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Wednesday, March 9, 2011

मिस्र जैसे हालात के आसार


खाद्यान्न को लेकर वैश्विक स्तर पर संकट की स्थिति पैदा होने जा रही है। विश्व खाद्य संगठन ने इस मामले में खतरे की घंटी बजा दी है। बताया जा रहा है कि इस वर्ष चीन में गेहूं की दो तिहाई फसल प्रभावित होगी। वहां इस शीत ऋतु में बारिश कम होने की वजह से गेहूं की पैदावार कम होने की संभावना है। उत्तरी चीन के मैदानी भाग में पिछले वर्ष सात करोड़ पचास लाख टन गेहूं की पैदावार हुई जबकि पूरे चीन में कुल गेहूं का उत्पादन 11 करोड़ 12 लाख टन था। अनुमान है कि चीन में फसल की पैदावार कम होगी क्योंकि उत्पादक क्षेत्र पानी की कमी से प्रभावित है। इसका सीधा असर दुनिया के खाद्यान्न भंडारों पर पड़ेगा। वैश्विक स्तर पर पिछले छह महीनों में खाद्य पदार्थो के दाम बहुत तेजी से बढ़े हैं। हालांकि इसके बावजूद उत्पादन और खपत की स्थिति अब तक संतुलन में रही है लेकिन भविष्य में हल्के से अभाव का दबाव भी समस्या को उग्र रूप दे सकता है। और कीमतों के नियंतण्रमें परेशानी आ सकती है। वैसे भी खाद्यान्नों के भाव वैश्विक स्तर पर अपने चरम पर 2008 में ही पहुंच चुके थे। इस वक्त पश्चिम एशिया इस समस्या से बहुत प्रभावित है। मिस्र की जनक्रांति का एक बहुत बड़ा मुद्दा खाद्य पदार्थो की महंगाई भी रहा है। वहां खाद्यान्नों के दाम 18.5 प्रतिशत बढ़ने के विरोधस्वरूप जनता सड़कों पर उतर आई थी। टय़ूनीशिया और मिस्र की देखादेखी अनेक अरब और अफ्रीकी देशों में भी क्रांति की चिंगारियां सुलग चुकी हैं। ओमान, इस्रइल और जॉर्डन में भी महंगाई के खिलाफ प्रदर्शन शुरू हो चुके हैं। यमन और अल्जीरिया में राजनीतिक विद्रोह का बिगुल बज चुका है। इराक ने अमेरिका से तीन लाख टन गेहूं मंगाने का आर्डर दिया जिसमें एक लाख टन अतिरिक्त की मांग की गई। इसी तरह जॉर्डन, लेबनान, अल्जीरिया और सऊदी अरब ने हाल में गेहूं मंगाने के बड़े आर्डर दिये। लेकिन खाद्यान्न संकट को देखते हुए बहुत से देशों ने निर्यात रोक दिया है। इनमें रूस सबसे पहला देश है। वैश्विक स्तर पर चीनी के दाम तीस वर्षों के रिकार्ड दामों तक चढ़ गये हैं। चीन में आटे के दाम एक वर्ष में 16 फीसद तक बढ़ चुके हैं। वहां की सरकार ने सूखे से निपटने के लिए एक अरब 96 करोड़ डालर के राहत पैकेज की घोषणा की है। यहां तक कि अप्राकृतिक बारिश करने की कोशिश की जा चुकी है। खाद्यान्नों की निरंतर कम होती मात्रा को देखते हुए पश्चिम एशिया के देशों की सरकारों ने खाद्यान्न भंडारण के जतन शुरू कर दिये हैं। इराक का कृषि उत्पादन लगातार घटता जा रहा है। चिंतित विश्व भूख से निपटने के लिए परेशान है। सरकारों ने समय पर कदम नहीं उठाये तो उन्हें जनता बर्दाश्त करने वाली नहीं है। दूसरी ओर हमारे देश का आलम यह है कि सरकार अपने अनाज के गोदामों को निर्यात के लिए खोलने को बेकरार दिख रही है। चाहे प्याज हो या चीनी या अन्य चीजें, वह मुक्त हस्त से रह-रहकर उनके निर्यात की कोशिश करती रही है। जब इसकी चौतरफा निंदा होती है तब