Friday, February 25, 2011

दादा से देश की उम्मीदें


इस बार 28 फरवरी को वित्त मंत्री प्रणब मुखर्जी अपनी सरकार का एक और बजट संसद के सामने पेश करेंगे। बजट सरकारी खर्च का मात्र लेखा-जोखा ही नहीं होता, बल्कि सैद्धांतिक रूप से यह सरकार की आर्थिक नीतियों का प्रतिबिंब भी होता है। हमेशा ही मीडिया, विशेषज्ञ और आम जनता बड़ी बेसब्री से बजट की प्रतीक्षा करते दिखाई देते हैं, लेकिन इससे अलग कुछ अर्थशास्ति्रयों का यह भी मानना है कि पिछले लगभग एक-दो दशक से बजट का जैसे महत्व ही खत्म हो गया है। उनका यह कहना है कि वित्त मंत्री किसी भी प्रकार से अपने बजट में कोई ऐसी बात नहीं करते कि उसका अर्थव्यवस्था पर कोई विशेष असर पड़े। यदि इस विषय पर विचार करें तो हम देखते हैं कि हमारे पूर्व के केंद्रीय बजट बारंबार कुछ प्रवृत्तियों को दर्शाते हैं। ऐसा लगता है कि बजट कोई भी सरकार पेश करे उन प्रवृत्तियों में कोई अंतर पड़ने वाला नहीं है। ऐसे में बजट के माध्यम से सरकार प्रभावी ढंग से देश की अर्थव्यवस्था को किसी नई दिशा में ले जा सकेगी ऐसा संभव प्रतीत नहीं होता। पिछले वर्षो के बजट में एक प्रवृत्ति यह देखने को मिल रही है कि कुल बजट में पूंजीगत व्यय का अनुपात घटता जा रहा है और राजस्व व्यय का अनुपात बढ़ता जा रहा है। वर्ष 1990 में पूंजीगत व्यय का अनुपात 30 प्रतिशत से भी अधिक था जो वर्ष 2010-11 के बजट तक मात्र 14 प्रतिशत ही रह गया। इस तरह राजस्व व्यय इस दौरान 70 प्रतिशत से 86 प्रतिशत तक पहुंच गया। राजस्व व्यय में जो मदें शामिल होती हैं वे हैं ऋण पर ब्याज और अदायगी, रक्षा व्यय, सब्सिडी, पेंशन, आर्थिक एवं समाजिक सेवाएं इत्यादि। पूंजीगत व्यय में मुख्य रूप से रक्षा क्षेत्र में पूंजीगत व्यय और सरकारी निवेश और निवेष हेतु ऋ ण एवं अनुदान शामिल होते हैं। दुर्भाग्य का विषय है कि केंद्र सरकार द्वारा लिए गए ऋ णों की अदायगी पर खर्च लगातार बढ़ता जा रहा है। जहां यह अदायगी 1990-91 में मात्र 21498 करोड़ रुपये थी वहीं वर्ष 2010-11 में 2.49 लाख करोड़ रुपये पहुंच गई। यानी हमारे बजट का कुल 22 प्रतिशत से भी अधिक का हिस्सा आज ऋ णों पर ब्याज अदायगी पर खर्च हो जाता है। इस प्रवृत्ति को बदलना असंभव-सा होता जा रहा है। ऐसा इसलिए है कि हर बार सरकार अपने भारी भरकम खर्च को पूरा करने के लिए बड़े घाटे का बजट बनाती है। पिछले वर्ष सरकार ने लगभग 3.81 लाख करोड़ रुपये के घाटे का बजट बनाया। जाहिर है इसके लिए और ऋ ण लिए गए और आगामी वर्ष में सरकार को पहले से ज्यादा ब्याज और ऋ ण अदायगी पर खर्च करना होगा। इस प्रवृत्ति को थामने के लिए भी जरूरी है कि सरकार अपने खर्चो पर अंकुश लगाए। दूसरी प्रवृत्ति जो पिछले वर्ष के बजटों में देखने को मिल रही है वह यह है कि अर्थव्यवस्था के महत्वपूर्ण क्षेत्र कृषि पर व्यय लगातार घटता जा रहा है। जहां कृषि पर 1990 के दशक में योजना व्यय का लगभग 10 प्रतिशत खर्च होता था, पिछले वर्ष 2010-11 के बजट में वह घटकर मात्र 2.5 प्रतिशत तक ही रह गया है। जाहिर है ऐसे में कृषि का विकास बाधित हो रहा है। उसका असर कृषि उत्पादन पर सीधे-सीधे दिखाई दे रहा है। जहां अर्थव्यवस्था के दूसरे क्षेत्र तेजी से प्रगति कर रहे हैं और पिछले कई वर्षो से कृषि की विकास दर शून्य अथवा उसके निकट टिकी हुई है। सरकार की वर्तमान प्राथमिकताओं को देखते हुए कृषि पर उसका ध्यान बढ़ने की संभावनाएं भी न के बराबर हैं। हमारी सरकार बारंबार ढांचागत विकास की बात करती दिखाई देती है। वास्तव