Monday, May 28, 2012

पब्लिक पर गिरा पेट्रोल बम


संसद का बजट सत्र समाप्त होने के अगले ही दिन तेल कंपनियों ने पेट्रोल के दाम 7.54 रुपए लीटर बढ़ा दिए हैं। एक ही झटके में की जाने वाली यह अब तक की सबसे बड़ी वृद्धि है। डालर के मुकाबले रुपए की विनिमय दर में भारी गिरावट और तेल कंपनियों को हो रहे भारी नुकसान को देखते हुए यह वृद्धि जरूरी हो गई थी। हालांकि संप्रग सरकार के सहयोगी दलों ने इस वृद्धि पर नाराजगी जताते हुए इसे वापस लेने की मांग की है। प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने संप्रग सरकार के तीन वर्ष का कार्यकाल पूरा होने के मौके पर मंगलवार को अर्थव्यवस्था के समक्ष खड़ी चुनौतियों से निपटने के लिए कड़े फैसले लेने पर जोर दिया था। इसके अगले ही दिन आज पेट्रोल के दाम बढ़ा दिए गए। दिल्ली में पेट्रोल की कीमत मध्य रात्रि से 7.54 रुपए बढ़कर 73.18 रुपए प्रति लीटर हो गई है। मुंबई में यह 78.57, कोलकाता में 77.88 तथा चेन्नई में 77.53 रुपए प्रति लीटर हो गई। यह मूल्य वृद्धि अबतक की सबसे ऊंची मूल्य वृद्धि है। इससे पहले तेल कंपनियों ने पेट्रोल के दाम में अधिकतम 5 रुपए की वृद्धि की थी। सरकार के सहयोगी दलों तृणमूल कांग्रेस, द्रमुक और बाहर से समर्थन देने वाली समाजवादी पार्टी ने मूल्य वृद्धि का विरोध करते हुए इसे वापस लेने की मांग की है। पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री और तृणमूल कांग्रेस की प्रमुख ममता बनर्जी ने इस वृद्धि को अनुचित और एकतरफा बताया। हालांकि उन्होंने कहा कि इस बात को लेकर वह सरकार के समक्ष कोई संकट खड़ा नहीं करेंगी।द्रमुक प्रमुख करुणानिधि ने भी कहा कि उनके सांसद इस मूल्य वृद्धि को वापस लेने की मांग सरकार के समक्ष रखेंगे। प्रमुख विपक्षी दल भाजपा समेत वामपंथी दलों ने भी तेल कीमत में वृद्धि पर विरोध जताया है। विशेषज्ञों का कहना है कि पेट्रोल के दाम बढ़ने से दीर्घकाल में महंगाई पर कोई असर नहीं होगा क्योंकि थोक मूल्य सूचकांक में पेट्रोल का भारांश बहुत कम है। पेट्रोलियम एवं प्राकृतिक गैस मंत्री जयपाल रेड्डी ने मंगलवार को कहा था कि अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल के दाम बढ़ने के साथ साथ रुपए की गिरावट के कारण तेल मूल्यों में तुरंत वृद्धि जरूरी हो गई है। बहरहाल, डीजल, मिट्टी तेल और खाना पकाने की गैस के दाम में कोई वृद्धि नहीं हुई है। वित्त मंत्री प्रणव मुखर्जी की अध्यक्षता वाली उच्चाधिकार प्राप्त समिति इसे देख रही है। समिति में संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन सरकार के घटक दलों के प्रतिनिधि शामिल हैं। पिछले एक साल से इसकी बैठक नहीं हुई है। पेट्रोलियम मंत्री जयपाल रेड्डी के अनुसार, ‘यदि डालर के मुकाबले रुपए की विनिमय दर एक रुपए घटती है तो तेल कंपनियों पर सालाना 8,000 करोड़ रुपए का बोझ बढ़ता है।उल्लेखनीय है कि पिछले कुछ महीनों से रुपए में डालर के मुकाबले लगातार गिरावट का रुख बना हुआ है। बुधवार को भी डालर के मुकाबले रुपया सबसे निचले स्तर 56 रुपए प्रति डालर पर बंद हुआ है। एक साल पहले इन्हीं दिनों डालर के मुकाबले रुपए की विनिमय दर 46 रुपए प्रति डालर थी। तेल कंपनियां अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल के लगातार बढ़ते दाम से पिछले कई सालों से जूझ रही हैं। मार्च 2011 को समाप्त वर्ष के दौरान लागत से कम दाम पर पेट्रोल बिक्री से कंपनियों को पेट्रोल पर ही 4,860 करोड़ रुपए का नुकसान उठाना पड़ा है।

