Friday, December 2, 2011

विदेशी दुकानों पर घमासान


एक आम भारतीय या एक बीघा जमीन पर खेती करने वाले किसान को न तो आर्थिक मामलों की बारीकियां समझ में आती हैं और न ही आंकड़ों की बाजीगरी से ही उसका कोई लेना-देना है। इस बात से उसका कोई ताल्लुक नहीं है कि अर्थशास्त्री प्रधानमंत्री आखिर अपने ही विषय अर्थशास्त्र में क्यों फेल हो रहे हैं? उसे यह भी समझ में नहीं आता कि चालू वित्त वर्ष की दूसरी तिमाही के आंकड़ों में विकास दर गिरकर 6.9 फीसदी पर क्यों आ गई? दो जून की रोटी के लिए सड़कों पर या खेत में पसीना बहाते आम आदमी को सरकार का यह गणित भी समझ में नहीं आएगा कि क्यों उसने खुदरा कारोबार के क्षेत्र में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश के दरवाजे खोल दिए हैं? आज भी देश का आम आदमी योजना आयोग के उपाध्यक्ष मोंटेक सिंह अहलूवालिया की उस बात को नहीं समझ सका है कि गरीबों के ज्यादा खाने की वजह से महंगाई किस तरह बढ़ गई है, जबकि वह तो अपने बच्चों को दो वक्त का खाना भी ठीक से नहीं खिला पा रहा है। लोगों को योजना आयोग का सुप्रीम कोर्ट में दाखिल किया गया वह हलफनामा आज भी समझ में नहीं आया कि गांवों में 26 रुपये और शहरी इलाकों में 32 रुपये प्रतिदिन खर्च करने वालों को गरीबी रेखा से ऊपर क्यों माना जाएगा? आम भारतीय भले ही अर्थशास्त्र की शब्दावली से वाकिफ नहीं हो, लेकिन उसे इतना तो समझ में आता है कि संप्रग-1 और संप्रग-2 की मनमोहन सिंह सरकार में महंगाई आसमान छू रही है। गरीबी में दाल-रोटी खाकर गुजारा करने वाले इंसान को यह बात समझ में आती है कि अब उसके लिए दाल खाना एक महंगा शौक बन गया है। अर्थशास्त्र की गहरी समझ नहीं रखने वाले आम आदमी को भी यह बात समझ में आती है कि विदेशी कंपनियां भारत में किराने की दुकान खोलने के लिए क्यों आ रही है? लेकिन दूसरी तरफ देश के अर्थशास्त्री प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह का कहना है कि हमने यह फैसला किसी जल्दबाजी में नहीं, बल्कि बहुत सोच समझकर लिया है। हमारा पक्का विश्वास है कि यह फैसला देश के हित में है। हमारा मानना है कि रिटेल के क्षेत्र में एफडीआइ बढ़ने से आधुनिक टेक्नोलॉजी भारत में आएगी, कृषि उत्पादों की बरबादी कम होगी और हमारे किसानों को उनकी फसल के बेहतर दाम मिलेंगे। खुदरा बाजार में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश पर मंत्रिमंडल के फैसला लेने के बाद वाणिज्य मंत्री आनंद शर्मा का कहना था कि आने वाले एक साल में खुदरा व्यापार में एक ब्रांड की श्रेणी में लाखों डॉलर का विदेशी पूंजी निवेश भारत आएगा। वाणिज्य मंत्री का यह भी कहना है कि एक से ज्यादा ब्रांड की श्रेणी में दस करोड़ डॉलर के न्यूनतम निवेश का नियम है। हमें उम्मीद है कि इसमें भी भारी मात्रा में निवेश किया जाएगा। सरकार यह भी तर्क दे रही है कि खुदरा कारोबार में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश की नीति से किसानों, उपभोक्ताओं और छोटे