में ढांचागत विकास आर्थिक विकास के लिए नींव का काम करता है। आम जनजीवन स्तर में सुधार के लिए सड़क, बिजली और अन्य ढांचागत विकास की खासी आवश्यकता है, लेकिन तमाम घोषणाओं के बावजूद हम देखते हैं कि 1993-94 में जहां जीडीपी का 6 प्रतिशत ढांचागत विकास पर खर्च होता था, 2010-11 तक आते-आते वह मात्र 5 प्रतिशत ही रह गया। इससे भी कहीं ज्यादा महत्वपूर्ण बात यह है कि ढांचागत क्षेत्र में सरकारी खर्च पहले से भी कम हो गया है और चाहे ऊर्जा का क्षेत्र हो, सड़क निर्माण हो, संचार माध्यमों का विकास हो अथवा एयरपोर्ट व जल पत्तन सब कुछ जैसे निजी-सार्वजनिक साझेदारी के नाम पर निजी हाथों में सौंपा जा रहा है। इस तरह कहा जा सकता है कि सरकार पहले की तुलना में अब ढांचागत विकास पर से ध्यान हटा रही है जिस कारण इस मद में खर्च भी कम किया जा रहा है। इसके अलावा एक अन्य प्रवृत्ति जो देखने को मिलती है वो यह है कि हालांकि सरकार सामाजिक सेवाओं जैसे- शिक्षा और स्वास्थ्य के महत्व को भले ही बार-बार रेखांकित करती आ रही है, लेकिन इन सेवाओं पर उसका खर्च निम्न स्तर पर बना हुआ है और उसमें कोई वृद्धि दिखाई नहीं देती। पिछले बजट में भी सामाजिक सेवाओं के लिए मात्र 10,0464 करोड़ रुपये का प्रावधान रखा गया था। यह राशि कुल बजट का मात्र 9 प्रतिशत ही बैठता है। इसके कारण सरकार द्वारा प्रदान की जा रही सामाजिक सेवाओं का विस्तार तो हो नहीं पा रहा है और जो योजनाएं चल भी रही हैं उनका स्तर नीचे गिरता जा रहा है। शिक्षा के क्षेत्र में लगातार बढ़ता निजीकरण आम आदमी के लिए शिक्षा के लक्ष्य को दूर कर रहा है और स्वास्थ्य सेवाओं में बढ़ते निजीकरण से स्वास्थ्य सुविधाएं लगातार महंगी होती जा रही है और आम आदमी के लिए अपना इलाज कराना असंभव होता जा रहा है। एक अन्य प्रवृत्ति जो देखने को मिल रही है वह यह है कि जन वितरण प्रणाली के माध्यम से आम जन को जो सस्ता अनाज उपलब्ध करवाया जाता था उसमें खासी कमी आई है। अब सस्ता अनाज केवल बीपीएल कार्डधारकों को ही उपलब्ध हो रहा है। इस व्यवस्था में खामियों के मद्देनजर सरकार द्वारा खाद्य सुरक्षा कानून बनाने की बात की गई थी, लेकिन उस प्रक्रिया को भी धीमा कर दिया गया और प्रस्तावित कानून का दायरा भी कम कर दिया गया है। विशेषज्ञों का मानना है कि इस कानून के बनने के बाद भी सरकार द्वारा गरीबों को अनाज उपलब्ध कराने की दिशा में कोई विशेष परिवर्तन नहीं आने वाला है। इन सब प्रवृत्तियों के मद्देनजर आने वाला बजट तभी प्रभावी हो सकता है जब सरकार ईमानदार इच्छाशक्ति के साथ किसान-मजदूरों और आम आदमी के हित में बजट बनाए जिसमें समाजिक सेवाओं जैसे-शिक्षा और स्वास्थ्य पर खर्च कम से कम दोगुना किया जाए। वर्तमान दौर में सार्वजनिक-निजी साझेदारी के माध्यम से ढांचागत क्षेत्र में भी विकास जारी रहना चाहिए, लेकिन सरकार को ढांचागत क्षेत्र में अपने खर्च को कम से कम 50 प्रतिशत बढ़ाना चाहिए। इसके अलावा सरकार को चाहिए कि वह अपने कुल योजना व्यय का कम से कम 10 प्रतिशत हिस्सा कृषि क्षेत्र पर खर्च करे। जब तक कृषि क्षेत्र में सुधार के लिए विशेष प्रयास नहीं किए जाते तब तक इसमें विकास की संभावना भी नहीं होगी। अर्थव्यवस्था के विकास के लिए कीमतों पर प्रभावी नियंत्रण कृषि के विकास से ही संभव है। खाद्य सुरक्षा कानून को हर उस व्यक्ति तक पहुंचाना होगा जिसकी खाद्य सुरक्षा खतरे में है। (लेखक आर्थिक मामलों के जानकार हैं)

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