यूरोपीय देशों की मुद्रा (यूरो) संकट का नया दौर शुरू होने से भारत सरकार की चिंताएं बढ़ गई हैं। सरकार मानती है कि यूरोपीय देशों ने अब स्थिति नहीं संभाली तो इससे सुस्त होती भारत की अर्थव्यवस्था को और ज्यादा झटके लग सकते हैं। सरकार को सबसे ज्यादा चिंता निर्यात में तेजी से गिरावट आने और रुपये की कीमत में तेज अस्थिरता आने को लेकर है। यही वजह है कि वित्त मंत्रालय और रिजर्व बैंक के आला अधिकारियों का दल पूरे हालात पर पैनी नजर रख रहा है। बताते चलें कि यूरोपीयन सेंट्रल बैंक ने गुरुवार को जारी अपनी रिपोर्ट में यूरो प्रसार वाले देशों की अर्थव्यवस्था की स्थिति और खराब होने की बात कही है। बैंक ने यह भी कहा है कि यूरोप के जिन 17 देशों में यूरो का प्रचलन है वहां महंगाई की स्थिति और बिगड़ेगी। बैंक ने इन देशों की आर्थिक विकास दर के अनुमान को मौजूदा 1.3 फीसदी से घटा कर महज 0.3 फीसदी कर दिया है। जबकि महंगाई की दर के अनुमान को दो फीसदी से बढ़ा कर 2.7 फीसदी कर दिया है। साथ ही बैंक ने ब्याज दरों को भी घटा दिया है। इसका असर यूरोप से लेकर अमेरिका तक में हुआ है। सबकी निगाहें इन देशों के प्रमुखों की 8-9 दिसंबर की बैठक के नतीजों पर टिकी हुई है। वित्त मंत्रालय के सूत्रों का कहना है कि यूरोपीयन सेंट्रल बैंक की नई रिपोर्ट से साफ है कि आगामी वित्त वर्ष के दौरान भी यूरोप की अर्थव्यवस्था पटरी पर नहीं आएगी। यह अपने आप में भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए चिंता की बात है। घरेलू अर्थव्यवस्था इससे बुरी तरह प्रभावित होगी निर्यात में होगी गिरावट पिछले दो तीन वर्षो के दौरान देश के कुल निर्यात में यूरोप की हिस्सेदारी घटी है। इसके बावजूद अभी देश से 19 फीसदी निर्यात यूरोपीय देशों को होता है। खास तौर पर भारतीय चमड़े व कपड़े का सबसे बड़ा आयातक यूरोपीय देश ही हैं। मंदी में यूरोपीय जनता इनका इस्तेमाल और कम करेगी। रुपया होगा और अस्थिर ऐसे समय जब डॉलर की तुलना में भारतीय रुपये की कीमत में पिछले कुछ हफ्तों में 18 फीसदी की गिरावट हो चुकी, यूरोपीय संकट का बढ़ना इसके समक्ष नई चुनौतियां पेश कर देगा। जानकारों का कहना है कि यूरोपीय अर्थव्यवस्था की मंदी की खबर के बाद रुपये के सापेक्ष इसकी कीमत क्या होगी, इसे लेकर अभी कयास ही लगाया जा सकता है। डॉलर के मुकाबले यूरो भी गिरा है। हाल के महीनों में रुपये के मुकाबले यूरो मजबूत हुआ है। इसका असर सबसे ज्यादा देश की सॉफ्टवेयर कंपनियों के राजस्व पर पड़ा है। एफआइआइ निकालेंगे निवेश वैसे ही विदेशी संस्थागत निवेशक भारतीय बाजार से निवेश समेटना शुरू कर चुके हैं। यूरोपीयन सेंट्रल बैंक की नई रिपोर्ट इस प्रक्रिया को और तेज कर सकती है। अमेरिका के प्रमुख एफआइआइ अपनी पूंजी ज्यादा सुरक्षित तरीके से रखने की प्रक्रिया शुरू भी कर चुके हैं। विमानन कंपनियों पर भी पड़ेगा असर एक ताजा रिपोर्ट के मुताबिक दुनिया भर की नागरिक उड्डयन कंपनियों के लिए बुरा दौर शुरू हो सकता है। सबसे ज्यादा एशिया-प्रशांत क्षेत्र की एविएशन कंपनियों पर बुरा असर पड़ने की बात अंतरराष्ट्रीय हवाई ट्रांसपोर्ट संघ (आइएटीए) ने कही है। एयर इंडिया, किंगफिशर और जेट एयरवेज की बदहाल स्थिति और खराब हो सकती है।
Friday, December 9, 2011
महंगाई के जख्म पर फिर से नमक