व्यापारियों को फायदा होगा और इससे देश के मूलभूत ढांचे को बेहतर करने का अवसर मिलेगा। इतना ही नहीं, सरकार का यह भी कहना है कि इससे उत्पादन क्षेत्र और एग्रो प्रोसेसिंग क्षेत्र में करीब एक करोड़ नौकरियों के अवसर भी आएंगे और कुल निवेश के पचास फीसदी को भंडार बनाने और माल की ढुलाई में लगाना होगा। खुदरा कारोबार के क्षेत्र में मनमोहन सरकार के अपने तर्क हो सकते हैं, लेकिन सबसे बड़ा सवाल यह है कि इतना बड़ा फैसला लेने के पहले क्या सरकार को विपक्षी दलों को भरोसे में नहीं लेना चाहिए था? देश में लोकतंत्र है और जनसंचार माध्यमों के जरिये जनता से रायशुमारी करना कोई मुश्किल काम नहीं रह गया है तो इस फैसले के पहले सरकार ने जनता से उसकी राय जानने की कोशिश क्यों नहीं की? दस लाख से ज्यादा आबादी वाले शहरों में इन विदेशी दुकानों को खोलने का प्रावधान है तो क्या ऐसे में सभी राज्यों के मुख्यमंत्रियों से सरकार को बात नहीं करनी चाहिए थी? इस पूरे मामले में संसद में गतिरोध को लेकर अब सरकार विपक्ष पर दोष मढ़ने की कोशिश कर रही है, लेकिन यह सरकार की भी जिम्मेदारी बनती है कि राष्ट्रीय हित से जुड़े बड़े नीतिगत मसलों पर कोई भी फैसला विपक्षी दलों के साथ राय-मशविरा करके ही करे। विपक्ष की बात तो दूर, खुद कांग्रेस के अंदर भी इस मुद्दे पर मतभेद बरकरार है। केरल कांग्रेस के अध्यक्ष रमेश चेन्निथला और उत्तर प्रदेश से कांग्रेस सांसद संजय सिंह ने भी इस फैसले का खुलकर विरोध किया है। उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री मायावती ने भी इस फैसले का विरोध किया है और उनका कहना है कि उनकी सरकार प्रदेश में इस निर्णय को लागू नहीं होने देंगी तथा उनकी पार्टी इसका संसद से लेकर सड़क तक विरोध करेगी। उड़ीसा, मध्य प्रदेश, बिहार और दूसरे राज्यों में भी खुदरा कारोबार में विदेशी निवेश को लेकर विरोध के स्वर सुनाई दे रहे हैं। बाबा रामदेव और अन्ना हजारे जैसे लोगों ने भी सरकार के इस फैसले का विरोध किया है। बाबा रामदेव का कहना है कि प्रधानमंत्री किराना में विदेशी दुकानों की वकालत इस तरह कर रहे हैं, जैसे वह वॉलमार्ट के प्रेसीडेंट हों। सवाल विपक्षी दलों या फिर बाबा रामदेव और अन्ना हजारे के विरोध का नहीं, बल्कि खुदरा क्षेत्र से जुड़े छोटे कारोबारियों और आम जनता के हित का है। सरकार में बैठे लोग यह भी तर्क दे रहे हैं कि खुदरा व्यापार के लिए कई दूसरे देशों ने भी अपने दरवाजे खोल दिए हैं। सीधी-सी बात है कि हम अमेरिका और ब्रिटेन जैसे देशों की आर्थिक नीतियों को आंख मूंदकर अपने देश में लागू नहीं कर सकते। हमारे देश की आर्थिक नीति हमारे मौजूदा प्राकृतिक संसाधनों और मानव संसाधनों पर आधारित होनी चाहिए। इसमें कोई दो मत नहीं कि 1991 में औद्योगिक सुधार की शुरुआत का कई क्षेत्रों में सकारात्मक असर भी दिखाई दिया है, लेकिन हमें यह भी देखना होगा कि देश का विकास इस तरह हो कि अमीरी और गरीबी के बीच का फासला बढ़ने के बजाय कम हो