विभिन्न राज्यों और मंत्रालयों में सहमति नहीं बन पाने के कारण सरकार अब महत्वपूर्ण खाद्य सुरक्षा विधेयक को संसद के आगामी शीतकालीन सत्र में ही पेश कर पाएगी। खाद्य मंत्री केवी. थॉमस ने बुधवार को यह जानकारी दी। इस विधेयक में सरकार ने देश की 70 फीसदी आबादी को कानूनी तौर पर सस्ता अनाज उपलब्ध कराने का प्रस्ताव किया है। पहले इस विधेयक को संसद के चालू मानसून सत्र में ही पेश किए जाने की उम्मीद थी। थॉमस ने कहा कि फिलहाल इस विधेयक पर विभिन्न राज्यों और मंत्रालयों के साथ विचार-विमर्श चल रहा है। मंत्रियों का अधिकार प्राप्त समूह और कानून मंत्रालय पहले ही विधेयक के मसौदे को मंजूरी दे चुके हैं। उन्होंने कहा कि विधेयक के मसौदे को पिछले शुक्रवार को ही राज्य सरकारों के पास उनकी राय के लिए भेजा गया है। इस प्रक्रिया में कम से कम 15 दिन का समय लगेगा। उसके बाद प्रधानमंत्री राज्यों के मुख्यमंत्रियों की बैठक बुलाएंगे, जिसमें विधेयक के प्रारूप को अंतिम रूप दिया जाएगा। स्वतंत्रता दिवस के मौके पर राष्ट्र के नाम अपने संबोधन में प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने कहा था कि सरकार जल्द ही राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा कानून लाएगी। खाद्य सुरक्षा कानून पर ठीक ढंग से अमल करने के लिए हमें देश का कृषि उत्पादन बढ़ाने की आवश्यकता है। 12 वीं योजना में हम इस दिशा में प्रयास तेज करेंगे। थॉमस ने कहा कि विधेयक में यूपीए अध्यक्ष सोनिया गांधी की अगुवाई वाली राष्ट्रीय सलाहकार परिषद की ज्यादातर सिफारिशों को शामिल किया गया है। यह पूछे जाने पर कि इस विधेयक के दायरे में कितनी आबादी आएगी, खाद्य मंत्री ने कहा कि अभी हम अंतिम आंकड़ों तक नहीं पहुंचे हैं। राष्ट्रीय सलाहकार परिषद ने सुझाव दिया है कि इस कानून के दायरे में 90 प्रतिशत आबादी को लाया जाना चाहिए। वहीं अधिकार प्राप्त मंत्री समूह का कहना है कि इसके दायरे में केवल 75 प्रतिशत ग्रामीण परिवारों को शामिल किया जाना चाहिए
Saturday, August 20, 2011
18 एफडीआइ प्रस्ताव मंजूर
: सरकार ने 122.79 करोड़ रुपये के प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (एफडीआइ) के 18 प्रस्तावों को मंजूरी दी है। इनमें पिपावाव डिफेंस एंड ऑफशोर इंजीनियरिंग का प्रस्ताव भी शामिल है। हालांकि वोडाफोन में एस्सार की हिस्सेदारी बेचने के प्रस्ताव पर निर्णय टाल दिया गया है। वित्त मंत्रालय ने एक बयान में कहा कि विदेशी निवेश संवर्द्धन बोर्ड (एफआइपीबी) ने कुल 39 एफडीआइ प्रस्तावों पर विचार किया है। इसमें से 16 प्रस्तावों पर फैसला टाला गया है। जबकि चार प्रस्ताव खारिज किए गए हैं और एक आवेदक को भारतीय रिजर्व बैंक से संपर्क करने के लिए कहा गया है। एफआइपीबी की पांच अगस्त को हुई बैठक में पिपावाव डिफेंस ऑफशोर इंजीनियरिंग कंपनी के 81.62 करोड़ रुपये के विदेशी निवेश प्रस्ताव को मंजूरी दी गई। आर्थिक मामलों के सचिव आर गोपालन की अगुवाई वाले एफआइपीबी ने एयर वर्क्स इंडिया (इंजीनियरिंग) के भारतीय विमानन कंपनियों में 17.77 करोड़ रुपये के निवेश प्रस्ताव को भी मंजूरी दी। बयान में कहा गया कि