भरपूर पैदावार फिर भी महंगाई की मार


संप्रग सरकार की सबसे बड़ी उपलब्धि का सच गरीबों के लिए बहुत कड़वा है। गेहूं की रिकॉर्ड उपज के बावजूद आटे और गेहूं की कीमत में दो से ढाई गुना का फर्क है। दाल भी दलहन के मुकाबले तीन गुनी तक महंगी है। यह इसका प्रमाण है कि खाद्यान्न पैदावार 25.50 करोड़ टन पहुंचने के बाद भी सरकार बाजार संभालने में विफल रही है। प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने मंगलवार को संप्रग-दो सरकार के तीन साल पूरे होने पर अनाज के बंपर उत्पादन को अपनी सबसे बड़ी उपलब्धि बताया। यह सच भी है। लेकिन, बाजार में आटे और दाल की कीमतों पर इसका कोई असर नहीं है। सरकार की खाद्य नीति में असंतुलन है। खाद्य उत्पादों पर लगाम कसने वाला प्रशासनिक अमला हार चुका है। खाद्यान्न प्रबंधन की खामियां इसके लिए जिम्मेदार हैं। मांग और आपूर्ति के सिद्धांत के विपरीत बाजार सटोरियों और जमाखोरों के हाथों में खेल रहा है। अनाज की भारी पैदावार पर सरकार इतरा रही है, लेकिन उसके प्रबंधन की चूक पर वह चुप्पी साधे है। तभी तो जिंस बाजार में गेहूं साढ़े नौ से 11 रुपये किलो और आटा 20 से 25 रुपये किलो बिक रहा है। इसी तरह 33 रुपये किलो की अरहर और उसकी दाल 70 रुपये किलो। खुले बाजार में गेहूं समर्थन मूल्य 1285 रुपये प्रति क्विंटल से नीचे यानी 950 से 1100 रुपये क्विंटल पर बिक रहा है। हैरानी यह कि जिंस बाजार में गेहूं के आटे का मूल्य 20 रुपये से नीचे नहीं है। प्रीमियम क्वालिटी के नाम पर तो यह 25 से 30 रुपये किलो तक बिक रहा है। ब्रांडेड आटे का मूल्य इससे भी अधिक है। दालों के मूल्य तो और भी अतार्किक तरीके से बढ़ाए गए हैं। घरेलू बाजार में अरहर 3300/3400 रुपये प्रति क्विंटल बिक रही है जबकि अरहर दाल 7000 से 7500 रुपये प्रति क्विंटल तक पहुंच गई है। दालों का प्रसंस्करण करने वालों की मानें तो प्रति किलो दाल पर आठ से दस रुपये प्रति किलो की लागत आती है। तैयार दाल के मूल्य खुदरा बाजार में बहुत अधिक हैं।