आवश्यक वस्तुओं की बेतहाशा महंगाई से आम जनता भले ही बिलबिला रही हो, लेकिन सरकार की नजर में खाद्य वस्तुओं के दाम घटे हैं। कीमतों पर काबू पाने की नाकामी के आरोपों को खारिज करते हुए केंद्र सरकार ने महंगाई का ठीकरा राज्यों के सिर फोड़ा है। महंगाई घटे न घटे, पर सदन में विपक्ष की ओर से इस बार भी सवाल दागे गए। सरकार ने जवाब भी उसी अंदाज में आंकड़ों सहित देकर छुट्टी पा ली है। वित्त मंत्री प्रणब मुखर्जी गुरुवार को राज्यसभा में महंगाई पर हुई चर्चा का जवाब दे रहे थे। वित्त मंत्री ने चावल, गेहूं और कुछ दालों के दो साल पहले के मूल्यों से तुलना करते हुए मंहगाई के कम होने का दावा किया। खाद्य उत्पादों के थोक मूल्यों का ताजा आंकड़ा पेश करते हुए मुखर्जी ने कहा कि चालू वित्त वर्ष 2011-12 में 29 अक्टूबर को समाप्त सप्ताह में खाद्य महंगाई दर 11.8 फीसदी थी। यह दर 26 नवंबर को समाप्त सप्ताह में घटकर 6.6 फीसदी पर पहुंच गई है। उनके मुताबिक, 8-9 फीसदी से अधिक की महंगाई देश झेल नहीं सकता है। वित्त मंत्री के जवाब से असंतुष्ट भाजपा, माकपा, अन्नाद्रमुक और सपा ने सदन से वाकआउट किया। महंगाई की वजह गिनाते हुए उन्होंने कहा कि फसलों के समर्थन मूल्य में उल्लेखनीय वृद्धि की गई है। पूर्ववर्ती सरकारों ने गेहूं का समर्थन मूल्य 440 से 500 रुपए प्रति क्विंटल तक बढ़ाया था। यह अब बढ़कर 1080 रुपये तक पहुंच गया है। भारतीय खाद्य निगम गेहूं के कुल उत्पादन का एक तिहाई खरीद करता है। राशन प्रणाली में रियायती दरों पर इसे उपभोक्ताओं तक पहुंचाने का प्रावधान है। यह काम कृषि भवन (कृषि मंत्रालय) और नार्थ ब्लॉक (वित्त मंत्रालय) नहीं कर सकता है। इसके वितरण तंत्र की व्यवस्था राज्य सरकारें ही कर सकती हैं। भाजपा के वेंकैया नायडू के उठाए सवालों के जवाब में वित्त मंत्री ने कहा कि मुख्यमंत्रियों की सिफारिशों को लागू करने का दायित्व राज्य सरकारों का है। मंडी कानून और थोक व खुदरा मूल्यों में बढ़ते अंतर को कम करने का जिम्मा राज्यों का ज्यादा है। बिचौलियों के माध्यम से ही 86 फीसदी खाद्य उत्पाद उपभोक्ताओं तक पहुंचते हैं। बहुत कम राज्यों में राशन प्रणाली ठीक से काम कर रही है। सब्सिडी वाला चावल व गेहूं सभी को दिया जा रहा है। राज्य सरकारें आम उपभोक्ताओं के लिए आवंटित अनाज को उठाने में कोई रुचि नहीं दिखाती हैं। माकपा के पेट्रोलियम पदार्थो की महंगाई पर उठाए सवालों के जवाब में वित्त मंत्री ने विस्तृत आंकड़ा पेश करते हुए इसकी जिम्मेदारी भी राज्यों पर थोप दी। उन्होंने कहा कि केंद्र को मिलने वाले 1.36 लाख करोड़ रुपये के करों का 32 फीसदी राज्यों को मिलता है। इसके अलावा राज्यों के बिक्री कर से मूल्य बढ़े हैं। तेल कंपनियों के घाटे का जिक्र करते हुए कहा कि डीजल पर 10.62 रुपये और केरोसीन पर 25 रुपये प्रति लीटर का नुकसान हो रहा है। रसोई गैस पर भी 260.50 रुपये प्रति सिलेंडर का घाटा हो रहा है। पूर्ववर्ती राजग सरकार पर वार करते हुए मुखर्जी ने कहा कि उसके कार्यकाल में पेट्रोलियम उत्पादों को नियंत्रण मुक्त करने की शुरुआत हुई थी। इनकी जरूरत का बड़ा हिस्सा आयात से पूरा होता है। घरेलू उत्पादन उस लिहाज से काफी कम है। भाजपा से कहा कि राजग सरकार खुदरा क्षेत्र में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (एफडीआइ) के पक्ष में था। लिहाजा भाजपा को अब इसका विरोध नहीं करना चाहिए।
अब बीमा एफडीआई में सरकार को लगा झटका
खुदरा क्षेत्र में एफडीआई पर झटका खाने के बाद सरकार को और एक झटका लग सकता है। एक संसदीय समिति ने बीमा क्षेत्र में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (एफडीआई) सीमा मौजूदा 26 फीसद से बढ़ाकर 49 फीसद करने का प्रस्ताव खारिज कर दिया है। संसद की स्थायी समिति ने सरकार से बीमा विधेयक के विभिन्न पहलुओं के अलावा भारत के लिए एक एकीकृत आधुनिक बैंकिंग कानून लाने को कहा है। बीमा कानून (संशोधन) विधेयक, 2008 पर अपनी रपट सौंपने वाली समिति ने बृहस्पतिवार को कहा कि मौजूदा वैिक परिदृश्य को ध्यान में रखते हुए विदेशी निवेश की सीमा में किसी तरह की वृद्धि भारतीय कंपनियों के हित में नहीं होगी। समिति ने यह भी याद दिलाया कि संसद को यह