वॉल्ट डिज्नी कंपनी के भारत में प्रसारण और डाउनलिंकिंग क्षेत्र में अतिरिक्त गतिविधियों के आवेदन को भी स्वीकार कर लिया गया। इसके अलावा डिश टीवी के शेयरों के हस्तांतरण से अतिरिक्त विदेशी निवेश जुटाने के प्रस्ताव को भी मंजूर किया गया है। गुजरात की ओम पाइल प्राइवेट लिमिटेड के 5.85 करोड़ रुपये के एफडीआइ प्रस्ताव को भी मंजूरी मिल गई है। हालांकि बोर्ड ने दूरसंचार कंपनी वोडाफोन एस्सार में मॉरीशस की दो कंपनियों द्वारा 5.48 प्रतिशत हिस्सेदारी 2,700 करोड़ रुपये में खरीदने के प्रस्ताव पर फैसला टाल दिया है। बोर्ड ने दूरसंचार क्षेत्र में विभिन्न गतिविधियों के संचालन के लिए भारतीयों के शेयर अप्रवासी भारतीयों को हस्तांतरित करने के प्रस्ताव को टाल दिया है। साथ ही एस्सार कैपिटल होल्डिंग्स (इंडिया) द्वारा दूरसंचार क्षेत्र की एक कंपनी में नई हिस्सेदारी खरीदने के प्रस्ताव पर भी फैसला टाल दिया है। पिछली बैठक में एफआइपीबी ने 3,844.7 करोड़ रुपये के 31 एफडीआइ प्रस्तावों को मंजूरी दी थी। बोर्ड विदेशी निवेश के प्रस्तावों को सिंगल विंडों सिस्टम के जरिए मंजूरियां प्रदान कर रहा है। बोर्ड की अगली बैठक दो सितंबर को प्रस्तावित है।
Wednesday, August 17, 2011
महाराष्ट्र और गुजरात में घटेगा प्याज उत्पादन
देश में प्याज के प्रमुख उत्पादक राज्य महाराष्ट्र और गुजरात में कम बरसात के कारण प्याज उत्पादन 20-30 प्रतिशत तक घट सकता है। राष्ट्रीय बागवानी शोध व विकास न्यास (एनएचआरडीएफ) के निदेशक आरके गुप्ता ने बताया कि फसल वर्ष 2010-11 (जुलाई-जून) में करीब 1.40 करोड़ टन प्याज का उत्पादन हुआ था। कम बरसात के कारण महाराष्ट्र, कर्नाटक और गुजरात में प्याज की खरीफ बुआई देर से हुई। इससे बाजार में प्याज आवक पर असर पड़ सकता है। आम तौर पर सितंबर में खरीफ प्याज की आवक होती है। इस बार इसके आने में अक्टूबर के अंत या नवंबर के पहले हफ्ते तक की देरी हो सकती है। गुप्ता ने कहा कि महाराष्ट्र के नाशिक व धूलिया, गुजरात के अहमदनगर व सौराष्ट्र और कर्नाटक के धारवाड़ व हुबली जैसे प्रमुख प्याज उत्पादक क्षेत्रों में कम बरसात हुई। एनएचआरडीएफ के आंकड़ों के अनुसार, इस वर्ष अगस्त से दिल्ली, नाशिक, बेंगलूर, चेन्नई, जयपुर, कोलकाता, मुंबई और पटना में प्याज की कीमतों में औसतन चार-आठ रुपये की बढ़ोतरी हुई है। प्याज के बढ़ते थोक और खुदरा मूल्य पर अंकुश लगाने के लिए सरकार हरकत में आ चुकी है। जून के बाद से प्याज का न्यूनतम निर्यात मूल्य तीन बार बढ़ाया जा चुका है। पिछले हफ्ते ही प्याज निर्यात को हतोत्साहित करने और घरेलू उपलब्धता को बनाए रखने के लिए सरकार ने प्याज के न्यूनतम निर्यात मूल्य को 45 डॉलर प्रति टन बढ़ाकर 275 डॉलर प्रति टन कर दिया था। प्याज की दो उन्नत किस्मों कृष्णापुरम और बेंगलूर रोज की कीमत को 50 डॉलर प्रति टन बढ़ाकर 400 डॉलर प्रति टन कर दिया गया।
सीएसआर में फेल हो रहीं कंपनियां