सके। प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की यह बात हैरान करने वाली है कि खुदरा कारोबार में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश से आधुनिक टेक्नोलॉजी भारत में आएगी और किसानों को उनकी फसलों के सही दाम मिलेंगे। अंतरिक्ष से लेकर परमाणु विज्ञान के क्षेत्र में अपनी स्वदेशी टेक्नोलॉजी का दुनिया भर में लोहा मनवाने के बाद क्या हिंदुस्तान को खुदरा कारोबार के क्षेत्र में विदेशी टेक्नोलॉजी के लिए दूसरे देशों की तरफ मुंह ताकने की जरूरत है? कृषि उत्पादों की बरबादी रोकने के लिए क्या हमें किसी वॉलमार्ट की जरूरत है? किसान भाइयों को फसल के वाजिब दाम मिले, इसके लिए क्या हम कोई व्यवस्था विकसित नहीं कर सकते और इसके लिए भी हमें विदेशी कंपनियों को भारत लाने की जरूरत पड़ेगी? आम आदमी के हितों की बात करने वाली सरकार के लिए क्या यह शर्म की बात नहीं है कि अनाज भंडारण की सही व्यवस्था नहीं होने की वजह से हजारों टन अनाज सड़ जाता है? एक तर्क यह भी दिया जा रहा है कि किराने की ये विदेशी दुकानें सिर्फ उन्हीं शहरों में खुलेंगी, जिनकी आबादी दस लाख या उससे ऊपर होगी और हिंदुस्तान में ऐसे शहरों की संख्या 53 हैं। क्या यह माना जाए कि दस लाख या उससे ऊपर की आबादी वाले इन शहरों में गरीबी रेखा के नीचे रहने वाले लोग नहीं रहते हैं? और यदि ऐसा नहीं है तो क्या वॉलमार्ट जैसी खुदरा कंपनियां दिन भर मजदूरी कर शाम को खाना पकाने के लिए पांच रुपये या दस रुपये का तेल खरीदने वाले की जरूरतों को पूरा कर पाएंगी? क्या इन शहरों में छोटे-छोटे किराना व्यापारी या रेहड़ी लगाकर अपना सामान बेचने वाले बरबाद नहीं हो जाएंगे? आज आवश्यकता इस बात की है कि सरकार देश में औद्योगिक निवेश का बेहतर माहौल बनाने की कोशिश करे ताकि देश में सकल घरेलू उत्पाद की दशा सुधारकर हम अपनी अर्थव्यवस्था को मजबूत बना सकें और इसके लिए हमें किसी वॉलमार्ट या टेस्को की तरफ नहीं देखना पड़े। खुदरा कारोबार में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश के मसले पर सरकार को आम जनता के हितों को ध्यान में रखते हुए संजीदगी से सोचने की जरूरत है। वैसे भी राष्ट्रीय हित से जुड़े किसी भी मसले या फैसले को सरकार को अपनी प्रतिष्ठा का प्रश्न नहीं बनाना चाहिए। (लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं)

एफडीआई के फैसले पर मनमोहन अडिग


खुदरा व्यापार में एफडीआई को लेकर सरकार अपने फैसले से पीछे हटने को तैयार नहीं हैं। प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने संसद में गतिरोध गहराने के बीच अपने सहयोगी दलों से स्पष्ट कह दिया है कि इस फैसले को वापस लेना मुश्किल है और यदि इस मुद्दे पर कोई मत विभाजन हो तो सहयोगियों को सरकार के पक्ष में मतदान करना चाहिए। सहयोगी दल भी अपने फैसले से पीछे हटने को तैयार नहीं हैं, लेकिन रुख में नरमी जरूर आई है। वहीं इस मुद्दे पर पांचवें दिन विपक्ष के हंगामे के कारण संसद के दोनों सदनों में बृस्पतिवार को भी कोई कामकाज