कहीं जाकर वह चेतती है। प्याज के मामले में पिछले दिनों यही देखने में आया। देश में खाद्यान्न का बफर स्टाक तो होना ही चाहिए। लेकिन इसमें नियोजन का अभाव बार-बार दिखता है। जब संकट गले-गले तक आ जाता है, तब ही सरकार चेतती है और इस संकट और होश संभलने के बीच बिचौलिए मालामाल हो जाते हैं। बेचारा उत्पादक और उपभोक्ता हाथ ही मलता रहता है। इन कमियों पर सरकार को सचेत होने की जरूरत है। जनता यदि परेशानी ही झेलती रहेगी तो कैसे उस सरकार को बर्दाश्त करेगी, जिसे वह अपना संरक्षक मानती है। बहरहाल, महंगाई और खासकर खाद्य पदार्थो की महंगाई के खिलाफ मध्य-पूर्व के देश मिस्र से प्रेरित होकर आंदोलन की राह चलने की तैयारी में जुट गये हैं। दुनिया के और देश भी इस रास्ते को अख्तियार कर सकते हैं। कारण हर देश की आम जनता रोजमर्रा की परेशानियों से बुरी तरह घिरी हुई है और दुनिया भर के लोग खाद्यान्न संकट से जूझ रहे हैं।

     
खाद्यान्न को लेकर वैश्विक स्तर पर संकट की स्थिति पैदा होने जा रही है। विश्व खाद्य संगठन ने इस मामले में खतरे की घंटी बजा दी है। बताया जा रहा है कि इस वर्ष चीन में गेहूं की दो तिहाई फसल प्रभावित होगी। वहां इस शीत ऋतु में बारिश कम होने की वजह से गेहूं की पैदावार कम होने की संभावना है। उत्तरी चीन के मैदानी भाग में पिछले वर्ष सात करोड़ पचास लाख टन गेहूं की पैदावार हुई जबकि पूरे चीन में कुल गेहूं का उत्पादन 11 करोड़ 12 लाख टन था। अनुमान है कि चीन में फसल की पैदावार कम होगी क्योंकि उत्पादक क्षेत्र पानी की कमी से प्रभावित है। इसका सीधा असर दुनिया के खाद्यान्न भंडारों पर पड़ेगा। वैश्विक स्तर पर पिछले छह महीनों में खाद्य पदार्थो के दाम बहुत तेजी से बढ़े हैं। हालांकि इसके बावजूद उत्पादन और खपत की स्थिति अब तक संतुलन में रही है लेकिन भविष्य में हल्के से अभाव का दबाव भी समस्या को उग्र रूप दे सकता है। और कीमतों के नियंतण्रमें परेशानी आ सकती है। वैसे भी खाद्यान्नों के भाव वैश्विक स्तर पर अपने चरम पर 2008 में ही पहुंच चुके थे। इस वक्त पश्चिम एशिया इस समस्या से बहुत प्रभावित है। मिस्र की जनक्रांति का एक बहुत बड़ा मुद्दा खाद्य पदार्थो की महंगाई भी रहा है। वहां खाद्यान्नों के दाम 18.5 प्रतिशत बढ़ने के विरोधस्वरूप जनता सड़कों पर उतर आई थी। टय़ूनीशिया और मिस्र की देखादेखी अनेक अरब और अफ्रीकी देशों में भी क्रांति की चिंगारियां सुलग चुकी हैं। ओमान, इस्रइल और जॉर्डन में भी महंगाई के खिलाफ प्रदर्शन शुरू हो चुके हैं। यमन और अल्जीरिया में राजनीतिक विद्रोह का बिगुल बज चुका है। इराक ने अमेरिका से तीन लाख टन गेहूं मंगाने का आर्डर दिया जिसमें एक लाख टन अतिरिक्त की मांग की गई। इसी तरह जॉर्डन, लेबनान, अल्जीरिया और सऊदी अरब ने हाल में गेहूं मंगाने के बड़े आर्डर दिये। लेकिन खाद्यान्न संकट को देखते हुए बहुत से देशों ने निर्यात रोक दिया है। इनमें रूस सबसे पहला देश है। वैश्विक स्तर पर चीनी के दाम तीस वर्षों के रिकार्ड दामों तक चढ़ गये हैं। चीन में आटे के दाम एक वर्ष में 16 फीसद तक