Monday, February 14, 2011

सबसे बड़ा घाटा


इस बजट में अगर वित्त मंत्री दस फीसदी विकास दर का दम भरें तो पलट कर खुद से यह सवाल जरूर पूछिएगा कि आखिर पांच फीसदी (सुधारों से पहले यानी 1989-90) से साढ़े आठ फीसदी तक आने में हम इतने हांफ क्यों गए हैं। ग्रोथ की छोटी सी चढ़ाई चढ़ने में ही गला क्यों सूख गया है। दो दशकों में सिर्फ तीन-चार फीसदी की छलांग इतनी भारी पड़ी कि कदम ही लड़खड़ा गए हैं। अचानक सब कुछ अनियंत्रित व अराजक सा होने लगा है। जमीन से लेकर अंतरिक्ष (एस-बैंड) तक घोटालों की पांत खड़ी है। मांग महंगाई में बदलकर मुसीबत बन गई है। नियम, कानूनों और व्यवस्था की वाट लग गई है। शेयर बाजार अब तेज विकास का आंकड़ा देखकर नाचता नहीं, बल्कि कालिख की चर्चा और महंगाई से डर कर डूब जाता है। यह बदहवासी बदकिस्मती नहीं, बावजह और बाकायदा है। दरअसल विकास की रफ्तार सुधारों पर ही भारी पड़ी है। अर्थव्यवस्था छलांग मारकर आगे निकल गई और सुधार बीच राह में छूट ही नहीं, बल्कि बैठ भी गए। आर्थिक सुधारों का खाता जबर्दस्त घाटे (रिफॉर्म डेफिसिट) में है। इसलिए बजट को अब विकास की रफ्तार से पहले इस सबसे बड़े घाटे यानी सुधारों की बैलेंस शीट की बात करनी चाहिए, क्योंकि सुधारों का बजट बिगड़ने से उम्मीद टूटती है।

सुधारों का अंधकार

बीस साल की तेज वृद्धि दर अब उन रास्तों पर फंस रही है, जहां हमेशा से सुधारों का घना अंधेरा है। भारत अब आपूर्ति के पहलू पर गंभीर समस्याओं में घिरा है। यह समस्या रोटी दाल से लेकर उद्योगों के कच्चे माल तक की है। खेती में सुधारों की अनुपस्थिति का अंधेरा सबसे घना है। कृषि उत्पादो की आपूर्ति की कमी ने महंगाई को जिद्दी और अनियंत्रित बना दिया है। अगर यह बजट सुधारों पर आधारित होगा तो यह पूरी ताकत के साथ खेती में सुधार शुरू करेगा। खेती में अब सिर्फ आवंटन बढ़ाने या बैंकों के लिए कर्ज का लक्ष्य बढ़ाने की झाड़ पोंछ से काम चलने वाला नहीं है। भारत की खेती को जमीन, पानी, खाद, कीमत, शोध, बिक्री, निर्यात और यहां तक कि अपनी जरूरत के लिए विदेश में उपज जैसे एकमुश्त बड़े सुधार चाहिए। दूसरी तरफ औद्योगिक कच्चे माल की आपूर्ति और अस्थिरता खनन क्षेत्र में सुधार मांगती है। जबकि रेलवे को सुधारों का बिल्कुल अनोखा रसायन चाहिए। अगर अब भी बिजली की आपूर्ति में सुधार अपरिहार्यता नहीं बने, तो डीजल पीकर दौड़ती अर्थव्यवस्था दम तोड़ देगी। सुधारों की अनुपस्थिति ने अचल संपत्ति के क्षेत्र को विस्फोटक बना दिया है। इसी तरह पूरे सेवा क्षेत्र को सुधारों की खुराक चाहिए, ताकि गुणवत्ता व सेवाओं का स्तर बेहतर हो। यह रफ्तार में पीछे छूट गए अंधेरे कोनों की बात है। अगर यह बजट इनमें रोशनी नहीं भरता तो कम से कम यह सुधार का बजट तो नहीं होगा।

