Thursday, May 5, 2011

मौद्रिक नीति की सार्थकता


महंगाई पर अंकुश के नाम पर रिजर्व बैंक ने एक बार फिर उलटबांसी की है। लगातार बढ़ती महंगाई ने देश में सबसे अधिक जिस वर्ग को प्रभावित किया है वह है निम्न मध्यम और निम्न वर्ग। इस वर्ग की अधिक परेशानियां खाद्य वस्तुओं तथा रोजाना उपयोग की आम चीजों की कीमतें निरंतर बढ़ते जाने से पेचीदा होती गई हैं। सरकार व उसके अर्थशास्त्रियों के पास आम आदमी की रसोई के बजट को काबू में रखने का कोई सार्थक और असरकारी उपाय नहीं सूझता। जब भी महंगाई बढ़ने और उसके खिलाफ लोगों के मुखर होने की बात आती है, वह तुरंत मुद्रा के प्रसार को रोकने का निर्णय ले लेती है। मंगलवार को रिजर्व बैंक द्वारा अपनी नीतिगत ब्याज दरों में की गई आधा फीसद की वृद्धि ऐसा ही कदम है जिससे अपना मकान खरीदने का लोगों का ख्वाब तो और दुरूह जरूर होगा लेकिन इससे महंगाई से तड़पन कम होने वाली नहीं है। इसकी एक अहम वजह यही है कि एक बार जब कोई आदमी किसी चीज को किसी तरह जरूरत के फंदे में फांस लेता है तो बाद में वह लाख कोशिश करके भी उससे मुक्त नहीं हो पाता। केंद्र सरकार की आर्थिक और वित्तीय नीतियों ने ही कुछ वर्ष पहले लोगों को कर्ज लेकर घी पीने का नशेड़ी बना दिया था। अब उनकी पूरी जिंदगी सिर्फ कर्ज को भरने में जाया होने के चक्र में फंसी लग रही है। याद कीजिए, कुछ साल पहले के दिन जब निजी ही नहीं, राष्ट्रीयकृत बैंकों के प्रबंधक तक पता-ठिकानाविहीन लोगों को भी सात-सवा सात फीसद ब्याज दर पर पर्सनल और ऑटो तथा होम लोन लेने के लिए पल्रोभित करने लग गए थे। आज आलम कहां पहुंच रहा है? ऑटो तथा होम लोन की दरें निजी क्षेत्र के बैंक तो कुछ मामलों को छोड़कर बारह फीसद के भी ऊपर ले जा चुके हैं जबकि सरकारी क्षेत्र के बैंकों के समक्ष भी ऐसा करने की बाध्यता होती जा रही है। धन की कमी और कर्ज का शिंकजा कड़ा होने से पर्सनल लोन के आवेदनों पर सरकारी बैंकों ने विचार प्राय: बंद कर दिया है। पर मार्च 2010 के बाद भारतीय रिजर्व बैंक द्वारा रेपो दर में नौवीं बार वृद्धि किए जाने के बाद भी महंगाई पर क्या कहीं कोई अंकुश लग पाया? लगता कि सरकार, जो सांविधानिक दृष्टि से वस्तुत: ‘राज्य’ है, ने लोक कल्याण के बजाय अब अपने लोक (जनता) की ही गर्दन दबाना शुरू कर दिया है? हालिया सरकारी कदम के सकारात्मक पहलू के रूप में कहा जा सकता है कि अल्पावधि की जमाओं पर अब अधिक ब्याज मिलेगा। लेकिन देश के अधिकतर लोगों के पास बचत के लिए धन बच कहां रहा है? और जिस व्यक्ति के पास ऐसी बचत के लिए धन है, उसके पास सोना-चांदी से लेकर शेयर बाजार और रीयल एस्टेट तक के क्षेत्र में धन लगाने का ज्यादा सुरक्षित आकर्षण है। फिर कैसे माना जाए कि सरकार के इस मौद्रिक कदम से आम आदमी का कोई भला होने जा रहा है?

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