बढ़ चुके हैं। वहां की सरकार ने सूखे से निपटने के लिए एक अरब 96 करोड़ डालर के राहत पैकेज की घोषणा की है। यहां तक कि अप्राकृतिक बारिश करने की कोशिश की जा चुकी है। खाद्यान्नों की निरंतर कम होती मात्रा को देखते हुए पश्चिम एशिया के देशों की सरकारों ने खाद्यान्न भंडारण के जतन शुरू कर दिये हैं। इराक का कृषि उत्पादन लगातार घटता जा रहा है। चिंतित विश्व भूख से निपटने के लिए परेशान है। सरकारों ने समय पर कदम नहीं उठाये तो उन्हें जनता बर्दाश्त करने वाली नहीं है। दूसरी ओर हमारे देश का आलम यह है कि सरकार अपने अनाज के गोदामों को निर्यात के लिए खोलने को बेकरार दिख रही है। चाहे प्याज हो या चीनी या अन्य चीजें, वह मुक्त हस्त से रह-रहकर उनके निर्यात की कोशिश करती रही है। जब इसकी चौतरफा निंदा होती है तब कहीं जाकर वह चेतती है। प्याज के मामले में पिछले दिनों यही देखने में आया। देश में खाद्यान्न का बफर स्टाक तो होना ही चाहिए। लेकिन इसमें नियोजन का अभाव बार-बार दिखता है। जब संकट गले-गले तक आ जाता है, तब ही सरकार चेतती है और इस संकट और होश संभलने के बीच बिचौलिए मालामाल हो जाते हैं। बेचारा उत्पादक और उपभोक्ता हाथ ही मलता रहता है। इन कमियों पर सरकार को सचेत होने की जरूरत है। जनता यदि परेशानी ही झेलती रहेगी तो कैसे उस सरकार को बर्दाश्त करेगी, जिसे वह अपना संरक्षक मानती है। बहरहाल, महंगाई और खासकर खाद्य पदार्थो की महंगाई के खिलाफ मध्य-पूर्व के देश मिस्र से प्रेरित होकर आंदोलन की राह चलने की तैयारी में जुट गये हैं। दुनिया के और देश भी इस रास्ते को अख्तियार कर सकते हैं। कारण हर देश की आम जनता रोजमर्रा की परेशानियों से बुरी तरह घिरी हुई है और दुनिया भर के लोग खाद्यान्न संकट से जूझ रहे हैं।
    

Monday, March 7, 2011

लंबी बीमारी से ग्रस्त रेलवे


 रेल मंत्री ममता बनर्जी ने माना है कि रेलवे ऐसी लंबी बीमारी से ग्रस्त है जिसका अब तक कोई इलाज नहीं ढूंढा जा सका है। लोकसभा में रेल बजट पर चर्चा का जवाब देते हुए ममता ने रेलवे की अधूरी परियोजनाओं के संदर्भ में यह टिप्पणी की। उन्होंने कहा डेढ़ लाख करोड़ रुपये की इन लंबित परियोजनाओं के बारे में प्रधानमंत्री, वित्त मंत्री और योजना आयोग ने भरोसा दिया है कि इन्हें पूरा करने के लिए 12वीं पंचवर्षीय परियोजना में विशेष प्रावधान किया जाएगा। ममता ने कहा वह हकीकत नहीं छिपाना चाहतीं। हकीकत यह है कि रेलवे के पास न तो जरूरत के यात्री डिब्बे हैं, न माल डिब्बे और न अन्य सामान। सालाना पचास हजार यात्री डिब्बों की जरूरत है, लेकिन सिर्फ दो फैक्टि्रयां हैं। यही हाल डीजल इंजनों का है। पिछले साल 20 इंजन बने, लेकिन रेलवे को एक भी नहीं मिला। सारे इंजन समझौते के तहत श्रीलंका को निर्यात कर दिए गए। इसीलिए मैंने 16 फैक्टि्रयों का एलान किया है जिनमें दो-तीन साल में उत्पादन होने लगेगा। रायबरेली कोच फैक्ट्री में अप्रैल में पहला यात्री डिब्बा बनकर निकलेगा। उन्होंने कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी से इसका उद्घाटन करने का अनुरोध