद्रास्फीति का प्रभाव कम करने के लिए कृषि उत्पादन और विशेष तौर पर खाद्य पदार्थो का उत्पादन बढ़ाया जाए। देश की वर्तमान स्थिति में सरकार की भूमिका भी संदिग्ध दिखाई दे रही है। सरकार में बैठे लोग लगातार विकास की रफ्तार तेज करने की बात करते रहते हैं। सरकार के ताजा बयानों के अनुसार इस वर्ष देश में आर्थिक संवृद्धि की दर 9 प्रतिशत तक रहने का अनुमान है। आर्थिक संवृद्धि को बढ़ाने के इस सरकारी जुनून ने देश की आम जनता को त्रस्त करने का ही काम किया है। वास्तविकता यह है कि सरकार का पूरा ध्यान कृषि को छोड़कर दूसरे क्षेत्रों के विकास में ज्यादा है। इस नीति का असर कृषि में होने वाले पूंजी निवेश पर भी पड़ा है। यही कारण है कि अंतत: हमारा कृषि उत्पादन बढ़ने के बजाय घटने लगा है। कुछ वर्ष पहले तक अनाज के मामले में आत्मनिर्भर हो चुका देश अब फिर से दुनिया के दूसरे मुल्कों से अनाज आयात करने के लिए बाध्य हो रहा है। देश वास्तव में कृषि के संबंध में आपात स्थिति से गुजर रहा है, लेकिन सरकार द्वारा कृषि के विकास की कोई योजना दिखाई नहीं देती, बल्कि आग में घी का काम करते हुए सरकारी नीतियों के तहत ज्यादा से ज्यादा उपजाऊ भूमि को उद्योगपतियों को विशेष आर्थिक क्षेत्र अथवा किसी अन्य नाम से गैर-कृषि कार्यो के लिए दिया जा रहा है। अंतरिक्ष से लिए गए चित्रों के अनुसार हरित भूमि लगातार घट रही है और उस पर कंक्रीट के जंगल बन रहे हैं, लेकिन हमारे नीति निर्माता इस आपातस्थिति से निपटने के लिए तैयार दिखाई नहीं देते। सरकार को यह समझना होगा कि अनाज हो या सब्जियां अथवा चीनी इसमें होने वाली जमाखोरी या कालाबाजारी की समस्या तभी आती है जब उत्पादन कम होता है। व्यापारियों के ठिकानों पर छापे मारने का उपक्रम करके सरकार मुद्रास्फीति का स्थायी हल नहीं खोज सकती अथवा दे सकती। मुद्रास्फीति के स्थायी हल के लिए जरूरी है कि हम देश की खाद्य सुरक्षा के मद्देनजर गरीबों को भोजन के अधिकार को सुनिश्चित करने के लिए कृषि पर विशेष ध्यान दें। इसके अलावा सरकार अपने फिजूलखर्ची पर अंकुश रखकर राजकोषीय घाटे को नियंत्रण में लाने का प्रयास करे। (लेखक आर्थिक मामलों के जानकार हैं)


Thursday, January 20, 2011

लाइलाज होता महंगाई का इलाज


मंहगाई थामने के नाम पर तीन दिन तक चले विचार मंथन के बाद वही अमृत निकला जो मनमोहन सिंह सरकार बीते डेढ़ साल से जनता को बताती आ रही है कि मंहगाई रोकने पर उसका बस नहीं है और यह कि वे इसे जान बूझकर बढ़ने दे रहे हैं। अर्थशास्त्री प्रधानमंत्री की सोच का यह निष्कर्ष है जिनका मानना है कि देश के मध्यम वर्ग को छठा वेतन आयोग देने के बाद अब उनका हक बनता है कि सरकार उसकी जेब से पैसे निकाले और उसे गरीबों को दे जिससे उनका जीवन भी आर्थिक रूप से मजबूत हो और बदले में वे उन्हें वोट दें। प्रधानमंत्री यह फार्मूला कांग्रेस आलाकमान सोनिया