नहीं हुआ। शीतकालीन सत्र का बृहस्पतिवार को आठवां दिन भी हंगामे की भेंट चढ़ गया। इसी बीच कांग्रेस ने विपक्ष को चेतावनी दे डाली है कि अगर वह सरकार के फैसले से सहमत नहीं है तो वह संसद में अविास प्रस्ताव ला सकता है। प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने इस मुद्दे पर सहयोगी दलों को एक मंच पर लाने के प्रयास तेज कर दिए लेकिन तृणमूल कांग्रेस सरकार के इस विवादास्पद फैसले को वापस लेने पर अड़ी है। जबकि द्रमुक इस मुद्दे पर संसद में चर्चा कराने के पक्ष में है। सूत्रों के अनुसार तृणमूल कांग्रेस के सुदीप बंधोपाध्याय ने इस बैठक में साफ किया कि इस फैसले पर पार्टी के रुख में कोई बदलाव नहीं आया है तथा इस मसले पर लोकसभा में मत विभाजन की नौबत आने पर पार्टी इस बारे में कोई फैसला करेगी। तृणमूल, द्रमुक, राकांपा, नेशनल कांफ्रेंस और आईयूएमएल के नेताओं ने बैठक में शिरकत की। प्रधानमंत्री और यूपीए के संकटमोचक माने जाने वाले प्रणव मुखर्जी ने संभवत: सहयोगी दलों से कहा है कि आर्थिक हालात काफी मुश्किल हैं और जीडीपी विकास दर को लेकर कई चिन्ताएं हैं। तृणमूल कांग्रेस के नेता सुदीप बंदोपाध्याय के मुताबिक मनमोहन सिंह और प्रणव मुखर्जी ने सहयोगी दलों के नेताओं से कहा है कि यह फैसला कैबिनेट ने मुश्किल हालात में लिया था और इससे हटना मुश्किल होगा। फैसले को वापस लेने पर अड़ी तृणमूल के संसदीय दल के नेता बंदोपाध्याय ने हालांकि कहा कि उनकी पार्टी नहीं चाहती है कि सरकार गिरे।
हालांकि कहा कि मुखर्जी, जो लोकसभा के नेता भी हैं, ने उन्हें बताया है कि निन्दा प्रस्ताव अविास प्रस्ताव नहीं है लेकिन यदि ये पारित हो जाए तो सरकार की विसनीयता पर गहरी चोट पहुंचती है। वे इस मुद्दे पर संसद में चर्चा भी चाहते हैं। द्रमुक हालांकि अपने रुख में कुछ नरमी लाता दिख रहा है। पार्टी नेता टीआर बालू ने संभवत: प्रधानमंत्री से कहा है कि यदि मत विभाजन हुआ तो वह पार्टी प्रमुख एम. करुणानिधि से इस बारे में सलाह मशविरा कर पार्टी के रुख से सरकार को अवगत कराएंगे। इस बीच एक फामरूले की भी बात चल रही है, जिसके मुताबिक सहयोगी दल संसद में सरकार का समर्थन करेंगे लेकिन स्पष्ट करेंगे कि वे अपने शासन वाले राज्यों में इस नीति को लागू नहीं करेंगे। ऐसी खबरें भी हैं कि यदि मत विभाजन हुआ तो तृणमूल के सांसद शायद सदन से अनुपस्थित रहें लेकिन द्रमुक और तृणमूल नेताओं ने इस बारे में पूछे गए सवालों को टाल दिया। नेशनल कांफ्रेंस के अध्यक्ष फारूक अब्दुल्ला ने बैठक के बाद पत्रकारों से बातचीत नहीं की। द्रमुक सांसद तिरुचि शिवा ने कहा कि इस मुद्दे पर संसद में मत विभाजन का अभी सवाल ही नहीं उठता। एफडीआई के फैसले का कड़ा विरोध कर चुके द्रमुक प्रमुख एम. क रुणानिधि ने कहा था कि यदि कार्यस्थगन प्रस्ताव मंजूर होता है तो पार्टी तय करेगी कि मत विभाजन में किस तरह मतदान करना है। हालांकि संसद परिसर में पार्टी सांसद टी. शिवा ने संवाददाताओं को बताया कि द्रमुक खुदरा क्षेत्र में