किया। बिहार के मढ़ौरा और मधेपुरा इंजन प्रोजेक्ट के बारे में ममता का कहना था कि ये सब पीपीपी प्रोजेक्ट हैं जिनमें जल्दबाजी ठीक नहीं वरना आप लोग ही कहेंगे कि घोटाला हो गया। घाटे पर ममता का जवाब पुराना ही था। कहा छठे वेतन आयोग में 73 हजार करोड़ रुपये निकल गए। बाकी कसर गुर्जर आंदोलन, लौह अयस्क निर्यात पर रोक और धरना-प्रदर्शनों ने पूरी कर दी जिससे अपेक्षित ढुलाई नहीं हो सकी। उन्होंने बात-बात पर रेल रोकने वालों से अपील की कि वे ऐसा न करें क्योंकि रेल रुकने से लोकतंत्र रुक जाता है, ट्रेनें समय पर नहीं चल पातीं। उन्होंने इन आरोपों से इंकार किया कि रेल बजट का एलान योजना आयोग से पूछे बगैर किया गया है। दुर्घटनाओं के बाबत भी ममता का जवाब घिसा-पिटा था। उन्होंने कहा 2002-03 में साढ़े सत्रह हजार करोड़ रुपये का विशेष संरक्षा कोष बनाया गया था जो 99 प्रतिशत खर्च हो चुका है। मगर दस साल पहले शुरू हुआ एंटी कोलीजन डिवाइस का काम अभी सिर्फ पूर्वोत्तर सीमांत रेलवे तक सीमित है। पहली बार इसे आठ और जोनों में लगाने की मंजूरी दी गई है। ममता ने कहा कि एक साल में बाकी सभी रेलवे क्रासिंगों पर चौकीदार तैनात कर दिए जाएंगे। सदस्यों की यात्री आरक्षण केंद्र (पीआरएस) खोले जाने की मांगों को ममता ने एक माह में पूरा करने का आश्वासन दिया। ट्रेनों की मांग पर उनका कहना था कि मैंने अब तक 345 ट्रेनें दी हैं। और देना चाहते हैं, लेकिन डिब्बों की कमी आड़े आ रही है। पिछले रेल बजट में घोषित 500 आदर्श स्टेशनों में 450 पूरे हो गए हैं। बाकी 50 का काम भी मार्च तक पूरा हो जाएगा। हालांकि उन्होंने व‌र्ल्ड क्लास स्टेशनों पर फिर माफी मांग ली। ममता ने कहा कि हमने कोशिश की लेकिन 46 करोड़ रुपये तो कंसल्टेंसी के लिए ही चाहिए। इसलिए फिलहाल इसे टाल दिया गया है। इसी के साथ लोकसभा ने 2011-12 के रेल बजट की अनुदान मांगों और 2010-11 की अनुपूरक अनुदान मांगों को ध्वनिमत से मंजूरी दे दी|

उद्योगों पर संकट का साया


 केंद्रीय बजट आने के साथ ही हंगामा शुरू हो गया। पंजाब के औद्योगिक शहर लुधियाना के कई क्षेत्रों के उद्यमियों ने हड़ताल शुरू कर दी है। होजरी, टेक्सटाइल और सिलाई मशीन तथा जालंधर के खेल उद्यमियों ने तो हड़ताल करके साफ तौर पर अपना विरोध जता दिया। साइकिल उद्यमी भी अपना विरोध जता चुके हैं। अगर सरकार ने अपने फैसले पर पुनर्विचार न किया तो आगे वे भी हड़ताल पर जा सकते हैं। यह विरोध केवल लुधियाना या पंजाब में ही हो ऐसा नहीं है। विरोध के ये सुर कर्नाटक और महाराष्ट्र के अलावा दिल्ली से भी सुनाई दे रहे हैं। यह विरोध केंद्रीय बजट के उस प्रस्ताव के विरुद्ध है जिसमें केंद्रीय उत्पाद शुल्क के दायरे में 130 नए उद्योगों को लाए जाने की बात की गई है। इसमें कोई दो राय नहीं है कि संविधान ने सरकार को अपने खर्चे पूरे करने के लिए कर और शुल्क लगाने के अधिकार दिए हैं, लेकिन सवाल यह है कि संविधान ने उन्हें यह अधिकार क्यों दिए हैं? यह बात हमें कभी नहीं भूलनी चाहिए कि किसी भी लोकतांत्रिक देश का संविधान हमेशा जनोन्मुख होता