आासन दिया गया है कि 26 फीसद की मौजूदा सीमा भविष्य में तोड़ी नहीं जाएगी। समिति ने यह सिफारिश भी की है कि विधेयक के उद्देश्यों की मौजूदा व्याख्या फिर से बदली नहीं जानी चाहिए क्योंकि इससे यह ‘भ्रामक धारणा’ बनेगी कि भारतीय बीमा कंपनियों में विदेशी भागीदारी का मुद्दा एक विशेषज्ञ समिति की सिफारिशों पर तय किया गया, जो सही नहीं है। इसने यह भी कहा कि स्वास्थ्य बीमा कारोबार में न्यूनतम 100 करोड़ रुपए की पूंजी के साथ एक कंपनी को कारोबार शुरू करने की अनुमति दी जानी चाहिए और इस तरह से 50 करोड़ रुपए की मौजूदा जरूरत को बढ़ाया जाना चाहिए। विशेष आर्थिक क्षेत्र (सेज) में कारोबार करने की योजना बना रही विदेशी कंपनियों के मुद्दे पर समिति ने सिफारिश की है कि सेज कानून, 2005 द्वारा प्रशासित क्षेत्रों में किसी भी गैर पंजीकृत विदेशी कंपनियों को परिचालन की अनुमति नहीं दी जानी चाहिए। बैंकिंग कानून (संशोधन) विधेयक, 2011 पर समिति ने कहा कि ‘निगमित लोकतंत्र’ को बढ़ावा देने के लिए शेयरधारिता के अनुपात के लिहाज से मताधिकार 10 प्रतिशत से बढ़ाकर 26 प्रतिशत की जानी चाहिए। विधेयक में प्रस्ताव है कि निजी क्षेत्र के बैंकों के लिए 10 प्रतिशत की मताधिकार सीमा खत्म की जानी चाहिए।
Thursday, December 8, 2011
स्पेक्ट्रम लौटाने की बीएसएनएल को सैद्धांतिक मंजूरी
घाटे में चल रही सरकारी दूरसंचार कंपनी बीएसएनएल को 13-14 सर्किल में ब्रॉडबैंड वायरलेस एक्सेस (बीडब्ल्यूए) स्पेक्ट्रम लौटाने की मंजूरी मिल गई है। दूरसंचार सचिव आर चंद्रशेखर ने भारत दूरसंचार सम्मेलन के मौके पर बताया कि दूरसंचार विभाग (डॉट) ने कंपनी के प्रस्ताव को सैद्धांतिक मंजूरी दे दी है। हालांकि, उन्होंने कहा कि इसकी बारीकियों पर अभी भी चर्चा हो रही है। अंतिम फैसला कंपनी के साथ बातचीत के बाद लिया जाएगा। बीएसएनएल ने पिछले साल बीडब्ल्यूए स्पेक्ट्रम खरीदने के लिए 8,500 करोड़ रुपये का भुगतान किया था। इसमें कंपनी के पास चयन का विकल्प नहीं था और उसे हर सर्किल में निजी क्षेत्र की कंपनियों के बीच हुई नीलामी की अधिकतम बोली के बराबर कीमत चुकानी पड़ी थी। चंद्रशेखर ने बताया कि बीएसएनएल के पास बीडब्ल्यूए के अलग बैंड हैं और चालू वित्त में इसकी नीलामी की संभावना नहीं है। बीएसएनएल को वर्ष 2010-11 में 6,000 करोड़ रुपये से ज्यादा का नुकसान हुआ। कंपनी को यह नुकसान कर्मचारियों के ऊंचे वेतन और 3जी व बीडब्ल्यूए स्पेक्ट्रम के लिए किए गए भुगतान के कारण हुआ। बीएसएनएल को 21 सर्किल में बीडब्ल्यूए स्पेक्ट्रम के गैर मानकीकृत बैंड आवंटित किए गए हैं। यह कंपनी दिल्ली और मुंबई को छोड़कर देश के सभी हिस्सों में दूरसंचार सेवाएं मुहैया करती है। नुकसान से त्रस्त बीएसएनएल ने हाल ही में दूरसंचार विभाग को 17 सर्किल में बीडब्ल्यूए स्पेक्ट्रम सौंपने की पेशकश करते हुए दूरसंचार विभाग को पत्र लिखा था। सूत्रों ने बताया था कि कंपनी सिर्फ महाराष्ट्र, आंध्र प्रदेश, गुजरात और हरियाणा सर्किल के स्पेक्ट्रम रखना चाहती है।
महंगाई-सब्सिडी से बिगड़ा बजट
अर्थव्यवस्था काफी मुश्किल हालात से गुजर रही है। केंद्र सरकार अब खुल कर यह बात मानने लगी है। महंगाई के जख्म पर बेलगाम सब्सिडी नमक रगड़ रही है। वित्तीय घाटा लक्ष्य से कितना ज्यादा होगा, इसका अंदाजा अभी तक नहीं निकल पा रहा है। वित्त मंत्री प्रणब मुखर्जी ने बुधवार को लोकसभा में सरकार के व्यय के लिए अनुपूरक मांगों पर चर्चा के दौरान अर्थव्यवस्था की बेहद गंभीर तस्वीर पेश की। हालांकि उन्होंने यह भी कहा कि अर्थव्यवस्था के आधारभूत कारक अब भी मजबूत हैं। वित्त मंत्री ने पहली बार स्वीकार किया कि यूरोपीय संकट का देश की अर्थव्यवस्था पर पड़ने वाले असर का आकलन करने में सरकार से गलती हुई