एफडीआई पर संसद में चर्चा चाहता है। संसद में भी सरकार और विपक्ष के बीच गतिरोध और बढ़ता जा रहा है। इस मुद्दे को लेकर लगातार पांचवें दिन संसद के दोनों सदनों की कार्यवाही एक बार के स्थगन के बाद दोपहर 12 बजे दिनभर के लिए स्थगित कर दी गई। संसद का शीतकालीन सत्र शुरू हुए आठ दिन हो चुके हैं लेकिन एफडीआई , मुल्लापेरियार बांध, अलग तेलंगाना राज्य जैसे मुद्दों को लेकर लोकसभा और राज्यसभा में एक भी दिन प्रश्नकाल नहीं चला और न ही कोई अन्य सरकारी कामकाज निपटाया जा सका है। हालांकि सरकार और कांग्रेस ने उम्मीद जताई है कि सत्ताधारी गठबंधन के पास संख्या बल की कमी नहीं है और उसने अविास प्रस्ताव को लेकर विपक्ष को चुनौती भी दी है। कांग्रेस प्रवक्ता राशिद अल्वी ने विपक्ष को चुनौती दी है कि यदि उसे लगता है कि सरकार के पास अपेक्षित बहुमत नहीं है तो वह अविास प्रस्ताव लाकर दिखाए। उधर संसदीय कार्य मंत्री पवन कुमार बंसल ने विास जताया कि सरकार के पास बहुमत है । मुझे यकीन है कि सरकार के पास बहुमत है । मौका आएगा तो आप देखेंगे।उन्होंने हालांकि इस मुद्दे पर किसी भी सवाल का जवाब देने से इनकार कर दिया। दिनेश त्रिवेदी ने कैबिनेट बैठक में नहीं लिया हिस्सा नई दिल्ली (एजेंसी)। खुदरा क्षेत्र में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (एफडीआई) की अनुमति देने के सरकार के फैसले पर तृणमूल कांग्रेस की अप्रसन्नता की पृष्ठभूमि में रेल मंत्री दिनेश त्रिवेदी ने बृहस्पतिवार को कैबिनेट की बैठक में हिस्सा नहीं लिया। बैठक में उनके शिरकत नहीं करने के बारे में आधिकारिक तौर पर कुछ भी कारण नहीं बताया गया। कैबिनेट में तृणमूल कांग्रेस का प्रतिनिधित्व करने वाले त्रिवेदी एकमात्र मंत्री हैं। उनकी पार्टी के एक वरिष्ठ नेता ने कहा, ‘इसका कोई निजी कारण हो सकता है क्योंकि पार्टी ने उन्हें कैबिनेट की बैठक में शिरकत नहीं करने का कोई निर्देश नहीं दिया था।त्रिवेदी ने कैबिनेट की पिछली बैठक में एफडीआई के फैसले का विरोध किया था।

एफडीआइ से फिर गुलाम बन जाएगा भारत : अन्ना


जनलोकपाल बिल और भ्रष्टाचार विरोध की नई जंग छेड़ने का आह्वान कर चुके अन्ना हजारे ने सरकार के खिलाफ बुधवार को नया मोर्चा खोल दिया। खुदरा क्षेत्र में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश के फैसले की आलोचना करते हुए हजारे ने कहा, यह देशवासियों को गुलामी की तरफ ले जाएगा और सरकारी दावों के विपरीत इससे किसानों को फायदा नहीं होगा। अन्ना हजारे ने बुधवार को रालेगण सिद्धि में बुधवार को संवाददाता सम्मेलन में कहा, एफडीआइ को लेकर पिछले कई दिनों से संसद ठप है, छोटे कारोबारी परेशान हैं। अगर लोग कह रहे हैं कि प्रत्यक्ष विदेशी निवेश नहीं होना चाहिए तो आखिर क्यों आप जोर दे रहे हैं। उन्होंने कहा, ब्रिटिश व्यापार के लिए भारत आए और दो सौ साल से ज्यादा समय तक हम पर राज किया, हमें गुलाम बनाया। क्या आप इसकी पुनरावृत्ति चाहते हैं। हजारे ने कहा, विदेशी निवेशक आब- ओ-हवा बिगाड़ देंगे। सरकार को इस पर विचार करना चाहिए। गांधीवादी नेता ने कहा, अगर सरकार किसानों के कल्याण को लेकर इतनी ही गंभीरता बरतती तो आजादी के 65 साल बाद भी किसान आत्महत्या नहीं करते। उन्होंने कहा, वह इस मुद्दे पर राजनीतिक दलों के बीच आम सहमति की हिमायत करते हैं।