है। उसमें सरकार की हैसियत कोई राजा या तानाशाह जैसी नहीं होती है। वह कुल मिलाकर जनता की एक प्रतिनिधि भर होती है, जनता की इच्छा और सुविधानुसार देश की व्यवस्था देखने और शासन चलाने के लिए। बेहद शर्मनाक बात यह है कि जब भी देश का बजट आता है तो जिस तरह विभिन्न क्षेत्रों पर अनाप-शनाप कर और शुल्क लगाए जाते हैं, उससे यह साबित हो जाता है कि हमारे राजनेता अभी भी सामंती मानसिकता से उबरे नहीं हैं। करों के प्रावधान देखकर उन राजाओं की याद आ जाती है जो किसी भी बात के लिए जनता पर कर थोप देते थे। कहने के लिए यह बजट महंगाई से पहले से ही पीडि़त आम जनता के घावों पर मरहम रखने को ध्यान में रखकर बनाया गया है। यही वजह है कि जनता पर प्रत्यक्ष कर लगाने से सरकार बची है, लेकिन वहीं सरकार अप्रत्यक्ष रूप से कर भी थोप दिए हैं। आखिर इसका भुगतान किसे करना होगा? जाहिर है जो अप्रत्यक्ष कर उद्यमियों पर लगाए हैं, आखिरकार इनका बोझ जनता की जेब पर ही पड़ेगा। जब उद्यमियों पर कर लगाए जाएंगे तो उनके तैयार माल की लागत बढ़ जाएगी। इससे सामान की कीमत बढ़ेगी और वह बढ़ी हुई कीमत जनता से ही वसूलेंगे। उद्यमियों का कहना है कि कच्चे माल की कीमत बढ़ी होने के कारण चीजों के दाम पहले से ही बढ़े हुए हैं। ऐसी स्थिति में उनके लिए और अधिक दाम बढ़ाने की कोई गुंजाइश नहीं बची है। उनके लिए अपने सामानों के दाम बढ़ाने की गुंजाइश इसलिए भी नहीं रह गई है, क्योंकि दुनिया भर के कई दूसरे देशों के लिए भारतीय बाजार के दरवाजे सरकार पहले ही खोल चुकी है। चीन से हर तरह के सामान हमारे देश में आ रहे हैं और दाम कम होने की वजह से खूब बिक भी रहे हैं। बेहद सस्ते दाम पर आने के लिए चीनी माल दुनिया भर के उद्यमियों के लिए परेशानी का सबब बने हुए हैं। काफी हद तक वे भारतीय उद्यमियों के लिए भी परेशानी के कारण बन चुके हैं। अगर भारतीय उद्यमियों पर इसी तरह बिना सोचे-समझे कर या शुल्क लगाए जाते रहे तो आने वाले दिनों में इनके लिए अस्तित्व का संकट पैदा हो जाएगा। आखिर मामूली मुनाफे पर या घाटा बर्दाश्त करके कोई उद्योग कितने दिनों तक चल सकेगा? इससे भी महत्वपूर्ण सवाल यह है कि उद्योगों से केवल उद्यमियों का जीवन जुड़ा हुआ नहीं है। इनसे बड़ी संख्या में मजदूरों की रोजी-रोटी का सवाल भी जुड़ा है। अगर उद्योग संकट में पड़ गए तो उन तमाम मजदूरों की रोजी-रोटी का क्या होगा जो इन पर आश्रित हैं? यह प्रश्न इसलिए भी अत्यंत प्रासंगिक है, क्योंकि बेरोजगारी पहले से ही पूरे देश में एक बहुत बड़ी समस्या के रूप में मौजूद है। इस समस्या को हल करने के नाम पर नाटक चाहे जितना भी क्यों न हो रहा हो, लेकिन सच्चाई यह है कि वास्तव में किसी भी प्रयास का कोई असर दिख नहीं रहा है। अब अगर उद्योग भी संकट में फंस गए तो फिर रोजगार की स्थिति देश में क्या होगी यह आसानी से समझा जा सकता है। इस तरह अगर देखा जाए तो सरकार नए रोजगार सृजन के बजाय देश में पहले से मौजूद रोजगार को भी खत्म करने पर तुल गई सी लगती है। इसी सोच के तहत लुधियाना के मजदूर संगठन भी उद्यमियों के साथ आ गए