Wednesday, May 23, 2012

रुपए में गिरावट जारी


रुपए में गिरावट के सिलसिला लगातार पांचवें दिन जारी रहा और कारोबार के दौरान यह अमेरिकी डालर की तुलना में एक समय 55.47 तक चला गया था जो स्थानीय मुद्रा की विनिमय दर में गिरावट का नया रिकार्ड है। बाद में इसमें थोड़ा सुधार हुआ और अंत में यह 55.39 प्रति डालर पर टिका। आयातकों विशेषकर तेल रिफाइनरी कंपनियों की डालर मांग से रुपए की धारणा प्रभावित हुई। बाहर से विदेशी मुद्रा की आवक लगभग थमी रहने से भी स्थानीय मुद्रा कमजोर हुई। अंतर बैंक विदेशी विनिमय बाजार (फारेक्स) में रुपया सुबह तेजी की धारणा के साथ 54.60 डालर पर खुला। सोमवार का बंद के समय दर 55.03 रुपए प्रति डालर पर बंद हुआ था। लेकिन जल्द ही डालर की मांग से रुपए की चमक मंद पड़ने लगी। रेटिंग एजेंसी फिच द्वारा जापान की वित्तीय साख घटाकर ए धनात्मक करने और भविष्य का परिदृश्य नकारात्मक करने की घोषणा के बावजूद एशियाई क्षेत्र की अन्य प्रमुख मुद्राएं डालर के मुकाबले आज दूसरे दिन भी मजबूत हुई पर रुपए के मामले में डालर की मांग का प्रभाव हावी रहा। आयातकों की डालर की मजबूत मांग से रुपया कारोबार के दौरान गिरकर 55.47 की नई तलहटी को छू गया। बाद में स्थिति कुछ सुधरी पर अंत में यह कल की तुलना में 0.65 प्रतिशत या 36 पैसे की गिरावट के साथ 55.39 प्रति डालर पर बंद हुआ। इस साल मार्च के बाद से रुपया डालर की तुलना में 11 प्रतिशत कमजोर हुआ है। डीलरों ने कहा कि मंगलवार को भी भारतीय रिजर्व बैंक की बाजार में कोई भूमिका नहीं दिखी। वैिक चिंताओं की वजह से पूंजी का अंतप्र्रवाह भी नदारद रहा। एफआईआई आज 283 करोड़ रुपए के शुद्ध बिकवाल रहे और बांबे शेयर बाजार का सेंसेक्स 157 अंक की गिरावट के साथ बंद हुआ। इंडसइंड बैंक के आल्को और आर्थिक एवं बाजार अनुसंधान प्रमुख मोजेज हार्डिंग ने कहा, ‘हालांकि आयातकों की डालर मांग सही थी, लेकिन पूंजी का प्रवाह कम रहने से मांग और आपूर्ति में काफी अंतर रहा।सोमवार को रुपए में 61 पैसे या 1.12 फीसद की गिरावट आने के बाद रिजर्व बैंक ने बैंकों के लिए रुपए से सम्बद्ध विदेशी विनिमय वायदा कारोबार में खुली स्थिति पर शिंकजा और कस दिया। उधर रुपए की गिरावट पर वित्त मंत्री प्रणव मुखर्जी ने नई दिल्ली में कहा कि सरकार विदेशी विनिमय बाजार में उतार-चढ़ाव पर अंकुश के लिए कदम उठा रही है और जब जरूरत होगी भारतीय रिजर्व बैंक इसमें हस्तक्षेप करेगा।

रुपये की टूट के पीछे

डॉलर के मुकाबले रुपये के 55 रुपये से ऊपर तक टूटने ने सरकार की नींद हराम कर दी है। वैसे यह सब अचानक नहीं हुआ है। अर्थ मामलों के जानकार इसकी आशंका पहले से जता रहे थे। फिर एक स्थिति यह भी है कि मौद्रिक असंतुलन को बड़ा खतरा मानने को लेकर देश में एक बड़ी बहस भी छिड़ गई है। कुछ जानकार तो रुपए की हैसियत तय करने वाली प्रक्रिया को ही पारदर्शी नहीं मानते हैं। उनके मुताबिक रुपये को अस्वाभाविक रूप से मजबूती देने की नीति से बाजार और अर्थव्यवस्था को बुनियादी आधारों पर सशक्त और टिकाऊ बनाने में बाधा पैदा होती है। फिर यह भी समझ लेना कि चूंकि रुपया टूटा है, इसलिए आयात महंगा होगा और इससे महंगाई बढ़ेगी, एकतरफा व्याख्या है। आज भारत बड़ा निर्यातक देश भी है और देश के आईटी सेक्टर की ग्रोथ तो तकरीबन विदेशी मुद्रा पर टिकी है। फिर अंदरुनी तौर पर भी देश में उत्पादन और खपत का एक प्रतियोगी बाजार तंत्र विकसित हो चुका है, जो काफी हद तक स्वावलंबी है। ऐसे में चौतरफा निराशा की बात सही नहीं है। अगर तेल निर्भरता की बात छोड़ दें तो रुपये का ऐतिहासिक रूप से टूटना कुछ बड़ी संभावनाओं के द्वार भी खोल सकता है। मसलन मेडिकल और टूरिज्म के क्षेत्र में हम बड़े डग भर सकते हैं। यहां एक और बात समझने की है। आज पूरी दुनिया की इकोनमी एकदू सरे से गहरे जुड़ी है। ऐसे में इस समय जो वैिक आर्थिक सूरते हाल है, उसमें भारत के लिए खतरे के कुछ संकेत जरूर हैं। लिहाजा मौद्रिक असंतुलन के पीछे एक कारण यह वैिक परिदृश्य भी निश्चित रूप से है। योजना आयोग के उपाध्यक्ष से लेकर वित्तमंत्री तक यह बात कह चुके हैं। ग्रीस संकट के बाद से यूरोपीय बैंक भारतीय कंपनियों को कर्ज देने में हाथ खींच रहे हैं। इससे डॉलर के आवक का एक बड़ा जरिया तंग पड़ गया है। फिर देश में आर्थिक सुधारों की गति सुस्त पड़ने से विदेशी पूंजी निवेश की राह में चहल-पहल पहले की तरह नहीं रह गई है। यह सब मिलकर बाजार और उद्यम जगत को मनोवैज्ञानिक रूप से हताश कर रहे हैं। घबराहट में कुछ भारतीय कंपनियां बड़ी मात्रा में डॉलर की खरीद में भी जुट गई हैं। एक चिंता यह भी है देश में चालू खाते का घाटा काफी बढ़ गया है। ऐसी स्थिति में बहुत कुछ दारोमदार सरकार पर है कि वह अपने कुछ फैसलों से कारोबार जगत से लेकर आम आदमी के बीच भरोसा पैदा करे। पर सरकार की कठिनाई यह है कि वह निशाने पर तो हर तरफ से है पर उसके कुछ करने की सूरत बहुत साफ नहीं है। कौशिक बसु से लेकर प्रणव मुखर्जी और कुछ मौकों पर तो प्रधानमंत्री भी सरकार की आंकिक कमजोरी का रोना रो चुके हैं, जिसके कारण सरकार की नीतिगत अस्पष्टता और बड़े सुधारवादी फैसले लेने में बार-बार हिचक नजर आती है। कॉरपोरेट जगत ने तो बहुत पहले इस सरकार को नीतिगत लकवे का शिकार बता दिया था। पर यह परेशानी अकेली यूपीए सरकार की है, ऐसा समझना ठीक नहीं होगा। अभी देश में जो एक गैरजवाबदेह राजनीतिक संस्कृति विकसित हो रही है, उसमें क्षेत्रवादी ताकतें केंद्र को घुटने के बल टिकाकर अपने हित साधने को अपनी नीतिगत जीत के रूप में देख रही हैं। यह एक खतरनाक परंपरा की शुरुआत है। राज्य और केंद्र के बीच तालमेल एक राष्ट्रीय दरकार है। गठबंधन राजनीति की खासियत अर्थ और विकास के हर पहलू को सर्वसमावेशी बनाने में है, न कि किसी विखंडनवादी दुराग्रह में।