अर्थव्यवस्था की रफ्तार


अर्थव्यवस्था की रफ्तार में गिरावट से परेशान उद्योग जगत ने सरकार को त्राहिमाम संदेश भेजा है। इंडिया इंक ने सरकार को याद दिलाया है कि सुस्ती के लिए बहुत हद तक घरेलू वजहें ही जिम्मेदार रही हैं। इसलिए इनका इलाज भी घरेलू स्तर पर ही होनी चाहिए। इंडिया इंक ने सरकार से आग्रह किया है कि मंदी से बाहर निकालने के लिए ब्याज दरों को घटाए और फैसले लेने में देरी नहीं करे। उद्योग चैंबर सीआइआइ के महानिदेशक चंद्रजीत बनर्जी का कहना है कि अर्थव्यवस्था के हर क्षेत्र में नए निवेश का आना बंद हो चुका है। अगर सरकार की तरफ से निवेश बढ़ाने के उपाय नहीं किए गए, तो अर्थव्यवस्था पर सुस्ती के बादल और गहरा सकते हैं। इस मंदी को खत्म करने का काम घरेलू नीति निर्माता ही कर सकते हैं। हाल ही में सरकार ने कुछ महत्वपूर्ण फैसले किए हैं और यह रफ्तार बनी रहनी चाहिए। उद्योग संगठन एसोचैम के महासचिव डीएस रावत ने मांग की है कि रिजर्व बैंक को बगैर किसी देरी के अब ब्याज दरों में कटौती का सिलसिला शुरू कर देना चाहिए। अगर अभी भी नई मैन्यूफैक्चरिंग नीति को तेजी से लागू किया जाए, तो चालू वित्त वर्ष 2011-12 के दौरान 7.5 फीसदी की आर्थिक विकास दर हासिल की जा सकती है। उद्योग चैंबर फिक्की के महासचिव राजीव कुमार को आशंका है कि दूसरी छमाही और आगामी वित्त वर्ष 2012-13 में भी हालात बहुत नहीं सुधरेंगे। उन्होंने कहा कि इस बात के ठोस संकेत हैं कि चालू वित्त वर्ष में आर्थिक विकास दर 7.3 फीसदी या इससे भी कम रहेगी। मौजूदा हालात से निकलने के लिए सरकार के साथ ही रिजर्व बैंक को भी तत्काल कदम उठाने होंगे। कुमार का आकलन है कि अर्थव्यवस्था में स्थायी पूंजी का निर्माण बिलकुल थम गया है। यह काफी खतरनाक संकेत है। जाहिर है कि पूरा उद्योग जगत परोक्ष या प्रत्यक्ष तौर पर मौजूदा मंदी के लिए रिजर्व बैंक की कठोर मौद्रिक नीति को जिम्मेदार ठहरा रहा है। 

पेट्रोल 78 पैसे सस्ता


पेट्रोल की कीमतों में 78 पैसे प्रति लीटर की कटौती की गई है जो दो सप्ताह में दूसरी कटौती है। कीमतों में कमी मध्यरात्रि से प्रभावी हो गई। हालांकि, पेट्रोल के दाम एक रुपए प्रति लीटर घटाए जाने का अनुमान था। लेकिन पिछले दो दिनों में वैिक बाजारों में कच्चे तेल की कीमतों में आई तेजी और रुपए में गिरावट के चलते तेल कंपनियों ने 78 पैसे की ही कटौती की। इस कटौती के बाद, दिल्ली में पेट्रोल की कीमत 65.64 रुपए प्रति लीटर हो जाएगी जो इस समय 66.42 रुपए लीटर है। इससे पहले, कंपनियों ने 16 नवम्बर को पेट्रोल के दाम 2.22 रुपए लीटर कम किए थे। उल्लेखनीय है कि सरकार ने जून, 2010 में पेट्रोल की कीमतों के निर्धारण पर से नियंतण्रहटा लिया था। कीमतों में कटौती की घोषणा करते हुए इंडियन ऑयल ने कहा कि रुपया में कमजोरी के मुकाबले वैिक बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में नरमी अधिक रहने की वजह से ही पेट्रोल के दाम घटाए जा सके। हालांकि इससे पहले तेल कंपनियों ने 4 नवम्बर को पेट्रोल के दाम 1.80 रुपए प्रति लीटर बढ़ा दिए थे।