है। सनद रहे कि फरवरी 2011 में बजट पेश करते हुए उन्होंने अर्थव्यवस्था में नौ फीसदी वृद्धि होने की बात कही थी। जबकि अब वे यह कह रहे हैं कि वृद्धि दर 7.5 फीसदी से ज्यादा नहीं होगी। वित्त मंत्री ने कहा कि महंगाई की दर आठ फीसदी पर आ गई है। मगर भारतीय संदर्भ में इसके पांच से छह फीसदी से ज्यादा स्तर को स्वीकार नहीं किया जा सकता। लोकसभा ने ध्वनिमत से 56.8 हजार करोड़ रुपये की अनुपूरक मांगों के प्रस्ताव को स्वीकृति दे दी। प्रणब ने स्वीकार किया कि बढ़ती सब्सिडी सरकार के लिए सबसे बड़ी सरदर्द बनी हुई है। वित्तीय घाटे की स्थिति भी बद से बदतर हो रही है। वर्ष 2011-12 के बजट में फर्टिलाइजर, खाद्य और पेट्रोलियम के लिए 1,20,000 करोड़ रुपये की सब्सिडी के प्रावधान किए गए थे। मगर अब इसमें एक लाख करोड़ रुपये की वृद्धि होने की संभावना है। उर्वरक सब्सिडी ही 90 हजार करोड़ रुपये हो सकती है, जबकि प्रावधान सिर्फ 40 हजार करोड़ रुपये का था। इसी तरह से पेट्रोलियम सब्सिडी भी काफी बढ़ सकती है क्योंकि तेल कंपनियों को पूरे वित्त वर्ष के दौरान 1,32,000 करोड़ रुपये की संभावित हानि होने की संभावना है। खाद्य सब्सिडी भी उम्मीद से काफी ज्यादा रहेगी। खाद्य उत्पादों की महंगाई दर पर प्रणब ने कहा कि फरवरी 2010 में यह 22 फीसदी थी जो अब घट कर आठ फीसदी रह गई है। यह भी स्वीकार्य नहीं है। उन्होंने इसके लिए किसानों को दिए जा रहे न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) में वृद्धि को भी परोक्ष तौर पर जिम्मेदार ठहराया है। पिछले छह वर्षो में धान का एमएसपी 600 रुपये प्रति क्विंटल से बढ़ कर 1100 रुपये हो जाने का उदाहरण देते हुए प्रणब ने सवाल पूछा कि क्या ऐसे में चावल छह वर्ष पहले की कीमत पर बेचा जाना चाहिए? उन्होंने कहा कि बचत दर में 33 फीसदी की वृद्धि और निवेश में 34-35 फीसदी की वृद्धि दर यह संकेत देता है कि अर्थव्यवस्था के आधारभूत तत्व मजबूत हैं। संसद से सहयोग मिले तो मुश्किल हालात से निबट लेंगे देश के समक्ष उत्पन्न आर्थिक संकट से निकलने के लिए वित्त मंत्री ने संसद और सभी राजनीतिक दलों का सहयोग मांगा। उन्होंने कहा कि अगर संसद सामान्य तौर पर चलती रहे, यहां काम काज होता रहे, अन्य वैधानिक संस्थानों का काम भी निर्बाध गति से होता रहे और हम चर्चा के बाद फैसले करते रहें तो अर्थव्यवस्था के हालात को भी बदला जा सकता है।
Wednesday, December 7, 2011
सुस्त पड़ती कारवां की चाल
भारत भी वर्तमान वैिक मंदी की चपेट में आ रहा है, इसमें कोई शक नहीं। वित्त मंत्री प्रणब मुखर्जी ने भी कह दिया है कि अब 9 प्रतिशत वृद्धि दर पाने की उम्मीद खत्म हो गई है। इस वित्त वर्ष की छमाही व दर 7.3 प्रतिशत है। साफ है कि अर्थव्यवस्था की गति 7.5 प्रतिशत से आगे नहीं जा पाएगी। यह गति पिछले दो सालों में सबसे कम है। 2010-11 में वृद्धि दर 8.5 प्रतिशत थी। पिछले वर्ष की पहली छमाही में वृद्धि दर 8.6 प्रतिशत थी। अब 2012-13 के लिए भी विकास की गति घटाकर 7.3 प्रतिशत कर दी गई है। इसका मतलब है कि हमारे आर्थिक कारवां की सुस्त चाल चिंताजनक है। इसकी उपेक्षा करना संकट के बड़े खतरे को नजरअंदाज करना होगा। आर्थिक गति मंद पड़ने का अर्थ है; खजाने पर दबाव और बढ़ना। करों से आमदनी घट रही है तो राजस्व के दूसरे स्रेत छीज रहे हैं। वर्तमान वित्त वर्ष में सरकार ने 6 लाख 64 हजार 457 करोड़ रुपये के राजस्व आय का अनुमान किया था। इनमें से 3 लाख 15 हजार 816 करोड़ रुपए केन्द्रीय उत्पाद शुल्क और सीमा शुल्क से आने की उम्मीद थी। उद्योगों की चाल सुस्त होने की अवस्था में इतनी आय संभव नहीं होगी। विनिवेश से 40 हजार करोड़ रुपये जुटाने की उम्मीद भी धूमिल हो रही है। इसलिए राजकोषीय घाटे को बजट लक्ष्य के