हैं। वे इस हड़ताल को अपना पूरा समर्थन दे रहे हैं। उद्यमियों और मजदूरों की इस मुश्किल को समझा जाना चाहिए। सरकार को इसके दूरगामी परिणामों की ओर भी देखना चाहिए। यह एक स्थापित तथ्य है कि जिस किसी भी समाज में बेरोजगारी और महंगाई बढ़ी है, वहां अपराध भी बढ़े हैं। वस्तुत: अपनी आवश्यक आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए समाज के एक बड़े वर्ग की यह मजबूरी हो जाती है। चिंताजनक बात यह है कि भारत में महंगाई और बेकारी दोनों ही समस्याएं बड़ी तेजी से बढ़ती जा रही हैं। क्या सरकार आने वाली स्थितियों के लिए तैयार है? यह सही है कि सरकार के खर्चे बढे़ हैं, लेकिन क्या इन खर्चो में सभी वाजिब हैं? यह कौन नहीं जानता कि जनकल्याण पर किए जाने वाले खर्चो में से एक बहुत बड़ा हिस्सा भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ जाता है! इस पर अंकुश लगाने का इंतजाम क्यों नहीं किया जाता है? सरकार जनता को तो अपने खर्चे सीमित करने के उपदेश देती है, लेकिन उस पर वह स्वयं अमल करने की कोशिश क्यों नहीं करती? अफसरों और मंत्रियों के अनाप-शनाप खर्चो में कटौती क्यों नहीं की जाती है? पहले से ही तबाह जनता अपने खर्चे किस हद तक सीमित करेगी? जिसके लिए अपनी रोटी-दाल का इंतजाम भी मुश्किल हो वह अपने खर्चे और किस हद तक सीमित करेगा? दूसरी तरफ, लाखों करोड़ों रुपये के घपले की जो बातें सामने आ रही हैं, उनकी ईमानदारी से जांच क्यों नहीं कराई जाती है? अपने चहेते लोगों को तरह-तरह से उपकृत करने और अनुत्पादक कार्यो पर सरकार के मंत्री जो खर्चे कर रहे हैं, उन पर नियंत्रण के उपाय क्यों नहीं किए जाते हैं? सच तो यह है कि अगर केवल इतने ही उपाय ईमानदारी से कर लिए जाएं तो सरकार के खर्चे बहुत हद तक घट जाएंगे। ठीक इसी तरह विकास कार्यो में भी अगर पूरी पारदर्शिता और ईमानदारी लाई जाए तो बहुत खर्चे घट जाएंगे। कम लागत में वास्तविक और प्रभावी विकास हो सकते हैं। बार-बार कर लगाने और नए-नए शुल्क थोपने की प्रवृत्ति से सरकार को बचना चाहिए, क्योंकि इससे पहले जनता, फिर उद्यमियों और अंतत: रोजगार पर इसका बहुत बुरा असर पड़ता है। इससे एक-एक करके क्रमश: सभी तबाह होते हैं और यह किसी भी देश या समाज के लिए अच्छी स्थिति नहीं होती है। अगर ऐसे ही बिना सोचे-समझे कर लगाए जाते रहे तो वह दिन दूर नहीं जबकि उद्यमों की स्थिति भी खेती जैसी हो जाएगी। ऐसी स्थिति की कल्पना भी भयावह है। अगर सरकार वास्तव में ऐसी स्थिति से बचना चाहती है तो बेहतर होगा कि वह अभी से इसके लिए सतर्क हो जाए और कराधान की अपनी वर्तमान प्रणाली पर पुनर्विचार करे। (लेखक दैनिक जागरण हरियाणा, पंजाब व हिमाचल प्रदेश के स्थानीय संपादक हैं)

अस्वीकार्य आर्थिक ¨चतन


विकास दर बढ़ाने के लिए कर प्रणाली सरल बनाने के विचार से असहमति जता रहे हैं लेखक