गांधी को भी समझाने में कामयाब रहे हैं। जो राष्ट्रीय सलाहकर परिषद के माध्यम से अपनी सहृदय आत्मा को संतुष्ट करती रहती हैं कि वह देश के गरीब लोगों के लिए कुछ कर रही हैं। यह अलग बात है कि प्रधानमंत्री उनकी किसी भी सिफारिश को नहीं मानते हैं चाहे मनरेगा के मजदूरों के वेतन में बढ़ोतरी को थोक मूल्य सूचकांक के हिसाब से बढ़ाने की बात हो या फिर एपीएल परिवारों को 35 किलोग्राम अनाज देने की बात हो। प्रधानमंत्री और उनके सलाहकारों के वित्त और संसाधन को लेकर अपने तर्क हैं तो सोनिया गांधी की सलाहकार परिषद के सामाजिक कल्याण के तरफदारों के अपने तर्क, लेकिन इस आर्थिक उद्धार कार्यक्रम और कल्याणकारी सोच के बीच में आम आदमी पिस रहा है और बुरी तरह पिस गया है। प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को शायद इस बात का अंदाजा नहीं होगा कि दुनिया भर की मंदी और उनके दस फीसदी विकास के इस महंगाई वाले फार्मूले के कारण भारत से अत्यंत गरीबों की एक पूरी नस्ल गायब हो गई है। मंदी के समय जब सूरत की कपड़ा मंडियों से बिहार के बेरोजगार मजदूरों से भरी रेलगाडि़यां बिहार जा रही थीं तो तत्कालीन श्रम मंत्री ऑस्कर फर्नाडीज ने कहा कि दुनिया भर में मंदी है और वह कुछ नहीं कर सकते हैं। यह सब तब हुआ था जब सरकार ने दावा किया कि मंदी से निपटने के लिए उसने बाजार में पौने चार लाख करोड़ रुपये झोंके हैं। ये पैसे और छूट किसको और कहां से मिली यह सरकार ही बता सकती है, क्योंकि आंकड़ों की बाजीगरी और उसे परिभाषित करने में सरकार माहिर है जैसे अब वित्त मंत्री प्रणब मुखर्जी कर रहे हैं। महंगाई दर बीते दिसंबर में एक फीसदी बढ़कर 8.43 प्रतिशत हुई तो प्रणब मुखर्जी ने कहा कि नवंबर के मुकाबले भले ही महंगाई दर एक फीसदी बढ़ी हो, लेकिन यह अक्टूबर के मुकाबले घटी है। प्रणब मुखर्जी ही नहीं इस सरकार में सभी मंत्री और कांग्रेस पार्टी के सदस्य महंगाई के आंकड़ों को जायज ठहराने में माहिर हैं। यही नहीं वे हर बार यह कहने से भी नहीं चूकते हैं कि वे महंगाई रोकने के लिए गंभीर प्रयास कर रहे हैं। सरकार के इन गंभीर प्रयासों का ही नतीजा था कि थोक मूल्य सूचकांक पर आधारित जो महंगाई दर का आंकड़ा पहले हर हफ्ते आता था अब वह मासिक आधार पर आता है ताकि हर हफ्ते सरकार को फजीहत न उठानी पड़े। यह सरकार महंगाई दर के बढ़ने से विकास दर के बढ़ने में यकीन रखती है। चीन में महंगाई दर डेढ़ से दो फीसदी के बीच रहती है और विकास दर भी 10 फीसदी रहती है, लेकिन प्रधानमंत्री को यह फार्मूला समझ में नहीं आता है। दरअसल, बात समझ में आने या न आने की नहीं है। बात नीयत और इच्छाशक्ति की है। भारत में डेढ़ और दो फीसदी की महंगाई दर के साथ 10 फीसदी की विकास दर हासिल की जा सकती है, लेकिन इसके के लिए सदृढ़ और दूरगामी उपाय करने होते हैं। आधारभूत ढांचागत क्षेत्रों में तेजी से विकास