मुंबई देश की आजादी के 64 साल पूरे हो चुके हैं। अभी भी समाज के उत्थान के लिए बहुत कुछ करने की जरूरत है। सरकार में बैठे लोग अगर भ्रष्टाचार में लिप्त हैं, तो निजी कंपनियां भी अपने सामाजिक दायित्वों को नहीं निभा रही हैं। एक गैर लाभकारी संस्था, कर्मयोग ने कॉरपोरेट सोशल रिस्पॉन्सिबिलिटी (सीएसआर) यानी कंपनी जगत की सामाजिक जिम्मेदारी के आकलन के बाद अपने शोध में यह बात कही है। शोध में स्वतंत्रता के बाद से अब तक की 500 सबसे बड़ी भारतीय कंपनियों का अध्ययन किया गया। अध्ययन में पाया गया कि इन कंपनियों के उद्यमियों में राष्ट्रीय भावना की भी कमी है। कर्मयोग ने अपने शोध में विभिन्न उद्योगों से जुड़ी सार्वजनिक, निजी और बहुराष्ट्रीय कंपनियों को शामिल किया। इनमें उपभोक्ता वस्तुओं, वाहन, आधारभूत संरचना, वित्तीय संस्थान शामिल थे। कर्मयोग सीएसआर स्टडी एंड रेटिंग नाम से किए गए इस अध्ययन के अनुसार एक भी कंपनी गे्रड फाइव हासिल नहीं कर सकी। यह ग्रेड उन कंपनियों को दिया जाता है, जो अपनी कुल बिक्री का 0.2 फीसदी सामाजिक जिम्मेदारियों पर खर्च करते हुए, सामाजिक सरोकारों के प्रति प्रतिबद्धता का प्रदर्शन करती हैं। कंपनियों के उत्पादों के पर्यावरण अनुकूल होने और अपने संयंत्रों के नजदीक रहने वालों से उनके व्यवहार को भी अध्ययन में शामिल किया गया। अध्ययन में केवल दो फीसदी यानी दस कंपनियां ही किसी तरह गे्रड फोर पाने में कामयाब रहीं। जबकि तीस फीसदी कंपनियां यानी 150 सबसे निचले दर्जे पर रहीं। मात्र 13 फीसदी कंपनियां ग्रेड थ्री पा सकीं। इससे संकेत मिलता है कि ये कंपनियां सीएसआर के प्रति कुछ गंभीर हो रही हैं। आइआइटी मुंबई से पढ़े और 2004 में कर्मयोग की स्थापना करने वाले विनय सोमानी का कहना है कि सीएसआर परिदृश्य में पिछले चार वर्षो में ही मुख्य बदलाव आया है, जब केंद्र सरकार ने कुछ माह पहले इसकी संस्तुति की। हार्वर्ड बिजनेस स्कूल से स्नातक विनय का कहना है कि व्यापक जागरूकता से कंपनियों की रिपोर्ट में उनकी सामाजिक गतिविधियां बढ़ी हैं। हालांकि, उन्हें अभी लंबा सफर तय करना है। पिछले वित्त वर्ष में इन सभी कंपनियों ने 37 लाख करोड़ की बिक्री की। जिसके अनुसार 7400 करोड़ रुपये सीएसआर पर खर्च होने चाहिए थे। जबकि खर्च महज 740 करोड़ रुपये ही किए गए।
Tuesday, August 16, 2011
अविकसित व उपेक्षित है हेलीकॉप्टर सेवा उद्योग
नई दिल्ली संचालन संबंधी बुनियादी ढांचे एवं प्रशिक्षण सुविधाओं की कमी की वजह से देश में हेलीकॉप्टर सेवाओं का समुचित विस्तार नहीं हो पा रहा है। अभी भी ज्यादातर वीआइपी उड़ानों के लिए ही हेलीकॉप्टरों का उपयोग हो रहा है। जबकि चिकित्सा और पर्यटन जैसे कई क्षेत्रों में इनके इस्तेमाल की भरपूर संभावनाएं हैं। संसद में पेश परिवहन, पर्यटन एवं संस्कृति संबंधी स्थायी समिति की रिपोर्ट में इस ओर सरकार का ध्यान आकर्षित किया गया है। समिति के मुताबिक इतने बड़े देश में महज 263 हेलीकॉप्टर हैं। इन्हें भी करीने से उड़ाने वालों की कमी है। ज्यादातर हेलीकॉप्टर बाहर से आयात होते हैं। इनकी मरम्मत और रखरखाव के इंतजाम भी अधूरे हैं। हेलीकॉप्टर पायलटों को प्रशिक्षण देने के लिए देश में राष्ट्रीय स्तर की एक भी अकादमी नहीं है। यह काम हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स की आंतरिक अकादमी के भरोसे चलाया जा रहा है। फिलहाल देश में नान