सबसे ज्यादा काली कमाई कंपनियों ने बनाई


देश में कितना काला धन छिपा है, इसका आकलन सरकार तो सही-सही अभी तक नहीं लगा पाई है लेकिन उसने जो आंकड़े दिए हैं उससे स्पष्ट है कि यह आम अनुमान से काफी ज्यादा है। सिर्फ पिछले पांच वर्षो में ही आयकर विभाग की विभिन्न एजेंसियों ने देश-विदेश में मोटे तौर पर दो लाख करोड़ रुपये के काले धन का पता लगाया है। विदेशों में कारोबार फैला रहा भारतीय कारपोरेट उद्योग हो या देश के छोटे व्यापारी या आम कर दाता, काला धन बनाने में सब एक से बढ़ कर एक हैं। काले धन पर सरकार की तरफ से पेश श्वेत पत्र में पहली बार आयकर विभाग के छापों और इसमें उजागर होने वाले धन के बारे में विस्तार से जानकारी उपलब्ध कराई गई है। अमूमन ये आंकड़े पिछले छह वित्त वर्षो के हैं, जो अपने आप ही बता रहे हैं कि काले धन की समस्या कितनी विकराल हो गई है। मसलन, आयकर विभाग कानून के तहत मारे जाने वाले छापों में पकड़े जाने वाली राशि इन वर्षो में तीन गुनी हो चुकी है। 2006-07 में 3612.89 करोड़ के काले धन का पता चला था जबकि 2011-12 में आंकड़ा 9289.43 करोड़ रुपये का हो गया। छोटी व मझोली औद्योगिक इकाइयां भी पीछे नहीं। गत छह वर्षो में इनके बीच किये गये सर्वे से 26,579 करोड़ के काले धन का पता चला है। रिपोर्ट से यह भी साफ होता है कि कॉरपोरेट सेक्टर में भी काले धन के मामले काफी तेजी से बढ़े हैं। चाहे विदेशों में कारोबार फैला रही देशी कंपनियां हो या भारत में कार्यरत विदेशी कंपनियां, सही तरीके से कर अदा करने में इन सब की भूमिका संदेहास्पद है। अंतरराष्ट्रीय कराधान निदेशालय को इनसे सही आय व कर वसूलने में नाकों चने चबाना पड़ता है। पिछले एक दशक के दौरान उन भारतीय कंपनियों के एक लाख करोड़ रुपये से ज्यादा का कर वसूला गया जो सही सूचना नहीं दे रही थी। श्वेत पत्र के मुताबिक, गत दो वर्षो के दौरान भारतीय कंपनियों ने विदेशी सहयोगी कंपनियों की मिलीभगत से 67,768 करोड़ का कर बचाने की कोशिश की है। यह पूरा खेल ट्रांसफर प्राइसिंग है जिसमें ये कंपनियां एक उत्पाद या सेवा का भारत में तो कुछ और मूल्य दिखाती हैं लेकिन विदेशों में ज्यादा राजस्व प्राप्त करती हैं।