अनुसार जीडीपी के 4.6 प्रतिशत तक सीमित करने का लक्ष्य नहीं पाया जा सकता है। सीएजी के आंकड़े बता रहे हैं कि राजकोषीय घाटा सितम्बर के अंत में 2.92 लाख करोड़ रुपया था, जो पूरे वर्ष के बजट अनुमान का 71 प्रतिशत है। गत वर्ष इस अवधि में गैर कर राजस्व मद में 1 लाख 8 हजार करोड़ रुपया आया था। इस वर्ष गैर कर राजस्व वसूली अनुमान का 54.4 प्रतिशत है। अप्रैल- अक्टूबर तक राजस्व घाटा 2 लाख 43 हजार करोड़ रुपया हो चुका है, जो बजट अनुमान के 79 प्रतिशत है। खजाने में धन की कमी का असर पूरी अर्थव्यवस्था पर पड़ता है। पूंजीवादी अर्थव्यवस्था का एक प्रमुख पहलू शेयर बाजार है। शेयर बाजार से विदेशी संस्थागत निवेशकों द्वारा लगातार अपना निवेश निकालने की खबरें आ रही हैं। बंबई शेयर बाजार के अनुसार दूसरी तिमाही में 19 शेयरों में विदेशी निवेशकों यानी एफआईआई ने निवेश घटाया और बढ़ाया केवल 11 में। पहली तिमाही में एफआईआई ने 16 कम्पनियों में निवेश थोड़ा बढ़ाया था और 14 कम्पनियों में कम किया था। कहा जा रहा है कि आर्थिक हालात और रुपये की कमजोरी के कारण एफआईआई ऐसा कर रहे हैं। शेयर निवेश पर अनुसंधान करने वाली रिपोर्ट्स बता रही हैं कि एफआईआई भारतीय कम्पनियों में निवेश करने से बच रहे हैं। विदेशी मुद्रा भंडार लगातार गिर रहा है। भारतीय रिजर्व बैंक द्वारा पिछले कुछ सप्ताहों से दिया जा रहा आंकड़ा विदेशी मुद्रा में रिकॉर्ड कमी का प्रमाण दे रहा है। उम्मीद की एक किरण निर्यात व्यापार हो सकता था लेकिन भारत का व्यापार घाटा अप्रैल-अक्टूबर तक 93.7 अरब डॉलर हो गया है यानी वष्रात तक यह 150 अरब डॉलर पार कर जाएगा। यह भी रिकॉर्ड होगा। ये स्थितियां एक-दो दिन या एक-दो साल में निर्मित नहीं हुई हैं। वृद्धि दर के धूमकेतु और विदेशी निवेशकों के शेयर से धन कमाने के रुझान से बढ़ते विदेशी मुद्रा भंडार के इन्द्रधनुष में अर्थव्यवस्था के मूल आधारों की लगातार अनदेखी हुई। विनिवेश के नाम पर कम्पनियों को बेचने, संचार क्षेत्र की निविदाओं, प्रवासियों की आय और दुनिया के प्रमुख देशों के संकट के कारण पूरा माहौल ऐसा बना मानो भारत विकासशील देशों के साथ सबसे अलग और तेज गति से विकास कर रहा है। दुर्भाग्यवश आज भी इनके लिए वर्तमान वैिक आर्थिक ढांचे के तहत बताए गए सतही कारणों को ही उद्धृत किया जा रहा है। मसलन, कहा जा रहा है कि महंगाई कम करने के लिए जिस तरह लगातार ब्याज दरें बढ़ाई गई, उससे उद्योगों पर विपरीत असर पड़ा। सरकार इसके लिए वैिक हालात को जिम्मेवार मानती है। भारतीय उद्योग परिसंघ एवं एसोचैम कह रहा है कि हर क्षेत्र में निवेश तथा स्थायी पूंजी का निर्माण लगभग रुक गया है। इनका सुझाव है कि मंदी से निकलने के लिए ब्याज दरों को घटाएं और फैसले लेने में देरी न करें। प्रश्न है कि अगर अंतरराष्ट्रीय परिस्थितियां विकट हैं, प्रमुख देश मंदी के दूसरे भयावह दौर के कगार पर हैं, तो निवेश कहां से आएगा? वित्तमंत्री ने कहा कि वैिक संकट के विपरीत प्रभावों से बचने के लिए मध्यमकालीन रणनीति के तहत हमें घरेलू मांग आधारित विकास दर पर फोकस करना होगा। साथ ही समावेशी विकास के लिए कृषि के उत्पादन को बढ़ावा देना आवश्यक है। घरेलू मांग आधारित विकास से प्रणब दा का अभिप्राय क्या है? अगर वे बाजार अभिमुख अर्थव्यवस्था के आलोक में मांग और उत्पादन के सिद्धांत के तहत विचार कर रहे हैं तो जाहिर है, संकट के मूल कारण को समझा नहीं गया। दुनिया के संकट का कारण ही मांग, आपूर्ति और बिक्री के सीमाहीन चक्र पर अर्थव्यवस्था को जबरन आधारित कर देना है। अगर देशों की अर्थव्यवस्था घरेलू आवश्यकताओं के अनुसार उत्पादन एवं बाजार पर आधारित होती तो यह नौबत ही नहीं आती। मांग, आपूर्ति और बिक्री के चक्र को तेज गति देने के कदमों से हमने