शिड्यूल्ड ऑपरेटर परमिट के तहत 169 हेलीकॉप्टर वाणिज्यिक तौर पर संचालित हो रहे हैं। इसके अलावा 44 हेलीकॉप्टर सरकार और पीएसयू के स्वामित्व में हैं। जबकि 50 निजी क्षेत्र के तहत संचालित हो रहे हैं। इनमें 129 हेलीकॉप्टर एक (सिंगिल) इंजन, जबकि 134 दो (ट्विन) इंजन वाले हैं। इनमें से महज 18 हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स के बनाए हैं। जबकि 109 बेल हेलीकॉप्टर्स अमेरिका के, 60 यूरोकॉप्टर फ्रांस के, 28 ऑगस्टा-बेल/वेस्टलैंड इटली के और 44 अन्य विभिन्न कंपनियों (राबिन्सन, सिकोर्स्की, एन्स्ट्राम, एमआइ-172, एमडी व शेवियर) के हैं। हेलीकॉप्टरों का संचालन विभिन्न नियम-कायदों के तहत होता है जिनमें एयरक्राफ्ट एक्ट, 1937 और समय-समय पर जारी सिविल एविएशन रिक्वायरमेंट्स (सीएआर) के नियम शामिल हैं। मगर मरम्मत एवं रखरखाव, प्रशिक्षण संबंधी संस्थानों और अकादमियों की कमी के कारण इनका समुचित पालन नहीं होता। आज की तारीख में देश में केवल एक हेलीकॉटर पायलट ट्रेनिंग अकादमी है जो सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनी एचएएल के स्वामित्व में है। कुछ समय पहले ही उड्डयन महानिदेशालय (डीजीसीए) ने पीएचएचएल नामक कंपनी को पुणे में एक प्रशिक्षण अकादमी खोलने का प्रस्ताव दिया है। इसके अलावा गोंदिया (महाराष्ट्र) में एक राष्ट्रीय स्तर की पायलट अकादमी खोलने का प्रस्ताव है जहां हेलीकॉटर पायलटों को ट्रेनिंग दी जाएगी। हेलीकॉप्टर पायलटों की ट्रेनिंग में शुरू में सिमुलेटर का प्रयोग किया जाता है। दिल्ली में निजी क्षेत्र का एक फिक्स सिमुलेटर है। जबकि बड़े स्तर का सिमुलेटर बेंगलूर में एचएएल-सीएई के संयुक्त उद्यम के तहत हाल में लगाया गया है। इसके अलावा डीजीसीए ने हेलीकॉप्टरों की मरम्मत एवं रखरखाव के लिए भी कुछ ट्रेनिंग इंस्टीट्यूट को मंजूरी दी है। समिति के मुताबिक आने वाले समय में देश में हेलीकॉप्टरों का इस्तेमाल कई गुना बढ़ने वाला है क्योंकि इनके उपयोग के नए क्षेत्र खुल रहे हैं। खासकर आपात चिकित्सा और पर्यटन में बड़ी संभावनाएं हैं। लिहाजा इस क्षेत्र के विस्तार के लिए पीएसयू और राज्य सरकारों की भी मदद ली जानी चाहिए।
Friday, August 12, 2011
सड़क परियोजनाओं में देरी से संसदीय समिति नाराज
नई दिल्ली देश के चारों महानगरों को जोड़ने वाली स्वर्णिम चतुर्भुज सड़क परियोजना के निर्माण में हो रही देरी पर संसद की प्राक्कलन समिति ने गहरी चिंता जताई है। उत्तर से लेकर दक्षिण और पूरब से लेकर पश्चिम को जोड़ने वाली महत्वपूर्ण सड़क परियोजना भी विलंब की शिकार है। यह राष्ट्रीय राजमार्ग विकास परियोजना (एनएचडीपी) के तहत संचालित है। संसद में पेश समिति की 2010-11 की रिपोर्ट में कहा गया है कि पूर्व-पश्चिम और उत्तर-दक्षिण कॉरीडोर परियोजना को 2009 में ही बन कर तैयार हो जाना था। कई बार अवधि विस्तार देने के बाद समिति को बताया गया कि दिसंबर 2010 में इसे एक बार फिर से अवधि विस्तार दिया गया। समिति ने इस बात पर चिंता जताई है कि परियोजना की 444 किलोमीटर सड़क के लिए अभी टेंडर तक नहीं दिए गए हैं। जब तक सारे टेंडर दिए नहीं जाते तब तक सड़क परिवहन