करना होता है और यह सब करने के लिए चाहिए मजबूत इच्छाशक्ति और मजबूत क्रियान्यवयन एजेंसियां। भारत में ये सारी स्थितियां हैं, लेकिन उन्हें करने वाला कोई नहीं है। सरकार को इसकी जरूरत ही महसूस नहीं होती है, क्योंकि इनके किए बिना ही उसकी झोली भर रही है। तीन साल पहले तक सरकार के गल्ले में प्रत्यक्ष कर (आयकर) से 1.32 लाख करोड़ रुपये जाते थे और बीते वित्तीय वर्ष में यह तीन गुना बढ़कर 3.78 लाख करोड़ हो गया है। इस वित्तीय वर्ष में सरकार ने 4.3 लाख करोड़ रुपये का लक्ष्य रखा तो हाल ही में सरकार ने प्रत्यक्ष कर संग्रह में 24 फीसदी की बढ़ोतरी होते देख यह लक्ष्य 20 हजार करोड़ रुपये और बढ़ाकर इसे 4.5 लाख करोड़ रुपये कर दिया है। सरकार जब यह कहती है कि देश में मंहगाई नहीं है। लोग अब दूध, मांस, अंडा, दाल, सब्जी आटा, चावल ज्यादा खाने लगे हैं इसलिए इन चीजों के दाम बढ़ रहे हैं तो सरकार गलत नहीं कहती है, क्योंकि उसके खजाने के आंकड़े तो यही कहते हैं। सरकार का मानना है कि अगर वाकई महंगाई जमाखोरों और उसकी गलत नीतियों से बढ़ती है तो उसके खजाने में 4.5 लाख करोड़ रुपये क्यों आ रहे होते हैं। मतलब साफ है कि लोगों के पास पैसा है और वे उसे खर्च भी कर रहे हैं। दरअसल सरकार कर संग्रह की इस गणित में भूल जाती है कि यह प्रत्यक्ष कर हो या कारपोरेट कर, सभी में यह बढ़ोतरी छठे वेतन आयोग की देन है। वेतन आयोग की सिफारिशों की लाभ सीमा में नौकरी पेशा मध्यम वर्ग और उच्च-मध्यम वर्ग तो आता है, लेकिन वो किसान, मजदूर और आम-आदमी नहीं आता है जो रोजाना जीतोड़ मेहनत करके भी अपने को मरने से नहीं बचा पा रहा है और न उसकी ग्रेच्युटी कटती है और न ही पीएफ। उसे न तो किसी तरह का मेडिक्लेम मिलता है और न ही कोई छुट्टी। सरकार का भी इस पूरे वर्ग के लिए एक शानदार तर्क है। मनरेगा, राशन की दुकान, इंदिरा आवास योजना और कई फ्लैगशिप योजनाएं। सरकार कहती है कि उसने मनरेगा में न्यूनतम मजदूरी बढ़ाकर 100 से 125 रुपये कर दी है। राशन की दुकानों से गरीबों को सस्ता अनाज मुहैया कराया जा रहा है। इंदिरा आवास योजना से सस्ते घर और केंद्र की अन्य कई फ्लैगशिप योजनाओं के कारण गरीबों की खर्च करने की क्षमता बढ़ी है। वह पहले से ज्यादा खाने, पहनने और ओढ़ने लगी है, लेकिन सरकार यहां भूल जाती है कि साल में 365 दिन होते हैं 100 दिन नहीं। मनरेगा में मात्र 100 दिन के लिए काम मिलता है और आज के दिन देश में किसी भी व्यक्ति को मनरेगा में 100 से 125 रुपये की निर्धारित राशि शायद ही किसी को मिली हो, क्योंकि यह सब मिलती है तो सिर्फ कागजों में। कोई भी व्यक्ति शत-प्रतिशत काम कभी नहीं कर सकता और यह राशि शत-प्रतिशत काम करने पर ही दी जाती है। राशन की दुकानों का क्या हाल है यह किसी से छुपा हुआ नहीं है। इंदिरा आवास के 18 हजार रुपये के मकान के लिए गरीब को कितने हजार रुपये की रिश्वत