शहर पुराने दाम नए दाम दिल्ली Rs66.42 Rs65.64 कोलकाता Rs70.84 Rs70.02 मुंबई Rs71.47 Rs70.65 चेन्नई Rs70.38 Rs69.55 चार महानगरों में दाम


शुरू हो गई मंदी की उलटी गिनती


मंदी फिर दस्तक दे रही है। बेकाबू महंगाई, ऊंची ब्याज दरें और फैसले लेने की सुस्त रफ्तार ने अर्थव्यवस्था को मंदी की तरफ धकेल दिया है। वित्त वर्ष की दूसरी तिमाही में आर्थिक विकास की दर और नीचे चली गई है। खनन और मैन्यूफैक्चरिंग उद्योग के बेहद खराब प्रदर्शन ने सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) की विकास दर को 6.9 प्रतिशत पर ला दिया है। पिछली नौ तिमाहियों में अर्थव्यवस्था की यह सबसे धीमी रफ्तार है। इस पर अक्टूबर महीने में आठ बुनियादी उद्योगों की रफ्तार भी शून्य के करीब पहुंच गई है। धीमी रफ्तार को देखते हुए सरकार ने वित्त वर्ष 2011-12 के लिए अर्थव्यवस्था की रफ्तार का अनुमान भी घटाकर 7.3 प्रतिशत कर दिया है। दूसरी तिमाही में जीडीपी के अनुमानित आंकड़ों ने साफ कर दिया है कि अर्थव्यवस्था की रफ्तार लगातार कम हो रही है। सबसे ज्यादा झटका खनन और मैन्यूफैक्चरिंग क्षेत्र ने दिया है। पर्यावरणीय मुद्दों पर सरकार में एक राय नहीं हो पाने के चलते खनन उद्योग का उत्पादन दूसरी तिमाही में शून्य से भी 2.9 प्रतिशत नीचे चला गया। वहीं मैन्यूफैक्चरिंग क्षेत्र की रफ्तार भी बेकाबू महंगाई ऊंची ब्याज दरों के चलते 2.7 प्रतिशत पर सिमट गई है। रिजर्व बैंक अब तक मार्च 2010 के बाद नीतिगत ब्याज दरों में 13 बार वृद्धि कर चुका है। अर्थव्यवस्था में सुस्ती का आलम इस साल की शुरुआत से ही दिखने लगा था। पहली तिमाही में खनन उद्योग की रफ्तार 1.8 प्रतिशत और मैन्यूफैक्चरिंग की 2.7 प्रतिशत रही थी। कृषि क्षेत्र का प्रदर्शन भी दूसरी तिमाही में उम्मीदों से परे रहा है। यह पहली तिमाही के 3.9 प्रतिशत से घटकर 3.2 प्रतिशत पर आ गया है। हालांकि, कृषि क्षेत्र की तस्वीर खरीफ और रबी के पूरे आंकड़े आने के बाद ही साफ होगी। अर्थव्यवस्था की धीमी होती रफ्तार ने सरकार की चिंताएं भी बढ़ा दी हैं। इसे देखते हुए सरकार को भी अर्थव्यवस्था की वृद्धि के अपने पूर्व के 7.6 प्रतिशत के अनुमान को घटाने पर मजबूर होना पड़ा है। वित्त मंत्री प्रणब मुखर्जी ने कहा कि पिछली दो तिमाहियों के रुझान को देखते हुए वर्ष 2011-12 में जीडीपी वृद्धि दर 7.3 प्रतिशत रहने की अपेक्षा है। बीते वित्त वर्ष में जीडीपी वृद्धि दर 8.5 प्रतिशत रही थी। मुखर्जी ने कहा कि हमारे समक्ष कई तरह की समस्याएं हैं। यूरोप व अमेरिका में कमजोर वृद्धि, देश के भीतर और बाहर की समस्याएं। बुनियादी उद्योगों की अक्टूबर महीने की रफ्तार ने भविष्य की तस्वीर को और धुंधला कर दिया है। इस महीने आठ बुनियादी उद्योगों की वृद्धि दर मात्र 0.1 प्रतिशत तक नीचे आ गई है। पिछले साल इसी महीने में यह 7.2 प्रतिशत थी। आठ में पांच उद्योगों की वृद्धि दर शून्य से भी नीचे चली गई है। अर्थव्यवस्था की खराब होती हालत ने अगले वित्त वर्ष के लिए भी चिंताएं बढ़ा दी हैं। वैश्विक अर्थव्यस्था में बन रहे हालात को देखते हुए जानकार 2012-13 में स्थिति और खराब होती देख रहे हैं। इनका मानना है कि घरेलू खपत में वृद्धि के उपाय नहीं किए गए स्थितियों को संभालना मुश्किल होगा।

सरकारी सुस्ती से गिरी विकास दर


वित्त वर्ष की दूसरी तिमाही में आर्थिक विकास की दर और नीचे चली गई है। खनन व मैन्यूफैक्चरिंग उद्योग के बेहद खराब प्रदर्शन ने जीडीपी यानी सकल घरेलू उत्पाद की विकास दर को 6.9 फीसदी पर ला दिया है, जो कि पिछली नौ तिमाहियों में सबसे धीमी रफ्तार है। अक्टूबर माह में आठ बुनियादी उद्योगों की रफ्तार भी शून्य के करीब पहुंच गई है। इसी के मद्देनजर सरकार ने वित्त वर्ष 2011-12 के लिए अर्थव्यवस्था की रफ्तार का अनुमान भी घटाकर 7.3 फीसदी कर दिया है। अर्थव्यवस्था को मंदी की तरफ ढकेलने में सरकार की सुस्ती भी जिम्मेदार रही है? अगर केंद्र सरकार ने इन दोनों औद्योगिक क्षेत्रों से संबंधित मुद्दों पर फैसले लेने में तेजी दिखाई होती तो अर्थव्यवस्था की रफ्तार में थोड़ी तेजी आ सकती थी। वित्त मंत्रालय के प्रमुख आर्थिक सलाहकार कौशिक बसु ने भी स्वीकारा है कि सरकार के स्तर पर फैसले लेने में हो रही देरी इस सुस्ती की एक प्रमुख वजह है। बसु से पहले मुकेश अंबानी, अजीम प्रेमजी, दीपक पारेख समेत तमाम दिग्गज उद्योगपति और कई अर्थविद भी सरकार पर फैसले लेने में देरी करने का आरोप लगा चुके हैं। माना जाता है कि भ्रष्टाचार और काले धन पर विपक्षी हमले से परेशान मनमोहन सरकार ने जनवरी, 2011 से लेकर सितंबर, 2011 तक कोई अहम फैसला नहीं किया। बाद में प्रमुख उद्योगपतियों ने वित्त मंत्री से मुलाकात कर हालात बताए, फिर भी स्थिति बहुत नहीं सुधर पाई है। दूसरी तिमाही में सकल घरेलू उत्पाद की वृद्धि दर में गिरावट को नीचे लाने के लिए मैन्यूफैक्चरिंग और खनन क्षेत्र जिम्मेदार रहे हैं। जानकारों का कहना है कि समय पर फैसला नहीं लेने का सबसे ज्यादा खामियाजा इन दोनों क्षेत्रों को ही भुगतना पड़ा है। मसलन, सारी तैयारियों के बावजूद नई मैन्यूफैक्चरिंग नीति को लागू करने में 10 माह की देरी हो गई। महंगाई रोकने में सरकार की नाकामी की वजह से ब्याज दरें बढ़ानी पड़ी जिससे उद्योग जगत की स्थिति और खराब हुई है। एक तो महंगाई नहीं रोकी जा सकी और दूसरा बढ़े ब्याज दरों का बोझ भी आम जनता व उद्योग जगत पर पड़ा। सरकार को मालूम है कि पर्यावरण मामलों की वजहों से खनन परियोजनाएं ठप हैं। हालांकि पीएम की अध्यक्षता में इस मुद्दे पर तेज गति से फैसला करने के लिए एक समिति भी गठित की गई, लेकिन जमीनी तौर पर इसका असर नहीं हो पाया।