मंत्रालय भी बता पाने की स्थिति में नहीं है कि यह परियोजना कब तक पूरी हो पाएगी। इस परियोजना में विलंब के संबंध में मंत्रालय के तर्को से भी समिति सहमत नहीं है। समिति ने अनुशंसा की है कि पूर्व-पश्चिम, उत्तर-दक्षिण कॉरीडोर के बचे काम के लिए बिना देरी किए टेंडर दिए जाएं और एनएचएआइ बोर्ड जैसी कोई उच्च स्तरीय कमेटी इसकी पाक्षिक निगरानी करे, ताकि निर्माण कार्यो में आगे कोई विलंब न हो। देश के चार महानगरों को जोड़ने वाली स्वर्णिम चतुर्भुज सड़क परियोजना को 2004 में पूरा होना था। समिति ने सात साल बाद भी इस परियोजना के पूरा नहीं होने पर नाराजगी जाहिर की है। मंत्रालय की इस दलील से समिति ने असहमति व्यक्त की कि इतने बड़े पैमाने की सड़क परियोजना को पूरा करने के लिए देश का निर्माण उद्योग सक्षम नहीं था। समिति ने कहा है भूतल परिवहन मंत्रालय सड़क निर्माण के काम में आने वाले भारी उपकरणों के आयात की अनुमति देने का फैसला लेने में शीघ्रता दिखाकर निर्माण में होने वाली देरी को कम कर सकता था। समिति ने अनुशंसा की है कि मंत्रालय सतत निगरानी करके जल्द से जल्द इस परियोजना को पूरा कराए।
निर्यात में तेज उछाल मगर आगे घटेगी रफ्तार
: अमेरिकी और यूरोपीय संकट के बावजूद जुलाई के निर्यात में 81.8 फीसदी की तेज बढ़त दर्ज की गई है। इंजीनियरिंग, पेट्रो-रसायन और रत्न एवं आभूषण क्षेत्र के बेहतर प्रदर्शन के चलते यह 29.3 अरब डॉलर पर पहुंच गया है। जबकि चालू वित्त वर्ष 2011-12 के पहले चार महीनों (अप्रैल-जुलाई) के दौरान निर्यात में 54 फीसदी की तेजी आई है। हालांकि सरकार ने चेताया है कि कठिन वैश्विक हालत में आगामी महीनों के दौरान यह रफ्तार शायद ही बरकरार रहे। वाणिज्य सचिव राहुल खुल्लर ने गुरुवार को निर्यात के आंकड़े जारी करते हुए कहा कि अमेरिका और यूरोपीय देशों में अनिश्चितता की वजह से निर्यात की रफ्तार को कायम रख पाना मुश्किल होगा। अगस्त-सितंबर से ही निर्यात की वृद्धि दर में कमी दिखाई देनी शुरू हो जाएगी। खुल्लर ने कहा कि ज्यादातर क्षेत्रों ने हालांकि बेहतर प्रदर्शन किया है, पर निर्यातकों को अति उत्साहित होने की जरूरत नहीं है। उन्हें संभलकर चलना चाहिए। माना जा रहा है कि अमेरिका और यूरोप में अनिश्चितता की वजह से वैश्विक मांग प्रभावित होगी। इन देशों की भारत के निर्यात में 35 फीसदी की हिस्सेदारी है। जुलाई में देश का इंजीनियरिंग निर्यात 8.7 अरब डॉलर का रहा। इसी तरह पेट्रोलियम उत्पादों का निर्यात 4.6 अरब डॉलर और रत्न एवं आभूषण निर्यात 3.5 अरब डॉलर का हुआ। इस दौरान आयात भी 51.5 फीसदी बढ़कर 40.4 अरब डॉलर पर पहुंच गया है। यानी इस महीने व्यापार घाटा बढ़कर 11.1 अरब डॉलर हो गया। चालू वित्त वर्ष के पहले चार महीनों में निर्यात 54 फीसदी उछल कर 108.3 अरब डॉलर का रहा है। इस दौरान आयात भी 40 फीसदी बढ़कर 151 अरब डॉलर पर पहुंच गया। पेट्रोलियम उत्पादों का आयात साल दर साल आधार पर 23 फीसदी बढ़कर 42 अरब डॉलर का रहा। निर्यातकों के संगठन फियो ने कहा कि निर्यात में इतनी तेजी वृद्धि हाल के समय में कभी नहीं हुई है।
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