देनी होती है और इन आवासों की क्या गुणवत्ता होती है यह भी किसी से छिपा नहीं है। दरअसल सरकार को इस सबसे फर्क नहीं पड़ता है। वह अपनी बैलेंसशीट देखती है। वह यह देखती है कि इस साल उसके पास कितने लाख करोड़ रुपये आ रहे हैं। वह देखती है कि देश की विकास दर कितनी तेजी से आगे बढ़ रही है। वह देखती है कि वित्तीय घाटे का प्रतिशत सकल घरेलू उत्पाद से ज्यादा न हो। इसे रोकने के लिए वह सार्वजनिक उपक्रमों के शेयर या दूरसंचार में स्पेक्ट्रम लाइसेंस बेचने के उपाय करती है। सरकार यह मानती है कि चूंकि उसके पास पैसा ज्यादा आएगा तो वह मनरेगा में इस बार 40 हजार करोड़ रुपये से ज्यादा, प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना में 12 हजार करोड़ रुपये ज्यादा और राहुल गांधी के लिए इस बार 3 हजार करोड़ रुपये (पिछली बार वह बुंदेलखंड के लिए दो हजार करोड़ रुपये ले गए थे), मिड-डे मील, सर्वशिक्षा अभियान और तकरीब उन सभी कल्याणकारी योजनाओं में पैसा बढ़ा पाएगी जो उसने गरीबों के उत्थान के लिए जनकल्याणकारी योजनाएं चला रखी हैं। यह सब करके सरकार गरीबों को बताना चाहती है कि वह उनके लिए काम कर रही है इसलिए उन्हें उसे ही वोट देना चाहिए। यही कारण है कि इस अच्छी बैलेंसशीट के चक्कर में न वो शहरी मध्यम वर्ग के महंगाई के आंसुओं को देखती है और ना ही देश के दूर-दराज गांवों में रह रहे व्यक्ति के पेट और कमर के बीच की कम होती दूरी को देख पाती है। (लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं)

Tuesday, December 28, 2010

लुभाते रहे आंकड़े, रुलाती रही महंगाई

आप किसी अर्थशास्त्री से भारतीय अर्थव्यवस्था का हालचाल पूछिए तो वह उत्साह से उछल पड़ेगा और एक से बढ़कर एक आंकड़े देगा, जो साबित करेंगे कि भारत की अर्थव्यवस्था वाकई पूरी दुनिया के लिए चीन के बाद सबसे ज्यादा आकर्षण का केंद्र क्यों है? जब यूरोप में या तो अर्थव्यवस्थाएं नकारात्मक हो रही हों या मंदी से उबरने के लिए जूझ रही हों, उस माहौल में भारतीय अर्थव्यवस्था का औद्योगिक उत्पादन 10 फीसदी के ऊपर लगातार बने रहना, विनिर्माणबिजली तथा दूसरे फास्ट मूविंग गुड्स कैरिअर्स के संदर्भ में 11 फीसदी से ऊपर की विकास दर। यह सब अगर चमत्कारिक नहीं तो बेहद आकर्षक तो लगता ही है। सिर्फ ये आंकड़े ही नहीं, अर्थव्यवस्था से संबंधित और भी कई आंकड़े चमत्कृत करते हैं। जैसे, प्रति 10 ग्राम 21,050 रुपये में पहुंचने के बावजूद सोने की मांग देश में न सिर्फ बरकरार है, बल्कि पिछले साल के मुकाबले इस साल यह 10 फीसदी से ज्यादा बढ़ी है। मतलब यह है कि भारत में इतना महंगा सोना खरीदने वाले भी न सिर्फ मौजूद हैं, बल्कि बढ़ रहे हैं। यही बात चांदी की कीमतों के संदर्भ में भी लागू होती है। चांदी भी इस साल 45,200 रुपये प्रति किलो का एवरेस्ट जैसा दिखने वाला शिखर पार कर गई। अगर अर्थव्यवस्था को