सुधारों का सुधार

चलते सुधारों में सुधार की जरूरत बड़ी गहरी है। देश को बड़ी उम्मीदों के साथ एक समान कर ढांचे वाली मूल्य वर्धित कर प्रणाली यानी वैट मिला था, जिसने राच्यों के व्यापार या बिक्री कर की जगह ली थी, मगर राच्य सरकारों ने मनमाने ढंग से दरें बढ़ाकर वैट को चौपट कर दिया। यह एक अच्छे सुधार का प्रदूषित होना था। देश इस बजट में बहुत बेसब्री के साथ यह तलाशेगा कि वित्त मंत्री गुड्स एंड सर्विसेज टैक्स (जीएसटी) कब लाएंगे। इसके लगातार टलते जाने से उम्मीद कमजोर पड़ने लगी है। सिर्फ अप्रत्यक्ष कर की नहीं, आयकर प्रणाली का नया कानून भी लंबित है। लोग यह भी जानना चाहेंगे कि बढ़ते आय वाले देश में कर का आधार बढ़ाने के लिए वित्त मंत्री की सूझ क्या है और काले धन को रोकने के लिए बजट का मंत्र क्या है। बैंकिंग क्षेत्र को सुधारों की नई खुराक चाहिए। न केवल ज्यादा निवेश और विदेशी निवेश के उदारीकरण के तौर पर, बल्कि गहरी पारदर्शिता के रूप में भी। सुधारों में सुधार की जरूरत बाजार को भी है। जिंस वायदा बाजार नए किस्म की पारदर्शिता मांगता है, जबकि शेयर बाजारों में अस्थिरता रोकने व बांड बाजार को सक्रिय करने के लिए बजट से कुछ जरूर आना चाहिए। जिंस वायदा पारदर्शिता के मोर्चे पर सुधार चाहता है ताकि इससे महंगाई को ईधन न मिले। भारत की नई आर्थिक क्रांति को आए बीस साल बीत रहे हैं। इसलिए लघु उद्योगों को मदद, निर्यात प्रोत्साहन, भूमि अधिग्रहण, विदेशी निवेश, श्रम, आयात की नीति, सार्वजनिक उपक्रम विनिवेश आदि से जुड़े सुधारों को अब सुधारने की जरूरत है। अगर यह बजट सुधारों की नई पीढ़ी नहीं लाता तो सिस्टम मौजूदा सुधारों के फायदों को खा जाएगा।

सुधारकों का सुधार

यह सबसे गंभीर विषय है और शायद सरकार की साख का सबसे बड़ा इम्तहान भी। भारत में आर्थिक उदारीकरण का सबसे बेचैन करने वाला पहलू यह है कि यहां सुधारकों में सुधार की प्रक्रिया बहुत धीमी रही है। ग्रोथ को संभालने और सही राह पर चलाने वाले हाथ इतने सुस्त रहे कि विकास अनियंत्रित होकर बिखर गया। भारत में विकास की गति इतनी तेज रही कि सरकार भी खुद यह समझ नहीं पाई कि उसे कब कहां कैसे दखल देना है और कहां-कहां नियमों को नए सिरे से बदलने की जरूरत है। भारत में नियामकों की जबर्दस्त किल्लत है और जो हैं भी, वे अक्षम और विवादित साबित हुए हैं। दूरसंचार क्षेत्र में नियामक के बावजूद कोई नीति घोटाले का लेबल लगे बिना या सुप्रीम कोर्ट में उलझे बिना पार नहीं होती। दूरसंचार नियामक सहित अन्य नियामकों के अधिकारों में बदलाव जरूरी है। इसी तरह अचल संपत्ति, तमाम तरह की वित्तीय सेवाएं, निजी सेवाएं, पारदर्शिता, ऊर्जा, प्राकृतिक संसाधन के दोहन आदि को नियामकों की जरूरत है, ताकि सरकार सिर्फ सिस्टम बनाए और नियामक सबके लिए समान मौके उपलब्ध कराएं। सुधारकों के सुधार में खुद सरकार भी शामिल है। सरकार में कामकाज के नियम (वर्किग रूल्स), नियुक्तियां, कागजी जरूरतों आदि को सुधार की जरूरत है। सुधार की जरूरत सरकार के खर्च प्रबंधन तंत्र, मॉनिटरिंग तंत्र, आंकड़ा प्रणाली आदि को भी है। पता नहीं बजट के सूत्रधार कितनी हिम्मत दिखाएंगे। 1991 में संकट वाले वर्ष (1.1 फीसदी विकास दर) के ठीक पहले तक हम औसतन पांच फीसदी की रफ्तार से दौड़ रहे थे। नब्बे के आखिरी दशक में औसतन 6.5 और पिछले दशक में 8.5 फीसदी की विकास दर बताती है कि हम बहुत तेज नहीं दौड़ पाए, क्योंकि विकास की रफ्तार बढ़ने के साथ सुधार घटते चले गए। जरा सी ग्रोथ ने पूरे सिस्टम और बुनियादी ढांचे को निचोड़ लिया है। नतीजतन ग्रोथ का इंजन अब कालिख फेंकने लगा है। इसलिए अगले बजटों को अब सुधारों की चिंता करनी चाहिए। वित्त मंत्री बजट पेश करते हुए अगर राजकोषीय घाटे के कम होने की घोषणा करें तो खुशी से फूल जाने जैसी कोई बात नहीं है। हमारी चुनौती अब राजकोषीय घाटा है ही नहीं, बल्कि नीतियों, सुधारों, कानूनों और गवर्नेस का घाटा सबसे बड़ा संकट है। दुआ कीजिए कि यह बजट इन्हीं घाटों की भरपाई पर न्योछावर हो जाए, विकास की रफ्तार तो अपने आप आ जाएगी।


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