साढ़े सात फीसदी विकास दर पाना मुश्किल


भारत के आर्थिक विकास को लेकर हाल तक बड़ी-बड़ी बातें कर रहे योजना आयोग के उपाध्यक्ष मोंटेक सिंह अहलूवालिया ने अचानक ही पलटी मार ली है। उन्होंने साफ कहा है कि फिसलते रुपये और बढ़ती महंगाई के चलते चालू वित्त वर्ष में साढ़े सात प्रतिशत की आर्थिक वृद्धि दर को हासिल कर पाना मुश्किल होगा। शुक्रवार को ही उन्होंने भारत को संभावनाओं का देश बताकर कहा था कि वह अगले दो दशक तक आठ से नौ फीसदी की दर से विकास करने में सक्षम है। मोंटेक ने केंद्र की ओर से नीतिगत निर्णयों को लेने में देरी की चिंताओं को खारिज कर दिया। उनके मुताबिक, सरकार की नीतियों की बदौलत ही पूर्व में देश 9 प्रतिशत से अधिक आर्थिक वृद्धि हासिल करने में सफल रहा। सरकार अपने एजेंडे पर काम कर रही है। वित्त मंत्रालय चालू वित्त वर्ष में 7.5 प्रतिशत की विकास दर की उम्मीद कर रहा है। यह मुश्किल है, लेकिन असंभव नहीं। पिछली तिमाही में आर्थिक वृद्धि मजबूत नहीं रही। वर्ष 2012-13 की पहली तिमाही में यह कैसी रहेगी, देखना बाकी है। रुपये में गिरावट, ऊंची मुद्रास्फीति और चालू खाते का घाटा जैसे कारण भारत को आठ से नौ प्रतिशत आर्थिक वृद्धि के रास्ते पर लौटने से रोक रहे हैं। रुपये की विनिमय दर में इस साल मार्च से अब तक 11 प्रतिशत की कमी आई है। अप्रैल में महंगाई की दर 7.23 प्रतिशत रही है। अर्थव्यवस्था को ऊंची विकास दर के रास्ते पर लाने के लिए सरकार कड़े निर्णय लेगी? इस सवाल के जवाब में अहलूवालिया का कहना था कि उन्हें ऐसी उम्मीद है। दुनिया में जहां उथल-पुथल है, भारत एक प्रमुख निवेश गंतव्य हो सकता है। इस मौके को गंवाना नहीं चाहिए।