वसूले गए अप्रत्यक्ष करों की कसौटी में कसकर देखें तो भी देश की तरक्की चमत्कृत करती है, क्योंकि इस साल अप्रत्यक्ष कर संग्रह में 42.3 फीसदी की बढ़ोत्तरी हुई है। साल 2009 में जहां 1,45,958 करोड़ रुपये का परोक्ष कर वसूला गया था, वहीं वर्ष 2010 में यह बढ़कर 2,07,756 करोड़ रुपये हो गया है, जो इस बात का सबूत है कि देश में कर वसूली में भी काफी तेज बढ़ोतरी हुई है। हालांकि इस साल यानी 2010-2011 के लिए अप्रत्यक्ष कर वसूली का लक्ष्य 3,13,471 करोड़ रुपये का रखा गया है और वित्तीय वर्ष खत्म होने तक इसके हासिल होने की उम्मीद है। अगर आंकड़ों से ही खुश होना हो तो यह भी जान लें कि इस साल हमने जीडीपी ग्रोथ रेट के मामले में चीन को पछाड़ दिया है। हमारे यहां सरकारी और निजी दोनों ही मांगों में इस साल बढ़ोतरी दिखी है। हां, आयात और निर्यात को अगर तुलनात्मक कसौटी में रखें तो अभी भी हमारा आयात, निर्यात के मुकाबले काफी ज्यादा है। 2009-10 के वित्तीय वर्ष में 176.5 फीसदी निर्यात के मुकाबले आयात का प्रतिशत 278.7 रहा। निवेश के मामले में भी भारतीय अर्थव्यवस्था ने पूरे के पूरे अंक हासिल किए हैं। 2010 में निवेश के मोर्चे पर दहाई के अंक में बढ़ोतरी हुई है और औसत 13 से 15 फीसदी के बीच रहा है। कृषि उत्पादन की दर में भी बढ़ोतरी हुई है और कई दूसरे पहलू भी अर्थव्यवस्था की चमक बिखरते नजर आएंगे। मसलन, यह पहला साल है जब सर्राफा बाजार और शेयर बाजार एक साथ आसमान छू रहे हैं। शेयर बाजार 21,000 के ऊपर का शिखर छुआ तो सोना भी उसी के साथ 21,000 प्रति 10 ग्राम के पार पहुंच गया। लेकिन ये तमाम आंकड़े जितने लुभावने हैं, उतने ही भ्रामक भी हो सकते हैं। दरअसल, ये आंकड़े सच तो हैं, लेकिन ये बात को पूरी सच्चाई के साथ नहीं कहते या यों समझ लीजिए कि देश में अर्थव्यवस्था की जो सुनहरी धूप है, वह सिर्फ थोड़े से या कहें मुट्ठीभर हिंदुस्तानियों के खाते में ही आ रही है। देश का बड़ा हिस्सा इस चमत्कारी विकास दर को सिर्फ दूर से ही देख और सुन रहा है, पर अपनी जिंदगी में महसूस नहीं कर पा रहा है। आम लोगों की नजर में तो यह साल बाकी कई सालों की तरह ही महंगाई के मामलों में रुलाने वाला साल रहा। इस समय जब साल के आखिर में मैं ये पंक्तियां लिख रहा हूं, बाजार में प्याज 60 रुपये किलो बिक रहा है। पेट्रोल के दामों में पूरे साल में पांचवीं बार बढ़ोतरी हो चुकी है। सरकार चाहे दिल्ली की हो, केंद्र की हो या किसी राज्य की, भले कुछ भी दावा करे, मगर खाने पीने की चीजों में एक बार जो महंगाई बढ़ी है, वह महंगाई लौटकर न कम हुई और न पूरी तरह से कम हो सकती है। भले 100 रुपये किलो आज अरहर की दाल न हो, लेकिन 70 से 75 रुपये प्रति किलो बिक रही है। आम लोगों के लिए अरहर की दाल खाना अब लग्जरी हो गया है। वर्ष 2010 आम लोगों के लिए महंगाई के मामले में हाहाकारी साल रहा। महंगाई