सामान्य घरेलू आवश्यकताओं के इर्द-गिर्द अर्थव्यवस्था के विकसित होने की संभावना का ही क्षय कर दिया है। इसमें मुक्ति का रास्ता कठिन हो गया है। अब खनन आवश्यकता के अनुसार न्यनूतम होना चाहिए लेकिन यह आधारभूत संरचना के मूल उद्योगों में से एक हो गया। अंधाधुंध खनन के कारण पर्यावरण चरमरा गया। कृषि को देखिए। भारत के पास तीन फसलों वाली मौसमी खेती की पर्याप्त जमीनें और उससे जुड़े श्रम एवं ज्ञान की सशक्त परंपरा थी। उद्योगों, कारोबारों तथा सरकारों के नासमझ लोकप्रिय कार्यक्रमों की आग में वह भस्म हो रही है। खेती की जमीनें कम हो गईं, योग्य मजदूरों तथा खेती के आधार पशुओं का अभाव हो गया। मनरेगा का एक दुष्प्रभाव खेती श्रमिकों का अभाव है और खेती दुष्कर हो गई है। किसानों की कोशिश अनाज की जगह खेतों में ऐसी नकदी फसलें लगाने की हैं, जिनमें मजदूरों की कम आवश्यकता हो। इससे अन्न उत्पादन में कमी आना निश्चित है। 2 दिसम्बर 2001 को तत्कालीन कृषि मंत्री के अनुसार 11 वीं पंचवर्षीय योजना के पहले चार वर्ष में खाद्यान्न उत्पादन में 2.90 प्रतिशत की वृद्धि हुई। यह 2008- 09 में 23 करोड़ 44 लाख 70 हजार टन से बढ़कर 24 करोड़ 15 लाख 60 हजार टन हो गया लेकिन 2009-10 में यह 21 करोड़ 81 लाख 10 हजार टन तक सिमट गया। ये आंकड़े ही संदेहास्पद हैं पर इन्हें स्वीकार कर लें तो भी भविष्य के संकट का अहसास हो जाता है।
Monday, December 5, 2011
खेत रहेगी खेती
प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह प्रत्यक्ष विदेश निवेश को कृषि क्षेत्र के लिए वरदान समझकर थोप रहे हैं। अगर इसे वास्तविकता की कसौटी पर पर परखें तो दुर्भाग्यवश यह खेती के ताबूत में आखिरी कील साबित होगा। यह भारतीय किसानों के अंत का प्रारंभ होगा। ऐसा अमेरिका में हुआ है। चूंकि अमेरिकी बाजारों में वॉल मार्ट जैसे बहु ब्रांड खुदरा व्यापारियों का प्रभुत्व कायम हो चुका है, किसान गायब हो गये हैं और गरीबी बढ़ गई है। इसी तरह भुखमरी भी बढ़ी है। आज अमेरिका में सात लाख से ज्यादा किसान नहीं रह गए हैं। वहां गरीबी बढ़ी है और भुखमरी ने 14 साल के रिकार्ड को ध्वस्त कर दिया है। यूरोप में भी, जहां खुदरा क्षेत्र में बड़े घरानों का दखल है, हरेक मिनट पर एक किसान खेती से तौबा कर रहा है। एक रिपोर्ट के मुताबिक फ्रांस में किसानों की आय 2009 में 39 फीसद घट चुकी है जबकि 2008 में यह 20 फीसद थी। अभी हाल में स्कॉटलैंड में सुपर बाजारों की कम कीमतों ने दुग्ध उत्पादकों का भट्ठा बैठा दिया। इससे क्षुब्ध किसानों को अपने उत्पाद के एवज में वाजिब दाम पाने के लिए ‘फेयर डील फूड’ नाम से एक गठबंधन बनाना पड़ा। एक अध्ययन यह भी बताता है कि टेस्को अपने उत्पादकों को बाजार के औसत दामों से चार फीसद कम देता है। इन तथ्यों के आलोक में यह उम्मीद फिजूल है कि सुपर बाजार भारतीय किसानों का मुक्तिदाता होने जा रहा है। सुपर बाजारों द्वारा वैिक स्तर पर खेती-बाड़ी को चौपट करने के बावजूद वाणिज्य और उद्योग मंत्रालय मल्टी ब्रांड वाले खुदरा क्षेत्र में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश के गुणों को लेकर उत्साहित है। इसका सीधा मतलब वॉल मॉर्ट और टेस्को जैसे बड़े खिलाड़ियों को भारतीय बाजारों पर छा जाने देना है। औद्योगिक नीति और संवर्धन विभाग की विचार-विमर्श के लिए तैयार रिपोर्ट में कहा गया है ‘संवृद्धि, रोजगार और ग्रामीण क्षेत्रों में आर्थिक सम्पन्नता के लिए कृषि क्षेत्र को बेहतर तरीके से काम करने वाले बाजार की आवश्यकता है।’ यह समूची परिकल्पना जानबूझकर गलत आधारों पर रची गई है। क्या सुपर बाजार वास्तव में लाभदायक हैं। भारत 2006 से ही अपने खुदरा क्षेत्र को आंशिक रूप से इसके लिए खोल चुका है। क्या इसकी इकाइयों ने भारतीय किसानों और अपने उपभोक्ताओं को फायदा पहुंचाया है? इसका जवाब है-नहीं। यह तर्क कि सुपर बाजारों की श्रृंखला बिचौलिये को बाहर कर देगा जिससे किसानों को उनके उत्पादकों का ऊंचे दाम मिलेंगे और इसी प्रकार, यह खेती बाद तथा शीतगृहों के आधारभूत ढांचे के विकास में बड़ी मात्रा में निवेश करेगा। यह सारे दावे गलत हैं क्योंकि वैिक अनुभव बताते हैं कि बड़े खुदरा व्यापारियों ने किसानों को कहीं ऐसी मदद नहीं दी है। यहां तक कि ब्राजील, अजेंटिना, उरुग्वे और कोलम्बिया समेत लैटिन अमेरिकी देशों में; जहां सुपर बाजार दिग्गज बहुराष्ट्रीय कम्पनियों द्वारा संचालित होते हैं और जिनका वहां के 65 से 95 प्रतिशत बाजारों पर कब्जा है, वहां के किसान खेती छोड़ने पर मजबूर हो रहे हैं। अगर सुपर बाजार अपने आप में इतना ही पूर्ण और गतिशीलता को बढ़ावा देने वाला होता तो फिर अमेरिका खेती के लिए भारी-भरकम सब्सिडी क्यों दे रहा है? आखिरकार वॉल मॉर्ट अमेरिकी कंपनी है, उसे अमेरिकी किसानों को आर्थिक रूप से सम्पन्न करने में सहायता देनी चाहिए थी। पर ऐसा हुआ नहीं। अमेरिकी किसानों को बचाने के लिए सरकार को 1995 से 2009 तक 12.50 लाख करोड़ का पैकेज देना पड़ रहा है और इसमें प्रत्यक्ष आय सहायता शामिल है। अमेरिकी सरकार द्वारा दी जा रही यह सबसे बड़ी सब्सिडी है। अगर इस सब्सिडी को, जो वि व्यापार संगठन के आकलन में ग्रीन बॉक्स के तहत आती है, रोक (जैसी कि यूएनसीटीएडी-इंडिया ने चर्चा की है) दी जाए तो अमेरिकी कृषि व्यवस्था ध्वस्त हो जाएगी। दुनिया के 30 सम्पन्न देशों की संस्था, आर्थिक सहयोग और विकास संगठन (ओईसीडी) की 2010 की ताजा रिपोर्ट में कृषि क्षेत्र को दी जाने वाली सहायता 2008 के 21 फीसद के मुकाबले 2009 में 22 फीसद हो गई है। केवल 2009 में ही इन औद्योगिक सम्पन्न देशों को 12.60 करोड़ रुपये की मदद कृषि क्षेत्र को देनी पड़ी है। यही वजह है कि वहां के कृषि क्षेत्र से होने वाली आमदनी ललचा रही है। बड़े खुदरा घराने की बात जाने दें तो अब तक यूरोप के किसान अपना बोरिया-बिस्तर गोल कर गए होते। इसके विपरीत भारत में बाजारों का वजूद किसानों और उनके उत्पादों की वजह से है, उन्हें दी जाने वाली सब्सिडी के चलते नहीं। इसी संदर्भ में कहा जा सकता है कि हम अमेरिका से एक विफल मॉडल का आयात कर रहे हैं। जहां तक खेती से होने वाली आय की बात है तो 1950 तक अमेरिकी किसान खाद्यान्न पर होने वाले प्रति डॉलर खर्च का 70 फीसद प्राप्त करता था। 2005 तक यह घट कर तीन-चार प्रतिशत से ज्यादा नहीं रह गया। अगर बिचौलिये हट जाते, जैसा कि सुपर बाजारों के लाने में फायदे के बतौर दावा किया जा रहा है, तो किसानों की आमदनी में बढ़ोतरी होनी चाहिए थी। फिर क्यों उनकी आमदनी घट रही है? इसलिए कि बिचौलियों की नई प्रजाति ने गिद्ध की तरह उन पर झपट्टा मार दिया है। यही वजह है कि अमेरिका और यूरोपीय समुदाय के देशों को अपने किसानों को जिंदा रखने के लिए सहायता देनी पड़ रही है। यह सभी को मालूम कहावत है कि बड़ी मछली छोटी को खा जाती है। बिल्कुल इसी कहावत की तरह सुपर बाजार व्यवहार करते हैं। वे छोटे बिचौलिये की तादाद को हटा देते हैं। धोती-कुर्ता वाले अढ़ातिये की जगह सूट-बूटधारी बिचौलिये को ला खड़ा करते हैं। इसलिए यह भ्रम ही है कि सुपर बाजार व्यवसाय से बिचौलिये को एकदम से साफ कर देते हैं। वास्तविकता यह है कि बड़े घराने उनके साथ अपने मुनाफे में उन्हें साझीदार बनाते हैं। परम्परागत बिचौलिये की जगह लेने वाले नये समूह गुणवत्ता नियंत्रक (क्वालिटी कंट्रोलर), प्रमाणक एजेंसी, पैकेजिंग इंडस्ट्रीज, प्रोसेसर्स, थोकविक्रेता आदि के रूप में हो सकते हैं। क्या सुपर बाजार गरीबी हटाने में मदद करते हैं? परामर्श देने वाली कुछ संस्थाओं के गुमराह