वर्ष 2011-12 के बजट में वित्तमंत्री का पूरा ध्यान आर्थिक विकास दर को बढ़ाने की ओर रहा है। उन्होंने आयकर, एक्साइज एवं कस्टम ड्यूटी के कानूनों को सरल बनाने की बात कही है। सेल टैक्स की विभिन्न दरों को समाप्त करके वैट की एक दर की ओर वह बढ़ रहे हैं। विचार है कि टैक्स प्रणाली के सरल होने से विकास दर में वृद्धि होगी। सरकार की प्रमुख जिम्मेदारी देश को समृद्ध बनाना है, वितरण स्वयं धीरे-धीरे हो जाएगा। वित्तमंत्री के इस चिंतन में अनेक समस्याएं हैं। एक यह कि ऊपरी वर्ग द्वारा पूंजी सघन यंत्र लगाने से निम्न वर्ग के श्रमिकों की मांग कम हो जाती है। काल सेंटर में वैक्यूम क्लीनर का उपयोग होने से सफाई कर्मचारी की जरूरत कम हो जाती है अथवा चाय की ऑटोमैटिक मशीन लगाने से नुक्कड़ के चाय वाले की जरूरत नहीं रह जाती है। दूसरी समस्या है कि च्यवनप्राश और सिगरेट पर टैक्स एक ही दर से लगाने से लाभप्रद और हानिप्रद वस्तुओं के उपभोग में बराबरी स्थापित हो जाती है। तीसरी समस्या यह है कि एडवरटाइजमेंट के माध्यम से लोगों को अनावश्यक एवं हानिकारक वस्तुओं का उपभोग करने के लिए प्रेरित किया जा सकता है। झुग्गी के बगल की सड़क पर गुजरती कार को देखकर मन उद्विग्न हो जाता है। अत: यह मान्य नहीं है कि तीव्र आर्थिक विकास से जनसाधारण की स्थिति स्वत: सुधर जाएगी, बल्कि देखा जाता है कि तीव्र आर्थिक विकास के दौर में आम आदमी की स्थिति बिगड़ती है, जिसका प्रमाण 19वीं सदी का इंग्लैंड है। तब श्रमिकों को चाबुक से मार-मार कर 14 घंटे काम लिया जाता था। यह शोषण तब बंद हुआ जब इंग्लैंड ने भारत के किसानों का शोषण कर अपने श्रमिकों को राहत देनी शुरू की। अत: सभी वस्तुओं पर एक ही दर से टैक्स लगाकर आर्थिक विकास को गति देने की वित्तमंत्री की सोच अस्वीकार्य है। दूसरी ओर सरकारी योजनाओं के माध्यम से भी गरीबों को राहत पहुंचाने की प्रक्रिया असफल है। सोवियत संघ तथा इंदिरा गांधी के गरीबी हटाओ जैसे कार्यक्रमों का अंतिम नतीजा कम्युनिस्ट पार्टी तथा सरकारी कर्मचारियों की समृद्धि रहा है। हमें ऐसा रास्ता निकालना होगा कि बाजार की ऊर्जा को प्रस्फुटित होने का अवसर भी मिले और गरीब को राहत भी मिले। मूल रूप से बाजार को स्वीकार करते हुए उसमें गरीब के पक्ष में सीमित मात्रा में दखल करना चाहिए, जैसे कार को रेड लाइट पर पैदल यात्रियों के लिए रोक दिया जाता है। वित्तमंत्री सभी वस्तुओं को अच्छी और बुरी श्रेणियों में वर्गीकृत कर सकते हैं, जैसे च्यवनप्राश अच्छा माल हुआ और सिगरेट बुरा माल हुआ। हैंडलूम अच्छा माल हुआ और पावरलूम बुरा माल हुआ, चूंकि इससे हथकरघे के रोजगार का भक्षण होता है। साइकिल एवं रिक्शा अच्छा माल हुआ, क्योंकि ये श्रम सघन हैं और पर्यावरण के लिए भी लाभदायक हैं, जबकि बड़ी कार बुरा माल हुआ, क्योंकि इसे चलाने के लिए हाईवे बनाने में कृषि भूमि समाप्त होती है, जिससे हमारी खाद्य सुरक्षा प्रभावित होती है। साथ ही हम आयातित तेल पर निर्भर हो जाते हैं। इससे हमारी आर्थिक संप्रभुता खतरे में पड़ती है। बायोडीजल अच्छा माल हुआ और पेट्रोलियम डीजल बुरा माल हुआ। रसवंती अच्छा माल हुआ, क्योंकि ताजा जूस स्वास्थवर्धक होता है तथा इस उद्योग में रोजगार अधिक बनते हैं, जबकि सॉफ्ट ड्रिंक बुरा माल हुआ। वित्तमंत्री को चाहिए कि अच्छे माल पर टैक्स की दर