Monday, April 30, 2012

भारत की आर्थिक साख गिरी


बिगड़ते आर्थिक हालत व यूपीए सरकार के नीतिगत अनिर्णय के बीच भारतीय अर्थव्यवस्था से दुनिया का भरोसा घटने लगा है। वैश्विक क्रेडिट रेटिंग एजेंसी स्टैंडर्ड एंड पुअर्स (एसएंडपी) ने देश की अर्थव्यवस्था के मौजूदा हालत और राजनीतिक परिदृश्य को खराब मानते हुए भारत की रेटिंग का आकलन स्थिर से घटाकर नकारात्मक कर दिया है, जो किसी देश की साख के नजरिए का सबसे निचला दर्जा है। यह बदलाव भारत की रेटिंग में कमी की भूमिका है। एजेंसी ने अगले दो वर्ष में स्थितियों में सुधार न होने पर रेटिंग घटाने की चेतावनी दी है। यह फैसला वित्तीय बाजार से निवेशकों का पलायन शुरू कर सकता है जिससे रुपये में गिरावट तेज हो सकती है। वैसे अप्रैल में विदेशी निवेशक बाजार से 760 करोड़ रुपये निकाल चुके हैं। ताजा रेटिंग पर वित्त मंत्री प्रणब मुखर्जी ने कहा कि मैं इसे लेकर कुछ चिंतित जरूर हूं लेकिन घबराहट नहीं है। मुझे पूरा विश्वास है कि अर्थव्यवस्था सात फीसदी की रफ्तार से बढ़ेगी, अधिक नहीं तो यह सात प्रतिशत के आसपास रह सकती है। हम राजकोषीय घाटे को सकल घरेलू उत्पाद के 5.1 फीसदी के दायरे में रखने में कामयाब होंगे। अभी भारत की दीर्घकालिक रेटिंग का आउटलुक यानी नजरिया बीबीबी प्लस (स्थिर) है। एस एंड पी ने इसे घटाकर बीबीबी नकारात्मक कर दिया है। यह फैसला आते ही शेयर बाजार में घबराहट फैल गई और निवेशकों ने बिकवाली शुरू कर दी। हालांकि बाद में वित्त मंत्री प्रणब मुखर्जी के बयान के बाद बाजार की स्थिति कुछ सुधरी। यही स्थिति मुद्रा बाजार की रही। डालर के मुकाबले रुपये की कीमत तेजी से गिरी, लेकिन बाद में डालर की कीमत 52.48 रुपये पर आ गई। रेटिंग का ऐलान होते ही सरकार ने इसके असर का आकलन शुरू कर दिया। वित्त मंत्री ने संसद परिसर में ही अपने मंत्रालय के उच्चाधिकारियों से राय मशविरा किया। वित्त मंत्रालय के अफसरों ने हाल में एस एंड पी के प्रतिनिधियों संग बैठक में भारत की रेटिंग बढ़ाने पर जोर दिया था,इसके बावजूद एजेंसी ने रेटिंग परिदृश्य घटा दिया। सरकार पर अब सुधारों की रफ्तार बढ़ाने का दबाव है। ऐसा नहीं होने की सूरत में भारतीय कंपनियों के लिए विदेशों से कर्ज उठाना मुश्किल हो जाएगा। साथ ही शेयर बाजार पर भी इसका नकारात्मक असर होगा। इससे विदेशी संस्थागत निवेशक (एफआइआइ) के निवेश में कमी का खतरा बनेगा। एस एंड पी के क्रेडिट विश्लेषक ताकाहीरा आगावा ने एक बयान में कहा, आर्थिक परिदृश्य में बदलाव के पीछे तीन में से एक की संभावना की हमारी सोच ने काम किया है। इसमें जिन बातों पर विचार किया जाता है उनमें बाह्य मोर्चे पर स्थिति का लगातार बिगड़ना, आर्थिक वृद्धि की संभावनाएं खत्म होना अथवा कमजोर राजनीतिक समन्वय में वित्तीय सुधारों के मोर्चे पर स्थिति ढीली बने रहना है। रेटिंग एजेंसी ने कहा है कि अगले 24 माह में यदि भारत के आर्थिक परिदृश्य में सुधार नहीं होता है, विदेशी मोर्चे पर स्थिति और बिगड़ती है और राजनीतिक परिवेश बिगड़ता है तथा राजकोषीय सुधारों की गति धीमी पड़ती है, तो रेटिंग और कम हो सकता है। एजेंसी ने जीएसटी, पेट्रोलियम व उर्वरक सब्सिडी में कमी, खुदरा रिटेल में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश की अनुमति जैसे आर्थिक सुधारों को जरूरी बताया है। एसएंडपी का मानना है कि हालांकि, भारत की वास्तविक जीडीपी वृद्धि वर्ष 2012-13 में 5.3 फीसदी बनी रहेगी, क्योंकि पिछले पांच वर्षो में इसमें औसतन 6 प्रतिशत वृद्धि दर्ज की गई है। एजेंसी ने कहा है कि भारत की अनुकूल दीर्घकालिक आर्थिक वृद्धि संभावनाएं और उच्च स्तर का विदेशी मुद्रा भंडार इसकी रेटिंग को समर्थन देता है। इसके विपरीत भारत का ऊंचा राजकोषीय घाटा और भारी कर्ज इसकी साख बढ़ाने के रास्ते की सबसे बड़ी रुकावट है। मई 2014 में होने वाले आम चुनाव व मौजूदा राजनीतिक पेचीदगियों को देखते हुए सरकार की तरफ से आर्थिक सुधारों की उम्मीद कम दिखाई देती है।