करने वाले अध्ययनों के आधार पर सरकार को भरोसा है कि सुपरबाजार रोजगार का सृजन करेंगे और इस तरह वह गरीबी हटाने में मददगार होंगे। यह भी दोषपूर्ण अनुमान है। अमेरिका के पेन्सिलवेनिया के विविद्यालय में कृषि आर्थिक और ग्रामीण समाजशास्त्र विभाग के स्टीफन जे गोत्ज और हेमा स्वामीनाथन द्वारा 2004 में किये गए अध्ययन के सबक को याद करने की जरूरत है। लेखक द्वय ने अमेरिका के विभिन्न प्रांतों में व्यापक पैमाने पर वॉल मॉर्ट के दखल से बढ़ने वाली गरीबी का अध्ययन किया है। ‘वॉल-मॉर्ट और गरीबी’
शीषर्क से किया गया समग्र अध्ययन आंखें खोल देने वाला है। यह दिखाता है कि 1987 में उन राज्यों के मुकाबले गरीबी वहां-वहां तेज गति से बढ़ी जहां वॉल-मार्ट के केंद्र ज्यादा खुले थे। रिपोर्ट का निष्कर्ष है, ‘इसी तरह, 1987 से 1998 की अवधि में अमेरिका के जिन जिलों में वॉल-मॉर्ट की यूनिटें खुलीं, वहां भी गरीबी बढ़ने की दर ज्यादा रही।’ यह तथ्य भी दिलचस्प है कि वॉल-मॉर्ट के अभियान के बाद गरीबी ऐसे समय बढ़ी जब अमेरिका में राष्ट्रीय स्तर पर गरीबी की दर में गिरावट दर्ज की गई थी। इस पाखंडपूर्ण दावे की भी कलई खुल गई है कि सुपर बाजार हजारों रोजगारों का सृजन करके आर्थिक सम्वृद्धि दिलाने वाला एक अहम कारक है। ब्रिटेन में टेस्को और सैन्सबरी सुपर बाजारों की श्रृंखला हजारों लोगों को रोजगार देकर आर्थिक सम्वृद्धि बढ़ाने में विफल हो गई है। विगत दो सालों में टेस्को ने 11000 और सैन्सबरी ने 13000 लोगों को रोजगार देने का वादा किया हुआ था। इसके बजाए टेस्को ने मात्र 726 लोगों को रोजगार दे सका जबकि सैन्सबरी ने अपने मौजूदा कर्मचारियों में से 1600 को हटा दिया जबकि 874 लोगों को बेरोजगार छोड़ दिया। ऐसे हालात में हम यह कैसे उम्मीद पाल सकते हैं कि टेस्को/सैन्सबरी भारत में रोजगार के अतिरिक्त अवसर मुहैया करेगा जबकि वे अपने घरों में ही अपने वादे निभाने में विफल रह गए हों? दरअसल, बड़े खुदरा घराने अतिरिक्त रोजगार के अवसर नहीं गढ़ते बल्कि वे मौजूदा अवसरों को भी खत्म कर देते हैं। यहां रखा गया तुलनात्मक अध्ययन के नतीजे हमारी आंखों पर पट्टी हटा देगा। भारतीय खुदरा बाजार 400 बिलियन डॉलर का है, जिसमें 1.20 करोड़ से ज्यादा खुदरा व्यापारी हैं और जिसके व्यवसाय से चार करोड़ लोगों को रोजगार मिला हुआ है। इसके विपरीत, वॉल-मार्ट जिसका सकल व्यापार 400 बिलियन डॉलर का ही है, उसमें मात्र 2.1 मिलियन (20 लाख से कुछ ज्यादा) लोगों को ही रोजगार मिला है। अब घरेलू या विदेशी बड़े खुदरा घरानों में से कौन ज्यादा रोजगार दिला सकता है, यह एकदम साफ है। अब अगर कोई समझता है कि वॉल-मॉर्ट भारत में रोजगार मुहैया करा सकता है तो उसे मूखरे के स्वर्ग में रहना ही कहा जाएगा। यह सरल बात है, वह मुनाफा कमाने के लिए भारत में निवेश करने आ रहे हैं। मैं नहीं समझता कि देश के अर्थशास्त्री, नीति-निर्माता और मंत्री यह सोच सकते हैं कि बड़े खुदरा व्यापारी उनके लोगों को रोजगार देंगे जबकि पूरे वि के प्रमाण हैं कि इन्होंने पहले से काम कर रहे लाखों लोगों की रोजी-रोटी ही छीनी है। तो इस तरह गलत आंकड़े और तथ्य के पेश करके हम अपने देशवासियों के साथ छल नहीं कर रहे? बड़े घरानों को न्योतने से करोड़ों हॉकरों, छोटे व्यवसायियों और किसानों की आजीविका संकट में पड़ गई है। आम आदमी के लिए काम करने का दावा करने वाली कोई संवेदनशील सरकार प्रत्यक्ष विदेश निवेश के नाम पर करोड़ों लोगों की रोजी-रोटी पर व्यापक संकट ला सकती है? क्यों हमारी सरकार अमेरिका और यूरोपीय समुदाय की अर्थव्यवस्थाओं को मंदी से निजात दिलाने और इस प्रक्रिया में भारत को अंधाधुंध मंदी में धकेलने के लिए बेताब है?
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