हर गुजरते दिन के साथ आम भारतीय का जीना दुश्वार करती रही, वहीं आंकड़े भले कुछ और कहते रहे हों। दूध, आटा, मसाले, सब्जियां, फल जैसी रोजमर्रा की इस्तेमाल वाली चीजें साल में बार-बार महंगी होकर आम लोगों को रुलाती रहीं। लेकिन आंकड़े यहां भी कुछ और ही कहते रहे, जैसे मुद्रास्फीति की दर और थोक मूल्य सूचकांक तो घटते दिखे, लेकिन बाजार में चीजें महंगी मिलीं। अब इसके लिए लगाते रहिए अंदाजा कि क्या-क्या वजहें जिम्मेदार हैं? मगर असली बात यही है कि इस देश में आम लोगों को अर्थशास्त्र के विशेषज्ञों का अर्थशास्त्र कतई समझ में नहीं आता। अर्थव्यवस्था के कुछ कुदरती कारक होते हैं, जिनसे वह घटती बढ़ती है यानी हमारे खुश होने और परेशान होने में कुदरत का भी योगदान कम नहीं होता। हालांकि इस साल मानसून की बारिश पिछले कई सालों के मुकाबले भरपूर हुई और इससे खेती की पैदावार में चार फीसदी की बढ़ोतरी का भी अनुमान लगाया गया, लेकिन जहां मानसून की बारिश ने हमें यह खुशी दी, वहीं गैर मौसमी बारिश ने काफी दुख दिया। फिलहाल जो प्याज की कीमतें नए रिकार्ड बना रही है, उनके पीछे भी यह मानसून की बारिश ही है। यही नहीं, इस साल की मानसूनी बारिश के चलते देश के अधिकांश इलाकों में बाढ़ आई और वह बाढ़ अर्थव्यवस्था की नजर में काफी कुछ खलनायक जैसी भी रही। जैसे, पंजाब में एक बड़े रकबे की धान की खेती बर्बाद हो गई। उत्तराखंड के तराई इलाकों में पूरी तरह से फसल चौपट हो गई। वहीं दक्षिण के प्रांतों में नवंबर-दिसंबर के महीनों में हुई बारिश ने फसलों को काफी नुकसान पहुंचाया। देश में अर्थव्यवस्था की दिशा ही तय करती है कि हमारे लक्ष्य क्या हैं? जिस तरह से देश की अर्थव्यवस्था में आयात का चलन बढ़ रहा है, उससे सरकार की कई आर्थिक नीतियों पर सवालिया निशान लगते दिख रहे हैं। 2010 में खाद्य तेलों पर 35 फीसदी से ज्यादा हमारी निर्भरता आयातित तेलों पर हो गई है। कुछ इसी तरह का माजरा दालों के मामले में भी दिखने लगा है। दालें भारतीय अर्थव्यवस्था की बहुत महत्वपूर्ण खाद्य सामग्री हैं और दालों के पैदावार में लगातार कमी आ रही है। 2010 दालों की पैदावार के लिहाज से एक और बुरा साल रहा। 15 से 25 फीसदी तक दालों की पैदावार में कमी देखी गई। दालों के मामले में हमारी सबसे नाजुक स्थिति अरहर की दाल से होती है और इसकी पैदावर में बाकी दालों के मुकाबले और भी ज्यादा कमी आई है। बर्मा, ऑस्ट्रेलिया और उत्तरी अमेरिका से आयात करने के बावजूद हम जरूरी और पर्याप्त दालों का जुगाड़ नहीं कर पा रहे, क्योंकि अरहर की दाल इन देशों में भी कम पैदा होती है। इसलिए अरहर की दाल खाने वालों के लिए विशेषकर उत्तर भारतीयों के लिए यह साल थोड़ा स्वाद खराब करने वाला रहा। मगर उम्मीद है कि अगले कुछ सालों में ये तमाम स्थितियां नई करवट लेंगी। (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं)