नई दिल्ली घरेलू अर्थव्यवस्था की सुस्ती से निबटने की तैयारी में जुटे भारतीय उद्योग जगत के सिर पर अब अमेरिकी कर्ज संकट का खतरा मंडराने लगा है। इंडिया इंक का मानना है कि अगर इस संकट पर समय रहते काबू नहीं पाया गया तो यह अर्थव्यवस्था को वर्ष 2008-09 की ग्लोबल मंदी से भी ज्यादा डगमगा सकता है। ये हालात रत्न व आभूषण, टेक्सटाइल, चमड़ा, आइटी जैसे क्षेत्रों से जुड़ी कंपनियों के प्रदर्शन पर काफी बुरा असर डाल सकते हैं। उद्योग चैंबर फिक्की ने मौजूदा संकट पर एक सर्वे जारी किया है। इसके मुताबिक, उद्योपतियों ने निर्यात पर सबसे ज्यादा असर पड़ने की आशंका जताई है। सर्वे से यह बात भी सामने आती है कि वर्ष 2008-09 की तरह इस बार भारतीय निर्यातक चीन और जापान के बाजार से भरपाई नहीं कर सकेंगे। वर्ष 2011 में जापान की अर्थव्यवस्था में 0.5 फीसदी की गिरावट के आसार हैं, जबकि अमेरिकी ऋण संकट से चीन की अर्थव्यवस्था की रफ्तार भी सुस्त होने की संभावना है। यूरोपीय देशों की मांग में सुधार आने के भी लक्षण नहीं हैं। ऐसे में निर्यात में हाल के महीनों में दर्ज तेजी थम सकती है। सीआइआइ के महानिदेशक चंद्रजीत बनर्जी ने दैनिक जागरण को बताया कि अमेरिका एक ऐसी अर्थव्यवस्था है, जिसमें कुछ भी होता है तो उसका असर भारत सहित तमाम विकासशील देशों पर पड़ना तय है। लेकिन यह असर किस तरह से पड़ेगा, इसका आकलन करने में समय लगेगा। मसलन, इस संकट की वजह से अगर रुपया डॉलर की तुलना में मजबूत होता है तो इसके सकारात्मक और नकारात्मक असर दोनों पड़ेंगे। इसी तरह से अगर अमेरिका अपनी मौद्रिक नीतियों में कुछ बदलाव करता है तो इसका सीधा असर भारत में होने वाले निवेश पर पड़ेगा। हो सकता है कि बहुत सारे फंड भारत की तरफ आकर्षित हो जाएं, इसका भी दूरगामी प्रभाव पड़ेगा। अमेरिकी बाजार से सीधे तौर पर जुड़ी देश की आइटी कंपनियां भी दम साधे पूरी स्थिति पर नजर रख रही हैं। आइटी उद्योग के शीर्ष संगठन नासकॉम के एक अधिकारी ने बताया, वर्ष 2008-09 की ग्लोबल मंदी के समय हमने यूरोप और जापान के बाजार में पहुंच बढ़ाकर राहत पाने की कोशिश की थी। लेकिन इस बार तो अमेरिका से ज्यादा इन दोनों के हालात खराब हैं। यही स्थिति टेक्सटाइल निर्यातकों की हो सकती है। ताजा आंकड़ों के मुताबिक, अमेरिका भारत के कुल टेक्सटाइल निर्यात का 20 फीसदी आयात करता है। कर्ज संकट से निकलने के लिए अमेरिकी सरकार खर्चो में कटौती करने जा रही है। इससे व्यक्तिगत व कॉरपोरेट खर्चो में भी कमी होने की आशंका जताई जा रही है।
Tuesday, August 9, 2011
चीन पर भारी पड़ेगी खस्ता अमेरिकी साख
, नई दिल्ली अमेरिका के कर्ज संकट और साख चौपट होने का सबसे पहला शिकार चीन हो सकता है। अमेरिकी सरकार के ट्रेजरी बिलों में 1.6 ट्रिलियन डॉलर का निवेश रखने वाला चीन अमेरिका को सबसे ज्यादा कर्ज देता है। अमेरिकी कर्ज की साख गिरने से चीन के निवेश कीमत घट जाएगी। इसलिए राष्ट्रपति ओबामा को सबसे कड़वी नसीहत चीन ने दी है। डॉलर को दुनिया की केंद्रीय करेंसी के ओहदे से बेदखल करने के लिए चीन की मुहिम अब और तेज होने वाली है। भारत, रूस, ब्राजील, दक्षिण अफ्रीका के रुख इस संदर्भ में निर्णायक साबित होंगे। सोमवार को बाजार खुलने के बाद दुनिया के निवेशक चीन के कदमों पर करीबी निगाह रखेंगे। ट्रिपल ए क्लब से बाहर होने के बाद अब दुनिया में फ्रांस, जर्मनी, कनाडा, ब्रिटेन और ऑस्ट्रेलिया के पास यह ताज बचा है। बाजार मान रहा है कि चीन अपना कुछ निवेश इन बांडों में ले जा सकता है। मगर इसके लिए चीन बाजार में अमेरिकी बांडों की बिकवाली करेगा, जो घबराहट को पंख देगी। अमेरिका में संकट को लेकर चीन की चिंताएं कर्ज से परेशान यूरोप व राजनीतिक संकट के शिकार मध्य पूर्व से ज्यादा बड़ी हैं। इसलिए चीन ने आधिकारिक तौर पर कहा कि अमेरिका के लिए कर्ज के दिन अब लद चुके हैं। उसे अपना हिसाब- किताब ठीक करना चाहिए। चीन की समस्या यह है कि उसके पास 3,000 अरब डॉलर का दुनिया सबसे बड़ा डॉलर भंडार है। अमेरिका की साख गिरने और डॉलर की कीमत घटने से इस भंडार का मूल्य घटेगा। यही वजह है कि चीन ने दुनिया के लिए नई अंतरराष्ट्रीय करेंसी की मुहिम शुरू की है। चीन जिस ब्रिक समूह का सदस्य है, वह पहले ही तय कर चुका है कि ब्रिक देशों का आपसी कारोबार अब उनकी अपनी मुद्रा में होगा। ताजा संकट के बाद डॉलर को बेदखल करने की ब्रिक की मुहिम तेज हो सकती है। इस समूह में भारत, रूस और ब्राजील भी शामिल हैं।
देश का पौने दो लाख करोड़ दांव पर
अमेरिका को कर्ज देने वाले 15 प्रमुख देशों में भारत भी शामिल है। अमेरिका के बढ़ते कर्ज में भारत की हिस्सेदारी करीब 1.83 लाख करोड़ रुपये (41 अरब डॉलर ) है। यह फ्रांस और ऑस्ट्रेलिया जैसे देशों से भी ज्यादा है। अमेरिका के कुल 15,000 अरब डॉलर के कर्ज में 45,00 अरब डॉलर का ऋण विदेश से लिया गया है। ये कर्ज अमेरिकी सरकार के ऋण प्रतिभूतियों (सिक्योरिटी) के जरिये दिए गए हैं। रिजर्व बैंक विदेशी मुद्रा भंडार के तहत अमेरिकी सरकारी प्रतिभूतियां डॉलर होल्डिंग एकाउंट में रखता है। यह उसके कुल पोर्टफोलियो का करीब 10 प्रतिशत है। अमेरिकी वित्त विभाग के अनुसार अमेरिका सरकार को सबसे अधिक कर्ज चीन ने दिया है। भारत ने अमेरिकी प्रतिभूतियों में 41 अरब डॉलर का निवेश कर रखा है। इस तरह अमेरिका को कर्ज देने वाले देशों की सूची में भारत 14वें स्थान पर है। स्टैंडर्ड एंड पुअर्स (एसएंडपी) द्वारा अमेरिका की संप्रभु रेटिंग एएए यानी ट्रिपल ए से घटाकर एए प्लस करने के बाद रिजर्व बैंक भी कुछ कदम उठा सकता है। केंद्रीय बैंक उन्हीं देशों की ऋण प्रतिभूतियां खरीदने और रखने की अनुमति देता है, जिन्हें ट्रिपल ए रेटिंग मिली है। 41 अरब डॉलर की कुल ऋण प्रतिभूतियों में बहुलांश हिस्सेदारी रिजर्व बैंक के पास है। इसके अलावा कुछ बैंकों का भी पैसा वहां फंसा हो सकता है। सूत्रों के मुताबिक, रिजर्व बैंक अमेरिका में कर्ज संकट के बावजूद पिछले करीब एक साल में अमेरिकी प्रतिभूति खरीदता रहा है। भारत ने बीते एक साल में करीब 10 अरब डॉलर की अतिरिक्त अमेरिकी सरकारी प्रतिभूतियां खरीदी हैं।
अति गरीब जिलों की सूची में यूपी-एमपी-बिहार अव्वल
, नई दिल्ली देश के 150 अति गरीब जिलों में उड़ीसा सबसे आगे हैं जहां 18 जिले इस सूची में शामिल हैं, जबकि यूपी, एमपी, बिहार के 15-15 व झारखंड के 14 जिले अति गरीब हैं। ये आंकड़ा योजना आयोग की गरीब जिलों की सूची का है, जोकि सुप्रीम कोर्ट के अति गरीब जिलों को अतिरिक्त अनाज देने के आदेश पर सामने आई है। सुप्रीमकोर्ट ने गत 14 मई को देश के अति गरीब 150 जिलों में 50 लाख टन अतिरिक्त अनाज देने का केंद्र सरकार को आदेश दिया था। इतना ही नहीं कोर्ट ने सरकारों से कहा था कि भूख ने किसी की मौत नहीं होनी चाहिए। गरीबों में अनाज वितरण का काम देख रही सुप्रीमकोर्ट द्वारा गठित जस्टिस डीपी वाधवा की अध्यक्षता वाली विजिलेंस कमेंटी ने योजना आयोग से गरीब जिलों के आंकड़े देने को कहा था। योजना आयोग ने कमेटी को दो सूचियां उपलब्ध कराई हैं। पहली सूची में 150 अति पिछड़े वे जिले हैं जहां काम के बदले अनाज योजना लागू की गई थी। दूसरी 147 पिछड़े जिलों की सूची है जो राष्ट्रीय सम विकास योजना लागू करने के लिए तैयार की गयी थी। सुप्रीम कोर्ट कमेटी ने 147 जिलों की सूची को अतिरिक्त अनाज वितरण के लिए उपयुक्त माना है और उसमें कुछ अन्य जिलों को भी शामिल किया है। कमेटी ने सूची में दिये गये जिलों पर संबंधित राज्यों से गरीबों का आंकड़ा और उसके आधार का ब्योरा मांगा है। साथ ही यह भी पूछा है कि उन्हें कितने और अनाज की जरूरत है। ये सारा ब्योरा सुप्रीमकोर्ट में दाखिल की गयी वाधवा कमेटी की रिपोर्ट में दिया गया है। सुप्रीम कोर्ट इस मामले पर 18 अगस्त को सुनवाई करेगा। देश के गरीब जिलों की तैयार सूची में महाराष्ट्र के 11, छत्तीसगढ़ के 10, आंध्र प्रदेश व पश्चिम बंगाल के 8-8,गुजरात के 6, राजस्थान व असम के 5-5, तमिलनाडु के 4, उत्तराखंड, कर्नाटक व जम्मू कश्मीर के 3-3 तथा हरियाणा और पंजाब राज्य का 1-1 जिला शामिल है। इसके अलावा सिक्किम, त्रिपुरा, केरल, मेघालय, मणिपुर, मिजोरम, नगालैंड का भी 1-1 जिला इस सूची में है। हालांकि योजना आयोग ने साफ किया है कि ऐसा कोई पुख्ता आंकड़ा उसके पास नहीं है जिससे यह कहा जा सके कि सूची में दिए गए जिले ही देश के सबसे गरीब जिले हैं। सुप्रीम कोर्ट में दाखिल वाधवा कमेटी की रिपोर्ट में गरीबों को अनाज मुहैया कराने पर विस्तृत चर्चा के साथ 60 हजार रुपये सालाना आय वालों को बीपीएल श्रेणी में शामिल करने और एक लाख रुपये सालाना से ज्यादा आय वालों को सबसिडी वाले राशन की श्रेणी से बाहर करने के सुझाव तक पर चर्चा की गई है। पिछड़े जिलों की सूची : यूपी : सोनभद्र, उन्नाव, रायबरेली, सीतापुर, हरदोई, फतेहपुर, ललितपुर, लखीमपुर खीरी, बांदा, चित्रकूट, मिर्जापुर, कुशीनगर, महोबा, हमीरपुर और बाराबंकी। बिहार : अररिया, वैशाली, गया, मधुबनी, मुजफ्फरपुर, नवादा, समस्तीपुर, श्योहर, कटिहार, जमुई, लखीसराय, मुंगेर, पुर्णिया, सुपौल,दरभंगा। झारखंड : सरायकेला, सिंघभूमि, गोड्डा, सिमडेंगा, गुमला, छत्रा, गढ़वा, पलामू, लातेहार, लोहरदगा, दुमका, जमतारा, साहेबगंज, पांकुर। जम्मू कश्मीर : डोडा, कुपवाड़ा, पंुछ। हिमाचल: चंबा। पंजाब : होशियारपुर। उत्तराखंड : चंपावत, टिहरी गढ़वाल, चमौली। हरियाणा : सिरसा।
Subscribe to:
Posts (Atom)