न्यून रखें एवं बुरे माल पर अधिक। ऐसा करने से संसाधनों का उपयोग अच्छे माल के उत्पादन में अधिक होगा। निश्चित रूप से हमारी आर्थिक विकास दर में कुछ गिरावट आएगी, परंतु इस गिरावट को स्वीकार करना चाहिए। जिस प्रकार मंदिर जाते समय जैन मुनि धीरे-धीरे पैर रखते हैं कि चींटी पैरों के नीचे न आ जाए और उनसे हिंसा न हो जाए। टैक्स प्रणाली को सुंदर समाज स्थापित करने का औजार बनाना चाहिए, क्योंकि तीव्र आर्थिक विकास का अंतिम उद्देश्य सुंदर समाज ही है। च्यवनप्राश पर टैक्स दर कम करके सीधे एवं स्पष्ट तरीके से सुंदर समाज बनाया जा सकता है। सिगरेट को बढ़ावा देकर पहले तीव्र आर्थिक विकास करना और फिर उस लाभ से च्यवनप्राश खरीदने के घुमावदार रास्ते को अपनाने की क्या जरूरत है? टैक्स प्रणाली का रोजगार पर भी प्रभाव पड़ता है। एकीकृत टैक्स दर में हथकरघे एवं पावरलूम अथवा हैंडमेड कागज तथा ऑटोमैटिक मशीन से बने कागज पर एक ही दर से टैक्स वसूल किया जाता है। टेलीफोन केबल डालने के लिए एक्सॉवेटर अथवा श्रमिक के उपयोग करने से कंपनी द्वारा देय टैक्स पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता है। श्रम तथा पूंजी को एक ही दृष्टि से देखा जाता है। इस व्यवस्था के स्थान पर सरकार को श्रम-सघन उद्योगों, तकनीकों एवं कंपनियों को टैक्स में छूट देनी चाहिए। ज्ञातव्य है कि इस वर्ष अर्थशास्त्र के नोबेल पुरस्कार विजेता प्रोफेसर फिलिप्स ने रोजगार पर सब्सिडी देने का सुझाव दिया है। वित्तमंत्री व्यवस्था कर सकते हैं कि जिस माल के उत्पादन में श्रम का हिस्सा अधिक है उस पर टैक्स की दर कम लगाई जाएगी। ऐसा करने से उस टेलीफोन कंपनी को टैक्स कम देना होगा जो केबल बिछाने का कार्य श्रमिकों द्वारा कराएगी और उस कंपनी को अधिक देना होगा जो केबल को एस्कॉवेटर से बिछाएगी। सरकारी कल्याणकारी योजनाओं पर भी आर्थिक सुधार लागू करना चाहिए। पिछले साठ वषरें के गरीबी हटाओ कार्यक्रमों का लाभ सरकारी कर्मचारियों को अधिक हुआ है। सरकारी अध्यापकों ने पक्के मकान बना लिए हैं, परंतु सरकारी विद्यालयों में छात्र अधिकााधिक संख्या में फेल हो रहे हैं और पूर्ववत झोपड़ी में रह रहे हैं। बिहार में नीतीश कुमार सरकार द्वारा अंत्योदय योजना को कूपन के माध्यम से चलाने का निर्णय लिया गया है। इस फार्मूले को सर्वत्र लागू करना चाहिए-विशेषकर शिक्षा के क्षेत्र में। सभी युवाओं को शिक्षा का कूपन दे देना चाहिए, जिसका उपयोग वे अपनी जरूरत के अनुसार किसी भी सरकारी अथवा निजी विद्यालय में फीस अदा करने के लिए कर सकते हैं। ऐसा करने पर सरकारी विद्यालयों के लिए छात्रों को आकर्षित करना जरूरी हो जाएगा और उनके द्वारा दी जा रही शिक्षा की गुणवत्ता सहज ही सुधर जाएगी। मुफ्त शिक्षा जैसी अनेक सरकारी योजनाएं कल्याणकारी माफिया का रूप धारण कर चुकी हैं। इन्हें पोषित करना बंद कर देना चाहिए। वित्तमंत्री को आर्थिक विकास की राह पर जनहितकारी रेड लाइट लगानी चाहिए। सुनिश्चित करना चाहिए कि विकास की आपाधापी में आम आदमी की बलि न चढ़ जाए। (लेखक आर्थिक मामलों के विशेषज्ञ हैं)